कालिख लगे दिन : चार

मुझे अब तीनमूर्ति से जहांगीरपुरी तक जाना था. कैसे जाऊंगा, इसकी कोई साफ तस्वीर मेरे दिमाग में नहीं थी. पूरा वातावरण रहस्यमय बनता जा रहा था. सड़क पर आकर वीरानगी की भाषा को पढ़ने की कोशिश की. परंतु उसका अभ्यस्त न होने के कारण नामकामयाब ही रहा. घर तक पहुंचने का रास्ता भी मेरे लिए अनजान ही था. पर डर की आवश्यकता नहीं थी. राजधानी के कोने-कोने से लोग तीनमूर्ति भवन पहंुचे थे. लोग रेला बनाकर वापस लौट रहे थे. मैं घर पहंचने के लिए किसी अनुकूल दल को खोज ही रहा था कि एक ओर अचानक शोर मचा. भीड़ ने एक दिशा में हल्ला बोला था. खुले मैदान में सापफ देखा जा सकता था. समझते देर न लगी. लोग एक सिख पर झपटे थे, जैसे वह इंसान ना होकर एक जंगली जानवर था. उसने स्कूटर पर भाग निकलने की कोशिश की. मगर तब तक लोगों का एक झुंड उसके ऐन सामने आ गया. घबराहट में स्कूटर पलट गया. उसके गिरते ही भीड़ उसपर टूट पड़ी. जैसे किसी जानवर को मारकर भून डालने को निकली बहशी लोगों की जमात हो. देर बाद ही सड़क पर स्कूटर के जले टायर पड़े हुए थे. मार के बीच वह हट्टा-कट्टा सिख कब परमात्मा की संगत में चला गया, कोई नहीं जान पाया.
सामने के गुरुद्वारे से उस वीभत्स दृश्य को कुछ आंखें सहमी हुई देख रही थीं. उनमें स्त्रियां, बच्चे, बूढे़ सभी थे. संभवतः सुबह अरदास को आए श्रद्धालु शहर में गहमागहमी देख वहां ठहर गए हों. भीड़ अपना बहशीपन दिखाकर मानो सांस ले रही थी. तभी गुरुद्वारे की ओर देखकर कोई चिल्लायाµ
‘उधर देखो, वहां गुरुद्वारे में आतंकवादी छिपे हैं.’
‘हैं, तो तुम क्या कर लोगे, वहां भारी असला है.’
अब तक जो घटा था उसकी पीठिका एक नामी गुरुद्वारे में तैयार हुई थी. सभी को यह मालूम पड़ चुका था. इसलिए भीड़ ने असले की बात सच मान ली थी. हिंसा के दीवाने फिर हुंकारने लगे. एक दल ने गुरुद्वारे पर हमला बोला. तब तक और पुलिस बुलाई जा चुकी थी. उसने भीड़ को पीछे ठेलने की कोशिश की…सिर्फ कोशिश. क्यांेकि आम दिनों में अपने डंडे की मार से लिलार फोड़ देने वाले सिपाहियों के हाथ आज हड़ताल पर थे. या शायद वे दिवंगता के प्रति श्रद्धा में परस्पर जुड़े हुए थे. या सवेरे घर से निकलने से पहले उन सभी ने तय कर लिया था कि आज वे सिर्फ अपनी ड्यूटी बजाएंगे. केवल ड्यूटी. हम सभी जानते हैं कि हिंदुस्तान में ‘ड्यूटी बजाना’ एक मुहावरा है, जिसका उपयोग उस समय किया जाता है जब काम के अलावा बाकी सबकुछ किया जा सके. भीड़ में से कुछ लोगों ने गुरुद्वारे की ओर पत्थर फेंके. बदले में वहां से गोली चलने की आवाज आई. गोलियां सचमुच चलाई गई थीं, इसका सटीक उत्तर दे पाना संभव नहीं है. क्योंकि शोरगुल के बीच गोली की आवाज सुनना संभव ही नहीं था. मगर अफवाह इतनी जोर से उठी थी, कि भीड़ बेकाबू हुई जा रही थी. लगता है कि किसी को भी अपने प्राणों का मोह नहीं है.
