कालिख लगे दिन : पांच

दो नवंबर, 1984
हादसों की दर्दनाक वापसी

प्रिय विमल
कल के बारे में मैंने तुम्हें लिखा. यह जानते हुए भी कि जो लिखा है वह तुम तक इतनी जल्दी नहीं पहुंच सकता, मैंने दुबारा कलम थाम ली है. मुझे मालूम है कि यह आगे भी जो लिखेगी वह भी तुम अभी नहीं पढ़ पाओगी. दरअसल यह लिखने के बहाने समय से भागने और उसको किसी भी तरह जी लेने की कवायद है. नहीं तो कल जो देखा, जिन हादसों से गुजरा था, वह कई-कई जन्मों के बाद खुद को दोहराते हैं. रात यह कामना करते करते सोया था कि आनेवाला दिन शुभ हो. पर शायद मन में कोई खोट रहा होगा जो प्रार्थना अनसुनी ही रह गई.
दिन पर शैतान का साया सवार है, इस बात का अंदाजा मुंह अंधेरे ही हो गया था. आंखें सुबह के वक्त लगी थीं. कफ्र्यू का ऐलान बीती रात ही हो चुका था. इसलिए सुबह देर तक सोने की आजादी थी. किंतु बाहर के हंगामे ने उसका अवसर ही नहीं दिया. सवेरे-सवेरे गली में भगदड़ मचने लगी थी. आंखें मलते हुए बाहर आया तो एक मनहूस खबर से सामना हुआ. घरों के सामने जमा डरे-सहमे लोगों ने बताया कि सुबह की अरदास के लिए जाते समय जाते समय चार आदमियों को मदांध भीड़ ने मार गिराया. सुनते ही दिल दहल गया. मन हुआ कि सबकुछ छोड़कर गांव चला आऊं. तुम्हारे पास मन की कहते-सुनते सारी क्लांतियों को अंगूठा दिखा दूं. फिर याद आया कि कर्फ्यू में बसें बंद हैं. कहीं आना-जाना संभव नहीं. होता तो भी शायद ही आ पाता. नए-नए अनुभवों से गुजरने की मेरी लालसा भी कुछ कम तो नहीं. बहुसंख्यक वर्ग का होने के नाते खतरा उतना नहीं जितना उन्हें है, जो संख्या में कम हैं. लेकिन संख्या में कम होने के कारण वे क्या-क्या सोचते हैं, कैसा डर उनके मन में समाया हुआ है, क्या बीत रही है उनपर, यह बता पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं.
कम से कम इतनी निश्चिंतता तो है कि तुम यहां नहीं हो. अगर होतीं तो मेरी चिंता में घुलती रहतीं. चारों ओर पुलिस के हथियारबंद जवान गली-गली पहरा दे रहे हैं. बार-बार कर्फ्यू का ऐलान किया जा रहा है. भीतर आकर ट्रांजिस्टर खोलता हूं. उदघोषक बता रहा है कि हिंसा की आग दिल्ली से बाहर भी फैल चुकी है. निर्दोष जानें जा रही हैं. हमेशा शांत और ठंडा रहनेवाला अपना उत्तरप्रदेश भी आपे से बाहर है. मध्यप्रदेश, जम्मू-कश्मीर, त्रिपुरा, मेघालय, हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र आदि प्रांतों में आग भड़की हुई है. पूरा देश जैसे पगला गया है. पड़ोसी का पड़ोसी दुश्मन बना है. सगे भाइयों की तरह साथ-साथ रहते आए हिंदू और सिख परस्पर जान के दुश्मन बने हैं. मान-मर्यादा की रक्षा के लिए पहनी गई पगड़ी जान के लिए खतरा बन गई. अर्से से रोटी-बेटी का संबंध रखने वाले दो समुदाय, एक ही माटी से उपजे दो धर्म, एक ही कोख की जन्मी संतानें आपस में दुश्मन बनी हैं. एक-दूसरे को खा जाने पर उतारू हैं. अगर यही धर्म हैं, तो इन्हें नष्ट हो जाना चाहिए.
