राष्ट्रीय सूचना अधिकार आयोग पर नौकरशाही का दबदबा

अपने पहले ही दिन से सूचना अधिकार अधिनियम-2005 सरकार के गले की फांस बना हुआ है। इसलिए किसी न किसी बहाने इसपर हमला या इसकी धार कुंद करने के प्रयास होते ही रहते हैं. आमतौर पर राजनेता तो इस बावत चुप ही रहते हैं, वे जनता की सीधे-सीधे बुराई मोल नहीं ले सकते, परंतु नौकरशाह किसी न किसी बहाने से इस अधिनियम के पर कतरने के प्रयासों में लगे रहते हैं. कदाचित अपने आका राजनेताओं को खुश करने की चाहत में, समय-समय पर उनके ऐसे बयान आते ही रहते हैं, जो इस अधिनियम की मूलभावनाओं से कहीं मेल नहीं खाते। कुछ महीने पहले फाइल की नोटिंग को सूचना अधिकार अधिनियम के दायरे से बाहर रखने की मांग इन नौकरशाहों ने ही की थी। सरकार भी तैयार थी, अधिनियम की समीक्षा की बात कही गई. किंतु बदनामी के डर से सरकार ऐसा फैसला लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. ध्यातव्य है कि सरकार ने सूचना के अधिकार को सुलभ और सशक्त बनाने के लिए उच्चाधिकार संपन्न आयोग का गठन किया है, उसके मुख्य सूचना आयुक्त का दर्जा देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के समकक्ष है.
यह विडंबना ही है कि अपने गठन के लगभग साढ़े तीन वर्ष पूरे होने के बाद भी आयोग समाज के बीच अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराने में असमर्थ रहा है, बल्कि जितना इसका आरंभिक दबदबा था, वह भी नौकरशाही की प्रशासनिक जकड़बंदी के कारण धीरे-धीरे कम होता जा रहा है. हाल ही में सरकार ने कुछ ऐसे नियम बनाए हैं, जो इस अधिनियम को कमजोर कर देने की सोची-समझी साजिश का नमूना हैं. हालांकि थोड़े ही वर्षों में ‘सूचना का अधिकार अधिनियम’ के पक्ष में अनेक उपलब्धियां दर्ज हो चुकी हैं, परंतु उनका श्रेय कुछ जागरूक नागरिकों तथा सूचना अधिकार अधिनियम के प्रचार-प्रसार में लगे स्वयंसेवी, संगठनों को जाता है. दूसरी ओर यह भी सच है कि अभी तक लोगों ने इस अधिनियम का लाभ उठाने का प्रयास किया है, उनमें से अधिकांश राजधानी या शहरी परिक्षेत्र से जुडे़ हुए हैं. ग्रामीण लोगों तक इस अधिनियम की पहुंच अभी तक नहीं बन पाई है. चूंकि देश की दो-तिहाई जनसंख्या अभी तक गावों में रहती है. अतः देश के बहुसंख्यक वर्ग का इस अधिनियम के प्रावधानों के प्रति अनभिज्ञ होना, वह भी ऐसे समय जब शक्तिशाली सूचनातंत्र घर-घर तक अपनी पहुंच बनाए हुए है, यह इस कानून के प्रति सरकार की उदासीनता को दर्शाता है. यह इसलिए भी प्रमाणित है कि अक्टूबर-2005 से, जबसे सरकार ने यह अधियिम लागू किया है, इसके प्रचार-प्रसार पर होने वाला खर्च लभगभ शूण्य है. इस तथ्य को सूचना आयोग भी स्वीकार चुका है.
