कालिख लगे दिन : दो

दिन में कालोनी के बुजुर्ग लोग बता रहे थे कि सन चौंसठ में जब जवाहरलालजी दिवंगत हुए तब भी लोगों के मन में यही सवाल थे. परंतु वह प्रकृति का कोप था. नियति की स्वाभाविक प्रक्रिया. पर आज…लोगों के झुके हुए चेहरे बता रहे हैं कि इस बार नियति से नहींµहम अपने ही स्वार्थ, लालच, क्षुद्रताओं और ओछी-विघटनकारी राजनीति से पराजित हुए हैं. कोई नहीं मरा, हमें हमीं ने मारा है…
शाम से ही आंशकाओं का बाजार गर्म था. अफवाहें सिर पर संसार उठाए दौड़ रही थीं. रात भयावह होगी, इसका अंदाजा था. अनुभवी लोग अंधेरा होने से पहले ही अपने-अपने घर में जा छिपे थे. पुलिस ने उस डर को, अफवाहों कें आतंक को, आपसी अविश्वास को और भी बढ़ा दिया था. लोगों के मन में एक संप्रदाय विशेष के लोगों के प्रति आक्रोश था. जिससे आतंकवादी हत्यारों का संबंध था. लोग जत्थे के जत्थे बनाकर दिवंगत प्रधानमंत्री के अंतिम दर्शनों को जा रहे थे. ‘इंदिरा गांधी जिंदाबाद…इंदिरा गांधी अमर रहे’ के नारों से आसमान गुंजायमान था.
घरों में दुबके-सहमें लोगों को सुबह का इंतजार था. एक और खबर मिली कि देश की बागडोर राजीव गांधी के हाथों में सांैपी जा रही है. लोकतंत्र में वंशवाद को आगे बढ़ाना महापाप है. एक गाली जैसा है. इसलिए मन में वैसी कोई खुशी नहीं होती, जैसी कि होनी चाहिए. परंतु घनीभूत पीड़ा के दौर में, दुःख के निविड़ अंधकार में, इतना होश ही कहां कि विकल्पों पर देर तक विचार किया जा सके. और विकल्प भी सशक्त और भरोसे के लायक कहां, शोक की बेला से टलते ही स्वार्थ की ताल पर ता-ता थैया करनेे वाले लोग हैं सब. दुनिया भले ही विकल्पहीन न हो, परंतु सार्थक विकल्पों की तलाश…असंभव नहीं तो आसान भी नहीं है, फिर दुःख की दारुण बेला में…जब दिल-दिमाग दोनों बैठ चुके हों…ऐसे में तो अच्छे-खासे ज्ञानी-ध्यानी वक्त के हाथों में पतवार सौंपते रहे हैं. दुनिया को भवसागर यूं ही तो कहा जाता.
दुःख और अवसाद के बीच भी दुनिया के गतिविधियां कब रुक पाती हैं. संसार-चक्र को तो सदैव गतिमान रहना पड़ता है. रेडियो पर बताया जा रहा है कि राजीव जी देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री हैं. उनमें राजनीतिक अनुभव की कमी है. हमें आशा करनी चाहिए कि वे इस कमी को अपनी प्रतिभा के बल पर दूर कर सकेंगे. वे इंदिराजी के श्रेष्ठतर विकल्प के रूप में सामने आएंगे. विकासपथ पर बढ़ता हुआ देश अपनी विकासयात्रा पर आगे भी इसी तरह से बढ़ता रहेगा. आतंकवादियों के मनसूबे नामकामयाब होकर रहेंगे.
अच्छे खयाल मन को बहलाते हैं. मन पर घंटों से पड़ा बोझ कुछ कम होने लगता है. वैसे भी रात आधी से ज्यादा बीत रही है. तुम गांव में हो, अच्छी बात है. तुमसे दूर रहना पहले तड़फाता था. आज अजीब-सा सुकून दे रहा है. मैं आनेवाले समय में सुख-सहवास की कामना करता हुआ सोने का प्रयास करता हूं…संदीप के साथ-साथ तुम्हें भी अच्छी, खूब अच्छी नींद आए और खुशनुमा-रूपहले सपने भी…
तुम्हारा ही….

एक नवंबर, 1984

हिंसा, भय और आक्रोश का नंगा नांच
प्रिय विमल…
स्नेहांजलि!