धर्म का जन्म आदमी को आदमी बनाने के लिए हुआ है, राजनीति आदमी को बेहतर इंसान बनाती है. लेकिन अगर ये दोनों मिल जाएं तो आदमी आदमी ही नहीं रहता…
खबर मिली कि शाहदरा में उसी की पुनरावृत्ति हो रही है जो कल पश्चिमी और उत्तरी दिल्ली में घटा था. लगता है कि दिल्ली अब रहने लायक नहीं रही. उपद्रवों से कहीं अधिक खतरनाक हैं अफवाहें. जो न जाने किधर से बिना सिर और पैर के उड़ी चली आती हैं. हर अफवाह जैसे एक सनसनी है. सुनते ही बस्तियों में सन्नाटा छा जाता है.
‘सुना कुछ…!’ लोग आपस में चर्चा कर रहे हैं.
‘अब क्या हुआ?’ लोग अफवाहों से परेशान हैं. लेकिन उनसे बच पाना भी तो संभव नहीं.
‘कल इंदिराजी के बेटे राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली है ना?’ पहला अफवाह को असरदार बनाने के लिए भूमिका गढ़ने लगता है. सिद्ध लोग सामान्य खबर को भी सनसनी की तरह परोसने में माहिर होते हैं. वे जानते हैं कि इंतजार खबर को पक्का रंग देता है, जो आसानी से नहीं छूटता.
‘बताओ, चुप क्यों हो गए?’ पहला इधर-उधर देखता है. यह जानते हुए कि जितने भी सिखधर्मी हैं, वे डरे, घबराए घरों में बंद हैं. किंतु खबर को असरदार बनाने के लिए ये सब जरूरी टोटके हैं. फिर सामनेवाले को संभलने का अवसर दिए बिना ही हथौड़े की चोट करता हैµ
‘पंजाब से आ रही झेलम एक्सप्रैस में जितने भी हिंदू थे उन सभी को सरदारों ने तलवार से काट डाला. रेलवे स्टेशन पर शव ही शव हैं. कहते हैं कि सिखों ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनने पर सौगात के रूप में ये शव भेजे हैं.’ सुनते ही लोगों को सांप सूंघ जाता है. मैं भी सिहर उठता हूं. यह कोई अकेली अफवाह नहीं. और भी अनेक झूठी कहानियां हैं जो गढ़कर सुनाई जा रही हैं. लोगों को भड़काने, हालात को गर्माए रखने के लिए. लगता है कि कोई तंत्र है, जो सुनियोजित साजिश के तहत इन अफवाहों को अंजाम दे रहा है. याद आया बीती शाम को एक स्कूटर सवार आया था. गली के कोने पर आकर वह खड़ा ही हुआ था कि घरों से निकलकर तीन-चार लोग उसके पास आ गए. फिर सभी न जाने क्या बातें करते रहे. कर्फ्यू में ऐसे लोगों का आना, छिप-छिपकर बातें करना रहस्यमय तो है ही. अफवाहों की ताकत के पीछे कौन-सा रहस्य है, नहीं मालूम. पर गुस्से से भरे, डरे हुए लोग उनपर सहसा विश्वास कर लेते हैं. सरकार इनका तुरंत खंडन भी तो नहीं करती. जब करती है, तब तक ये अफवाहें कयामत बन जाती हैं.
एक अफवाह और हवा में जहर घोल रही थी कि ‘उन्होंने’ नगर निगम के पानी में जहर मिला दिया है. घरों में बंद आदमी को पीने के लिए पानी तो चाहिए ही.
‘लोगों को घरों में कैद कर प्यासे मार देने की साजिश है यह.’ लोग गुस्से से तिलमिला उठते हैं.
