कालिख लगे दिन – तीन

केंद्रीय सचिवालय के निकट पहुंचकर बस रुक गई. एक-एक कर लोग उतरने लगे. रोते, आंसू पोंछते, अवसाद के मारे हुए, खिन्न मन और सहमे-सहमे. रास्ते में देखे हादसों को भुलाने का प्रयास करते हुए. सामने ही तीनमूर्ति भवन ठहरा. मगर पांव सभी के बोझिल थे. लोगों का हुजूूम उसी ओर बढ़ रहा था. नारे लगाता हुआ. झंडे उठाए…मेरे अवसाद-भरे मन में जोश आने लगा. मनुष्य यदि संगठित होकर आगे बढ़े तो मौत भी उत्सव बन जाती है. हजारों की तादाद में लोग सड़कों पर थे. औरत और मर्द सभी. जवान और बूढ़े भी. तीनमूर्ति भवन तीर्थस्थल बना हुआ था. आज जो अंतिम दर्शनों से वंचित रह गया वह मानो वह किसी पुण्य से दूर छिटक गया. बस में सवार यात्री तीनमूर्ति भवन की ओर बढ़ चले. मैं भी आगे बढ़ रहे एक दल का हिस्सा बन गया.
सभी के चहरों पर अतिंम दर्शनों की आस थी. मन में आवेग. धीरे-धीरे भीड़ के साथ आगे बढ़ते हुए. दस-बीस कदम आगे खिसकने में ही आधा घंटा खिसक गया. भवन का मुख्यद्वार बंद था. दर्जनों पुलिसवाले हाथों में बंदूक लिए पहरे पर तैनात थे. भीड़ मुख्यद्वार के साथ जोर आजमाइश कर रही थी. लाखों दर्शनार्थी और सैकड़ों सिपाही. पूरी दिल्ली मानो तीनमूर्ति भवन में सिमट आई थी. हजारों दीवार पर चढ़कर भीतर जाने के प्रयास में थे. पुलिस उन्हें रोकने की कोशिश करती. किंतु भारी जनसैलाव के आगे वह भी नाकाम थी. सुरक्षा अधिकारी लाउडस्पीकर के माध्यम से भीड़ को संयत रहने को कह रहे थे. मगर संयत तो मनुष्य हो सकता है. भीड़ नहीं. जहां जुनून हो वहां होशोहवास की कौन सुनता है…किसे अपनी सुध रह पाती है. सूरज चढ़ने के साथ-साथ भीड़ बढ़ती जा रही थी. साथ में उसका पागलपन भी. अब इनमे से कौन ज्यादा बढ़ रहा है, भीड़ या भीड़ का पागलपनµयह बता पाना तो संभव नहीं. निरंतर बढ़ता हुआ शोर यह सब सोचने का अवसर भी कहां दे रहा था.
भीड़ में सभी वर्गों के लोग थे. मजदूर से लेकर मालिक तक. मोची के साथ-साथ साहूकार भी. महिलाएं और साथ में कुछ बच्चे भी. वाहनों के बोझ से दिन-रात कराहने वाली सड़कें आज खाली-खाली थीं. मानो वे भी शोकाकुल होकर सबकुछ बिसरा चुकी हों. सुरक्षा अधिकारी बार-बार अपील कर रहा था कि लोग अनुशासित होकर लाइन में आ जाएं. शांतिपूर्वक दर्शन करें. इंदिरा प्रियदर्शिनी की अंतिम छवि मन में सहेजे अपने-अपने घर जाएं. मगर लोग तो अपने कान मानो अलगनी पर टांग आए थे. घर छोड़ने से पहले अनुशासन का पाठ भी भूल आए थे. अथवा शोक की इंतिहा में, दुःख के आवेग में सारी मर्यादाएं, समस्त संस्कार अपने आप कहींे कूंच कर चुके थे. जहां इतना शोर, इतनी भीड़, इतना आवेश, इतनी उत्तेजना ना हो.
