कालिख लगे दिन : छ्ह

नवंबर 3, 1984

महायात्रा का दिन
सजा हुआ क्यों तन पर आली दुलहनि का बाना है
गर्म सांस दृष्टि है चंचल, मन भी दीवाना है
दूर गगन के पार बसा मेरा प्रियतम दीवाना है
मौन निमंत्रण उसका आया, मुझे वहीं जाना है.
दो दिन पहले ही यह तय हो चुका था कि अपनी दिवंगता प्रधानमंत्री को मुखाग्नि आज के दिन दी जाएगी. हमारी भारतीय संस्कृति की परंपरा में मृत्यु भी एक उत्सव है. आत्मा और परमात्मा के महामिलन का. इसपर शोक जैसी बात ही नहीं. शोक इंदिराजी के जाने का नहीं. जिस तरह से उन्हें मौत के मुंह में ढकेला गया वह शोचनीय है. कलंक है मनुष्यता के ऊपर. सभी को उम्मीद थी कि दिन आज अपेक्षाकृत शांत रहेगा. राजधानी की तो खबर नहीं, परंतु अपनी कालोनी में हालात सामान्य होते जा रहे थे. मगर सुबह होते ही पता चल गया कि लॊगों का मेरा सिर्फ भ्रम है. खुद को झूठी तसल्ली देने की कोशिश, वक्त से दूर भागने की छटपटाहट.
रात पहरा देना पड़ा. सो सुबह पांच बजे सोने को गया. ठंड बहुत थी. शायद रात-भर जागने के कारण उसका एहसास ही कुछ अधिक हो रहा हो. इसीलिए बिस्तर पर जाने के बाद भी नींद नहीं आई. बेचैनी से करवटें बदलता रहा. पहरा पूरा करने के बाद चारपाई पकड़ते ही करीब तीन वर्ष पुरानी गांव की वह रात याद आ गई, जब ऐसे ही एक रात को पहरे से लौटा था. वे भी सर्दी के ही दिन थे, अपने साथ ठिठुरती हुई रात लिए हुए. उन दिनॊं गांव में चोरों के आने की अफवाह थी. आसपास के गावों में चोरियां होने की खबरें रोज आ रही थीं. आए दिन ऐसी घटनाएं होतीं, डाके पड़ते. मगर इनसे भी कहीं अधिक, चोरों के हमले का डर और उनसे जुड़ी अफवाहें लोगों को मारे डालती थीं. तब गांव वालों ने बारी-बारी से पहरा देने का निर्णय लिया था.
एक रात मेरा भी नंबर था. कंबल ओढ़कर पूरी रात जागरण किया. अफवाहों से घबराकर लोगों के साथ गांव के इस कोने से लेकर उस कोने तक कई चक्कर लगाए. नवंबर का ही महीना था. उन दिनों गांव में कड़कड़ाती ठंड के दिन होते. रात-भर चलने से बुरी तरह थका हुआ था. लेटा तो आंखों में नींद ही नहीं थी. तब मैंने तुमसे आग्रह किया था, किसी तरह सुला देने के लिए. तुम मेरा इशारा समझ गई थीं. हां, इशारे समझ लेना तुम्हें खूब आता था. और तब तुम मेरे बराबर में लेट गईं थीं. अपनी बांहों में कसते हुए तुमने मेरा मुंह अपने वक्ष में भर लिया था. अपनी गर्म हथेली से मेरी आंखों को ढांप लिया था. कि जैसे जादू भरा था तुम्हारी बाहों में…या फिर था कोई गहरा नशा. मैं सचमुच सो गया था. एक अच्छी और गहरी नींद. हमारे प्रणय की कई यादगार रातें हैं. उनमें वह रात अनमोल है. कभी भुलाए नहीं भूलती. काश! आज की रात भी तुम मेरे पास होतीं. रात की थकान, सारा तनाव और समस्त विश्रांति पलक झपकते हवा हो जाते. परंतु अकेला देख आज देर तक वह रात मुझे तड़फाती रही. निरीह तड़फता रहा मैं, अकेला और निरुपाय.