‘कल दिन-भर उनका कत्लेआम हुआ है, उसका बदला लेने के लिए वे कुछ ना कुछ तो करेंगे ही…’
‘हां, यह हिंदू ही है जो चुपचाप सह लेता है…’
यह चुपचाप सहने की बात कुछ लोगों के मन में अपराधबोध भर देती है. कुचले हुए सूरमा की तरह वे हुंकारने लगते हैं. हालांकि बीती रात से ही लगातार घोषणा कराई जा रही है कि सरकार ने जगह-जगह से नमूने लेकर पानी का रासायनिक विश्लेषण कराया है. रेडियो पर भी खबर आ रही है कि पानी में जहर घुले होने की बात झूठ, कोरी अफवाह है. लेकिन सरकार अविश्वसनीयता ही ऐसे अवसरों पर उसे भारी पड़ जाती है. लोग जब तक सरकार की घोषणा पर भरोसा करें तब तक अफवाहों को अंजाम देने वाले लोग अपना काम कर जाते हैं.
आज पूरे दिन अफवाहें आंधीं की तरह आती-जाती रहीं. पूरे दिन सहमी रही हवा. सहमी रहीं सड़कें. घर से बाहर आदमी कम ही थे. औरतें और बच्चे तो और भी कम. शहर में क्या हो रहा है, क्या बीत रही है सिखों पर जो अपने ही भाई-बंधु है. भारत पर आने वाली हर विपत्ति को जिन्होंने सबसे पहले झेला है. गुरुतेगबहादुर सिंह, गुरु गोविंद सिंह, बंदा बहादुर, वीर हकीकत राय, सरदार भगत सिंह जैसे अनगिनत बलिदानी योद्धाओं ने भारतीय धर्म और संस्कृति को बचाने के लिए जो कुर्बानियां दी हैं, उनका जोड़ कहां है? गुरुनानक देव की वाणी-‘अव्वल अल्ला नूर उपाया कुदरत ते सब बंदे, एक नूर से सब जग उपज्या कौन भले कौ मंदे.’ को क्या हम पराया कह सकते हैं? आज उन्हीं के नाम पर यदि कुछ सिरफिरे देश को बांटने की साजिश करें तो तो दोष उन सिरफिरों का है. उसकी सजा पूरे समुदाय को देना कहां की नैतिकता है. अपने देश की राजनीति के बौद्धिक दिवालियेपन पर भी क्षोभ हुआ. जो असली मुद्दों से, ऐसे मुद्दों से जहां उसके दावों की कलई खुले, ध्यान हटाने के लिए तरह-तरह के षड्यंत्र रचती रहती है-
‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती कांपती ही है.’- नए प्रधानमंत्री जी के ये शब्द उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता का परिचय दे गए. ये शब्द उन्होंने एक बेटे की तरह कहे, न कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री के रूप में. काश! उस समय कलेजे पर पत्थर रखकर भी वे प्रधानमंत्री का धर्म निभाने का प्रयास करते. उस समय कोई और खुश हो न हो, इंदिरा प्रियदर्शिनी की आत्मा उनपर जरूर खुश होती. ऊपर सातवें आसमान से ही भर-भर अंजुलि आशीर्वाद लुटाती अपने लाडले बेटे के लिए…
समाचार था कि जहांगीरपुरी के ही सी-ब्ला॓क में काफी हंगामा मचा हुआ है. सिर्फ एक पार्क की दूरी थी. हालात का जायजा लेने के लालच से मैं स्वयं को रोक न पाया. मन में आशंका और डर लिए मैं चुपके से घर से निकल पड़ा. पार्क पार करते ही स्थिति की गंभीरता ने तन सिहरा दिया. सिखों के घरों को एक-एक कर निशाना बनाया जा रहा था. हाथों में डंडे, लाठियां, फरसे आदि लेकर जत्थे के जत्थे मैदान में थे. कि जैसे होली के दिन लोग टोली बनाकर निकलते हैं. वैसे ही आज खून की होली खेलने के लिए लोग घरों से बाहर निकले हैं. ऐसे ही एक जत्थे की कारगुजारियों का जायजा लेने के लिए मैं उसके पीछे-पीछे चला. लोगों को पता था कि किस घर में ‘सिक्खड़ा’ रहता है. उन घरों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा था.