ऊपर सूरज अपना कोप-प्रदर्शन कर रहा था. अक्टूबर का महीना पिफर भी आसमान एकदम लालमलाल. मानो बीते दिन जो घटा उससे वह भी नाराज हो…और स्वार्थी दुनिया को, इस नाशुक्रे समाज को, अपने क्रोध से जलाकर खाक कर देना चाहता हो. भीड़ में कितने कुचले, कितने हताश होकर एक ओर छिटक गए…कितने जोशोजुनून में चिल्लाते-चिल्लाते अपना गला खराब कर बैठे, अंदाजा लगा पाना बड़ा ही कठिन था. तीनमूर्ति भवन की दीवार के सहारे-सहारे, उसके सभी दरवाजों के सामने टूटे हुए जूते-चप्पलों का ढेर लगा था. भीड़ में ज्यादा संख्या मजदूरों, कारीगरों, छोटा-मोटा धंधा करनेवाले गरीब लोगों की थी, जिन्हें जूते नसीब ही नहीं हो पाते थे. दिवंगता प्रधानमंत्री उन्हीं की तो नेता थीं. वही उन्हें संसद तक पहुंचाते थे. वे लोग जैसे थे वैसे ही घर से निकल आए थे. और चप्पल टूट जाने के कारण अब नंगे पांव थे. लेकिन जब देश का सिंहासन ही नंगा हो चुका हो तो पांवों की परवाह भी कौन करे. किसलिए करे…
अंतिम दर्शनों के लिए उतावले लोग भीतर जाने का प्रयास कर रहे थे. पुलिस की चेतावनी, बार-बार किए जा रहे अनुरोध, प्रार्थना, फरियाद की भी उन्हंे कोई परवाह नहीं थी. असीमित भीड़ सीमाहीन शोक में सारी नैतिकता और सभी संस्कार घर छोड़ आई थी. आखिर दरवाजा खुला. सुरक्षा अधिकारी एक-एक कर लोगांें को भीतर भेजने लगेे. किंतु भीड़ बढ़ती ही जा रही थी. जिससे लोगों का धैर्य जवाब देने लगा. तीनमूर्ति भवन के आगे चैड़ी सड़क पर भीड़ से भरी थी. दूर-दूर तक केवल सिर ही सिर नजर आते थे. लोग पागल होकर दीवारों, दरवाजों को लांघकर भीतर जाने का प्रयास कर रहे थे. भीड़ के दबाव को देखते हुए सुरक्षाबलों के कुछ और दस्ते बुलाए गए थे. किंतु जनसैलाव के आगे उनकी उपस्थिति भी नाकाफी लग रही थी. पुलिसकर्मियों का हर प्रयास विफल था. सुरक्षा अधिकारी बार-बार अपील कर रहा था कि अगर सभी लोग लाइन बना लें तो दर्शनों में सुविधा रहेगी. पर भीड़ असंयत थी. मानो शोक अपने साथ मर्यादाहीनता का अभिशाप भी लेकर आया हो.
देखते ही देखते विशाल तीनमूर्ति मार्ग भीड़ से भर गया. हालात पर नियंत्रण पाने के लिए कुछ और पुलिसकर्मी बुलाए गए थे. मगर भीड़ उतावली और बेकाबू भी थी. अंततः उसपर काबू करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े गए. एक क्षण को सभी की आंखंे भीग गई. गैस का असर कुछ ही देर में जाता रहा. भीड़ फिर भीतर जाने का उपक्रम करने लगी. भीड़ से हमेशा घबरानेवाला, बचकर निकल जानेवाला मैं, उस समय भी परेशान था. भीड़ की तरह भीतर जाने का सामथ्र्य नहीं था और आराम से अंदर पहुंचने की कोई संभावना ही नहीं थी.