नहीं प्राणों का डर तो था. काफी चैड़ी चारदीवारी के बीच गुरुद्वारा सिर उठाए हुए था. एक किले के समान. उसे भेद कर भीतर जा पाना निहत्थी भीड़ के लिए संभव न था. लोग पत्थर ढेला, जूते-चप्पल आदि फेंके जा रहे थे. तीन घंटे तक यही सबकुछ चलता रहा. क्षुब्ध भीड़ ने सड़कों को उखाड़ फेंका. साइड रेलिंग को तहस-नहस कर दिया. मानो कोई विध्वंस का दौर या फिर जलजला हो. अफवाह उस दिन अपनी असल रंगत में थी. मानो सारे विश्वास, सारे इंतजामात को तहस-नहस कर देने पर उतारू हो. एक अफवाह यह थी कि उन्होंने दो हिंदुओं को मारा है. उनकी लाशों को खींचकर गुरुद्वारे में ले गए हैं. उन्हें तलवार से टुकड़े-टुकड़े कर तालाब में फिंकवा दिया है. इसपर भीड़ अपना रहा-सहा विवेक भी खो बैठी. वह किसी भी तरह गुरद्वारे पर चढ़ाई करना चाहती थी. लेकिन पुलिस बीच में दीवार बनी हुई थी.
इस बीच, काफी आगे दो और सिख भीड़ की हिंसा का शिकार बनेे. किसी ने उनपर पैट्रोल छिड़ककर आग लगा दी थी. मेरा मन घबराने लगा था. अब मैं जल्दी से जल्दी घर पहंुच जाना चाहता था. सहसा चमत्कार की भांति एक बस उधर से गुजरी. वह कहां जाएगी, यह सोचने-विचारने का समय ही नहीं था. भीड़ के साथ-साथ मैं भी बस पर सवार हो गया. परंतु तीन-चार किलोमीटर की यात्रा के बाद ही वह रुक गई. किसी ने बता दिया गया था कि शहर के हालात बिगड़ चुके हैं. बीच रास्ते में कंडक्टर ने बस खाली कर देने का ऐलान किया. आगे की सवारियां धड़ाधड़ नीचे उतरने लगीं. नीचे उतरते लोग चिल्ला रहे थेµ
‘उतरो-उतरो, आगे गोलियां चल रही हैं.’ कुछ देर उसके ऐलान की हकीकत जानने के लिए लोग बस पर सवार रहे. धीरे-धीरे बस खाली होने लगी. मेरा घर अभी भी दस-बारह किलोमीटर आगे था. सांझ हो चुकी थी. किसी और सवारी की प्रतीक्षा करने के बजाय मैं भीड़ के साथ आगे बढ़ने लगा.
पटेलनगर आते-आते अंदाजा हो गया कि आज का दिन वहां कैसा बीता है. क्या गुजरी होगी उनके निवासियों पर. बाजार बंद थे. सड़कें सुनसान, सिवाय भीड़ और उसके हिंस्र नारों के वहां कोई न था. तभी एक आदमी दौडता हुआ रास्ते से गुजरा. बदहवासों की तरह चिल्लाते हुए बोला, ‘सावधान, आगे किसी ने एक हिंदू की जान ली है.’
‘हिंदु!’ किसी ने सवाल किया. राजधानी के नागरिक आज या तो हिंदू थे या सिख, अथवा कुछ और धर्मी. उससे आगे मानने को आज कोई तैयार न था.
‘हिंदू, बाकी लोग कहां मर गए थे? गोली लगी है?’
‘नहीं बता सकता. पुलिस ने देखने ही नहीं दिया. तुरंत उठाकर ले गई.