अधिकांश घरों से मर्द गायब थे. औरतों और बूढ़ों को छोड़कर सभी गुरुद्वारों की शरण में जा चुके थे. कहीं-कहीं पूरा परिवार ही सुरक्षित स्थान की खोज में जा चुका था. ऐसे घरों पर भी उपद्रवी हमला करते. लूट-खसोट के बाद आगजनी. बर्बर लोगों की भीड़ कितने ही लोगों को जलाकर खाक कर चुकी थी. कई को शेखी बघानते हुए सुना कि आज उसने या फलां ने टेलीविजन, बिजली के पंखे या कीमती कपड़ों को मिलाकर कुल कितनी कमाई की है. या कितने ‘आतंकवादियों’ को ठिकाने लगाया है.
यह सोचकर मैं बार-बार दुःखी होता रहा कि जीवन की उन मामूली वस्तुओं को जुटाने के लिए उन बेचारों ने कितनी मेहनत की होगी. कितने वर्ष लगे होंगे. जानता था कि उन उपद्रवियों का कोई धर्म नहीं था. खबर यह भी मिली कि दंगे की चपेट में आने के भय से कितने ही सिखों ने दाढ़ी-मूंछ साफ करा ली हैं. उपद्रवी इसे भी अपनी विजय के रूप में देख रहे थे. कुछ को मलाल भी था कि इससे दुश्मन की पहचान खत्म हो जाएगी. दिन में उपद्रवियों के पीछे-पीछे चलते, दर्जनों घरों को जलते हुए देखा. लोगों को आदमी पर इस तरह हमला करते देखा जैसे वह कोई जंगली जानवर हो. औरतों को रोते-कलपते-विलापते देखा और सुना. उनके साथ-साथ दुःखी होता रहा. कई बार लगा कि ऐसे माहौल में तमाशबीन बने रहना भी अपराध है. दिनकर की पंक्तियां रह-रहकर मन को कचोटती रहीं:
समर शेष है- नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध.’
पर यहां मैं ही नहीं, सब तमाशबीन बने थे. सभी नपुंसक संवेदना से भरे हुए. एक ही दिन में वह सब देखा जो इंसानियत पर कलंक था. कलंक है और कलंक रहेगा…जहांगीरपुरी, आजादपुर, आदर्शनगर, महेंद्र एन्कलेव, तिलकनगर, जमनापार…दिल्ली के हर कोने की कहानी एक जैसी थी. हैवानियत की जीत और इंसानियत के मरण की कहानी.
अच्छा ही है कि वक्त किसी के काबू में नहीं आता. अच्छा हो या बुरा वह बीतता ही है. रात हुई तो वातावरण ओर भी भयानक हो गया. जोरदार अफवाह थी कि दिल्ली के हिंदुओं से बदला लेने के लिए पंजाब के सिखों का एक हथियारबंद जत्था दिल्ली बार्डर पर आ चुका है. अंधेरा होते ही वह आक्रमण करेगा. भारी कत्लेआम करेगा. मुकाबले के लिए सभी तैयार रहें. बच्चों-बूढ़ों को सावधान कर दिया जाए. इस अफवाह से पूरी कालोनी में भय की लहर दौड़ गई. अब तक इस कत्लेआम के लिए उपद्रवियों को दोष देने वाले लोग भी धैर्य खो बैठे. उत्तेजना और डर के मारे सभी अपने-अपने घर से निकल आए. गलियों के बाहर पहरे बिठा दिए गए. सर्दी की रात थी, मगर इतनी भी नहीं कि बाहर बैठा न जा सके. जिससे जो बन पड़ा वही हथियार लिए था. डंडे, लाठियां, लोहे की राड वगैरह. कुछ लोगों के पास गैरलाइसेंसी हथियार, कट्टे आदि भी थे. वही उस समय लोगों के हीरो बने हुए थे.