तभी संयोग से एक दिशा से नारे की आवाज आई. कतार तोेड़कर कुछ लोग उनके साथ-साथ नारे लगाते हुए आवाज की दिशा में बढ़ गए. लाइन कुछ कमजोर पड़ी तो मैं भागकर उसमें आगे फंस गया. फिर तो भीतर जाने में मात्रा आधा घंटा लगा. स्वयं को भीड़ के साथ बहाता हुआ मैं भी मुख्य भवन में प्रवेशकर गया. मगर कुछ दूर आगे जाते ही रुकना पड़ा. हमारी शक्तिस्वरूपा प्रधानमंत्री का शव तीनमूर्ति भवन के प्रांगण में सामने लिटाया हुआ था. हल्की पीली साड़ी में लिपटा हुआ. मुझे लगा कि जनता के मन को समझने वाली, उसके मन जैसी बात करनेवाली दिवंगता इंदिरा प्रियदर्शिनी के लिए इससे अच्छा कुछ और हो ही नहीं सकता था.
इंदिराजी और धरती पर…हां यह अनहोनी सच हो ही रही थी. उनके सिर को कुछ ऊपर उठा दिया गया था. ताकि दर्शनार्थी उसे ठीक से देख सकें. उनकी दिव्य स्मृति को हमेशा-हमेशा के लिए अपनी स्मृति में बसा सकें. प्रत्येक का मन था कि उन्हें छू कर प्रणाम करें. लेकिन रस्सी के सहारे ऐसी व्यवस्था की गई थी कि शव को छू पाना आसान नहीं था. जैसे-जैसे करीब आ रहा था, वैसे-वैसे दबाव बढ़ता ही जा रहा था. चारोें ओर से भीड़ ही भीड़. कई बार तो कुचलने से बचा. घबराहट में मेरे दिल की धड़कनें बढ़ गईं. मन हुआ कि लौट जाऊं. रेडियो की खबरों से संतोष कर लूं. फिर समाचारपत्रों में तो सब छपेगा ही. मैंने पीछे नजर घुमाई. आगे-पीछे-दाएं-बाएं भीड़ ही भीड़, सिर ही सिर, आदमी ही आदमी. धक्का-मुक्की और रेलमपेल, वापस लौटने का साहस भी जाता रहा.
मुख्य भवन का बरामदा धीरे-धीरे करीब आ ही गया. तिरंगे झंडे में लिपटी मैं वह देह देखी…जिसकी हंुकार सुनकर विरोधियों के हौसले पस्त हो जाती थे. पंद्रह अगस्त और छबीस जनवरी पर जिसका ओजस्वी भाषण सुनकर देश के नागरिकों का सीना गर्व से चैड़ा हो जाता था. रेडियो और ट्रांजिस्टर के आगे लोग जमा होने लगते. रास्ते जाम हो जाते. भारतीयता की पहचान, वही दिव्य विभूति, मातृशक्ति की आदर्श प्रतीक, निष्प्राण होकर जमीन पर लेटी हुई थी. भूमिसुता मानो मां की गोद में चिरनिद्रा में लीन हो. तिरंगे झंडे में लिपटी उस देह में मानो तिरंगे की आभा समाहित थी. यूं तो ढेरांे फूलमालाओं से आच्छादित थी वह देह. मगर आभा में सभी फूल उसके आगे पफीके पड़ रहे थे. पूरा वातावरण सुगंधित हुआ था. परंतु धूम्रगंध से अधिक गंध उन विचारों के कारण वातावरण में छाई हुई थी जिन्होंने कई दशक तक देश की राजनीति और यहां के जनजीवन को प्रभावित किया था. कभी न झुकने की जिद, मुश्किलों के आगे कभी हार न मानने का संकल्प, देश को सदा आगे और आगे ले जाने की जिद…
अनेक गोलियां झेलने के बाद भी उनके चेहरे पर शांति थी. और मुस्कान भी. पीड़ा सिरे से नदारद. बंद आंखें, कि जैसेे कोई साध्वी साधनारत हो. मृत्यु को चैबीस घंटे से अधिक बीत चुके हैं. मगर लगा कि अब भी वह उन्हें हरा नहीं पाई है. अंतिम समय में भी विकारहीन चेहरा बता रहा है कि जिन्होंने उनपर गोलियां चलाई उनके लिए भी उनके मन में आशीर्वाद का भाव है. कि वे अभी महज विश्राम कर रही हों. अभी-अभी उठ जाएंगी. और वहां जमा भीड़ को संबोधित कर कह उठेंगीµ
‘मेरे प्यारे देशवासियो!’