परेशानी तब और भी बढ़ जाती है जब वही लोग इस अधिनियम के परिसीमन की मांग करते लगते हैं, जिनके ऊपर इस अधिनियम के सफल कार्यान्वन की जिम्मेदारी है. क्या इसलिए कि वे स्वयं भी नौकरशाह हैं? लोगों को सिर उठाकर हवा में खुलकर सांस लेते देख लेने से ही उनका अहं फुफकारने लगता है? सूचना अधिकार का अधिनियम का विरोध करने वाले प्राय: यह भूल जाते हैं कि लोकतंत्र के सशक्तीकरण का सही रास्ता सूचना की सर्वसुलभता के रास्ते से ही जाता है. कुछ महीने पूर्व एक सूचना आयुक्त बार-बार इस इस बात पर सार्वजनिक रूप से दुःख प्रकट कर रहे थे कि सूचना अधिकार अधिनियम का ज्यादातर लाभ सरकारी कर्मचारी उठा रहे हैं…कि इस अधिनियम के अंतर्गत आने वाले प्रार्थनापत्रों में से अधिकांश नौकरी की समस्याओं या तरक्की से जुडे़ मामलों को लेकर होते हैं…
इसपर एक समाचारपत्र ने अपने त्वरित संपादकीय में सूचना आयुक्त महोदय के सुर में सुर मिलाते हुए इस बात को दुर्भाग्यपूर्ण बताया गया कि सरकारी कर्मचारी (केवल) अपने किसी हक के लिए इस अधिनियम का उपयोग करें…तरक्की के लिए सीढ़ी बनाएं…कि जैसे सरकारी कर्मचारी इस देश के नागरिक ही नहीं हैं…जैसे सरकारी कर्मचारियों के उपयोग मात्र से इस अधिनियम की चमक फीकी पड़ जाएगी. लगता है कि इस तरह की टिप्पणी करते समय संपादक महोदय यह भूल गए थे कि देश के सरकारी कार्यालयों में सीसीएस और सीसीए के अंतर्गत जो प्रशासनिक नियम-कानून सरकार ने लागू किए हुए हैं, उनका ढांचा लगभग वही है, जो अंग्रेजों के समय के सरकारी दफ्तरों का था, जिसमें अंग्रेज बहादुर सर्वेसर्वा होता था, जो अपने हितों की खातिर सारे कायदे-कानून ताक पर रख देता था.
मुट्ठी-भर अंग्रेजों ने इस देश पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए उच्चस्तरीय नौकरशाहों को अतिरिक्त रूप से अधिकार-संपन्न बनाया था. क्योंकि उन पदों पर या तो स्वयं अंग्रेज नियुक्त होते थे अथवा उनके मुंहलगे, खुशामदी सामंतपुत्र. वही कानून आज भी उच्चस्तरीय नौकरशाहों को अतिरिक्तरूप से अधिकार संपन्न बनाते हैं. सरकारी कर्मचारी को भी शीर्षस्थ अधिकारियों के उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है. विद्वान संपादक एवं सूचना आयुक्त महोदय को इतना तो मालूम ही होगा कि उत्पीड़न या भ्रष्टाचार का शिकार अकेले जनता ही नहीं होती. अपने पद का दुरुपयोग कर कई बार ये बड़े अधिकारी अपने चहेतों को आगे ले आते हैं और जिनको तरक्की मिलनी चाहिए वे उससे वंचित रह जाते है. भाई-भतीजावाद के आरोप ऐसे ही तो नहीं लगाए जाते. सूचना अधिकार का अधिनियम यदि ऐसे उत्पीड़कों को अपनी बात उठाने का एक अवसर देता है तो इसमें बुराई ही क्या है.
यह अधिनियम आमजन और छोटे कर्मचारियों को सत्ता के तिलिस्म में सेंध लगाने का अधिकार देता है, जिससे कि वे सूचना को जनता के बीच ले जाकर उसे सच से रू-ब-रू करा सकें. उसपर सरकारी कर्मचारियों की संख्या है ही कितनी. भारत की कुल जनसंख्या के अनुपात से देखा जाए तो मुट्ठी-भर भी नहीं. आरोप लगाते समय जनाब सूचना आयुक्त यह भी भूल गए थे कि इस देश के आमजन का सशक्तीकरण कहीं न कहीं सरकारीतंत्र की पारदर्शिता से भी जुड़ा है; और नौकरशाही इसलिए भी बलवान है, क्योंकि इसमें अपनी कलम की ताकत का डर दिखाकर बड़े अधिकारी छोटों से मनमाने काम करा ले जाते हैं. सूचना अधिकार अधिनियम ने आम जनता के साथ साथ उन अधिकारियों एवं कर्मचारियों को भी ताकत दी है जो अपनी मेहनत और ईमानदारी के साथ काम करना चाहते हैं. इसलिए सरकारी कर्मचारियॊं को इस अधिनियम के लाभॊं से वंचित करना या किसी भी प्रकार से हतोत्साहित करना सरकारी मशीनरी में यथास्थिति बनाए रखने की साजिश जैसा होगा.