कल के बारे में मैंने तुम्हें लिखा. यह रात बड़ी डरावनी रही. सच कहूं तो पहली बार तुम्हारी स्मृति भी साथ छोड़ गई थी. मन में न जाने कैसे-कैसे डरावने विचार आते रहे. प्रातः रोज की अपेक्षा मौन थी. मानो दिवंगता प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि दे रही हो. लेकिन सूर्योदय के साथ-साथ दिन का कोलाहल बढ़ता गया. घोर रहस्यमयता लिए हुए. हौले-हौले वातावरण में डर बड़ी तेजी से पसरता जा रहा था. तुम तो सब जानती ही हो. जिन लोगों के बीच हमारा यह अस्थायी, किराये का ठिकाना है, वे सभी मेहनत-मजदूरी करके घर चलाने वाले गरीब लोग हैं. झुग्गी-झांेपड़ियों से लाकर लोगों का यहां बसाया गया है. मुगल बादशाह जहांगीर के नाम बसाई गई यह आवास बस्ती, राजधानी की सबसे बदहाल कालोनियों में से एक है. ऐसी बस्ती को बादशाह जहांगीर का नाम देना मजाक नहीं तो क्या है…कौन-सा तर्क रहा होगा इसके पीछे कौन जानता है. पर यह दिल्ली है, लगभग ऐसी ही एक बस्ती को यहां इंद्रलोक कहकर पुकारा जाता है. गजब का नामकरण है, पर क्या करें, जनता को भुलावा देने के लिए सत्ताएं ऐसे मजाक तो रोज करती हैं. उनसे सवाल कौन कर सकता है. जो कर सकते हैं वे भी तो इसी ‘सिस्टम’ का हिस्सा हैं. अपनी बारी की प्रतीक्षा मौन रहकर करना उनकी स्वार्थमय मजबूरी है.
सवेरे-सवेरे ही यह समाचार हवा में घूम जाता है कि दिवंगता इदिराजी का पार्थिव शरीर आम जनता के दर्शनार्थ तीनमूर्ति भवन में रखा गया है. लोग उनके दर्शन के लिए घरों से निकल रहे हैं. निकलने वालों में स्त्रियों की संख्या भी काफी है. इंदिराजी देश की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की लोकप्रिय नेता. उनकी उपस्थिति से देश की स्त्री-शक्ति को बहुत ताकत और प्रेरणा मिलती थी. इसलिए घरों में पर्दे के पीछे रहने वाली स्त्रियां शील-संकोच त्यागकर बाहर निकल आई हैं. अपनी नेता, अपनी प्रेरणास्रोत अपने प्रधानमंत्री के अंतिम दर्शन करने…
यूं तो आपातकाल के काले दिन भी याद आए. उन्हें यादकर क्षोभ हुआ. बड़े से बड़ा आदमी भी गलती कर जाता है., यह इंदिराजी ने देश पर आपातकाल थोपकर सिद्ध कर दिया था. उनकी इस भूल ने सैकड़ों वाचाल नेताओं को मीडिया के दम पर सत्ता केंद्र पर काबिज होने का अवसर दिया था. उनमें से कुछ को तो यह देश आज तक ढेाता-ठेलता आ रहा है. पर सन इकत्तर के पराक्रम को याद करके मैं अभिभूत हूं. जब इंदिराजी ने पाकिस्तान को ललकारा था. उनके नेतृत्व में हमारी सेनाओं ने पाकिस्तानी सेना को ढाका में पटकनी दी थी. मैं आंखों में नव्वे हजार पाकिस्तानी सैनिकों को भारतीय सूरमाओं के आगे हथियार डालते हुए देखता हूं. ऐसी निर्भीक, पराक्रमी प्रधानमंत्री को अपने ही देश के सिरफिरे लोगों ने मौत के घाट उतार दिया. कितना कृतघ्न है मनुष्य.
शोक में पूरी दिल्ली बंद थी. मैंने भी तीनमूर्ति जाने का निर्णय कर लिया था. प्रातः साढ़े नौ बजे बस में सवार हुआ. ठसाठस भरी बस. लोग अपनी नेता को नारों में जिंदा देख रहे थे. इंदिरा गांधी जिंदाबाद…इंदिरा गांधी अमर रहे…के नारे हवा में थे. कइयों की आंखें लाल थीं. शायद उनकी रात रोते-रोते ही बीती थी. कुछ की आंखें अब भी नम थीं. स्त्रियां पल्लू से मुंह ढांपकर सिसक रही थीं. बस स्टार्ट होते ही ‘इंदिरा गांधी की जय ’ का जोरदार नारा हवा दूर-दूर तक फैलता चला गया.