‘बेचारे हिंदुओं के पास है भी क्या? सिवाय कुत्ता मारनेवाली डंडी के. वक्त पड़ने पर वह भी हाथ से छूट जाती है.’
‘नहीं, आज हम उन्हें सबक सिखाकर रहंेगे? उन्हें बता देंगे कि हमारा खून भी खून है, पानी नहीं.’
पैदल आगे बढ़ता हूं. पटेलनगर का इलाका. घर यहां से दस किलोमीटर आगे है. पैदल चलना स्वभाव का हिस्सा ऐसा बना है कि ऐसी दूरियों को कभी गंभीरता से नहीं लिया. लेकिन आज मन करता है कि किसी तरह उड़कर पहंुच जाऊं. अचानक एक जगह लोगांे को बैरीकेड लगाए देख ठिठक जाता हूं. एक आदमी दोनों को हाथ फैलाकर लोगों को सावधान कर रहा है. ‘रुक जाइए…आगे खतरा है.’
‘क्या हुआ.’ यह सवाल मेरी आंखों में उभर आता है. इसलिए कि जुबान तो अर्से से शांत पड़ी है…तालू से चिपकी हुई है. बताया जाता है कि एक सरदार अपने घर की छत पर चढ़कर गोलियां चला रहा है. सात हिंदुओं को हलाक कर चुका है. खबर पर खबर…चोट पर चोट, यह हकीकत है या अफवाह, मालूम नहीं. इतना जरूर है कि इसने आग में घी डालने का काम किया है. गुस्साए लोग उस इमारत पर ईंट, पत्थर आदि बरसा रहे हैं…
‘वो देखो, वो भागा, ऊपर की ओर गया है…’
‘हां, हाथों में बंदूक लिए, बचो…’ आवाज आई.
‘आज दोपहर से ही गोली बरसा रहा है…’
‘सरदार है…दोपहर को जरूर उसका दिमाग पिफर गया होगा…’
‘कुत्ते की मौत आई है…हरामखोर.’
‘हर-हर महादेव…मारो…बच न पाए…’
मेरी निगाह उस कोठी पर पड़ती है. जिसमें वह कथित ‘हत्यारा’ मौजूद है. दनादन गोलियां बरसा रहा है. कत्थई रंग में रंगी वह शानदार कोठी अपनी सुंदरता के कारण जरूर लोगों का ध्यान आकर्षित करती होगी. परंतु आज किसी और कारण से चर्चा में है. सात-आठ सौ लोगों का हुजूम कोठी को घेरे हुए खड़ा है. जिनमें से ज्यादातर निहत्थे. कुछ लोग हथियार के नाम पर डंडे या लाठियां उठाए हुए. पर उनका साहस भीड़ का साहस था. उनका पौरुष भीड़़ का पौरुष. एक आदमी चिंघाड़ता तो सैकड़ों उसके साथ चिल्लाने लगते. एक आदमी पीछे की ओर मुंह करता तो दर्जनों बिना आगा-पीछा सोचे वापस भाग छूटते. शोर-शराबे और मारधाड़ डरते-बचते मैं भी कोशिश करता हूं कि एक झलक उस पागल इंसान की मिल जाए. पर कामयाबी नहीं मिलती. ना गोली चलने की आवाज ही आती है. लोग उस तीन मंजिला मकान को चारों ओर से घेरे खड़े हैं. हुजूम बढ़ता ही जा रहा है. कुछ लोग आस-पड़ोस के मकानों के रास्ते, उस ‘आतंकवादी’ के घर में घुसकर मजा चखाने का प्रयास करते हैं. मगर आसपास के घरों के दरवाजे बंद हैं. कहीं से रास्ता नहीं मिल पाता. हिंसक पुकारें आसमान दहला रही हैं. भीड़ क्षुब्ध, वह अंदर न जा सकती थी. नारों और हुंकारों के साथ लोग आगे बढ़ते. तभी किसी अफवाह या चेतावनी का रेला आता और बढ़े हुए कदम पीछे की ओर भाग छूटते.