ऐसा नहीं है कि वर्तमान प्रशासनिक नियम छोटे सरकारी कर्मचारियों के एकदम विरुद्ध हैं. बल्कि जो कानून बड़े अधिकारियों के लिए उन्हीं के अंतर्गत छोटे कर्मचारियों को भी काम करना पड़ता है. लेकिन बड़े अधिकारियों को विवेक के इस्तेमाल की छूट उन्हें कभी-कभी उन्हें असीमित रूप से सामर्थ्यवान बना देती है. हालांकि वर्तमान नियमों में भी ऐसा प्रावधान है जिससे फाइल में दर्ज सूचनाएं मांगने पर उपलब्ध कराई जा सकती हैं. लेकिन इस कानून की एक तो सीमाएं हैं। यह कि वह बात को कार्यालय से बाहर ले जाने की अनुमति नहीं देता और बिना उच्चाधिकारियों की अनुमति के यदि कोई ऐसा करनेका दुस्साहस करता है तो उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाही का अधिकार वर्तमान नियम उच्चाधिकारियों को देते हैं. वर्तमान नियमों की सरकारी गोपनीयता कानून के बहाने किसी भी सूचना को रोका जा सकता है. जबकि सूचना अधिकार अधिनियम की शर्तों के अनुसार मांगी गई सूचना को सार्वजनिक करना पड़ता है. परंपरागत सरकारी नियमों में तीसरी कमी है, स्पष्टता की और प्रार्थनापत्र के निस्तारण के लिए किसी समयसीमा का न होना, जिससे किसी भी अनचाहे प्रार्थनापत्र पर कार्रवाही अनंतकाल तक टाली जा सकती है. सूचना अधिकार अधिनियम में अंतर्गत एक ओर तो गोपनीयता कानून के आने वाली सूचनाओं की स्पष्ट व्याख्या की गई है, दूसरे इसमें हर स्तर पर कार्रवाही की समय सीमा तय गई है। तय सीमा के अंतर्गत सूचना प्राप्त न होने पर प्रार्थी ऊपर के स्तर पर अपील कर सकता है।
इतने सारे गुण मिलकर सूचना अधिकार अधिनियम को बाकी कानूनों से अलग एवं लोकोन्मुखी बनाने का काम करते हैं. इन्हीं के कारण यह कानून अनेक लोगों की आंखों की किरकिरी बना हुआ है. इसपर सूचना अधिकार अधिनियम के प्रचार-प्रसार में लगे मैग्सेसे पुरस्कार विजेता अरविंद केजरीवाल ने अंग्रेजी दैनिक ‘मिंट’ में लिखे लेख में मुख्य सूचन आयुक्त के कार्यालय में सूचना के अधिकार के कार्यान्वन में हो रही शिथिलता और लापरवाही को लेकर जो गंभीर आरोप लगाए थे, उनसे तो लगता है कि मुख्य सूचना आयुक्त का कार्यालय ही सूचना के अधिकार का दुश्मन बना हुआ है. वे आरोप इतने गंभीर थे कि सच सिद्ध होने पर मुख्य सूचना आयुक्त का इस्तीफा भी इस दाग को शायद ही धो सके, क्योंकि यह सीधे-सीधे लोकतंत्र और जनता जनार्दन के प्रति विश्वासघात का मामला बन सकता है. तब अरविंद केजरीवाल ने उदाहरण देकर बताया था कि मुख्य सूचना आयुक्त के कार्यालय में बरती जा रही शिथिलता को देखकर दूसरे सरकारी कार्यालय भी अधिनियम को लेकर लापरवाही दिखाने लगे हैं.