नींद अपनी मेहरबानी दिखाए, अमृत की वर्षा करे, उससे पहले ही शोर सुनकर आंख खुल गईं. आंखें मलता हुआ बाहर आया. देखा कि सैकड़ों लोग गली में दौड़ लगा रहे हैं. मारो-मारो, पकड़ो जाने न पाए. कारण जानने की जरूरत ही नहीं थी. पिछले तीन दिनों से यही तो हो रहा है. लोग आदमी के पीछे इस पड़ जाते हैं मानो वह कोई जंगली जानवर हो. कि जैसे हिरन के पीछे कई-कई खूंखार भेड़िये लगे हों. सभी अपनी-अपनी तरह से हथियार बंद थे. जो खाली हाथ थे वे यह सोचकर कि लूट का माल झपटने और उड़ाने में आसानी रहे. भागने वाला कोई सिख ही था. पिछले दिन अपने ब्ला॓क में जो शांति रही थी, उसी से लौट आया था. संभव है उसकी बूढ़ी मां घर में ही रह रही हो, उसी का हालचाल जानने की ललक उसे घर तक खींच लाई हो. यह भी हो सकता है कि घर में कोई बीमार या घायल हो और परिवार वालों के मना करने के बावजूद दवा लेने के लिए वह बाजार तक निकला हो और अब मौत पीछे पड़ गई हो. कुछ भी हो सकता है. मगर उसके लिए इतनी दर्दनाक मौत का सामना करना पड़े, उफ! हैवानियत की पराकाष्ठा है यह तो…
घरों के दरवाजे खटाखट बंद होते जा रहे थे. डर था कि कहीं मौत से भागता हुआ आदमी शरण न मांग बैठे. एक आदमी को हजारों घरों में कहीं शरण नहीं थी. स्वार्थ प्रत्येक की आंखों में बसा था. आंखें अपने से आगे किसी को देख ही नहीं रही थीं. पीछा कर रहे हिंसक बहशी लोग सार्वजनिक शौचालयों तक में झांक-झांककर तलाशी ले रहे थे कि….
‘जय भवानी…वो भागा…पकड़ो हरामखोर को…’
‘मारो, भागने न पाए…आतंकवादी की औलाद.’
‘इंदिराजी की चिता के साथ-साथ फूंक डालो इसे भी…’
भीड़ एक गली में घुसी. शिकार उसी तरफ भागा था. गली के दूसरे हिस्से से भीड़ का दूसरा जत्था पड़ गया. वह बीच में ही घिर गया था. तो भी उसने बचने की कोशिश में जान लगा दी. रास्ते में एक गड्ढ़ा था. पाइप लाइन की मरम्मत के लिए खोदा गया. भागता हुआ बेचारा उसी गड्ढ़े में जा गिरा. उसके गिरते ही पूरी भीड़ उसपर पिल पड़ी. कुछ ही क्षणों में वह लहूलुहान होकर एक ओर लुढ़क गया. भीड़ को लगा कि उसने अपना काम पूरा कर दिया. उसे गड्ढ़े में ही बेहोश-तड़फता छोड़कर भीड़ तितर-बितर हो गई. मानो एक मोर्चा फतह कर लिया हो. आहत व्यक्ति के पास जाकर देखने की मेरी हिम्मत ही न पड़ी. भीड़ छंटते ही घरों के दरवाजे खुलने लगे. सुना कि कुछ बच्चे और औरतें उसके पास जुट आई थीं. अधिकतर तमाशबीन. पड़ोसियों के मना करते-करते एक बुढ़िया ने आगे बढ़कर उसे निकाला. कमजोर और बूढ़ी औरत उसे निकालते-निकालते खुद भी जमीन पर गिर पड़ी, और बिलखने लगी. यह हादसा दिन में कर्फ्यू में दी गई ढील के दौरान हुआ था. उसी समय कर्फ्यू लगने की घोषणा हो गई. लोग फिर घरों में घुसने लगे.
