कालिख लगे दिन : समापन किश्त

नवंबर 5, 1984
हौले-हौले पटरी पर लौटती जिंदगी
प्रिय…!
परसों तक का हाल मैंने तुम्हें लिखा. जैसा देखा-सुना ठीक उसी को शब्द देने की कोशिश मैंने की. जहां कहीं हैवानियत का नंगा नांच, इंसान के पतन की पराकाष्ठा देख कलम को शर्म को आने लगी, वहां मैंने कड़वी हकीकत से मुंह मोड़ लिया. यह विचार भी मन में आया कि इन दागदार लम्हों को किसलिए संजोया जाए. क्यों तैयार किया जाए दर्द का दस्तावेज, कलंकों को इश्तिहारी जुबान क्यों दी जाए. तुम होतीं तो शायद कभी न लिखता- पर अपने अकेलेपन के बीच तो मेरी कलम ही सहचरी है. पीड़ा जब बहुत ज्यादा सघन हो जाती थी तो कलम ही सहारा बनती थी. डायरी के ये हिस्से भी शायद इसलिए लिखता गया कि वर्षों बाद जब सबकुछ ठीक-ठाक हो जाए, एकदम पहले जैसा दिखाई पड़ने लगे, लोग आपस में इतने हिल-मिल जाएं कि बड़े से बड़ा हादसा उन्हें बांट ही न सके, तब अतीत के इन काले-कुलिश लम्हों को इंसानियत की भयावह त्रासदी के रूप में याद किया जा सके.
शब्दों का इतना सामर्थ्य कहां कि कड़वी-कसैली हकीकत को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर सकें. सो थोड़े लिखे को बहुत समझना. कल का दिन काफी सामान्य था. दिन के समय कर्फ्यू में ढील दी गई. चार दिनों से घरों में बंद लोग काम पर निकले भी. जहांगीरपुरी मेहनतकश लोगों की कालोनी है. अधिकांश निवासियों के हालात रोज कमाने और खाने के हैं. ऐसे लोगों को चार-चार दिन घर में बंद रहना पड़े. पता नहीं कितनों को इस बीच फाके करने पड़े होंगे. कितनों ने अपने मासूम बच्चों को भूखा सुलाया होगा. इस बात को न वे समझ सकते हैं, जो धर्म के नाम पर देश का बंटवारा करना चाहते हैं, न ही लाशों की राजनीति करने वाले सफेदपोश नेता-हत्यारे.
कई दिन बाद मैं भी फैक्ट्री के लिए निकलना चाहता था. लेकिन तैयार होने के बाद याद आया कि आज तो साप्ताहिक अवकाश है. सो आजादपुर मंडी की ओर निकल गया. जहां से एक नवंबर की रात को गुजरा था. वहां जगह-जगह दुकानें खाक हुई पड़ी थीं. ट्रकों और बसों के जले हुए पिंजर, राख से काली पड़ी इमारतों को देख मन रो उठा. टूटे हुए मकान, भस्म हुए सिनेमाघर लुटी-पिटी दुकानें, सभी कुछ हैवानियत की भेंट चढ़ाया जा चुका था. सिर्फ सरदार मालिक होने के कारण मोतीनगर स्थित कैंपाकोला बनाने की फैक्ट्री को उपद्रवियों ने जलाकर खाक कर दिया. यह भी नहीं सोचा कि उसमें काम करने वाले सभी सरदार नहीं, हिंदू हैं और सैकड़ों के घर का चूल्हा उसकी कमाई से ही जलता है. फैक्ट्री जल जाने के बाद अब वे सबके सब बेरोजगार हो जाएंगे. करोड़ों की संपत्ति जो इन दंगों में नष्ट की गई. उसे जुटाने में तो दशकों लगेंगे ही, हजारों जान जाने से जो परिवार बरबाद होंगे उससे उबरने में ही शायद पूरा जीवन गुजर जाए. हो सकता है उनमें से कुछ भूख और बेकारी की मार से घबराकर आत्महत्या जैसा पाप कर बैंठे. ऐसे में उनका पाप किसको लगेगा. कोई धर्म है ऐसा जो इस पाप का प्रायश्चित करा सके.