‘मां का खसम…ऐसे नहीं निकलेगा…पैट्रोल लाओ…’ कोई आवाज देता है. कुछ लोग इधर-उधर भागते हैं. मैं डर जाता हूं. इधर-उधर नजर दौड़ाकर देखता हूं. शायद ‘आपके लिए, आपके साथ…सर्वदा’ का नारा उछालनेवाली बोल-बांकुरी पुलिस का कोई बांका जवान दिखाई पड़ जाए. मगर उम्मीद नहीं फलती. थोड़ा आगे बड़ते ही सकपका जाता हूं. बीच सड़क पर लाशें देखकर एकाएक दिल को धक्का लगता है. मरनेवालांे के सिर पर पगड़ी नहीं है. इसलिए सरदार तो हो नहीं सकते. पहली बार एक साथ इतनी लाशें देखकर मन घबराने लगता है. कुछ देर पहले लोग सिखों को लेकर उनपर जो आरोप लगा रहे थे, उनमें सचाई नजर आती है.
सड़क पर बस देख लोग उसकी ओर भागे. पर ड्राइवर को बस खड़ी कर अपने घर जाने की जल्दी थी. उसने बस निकाल ले जाने का प्रयास किया. लेकिन भीड़ उसके रास्ते में दीवार बनकर खड़ी गई. ड्राइवर को अब अपनी जान की फिक्र सताने लगी. बस को खड़ी कर वह सड़क किनारे खड़ा हो गया. तभी पीछे से कुछ लोग भागते हुए नजर आए और बस को ठेलने लगे. मेरे पांव ठहर गए. कुछ ही मिनटों में बस उसी कत्थई रंग की कोठी के सामने थी. आगे के दृश्य की कल्पना कर मैं सिहर गया. कुछ लोगों ने बस की टंकी खाली कर दी. डीजल निकालकर उस कोठी पर फैंक दिया. इस बार भीतर से गोली चलने की आवाज आई. लोग जान बचाकर भागने लगे. तभी किसी ने माचिस की जलती हुई तीली कोठी की ओर उछाल दी. सहसा पीछे से सायरन की आवाज आई. पुलिस के आने से पहले ही भगदड़ मच चुकी थी.
मैंने दो-तीन आदमियों को सड़क पर गिरते हुए देखा था. वे गोली की मार से गिरे थे कि भीड़ के रेले से दबकर, कह नहीं सकता. शाम हो चुकी थी. सूरज अपना मुंह छिपाकर घर भागने की तैयारी में था. जहांगीरपुरी अब भी दस-बारह किलोमीटर आगे है. मैं किसी भी तरह अंधेरा होेने से पहले घर पहुंच जाना चाहता था. इसलिए आगे बढ़ने लगा. सड़क पर वाहन आ-जा रहे थे. इनमें वही लोग रहे होंगे जो सुबह रोज की तरह काम पर निकले थे. दिन ढले तक हालात सामान्य होने का इंतजार करते रहे. और जब उम्मीद जाती रही तो सब अपने घरों की ओर दौड़ पड़े.
मैंने सड़क पर भाग रहे वाहनों को रुकने कर संकेत किया. उम्मीद कम ही थी. डरे हुए लोग भला किसे सहारा देंगे. पर वक्त अभी मददगार बना था. कुछ दूर चलने के बाद एक मिनी बस मिल गई. ड्राइवर उसे वजीरपुर डिपो में खड़ी करने के लिए दौड़ाए लिए जा रहा था. न जाने उसे कैसे दया आ गई. उसने बै्रक लगाए. रुकते ही लदर-फदर जितने समा सकते थे उतने लोग उसमें समा गए. बिना किराया लिए ही उस बस ने हमें रिंग रोड पर लाकर छोड़ दिया. उतरते समय मन मे हल्की-सी प्रसन्नता थी. मंजिल के करीब पहुंच जाने की खुशी का परिणाम. आगे का सात-आठ किलोमीटर का सफर पैदल तय करना होगा, यह सोचकर में भरसक तेज चलने लगा.