आज दिन में एक अच्छी बात यह हुई की पुलिस की गाड़ी कालोनी में आई और घरों में छिपे हुए सिख परिवारों को अपनी सुरक्षा में ले गई. मैंने मन ही मन सरकार के इस कदम की सराहना की. पर लगा कि सरकार ने यह कदम बहुत देर से उठाया है. अगर कल भी यह काम पूरा कर लेती तो सैकड़ों जाने बचाई जा सकती थीं. कमरे में बंद होकर केवल ट्रांजिस्टर के सहारे खबरें सुनता रहा. शव को तिरंगे में लिपेटकर फूलों के ढेर के साथ गाड़ी पर चढ़ाया गया. कंधा देने वालों में राजीव गांधी के तीनों सेनाओं के कमांडर तथा अभिताभ बच्चन भी थे. बाहर लाखों लोगों का जमघट था. इंदिराजी का शव जब नहलाकर गाड़ी पर चढ़ाया जा रहा था तो उपस्थित लोगों की आंखें भर आई थीं. कई महिलाएं बिलख पड़ीं. पुरुष भी अपने आंसू कहां रोक पाए थे. युवकों ने बिलखते हुए कहा-
‘मत जाओ हमें छोड़कर मां.’
‘आज हम अनाथ हो गए…’ औरतों की ओर से आवाज आई.
एक सौ चार देशों के शासनाध्यक्ष राजधानी दिल्ली में आए हुए थे. एशिया की उस लौह महिला को अंतिम विदाई देने के लिए. शवयात्रा आगे बढ़ी तो उसके पीछे लोगों का हुजूम बढ़ता ही गया. महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के बाद यह पहली शवयात्रा थी जो इतनी धूमधाम से निकल रही थी. करीब पांच लाख से ज्यादा लोग आए थे प्रधानमंत्री को अंतिम रूप से विदा करने के लिए. रास्ते के दोनों तरफ पुलिस के जवान मोर्चा लिए खड़े थे. जिनकी संख्या भी हजारों में थी. इंदिराजी की चिता अपने पिता और पुत्र की बगल में बनाई गई है. एक ही परिवार की तीन-तीन पीढ़ियां एक साथ सोयी हुई हैं.
खबर मिली है कि चिता के लिए पैंतीस वर्ग फुट का एक चबूतरा बनाया गया है. जिसपर चमेली के ताजे फूल बिछाये गए हैं. उसके बाद चंदन की चिता पर उनके शव को लिटाया गया. उपस्थित जनसमुदाय ने हाथ जोड़कर अपना अंतिम प्रणाम किया. आग की लपटों ने उस शक्तिस्वरूपा को अपने आगोश में ले लिया. जवाहरलाल नेहरू की ‘इंदू’, महात्मा गांधी की धर्मपुत्री इंदिरा प्रियदर्शिनी को आज अंतिम रूप से विदा कर दिया गया. इस अवसर पर आदमी तो आदमी वे चिट्ठियां भी जार-जार रोई होंगी, जो जेल से एक पिता होने के नाते नेहरू जी ने अपनी बेटी इंदु को लिखी थीं.
सचमुच यह विदाई की रात थी. शोक में डूबी और सहमी हुई. मानो दिवंगता इंदिरा प्रियदर्शिनी को अपनी मौन श्रद्धांजलि प्रस्तुत कर रही हो. उस रात भी गली के नुक्कड़ पर पहरा जमा. पर पुलिस के स्थान पर सेना आ चुकी थी. अफवाहें धीरे-धीरे दम तोड़ रही थीं. इतने दिन बाद मानो सरकार और नेताओं को होश आया हो. खबर मिली कि राजीव गांधी स्वयं दंगाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं. सेना की बख्तरबंद गाड़ियां देखकर उपद्रवियों के हौसले पहले ही पस्त हो चुके थे. उस रात नींद कुछ अच्छी आई. कई रातों से बिना नींद के जल रही आंखों को कुछ आराम मिला.
तुम्हारा ही…

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