इधर एक और दिल दहला देने वाली खबर मिली. पीछे कुछ जुनूनी लोगों ने मशहूर लेखक खुशवंत सिंह को भी नहीं छोड़ा था. उनके घर पर धावा बोल दिया. इस देश के साहित्य की विदेशों में जो प्रतिष्ठा है, उसमें खुशवंत सिंह का योगदान भी कम नहीं है. एक अरबपति पिता की संतान होने के बावजूद उन्होंने लेखन को चुना; और अपनी पूरी जिंदगी उसके नाम कर दी. इसमें उनका तो बड़प्पन है ही, साहित्य के लिए भी भला ही हुआ है. सिख खुशवंत सिंह ने अपने लेखन में सदा ही मनुष्यता को ऊपर रखा है, कभी अपने लेखन को धर्म, जाति या वर्ग के दायरे में कैद नहीं किया. लेकिन जिनके सिर पर खून सवार हो वे इतनी गहरी बात कहां सोच पाते हैं. सोच पाते तो दंगे जा धत्कर्म करते ही क्यों!
दंगायियों ने जब खुशवंत सिंह के घर को चारों ओर से घेर लिया तो उन्हें मदद के सरदार ज्ञानी जैल सिंह का नाम याद आया. तुम जानती हो न! हमारे महामहिम राष्ट्रपति. देश के प्रथम नागरिक. पर वहां से जो जवाब मिला उससे भी तुम इस देश की साझा संस्कृति की गहराई के बारे में अनुमान लगा सकती हो. सुनकर तुम्हें शायद हैरानी हो. गर्व तो होगा ही. महामहिम राष्ट्रपति चाहते तो सीधे पुलिस कमिश्नर को फोन करके मदद पहुंचा सकते थे. अपनी गाड़ी और कमांडो भेजकर खुशवंत सिंह को वहां से सुरक्षित निकलवा सकते थे. पर उन्होने उनसे सिर्फ इतना कहा, मात्र एक सलाह कि— ‘अपने किसी हिंदू मित्र के यहां छिप जाओ.’ कितनी ऊंची बात थी. सरकारी आंकड़ों के अनुसार जिन दंगों में सिर्फ दिल्ली में 2733 लोग मारे गए हों, वहां एक सिख राष्ट्रपति एक सिख लेखक को हिंदू मित्र से मदद मांगने की सलाह दे. इसकी गहराई को वही समझ सकता है, जिसने इस देश की साझा संस्कृति को समझा हो. इससे यह बात भी तय होती है कि इतने ऊंचे पद पर वही जा सकता है, जो दिल से भी बड़ा हो. राष्ट्रपति महोदय ने तो अपना बड़प्पन सिद्ध कर दिया, लेकिन अपने अनुभवहीन प्रधानमंत्री का बचकाना वक्तव्य कि ‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिल जाती है.’ ऐसा वक्तव्य एक बेटे का तो हो सकता है, देश के प्रधानमंत्री का नहीं.
खुशवंत बच गए या मानो कि बचा लिए गए. बाद में नानावटी जांच आयोग के सामने उन्होंने जो बयान दिया उसमें देश के हर सिख, बल्कि सिख की क्यों हर उस संवेदनशील इंसान के दिल का समाया हुआ है, जो उन दंगों से गुजरा था, या उस त्रासदी को सच्चे दिल से अनुभव कर सकता है. अपनी थरथराती हुई आवाज में खुशवंत सिंह ने आयोग के सामने कहा था- ‘तब मुझे लगा था कि मैं इस देश में एक शरणार्थी की तरह हूं. दरअसल मैं नाजी जर्मनी में यहूदी की तरह हूं.’ उफ! तुम अंदाजा लगा सकती हो. यह कहते समय कलम का वह धनी इंसान कितनी पीड़ा से गुजरा होगा. हिंदू हो या मुस्लिम, सिख हो या ईसाई, या कोई भी अन्य समाज-समुदाय हो. जो अपने कलाकारों, साहित्यकारों और संस्कृति-कर्मियों का सम्मान नहीं करना जानता, उसको क्या हम सभ्य कह सकते हैं? हरगिज नहीं, वे तो मनुष्यता के कलंक ही कहे जाएंगे.