आजादपुर सब्जी मंडी, जिसे एशिया की सबसे बड़ी सब्जी मंडी होने का गौरव प्राप्त है. तक पहुंचते-पहुंचते अंधेरा छा चुका था. वजीरपुर पुल के ऊपर से गुजरते हुए आसमान में काले दैत्य जैसे बादलों को मंडराते देख मैं अनायास डर गया. दिल की धड़कनें बढ़ गईं. कहीं ओलों के आसार तो नहीं! मगर कुछ आगे बढ़ते ही स्थिति सापफ हो गई. जिन्हें मैं काला बादल समझा था, वे तो धुएं के भारी-भरकम झुंड थे. काले पहाड़ जैसे, मानो आसमान को दबोचने भयानक दैत्य सेना निकल पड़ी हो. मंडी में जगह-जगह आग जल रही थी. कि जैसे पचास-पचास लाशें, पचासियों जगह एक साथ जलाई जा रही हों. तेज लपटें आसमान का कलेजा भूनने को लपलपा रही थीं. दृश्य कंपकंपा देने वाला था. कम से कम मेरी स्मृति में तो ऐसा कोई रूपक नहीं जिससे उसका साम्य बिठा सकूं. किंचित रोमांच पर ढेर सारे भय के साथ, मंडी का दृश्य देख मैं भीतर तक कांप गया.
कुछ दूर आगे बढ़ते ही बदबू का तेज झोंका नाक में घुसता चला गया. फिर सड़क के किनारे कुचले गए फलों का ढेर दिखाई पड़ा. समझते देर न लगी. उपद्रवियों ने मंडी में माल ले जा रहे ट्रक को रोककर उसके माल में आग लगा दी. और ट्रक? उसे शायद ड्राइवर ले जाने में कामयाब हो गया हो. या पिफर उपद्रवियों ने ही चले जाने दिया हो. उससे आगे चलने पर जले-कुचले फलों के और भी ढेर दिखाई पड़े. अब पता चला कि सिर्फ ट्रक ही नहीं लूटे गए हैं. दुकानों से माल लाकर उपद्रवी जितना ले जा सकते थे, ले गए. बाकी को चील-कव्वों को खाने के लिए छोड़ गए. आगे एक टेंपो को जली हालत में देखकर मन कुछ सोच पाए, उससे पहले ही मंडी के एक कोने से धूं-धू उठती लपटों और धमाकों ने आसमान थर्रा दिया. किसी ने भारी वाहन में आग लगा दी थी. उसी की टंकी फटने से धमाका हुआ था.
आगे चैराहा पार करने के साथ ही लगा कि अब घर करीब है. बस मिलने की कोई संभावना थी नहीं. इसीलिए खिन्न मन लिए आगे बढ़ रहा था. आगे पैट्रोल पंप था. जहां दस-पांच ट्रकों का जमघट हमेशा लगा रहता था. बराबर में ही बाॅडी बनानेवालों की दुकाने थीं. कभी वहां खूब भीड़-भाड़ रहती थी. मगर आज सुनसान था. दो गाड़ियां जली हुई हालत में खड़ी थीं. अभी तक इतने हादसे देख चुका था कि नए दृश्य ने मुझे जरा भी नहीं चैंकाया. एक सरसरी निगाह डालकर मैं आगे बढ़ गया. बस अब किसी भी तरह घर पहंुचने की जल्दी थी.