हर गली के मुहाने पर लोग जमा थे. अलाव के सहारे अपने भीतर और वातावरण के डर को भगाने का प्रयास करते हुए. जब-तब शोर मच जाता कि सिख हथियारबंद दस्ता इस समय जमनापार में कत्लेआम मचा रहा है. उस समय सभी की एक चिंता बिल्कुल आम थीः कि हिंदू कौम इतनी दयालु क्यों है? कि एक भी ढंग का हथियार हिंदुओं के घर में नहीं मिल सकता. इसलिए कभी मुसलमान, कभी सिख उसे हलाल कर जाते हैं.
उफ! कितना बड़ा भ्रम, कितना बड़ा झूठ. इस झूठ से मन को कोफ्त होती है. बीते दिनों में तीन हजार से अधिक सिखों का कत्लेआम करनेवाले हिंदू ही हैं. यही क्यों, सहस्राब्दियों पहले बौद्धों के कत्लेआम में भी हिंदुओं ने ही हाथ भांजे थे. दरअसल कोई भी धर्म जब तक अपनी ऊर्जा केवल अध्यात्म की खोज और उसके प्रचार-प्रसार में लगाता है, जब तक उसके कर्मकांड नैतिकता के आधार पर तय किए जाते हैं, तब तक तो ठीक. मगर जब वह संगठित होकर सत्ताकेंद्र का रूप ले लेता है तो उसमें राजनीति की सभी विकृतियां स्वाभाविक रूप से आ जाती हैं. यही सभी धर्मों के साथ होता रहा है. एक-दूसरे को कोसते सब हैं, पर कोई भी धर्म इससे अछूता नहीं है.
कुछ लोग कत्लेआम पर खुश भी थे. उन्हें लग रहा था कि इस बार का कत्लेआम हिंदुओं की जीत है. कि अब हिंदू संगठित हो चला है. ईंट का जवाब पत्थर से देने की अक्ल उसे आ चुकी है. उनमें से कुछ को मैं चेहरे से पहचानता था. वे वही थे जो सवेरे स्कूटर सवार से कानाफूसी कर रहे थे. अधिकांश डरे हुए. अनिष्ट की आशंका से पीड़ित उन लोगों में अधिकांश चुप थे. और कुछ जोर-जोर से बोलकर स्वयं को भुलावे में रखने का प्रयास कर रहे थे. कुछ इस चिंता से पीड़ित थे कि उनके पास मुकाबले के लिए सिवाय डंडों और लाठियों के और कोई हथियार नहीं है. जबकि दुश्मन हथियारों से लैस है.
पहरा सारी रात चला. लोग बदलते रहे. हालांकि सरकार की ओर से भारी संख्या में पुलिस और सेना गश्त लगा रही थी. लोगों से आग्रह किया जा रहा था कि वे निश्चिंत होकर घरों में सो जाएं. डर की कोई बात नहीं है. मगर सदा की तरह उस समय भी लोगों को पुलिस और सरकार पर भरोसा नहीं था. बार-बार समझाने, खदेड़ेजाने पर भी लोग डटे रहे. अलाव के सहारे पहरा देते रहे. रात-भर पूरा वातावरण ‘जागते रहो’, ‘खबरदार-होशियार’ की आवाजों से गूंजता रहा. मामूली आहट पर लोग लाठियां लेकर दौड़ पड़ते थे. बदहवासी ऐसी कि सार्वजनिक शौचालयों, सरकारी स्कूलों पर भी नजर रखी जा रही थी. कहीं दुश्मन वहां न छिपा हो. मैं पूरी रात जागता रहा. कभी चारपाई पर नींद को आमंत्रण देते हुए तो कभी बाहर पहरा देते हुए लोगों की बातें सुनते हुए.
उस रात भी गोलियां चलती रहीं. अग्नि की भेंट निर्दोष लोग चढ़ाए जाते रहे. फिर भी दिन की अपेक्षा रात कुछ शांत ही रही. सिवाय इसके कि जो होलियां दिन में जलाई गई थीं वे रात-भर धधकती रहीं और हैवानियत के किस्सों को दोहराती रहीं. लाशों की चिड़ांध से पूरा वातावरण ग्लानिभाव उपजाता रहा.

तुम्हारा ही…

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