परंतु नहीं, यह धोखा है. वह आवाज हमेशा के लिए शांत हो चुकी है.
मैंने एक मौन प्रणाम किया उस दिवंगता को. फिर भीड़ का सामना करते हुए बाहर निकल आया. थकान से मन भारी-भारी था. मन था कि सीधे घर पहुंचकर चारपाई पर जा पडूं. ताकि एकांत में जाकर खुलकर रो सकूं. और संचित व्यथा को आंसुओं से कुछ कम कर सकूं. सहसा कानों में कुछ शब्द टकराएµ
शठे शाठयं समाचरेत…
खून का बदला खून…
इंदिरा गांधी अमर रहे…
इन समाघोषों को सुनते ही मैं दहल गया. साथ आने वाले व्यक्ति द्वारा ज्ञात हुआ कि उन नवयुवकों में से कई ने प्रधानमंत्री के शव को साक्षी मानकर सौगंध ली है कि वे इंदिराजी की निर्मम हत्या का बदला जरूर लेंगे…लेकर रहेंगे. जोश बढ़ता ही जा रहा था. भावनाओं का आवेग ठहरा. शांत कहे जाने वाले लोग भी उनके साथ मिलने लगे थे. सभी के मन में जोश था, और गुस्सा भी. चेहरे पर क्रोध की ललाई छाई हुई थी. सभी मरने-मारने पर आमादा थे. आवेश में चीख और चिल्ला रहे थे. उन्हे देखकर मेरे ठंडे रक्त में भी उबाल आने लगा था.
मनुष्य या तो गहन दुःख में विवेक खोता है या पिफर क्रोध की अवस्था में. कारण जो भी अविवेकी होना इंसानियत से कई पायदान नीचे उतरना ही हुआ. शहर में अनहोनी की आशंका की भनक सरकार को लग चुकी थी. इसलिए बसें बंद हो चुकीं थीं. सड़कों से वाहन नदारद थे. सिर्फ पैदल यात्री नजर आ रहे थे. रोते-चीखते, नारे लगाते, मरने-मारने का संकल्प लेते हुए. भीड़ का एक रेला गुरुद्वारा रकाबगंज के आगे खड़ा था. अपफवाह थी कि ‘उन्होंने’ गुरुद्वारों में आतंकवादी बसा रखे हैं. भीड़ को गुस्से में हर सिख पगड़ीधारी इंसान आतंकवादी नजर आ रहा था. लोगों की उत्तेजना को शांत करने, गलतफहमी दूर करने के बजाय भीड़ में कुछ लोग थे जो उसको भुनाने में लगे थे. वही लोग बाकी को उकसा रहे थे. उस समय तो मैं नासमझ भी उनके उकसावे का शिकार बना था…
आज खयाल आता है कि गुस्सा लोगों को अहसानफरामोश भी बनाता है, जिस धर्म ने हिंदुत्व की रक्षा के लिए शताब्दियांे तक विधर्मियों से युद्ध किया. जो भारती की पश्चिमी सीमाओं पर प्रहरी बनकर डटे रहे, झेलते रहे आक्रामकों के वार अपने सीनों पर…अपने कितने ही गुरुओं, रणबांकुरे बहादुर सेनानियों को जिन्होंने इस देश-धर्म के लिए कुर्बान किया, जिसका बच्चा-बच्चा हमारे ही परिवार का बड़ा भाई है, उसी धर्म के दो-चार सिरफिरों के लिए पूरे धर्म और उसके आदर्शों को कठघरे  खड़ा करना अपने ही वजूद पर संदेह करने जैसा घिनौना कर्म है.

                                                                                क्रमश:

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