इस बीच कई अच्छी खबरें भी सुनने को मिलीं. ऎसी खबरें जिनसे इंसनियत पर भरोसा कायम हो. जो भारत की साझा संस्कृति की अनमोल मिसाल हैं. भीषण दंगॊं के बीच अनेक हिंदुओं ने अपनी जान पर खेलकर भी सिखों की जान बचाई. संकट की घड़ी में उनके लिए राशन-पानी से लेकर दवाओं और डा॓क्टरों का लगातार इंतजाम करते रहे. जिन लेखकॊं और पत्रकारों ने भीषण दंगॊं के बीच सरकार की सुस्ती और दंगायियों कॊ खूब लताड़ा उनमें अधिकांश हिंदू ही थे. जान की परवाह न कर अनेक हिंदू परिवार सिखों के पुनर्वास में लगे रहे. फिर भी इन चंद दिनों में यहां अकेले रहकर जो भोगा वह मेरे जीवन की सबसे दु:खद अनुभव है. जिसे चाहकर भी भुला पाना असंभव है.
अच्छा रहा कि दिल्ली आज शांत रही. कहीं से किसी अप्रिय घटना का समाचार नहीं मिला. गांव में अखबार तो जाते नहीं. ट्रांजिस्टर से खबरें छन-छन कर ही सही तुम तक जरूर पहुंच रही होंगी. आने वाला दिन और भी अच्छा होगा, इस उम्मीद के साथ मैं यही विराम लेता हूं. मिलने पर बाकी बातें तो होंगी ही. चलते-चलते एक प्रसंग याद आया. जिस बूढ़ी औरत का जिक्र मैंने ऊपर किया है, जब वह सरदार के क्षत-विक्षत शरीर को बाहर निकालने का प्रयास कर रही थी, तब उसके एक पड़ोसी ने उसे टोका था—
‘ऐ बुढ़िया मरने दे. तू कौन-सी ‘सिक्खनी’ है जो इसे बचाना चाहती है?’
‘सिक्खनी ना सही, पर मां तो हूं.’ बुढ़िया ने तपाक से उत्तर दिया.
‘जैसे मैं जानता नहीं. मां भी तो हिंदू की ही है.’
‘चुप नासपीटे, मां तो बस मां होती है. हिंदू और सिख दोनों मेरी ही कोख से जन्मे हैं. बड़ा बेटा गुरुद्वारे में मत्था टेकने जाता है, छोटा मंदिर में जल चढ़ाता है.’
‘जिसे तू बड़ा बेटा कह रही है, उसी ने इंदिरा गांधी का कत्ल किया है. क्या वह मां नहीं थीं?’
‘जो मां का कत्ल करे वह कैसा बेटा, किसका बेटा!’
‘कहीं ऐसा ना हो कि सिक्खनी समझकर कोई तुझे भी…’
‘मार डालेगा तो मार डाले…कोई और मां आगे आकर इसे सहारा देगी…’ बुढ़िया बेखौफ ललकारती है.
ऐसी ही मांओं के कारण भारत है, भारत की महानता है, इंसानियत और नैतिकता हैं. मैं मन ही मन उस वृद्धा मां को नमन करता हूं. गुरुद्वारे से आती हुई आवाज घायल मन को सहलाने लगती हैं—
आदि सच, जुगादि सच, है भी सच, नानक होसी भी सच….
इसके साथ-साथ ऋग्वेद का मंत्र कानों में गूंजने लगता है-
स॒मा॒नी व॒ आकू॑तिः समा॒ना हृद॑यानि वः
स॒मा॒नम॑स्तु वो॒ मनो॒ यथा॑ व॒: सुसा॒हास॑ति
सुख-शांति-सदभाव की अंतहीन कामनाओं के साथ….

तुम्हारा प्रवासी…
-ओमप्रकाश कश्यप opkaashyap@gmail.com

1 टिप्पणी

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One response to “कालिख लगे दिन : समापन किश्त

  1. subhash chander

    kashyapji,puri jalan ke sath kahata hun.kash ye rachna maine likhi hoti.badhia bhut badhia rachna hai.par iske age ka matter kahan hai?

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