ऐसे में जरूरी है कि मुख्य सूचना आयुक्त और उनके सहयोगी मिलकर अपने की कार्यालय की कार्यकुशलता को सुधारने के लिए काम करें, जहां हजारॊ की संख्या में मामले सुनवाई की प्रतीक्षा कर रहे हैं. कुछ क्षेत्र तो उनसे तत्काल कार्रवाही की मांग भी करते हैं, जिनसे इस अधिनियम की साख भी जुड़ी हुई है। जैसे कि अधिनियम के अंतर्गत मांगी गई सूचना का गलत या आधे-अधूरे रूप में मिलना। जवाब में वे कह सकते हैं कि इसके लिए अपील प्राधिकारी हैं; और यदि अपील प्राधिकारी भी गलत या आधी-अधूरी सूचना देकर पीछा छुड़ाना चाहता है तो उसके लिए सूचना आयुक्त हैं. लेकिन यह प्रश्न फिर भी रह जाता है कि कितने मामलों में जनता को बरगलाने वाले अधिकारियों को गलत या आधी-अधूरी सूचना के लिए दंडित किया गया है? आयोग यदि मानता है कि जनता के हक में बनाए गए इस अधिनियम का पूरा लाभ आमजन को नहीं मिल पा रहा है, तो मेरी समझ में आमजन को उसका हक दिलाने के लिए उसमें अधिनियम के प्रति जागरूकता लाना भी सूचना आयोग का काम है।
इसलिए सरकारी कर्मचारियों को इस अधिनियम का अपने हितों के लिए उपयोग करने के लिए दोषी ठहराने ज्यादा जरूरी है कि सरकार इसके प्रचार-प्रसार के लिए योजनाएं बनाए. वे योजनाएं सिर्फ कागजी ही न रह जाएं इस बात पर निरंतर नजर रखी जानी चाहिए. सरकारी कर्मचारियों को दोषी ठहराना तो आसान है, उसके बहाने से एकाध प्रेस रिलीज जारी करने जैसा रूटीन कार्य भी किया जा सकता है, किंतु सूचना के अधिकार को जन-जन तक ले जाकर उसे अधिकाधिक लोकोन्मुखी और व्यापक बनाने का काम बहुत ही चुनौती पूर्ण है. लेकिन टी. एन. शेषन जैसा नामचीन नौकरशाह बनने के लिए ऐसी ही चुनौतियों से गुजरना पड़ता है. ध्यान रहे कि शेषन साहब ने भ्रष्ट कही जाने वाली इसी नौकरशाही को एकदम पटरी पर लाकर निर्वाचन आयोग को दूसरों के लिए उदाहरण बनाने का कार्य किया था। उन्हीं की प्रेरणा थी जो उत्तरप्रदेश के पिछले विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग को शाबासी का हकदार पाया गया था.
इसलिए जनाब सूचना आयुक्त से अनुरोध है कि वर्तमान सूचना अधिनियम को परिसीमित करने के बजाय वे इसे और अधिक उपयोगी, सशक्त एवं प्रभावी बनाने का काम करें. तभी उनके कहने और होने की सार्थकता है. नहीं तो जाने कितने अधिकारी आए और गए. समय की छलनी में सिर्फ दो तरह के नाम ऊपर रह जाते हैं—एक वे जो समाज के भले के लिए काम करते हैं तथा दूसरे वे जो भलाई के काम में अडंगा लगाने का काम. यह इंसान के ऊपर है कि वह इनमें से कौन-सा रास्ता अपने लिए चुनता है. निश्चय ही सरकार तथा सूचना अधिनियम के कार्यान्वन से जुड़े कर्मचारियों तथा अधिकारियों पर यह जिम्मेदारी है कि वे न केवल इस अधिनियम कि ताकत एवं पवित्रता को बनाए रखेंगे, बल्कि अधिक से अधिक नागरिकों को इससे परचाकर, भारतीय जनतंत्र को और अधिक सफल एवं मजबूत बनाने में अपना बहुमूल्य योगदान देंगे.
प्रस्तुति: विनायक

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