सभी यात्री शोकाकुल थे. व्यथित और म्लान. अवसाद उनके चेहरों से टपक रहा था. बस एक ही तरह की बातें थीं उनके होठों पर. इंदिराजी की यादों, उनकी प्रशंसा से भरी हुईं. उनकी एक-एक खूबी लोगों के चेहरों पर आ रही थी. कि वे अकेली ऐसी प्रधानमंत्री थीं जिन्होंने सबसे ज्यादा वर्षों तक देश की बागडोर संभाली…कि राजनीति में हजारों दुश्मनों के बीच भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी…कि पंद्रह अगस्त को लालकिले से उनका भाषण सुनकर बूढ़ों के रक्त में भी उबाल आ जाता…दुश्मन के भी हौसले पस्त हो जाते थे…उन्होंने जो एक बार ठान लिया वही किया…कि वे बांग्लादेश बनवा कर ही मानीं…कि पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाया जो उसे ताजिंदगी याद रहेगा. आदि-आदि. बस में कुछ यात्री शांत बैठे हुए थे. एकदम शांत, मानो मरघट के बीच से गुजर रहे हों. सड़कें सुनसान थीं…बाजार बंद.
बस में सवार स्त्रियां या तो सिसकियां भर-भर कर रो रही थीं या उन सिरफिरे आतंकवादियांे को कोस रही थीं, जिन्होंने न जाने किसके बहकावे में आकर इंदिराजी पर हमला किया था. उनपर निष्ठुरतापूर्वक गोलियां चलाई थीं. जिनके कारण वह दिव्यातमा अब हमारे बीच नहीं है. सभी के मन में आतंकवादियों के प्रति आक्रोश था. आंसुओं से भीगा मन लिए लोग किसको तसल्ली दें. किसकी बातों से मन को बहलाएं. बस में एक-दो बच्चियां भी थीं. माता-पिता ने बार-बार समझाया था कि ऐसे मामलों से बच्चों को दूर ही रहना चाहिए. पर वे चली आई थीं. जिद करके चली आई थीं. वे ढंग से रो भी नहीं पा रही थीं. गले में आते ही सांसें घुट जातीं…फिर एक झटके से हिचकी बनकर निकलतीं. उन बच्चियों को समझाने…ढांढस बंधाने की जरूरत थी. मगर यह काम कौन करता कौन. सभी तो उदास और गमगीन थे अपने आंसू पीते, हवा के साथ जीते हुए. मैं खुद बदहवास हालत में था. बार-बार मन गांव की ओर दौड़ जाने को कर रहा है. तुम्हारे पास, अपनों के सानिध्य में. मगर बसें बंद हैं. शहर में भारी तनाव. क्या वह भीतर के तनाव से अधिक होगा…हो भी नहीं सकता. आदमी के भीतर तनाव न हो तो बाहर कुछ आ ही नहीं सकता. भीतर का तनाव ही उसे जगह-जगह दौड़ाता है.
वर्षों पुरानी एक घटना बार-बार स्मृति में कौंध रही है. बात जनता पार्टी के शासन के अंतिम दिनों की है। चैधरी चरण सिंह की सरकार अचानक गिर जाने के बाद आमचुनावों की घोषणा हो चुकी है. इंदिरा गांधी चुनाव अभियान पर खुर्जा पहुंची हुई हैं. हल्की पीली साड़ी, नहीं उसको बादामी कहना ज्यादा उपयुक्त रहेगा. तो उस साड़ी में उनका भव्य व्यक्तित्व अद्भुत आभा बिखेर रहा है. लंबा-चैड़ा रामलीला मैदान, जहां इंदिराजी की सभा होनी है, उनके आने से पहले ही खचाखच भर चुका है. समझ में नहीं आ रहा कि मात्रा अठारह महीने पहले जनता जिसे ठुकरा चुुकी थी, उसी के स्वागत में वह आज पलक-पांवड़े क्यों बिछाए हुए है. मुझे वह दृश्य आज भी याद है. इंदिराजी के आते ही मैदान में जमा लोग टूट पड़े थे. मात्रा एक झलक पाने के लिए. मैंदान उनकी जय-जयकार से गुंजायमान था. उस सभा में मैंने लोगों की आंखों में जिन सपनों को तैरते देखा उनकी झलक आज भी मेरी आंखों पर सवार हैं. जनता ने उन चुनावों में एक बार पिफर इंदिराजी में भरोसा व्यक्त किया था. आज मुझे लग रहा है कि चंद सिरफिरों ने मासूम लोगों की आंखों में पलनेवाले सपनांे, उनकी उम्मीदों, उनके अरमानों को नोंच लिया है.