तुमसे दूर रहना कभी अच्छा नहीं लगता मन में सूनापन बसा रहता है. भीड़ में अकेले होने का एहसास. हर रोज तुम्हारे यहां न होने का एहसास मन में बेकली जगा जाता है. फिर अपने ही आंसू पीते हुए रात बीतती है. पर आज तुम्हारे यहां न होने से मन को शांति है. तुम होतीं तो शायद ही घर से निकलने देतीं. निकल गया होता तो तुम पूरे दिन चिंता में घुल-घुलकर हलकान हो जातीं. कभी-कभी वियोग भी कितना अपना लगने लगता है. आज इसका साक्षात अनुभव हुआ. दिन का एक भी पल तो ऐसा नहीं जो ढंग से गुजरा हो…फिर भी, क्या यह यह दिन कभी भुलाया जा सकेगा?
घर आ चुका था. पड़ोसी और मित्रगण मेरे ना लौटने पर परेशान थे. मुझे देखते ही उनके चेहरों पर संतोष झलकने लगा. मुझे भरोसा था कि अपने दिन-भर के अनुभव सुनाकर उनमें से प्रत्येक को चैंका दूंगा. मगर यह जानकर मेरी घबराहट सवाई हो गई कि उनमंे से सभी के पास मुझे बेचैन कर देने के लिए अनगिनत अनुभव थे. उनमें से अधिकांश दिहाड़ी की तलाश में निकले लोग थे. राजधानी के विभिन्न क्षेत्रों के उनके अनुभव थे. कुछ को सुनने के बाद ही मैं समझ गया कि हम सबके अनुभवों में आज एक साम्य था. केवल स्थान और भीड़ के चेहरे अलग-अलग थे. बाकी किस्से-कथानक, चील-कव्वे सब जगह बराबर, एक ही जैसे थे.
यूं तो अकेलेपर की हर रात भयानक ही होती है. मन बाबरे पंछी-सा इधर से उधर भटक रहा था. ऐसी रातें जाग-जागकर काटने के लिए मैं हमेशा बदनाम रहा हूं. पर वह रात भयानकतम थी. तिल-तिल कटती हुई वह आंखों में पल-पल तेजाब पूरती रही. नींद भला कैसे आ पाती. पूरी कालोनी पर भय की छाया मंडरा रही थी. एक अनुमान के अनुसार इस एक दिन मंें हजार से ऊपर निर्दांेष जाने गईं, सैकड़ों वाहन फूंके गए. उनकी संख्या भी चार-पांच सौ से कम कहां होगी. करोड़ों की संपत्ति स्वाह हुई थी. रात का काला साया मेहरबानी बख्शे. आनेवाला दिन बैर-भाव से परे हो. पूरी रात मैं यही मनौती मांगता रहा. किससे, बता नहीं सकता. क्योंकि देवताओं से भरोसा तो पहले ही उठ चुका था.
पूरी रात गली में हलचल मची रही. तरह-तरह की अफवाहें बेचैन करती रहीं. तुम होतीं तो तुम्हारे साथ मजे से सो रहता. जाने कितनी बार कितने डरों, तनावों और आघातों को मैंने इसी तरह हराया है. लेकिन अच्छा ही है कि तुम यहां नहीं हो. आदमी को आदमी का खून करते, जिंदे शरीर पर पैट्रोल डालकर जलाते देख, तुम इंसान से ही नहीं भगवान से भी भरोसा खो देतीं. वह काली रात मेरे जीवन की संभवत सबसे काली रात है. डरावनी और निर्लज्ज भी. चारों और हिंसा का नांच. गोटियां सेट करते खूनी नेता. भय से दिल जोर-जोर से उछल रहा है. वह रात कैसे बीती क्या लिखूं…कैसे लिखू…शब्द ऐसे में अक्सर दगा दे जाते हैं. कलम बेजुबान होकर रह जाती है. दिमाग में घूमते एक कविता के कुछ शब्द मन को और व्यथित कर जाते हैंµ
उन्होंने बापू का जन्मदिन
ऐसे मनाया
कि समाधि को गंगाजल से
देश को खून से नहलाया.

Advertisements

टिप्पणी करे

Filed under Uncategorized

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s