दुःख और आवेग के साथ सफर पूरा कर पाना कठिन होगा. सो मन लगाने के लिए मैंने घर से राहुल सांकृत्यायन का उपन्यास निकाल लिया था. मगर मन का विक्षोभ इतना तीव्र था कि उपन्यास में मन रम ही नहींे पाया. फिर भी में खुद को बहलाए रखने का भ्रम करता रहा. आंखंे उस पुस्तक में गढ़ाए रहा. बस धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी. खिड़कियों से बाहर जमा गहरा सन्नाटा देखकर मुझे ऐसा लगा कि क्या यही दिल्ली है? हमारी राजधानी….अस्सी लाख की आबादी का शहर. पिफर भी एकदम शांत…मानो मातम मना रहा हो. जहां-तहां से लोगों के जत्थे दिखाई पड़ जाते थे. हाथों में झंडा उठाए. इंदिरा गांधी की जय-जयकार करते हुए. दल के दल तीनमूर्ति भवन की ओर प्रस्थान करते हुए. मैं अनुमान लगाता हूं कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद भी शहर पर ऐसा ही मातम छाया होगा…तब भी लोग ऐसे ही अकुलाए होंगे. शोकाकुल पथराई आंखें ऐसे ही रास्ते पर जा बिछी होंगी.
चैराहे पर पहुंचकर बस को ब्रैेक लग गए. उसी के साथ भीतर सवार लोगों की सांसें ठहर गईं. सड़क पर कुछ युवक रास्ता रोके खड़े थे. हाथों में लाठियां, डंडे, लोहे की छड़ें, फरसे संभाले हुए. बस में सवार लड़कियां सिहरकर अपनी मांओं से चिपट गईं. पुरुषों में से कुछ के चेहरे पर आक्रोश झलकने लगा. कुछ मेरी तरह घबरा गए. कुछ खुद को जैसे-तैसे संभालने, धैर्य बंधाने का प्रयास करने लगे.
‘बस में जो भी पग्गड़धारी हो चुपचाप नीचे उतर आए.’ एक जोरदार आवाज नीचे से आई. गनीमत रही कि बस में कोई सिख यात्री नहीं था. वे बेचारे तो घबराकर पहले ही अपने-अपने घर में सिमट चुके थे. अपने ही धर्म के कुछ सिरफिरों के दुष्कर्म की सजा भुगतते हुए. फिर भी हरेक यात्री ने गर्दन घुमाकर पीछे झांका-µ
‘यहां कोई नहीं है…’ किसी ने बताया.
‘इंदिरा गांधी की…’ एक सवारी ने अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए नारा लगाया.
‘जय….!’ बाकी लोगों ने साथ दिया. बस की तलाशी के लिए ऊपर चले आए लोग एक-एककर नीचे उतर गए. सभी ने राहत की सांस ली. पर यह राहत सिर्फ कुछ क्षणों की थी. क्योंकि बस थोड़ी दूर ही बढ़ी थी कि सामने सड़क पर शोर सुनाई पड़ा. ड्राइवर ने जोर से ब्रैक लगाए. इतने तेज कि उन्हें लगाने के लिए ड्राइवर ने अपना पूरा बोझ ब्रैक पैडल पर डाल दिया था. उस क्षण वह यदि जरा भी चूकता तो सड़क खून से लाल हो गई होती. कई लाशें वहां बिछ जातीं. तत्क्षण एक सरदार बस के आगे से तेजी से गुजरा था. उसी के पीछे, ‘मारो…बचने न पाए.’ का शोर करते. सैंकड़ों आदमी, पगलाई भीड़ में सबके सब हिंस्र, वनमानुष से…शोक और गुस्से में होशों-हवास औैर नैतिकता गंवा चुके लोग. जिनका कोई धर्म नहीं, जात नहीं. देश नहीं, प्रांत नहीं, सबके हाथों में कोई न कोई हथियार, डंडे, लाठियां, हाकी, चाकू, छुरियां लिए हुए. सड़क पर जाम की स्थिति उत्पन्न हो गई. जान बचाने की कोशिश में भागता हुआ आदमी सड़क के दूसरी ओर स्थित गली में घुस गया. उसके पीछे-पीछे भीड़ का रेला भी. इस घटना से बस में सवार लोगों की सांसंे थम गईं. कुछ तो वापस लौटने का मन भी बना चुके थे. लेकिन सड़क पर इक्का-दुक्का वाहन ही थे. नीचे उतरना खुद को मुश्किल में डालना था. अब भी कुछ लोग ऐसे थे जो बिना दर्शन किए लौटने को तैयार न थे. ड्राइवर कुछ देर तक सवारियों के साथ पेशोपेश में पड़ा रहा. आखिर उसने बस स्टार्ट कर दी.

क्रमश:

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