कालिख लगे दिन : ओमप्रकाश कश्यप

अक्टूबर 31, 1984

अनंत दुःख से भरा दिन

प्रिय विमल
चिर-मधुर स्नेह!
मैं सकुशल हूं. परंतु देश इन दिनों संकट में है. और जब देश पर कोई संकट हो, वह दुःख के कठिनतम दौर से गुजर रहा हो तो उसके नागरिकों की कुशलता बेमानी हो जाती है. देश की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या का समाचार तो तुम सुन ही चुकी होगी. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के बाद देश को सबसे बड़ा आघात इस घिनौने हत्याकांड से पहंुचा है. साथ में यह जानकर कि हत्या उन्हीं के रक्षकों द्वारा की गई है, मनुष्यता के प्रति विश्वास पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है. यानी जहां से भरोसे की शुरुआत होती है, वहीं विश्वासघात! यह तो पाप की पराकाष्ठा हुई न! पर आतंकवाद के पोषक, स्वार्थी राजनीतिज्ञ यह सब कहां समझते हैं.
खबर है कि आज प्रातः नौ बजकर चालीस मिनट पर, जब वे प्रधानमंत्री आवास 1, सफदरजंग रोड से अपने कार्यालय के लिए निकली थीं, तब उन्हीं के एक क्रूर और सिरफिरे अंगरक्षक ने उनपर एक के बाद एक कई गोेलियां दागीं. प्रधानमंत्री ने उसकी और हैरानी से देखा. जैसे कोई भरोसे का खून कर रहा हो. आंखों में हैरानी के भाव लिए घायल अवस्था में वे मुंह के बल जा गिरीं. तभी सामने स्थित अंगरक्षक ने भी अपनी स्टेनगन का मुंह खोल दिया. उसने एक-एक कर पूरी सोलह गोलियां उनके शरीर में उतार दीं. अचानक हुए इस हादसे को दूसरे अंगरक्षक कुछ देर तक तो समझ ही नहीं पाए. जब होश आया तो उन्होंने दोनों हमलावरों पर वार किया. वे वहीं धराशायी हो गए. उन सिरफिरे हमलावरों के नाम सतवंत सिंह औैर बेअंत सिंह हैं. दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया है.
इंदिराजी क्षत-विक्षत अवस्था में धारा पर पड़ी थीं. सभी किंकर्तव्यविमूढ़ थे. हाय! यह क्या हुआ अचानक? चारों ओर अंधकार ही अंधकार था, गहरा और काला, समूचे उजाले को अपनी कैद में समेटे हुए. तभी अंगरक्षकों को अपने कर्तव्य का बोधा हुआ. उन्होंने खुद को संभाला. बेहोश इंदिराजी को अस्पताल पहुंचाया गया. गोलीकांड की खबर को पंख लगे थे. वह पल-भर में यहां से वहां तक फैल गई. जिसने भी सुना वही हतप्रभ रह गया. सभी हत्यारों को निंदा कर रहे थे. पुरुष गुमसुम, भोली-भाली महिलाएं बिलखने लगीं. बच्चे सुबककर स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हुए अपनी मांओं से चिपट गए.
सुना है कि तभी से धर्मस्थलों में प्रधानमंत्री की जीवनरक्षा के लिए प्रार्थना हो रही है. वैसे आदमी भी अजीब है. पहले तो पाप करेगा, दूसरों को सताएगा. फिर भगवान के सामने नाक रगड़ेगा, माफी के लिए पूजा-अरदास सब करेगा. गलती कभी न दोहराने की कसमें खाएगा. कसमें खाकर जैसे ही बाहर निकलेगा. फिर वही सब पाप करेगा. और गीत पुण्य के गाएगा. ये धर्म-स्थल भी कम अजीब तो नहीं. रोज-रोज भाइचारे की दुहाई देनेवाले, बात-बात पर सभी धर्मों को एकसमान बतानेवाले, इस संसार से मुक्ति का पाठ पढ़ानेवाले ये धर्मस्थल, यहां पर रहने वाले पंडे, पुजारी, मुल्ला, मौलवी, ग्रंथी, पादरी सभी तो…हां, ये सभी वक्त आने पर कितने अहंकारी और निर्मम बन जाते हैं, कोई नहीं जानता. कोई सोच भी नहीं सकता. इन दोनों में कौन ज्यादा खतरनाक है, कौन जाने, धर्म की सत्ता या सत्ता का धर्म. कोई भी हो, पर इनके बीच पिसता तो बेचारा आम आदमी ही है.
वैसे इनकी दया-ममता का भी कोई सानी नहीं है. धर्म ने आदमी को आदमी से जोड़ा है. उसको संस्कृति, सभ्यता और जीने के नवेले संस्कार दिए हैं, तो आदमी और आदमी के बीच नफरत की मोटी दीवारें भी खड़ी की हैं. आखिर क्यों न हो. धर्म की सेवा में लगे ये पंडा-पुजारी, मुल्ला-मौलवी, ग्रंथी-पादरी वगैरह भी तो इंसान ही हैं. सो आदमी की सारी की सारी कमजोरियां इनमें भी हैं. तभी तो एक गुरुद्वारे में हत्यारों को अमृत चखाया जाता है तो दूसरे में घायल ‘इंदिरा मां’ की प्राणरक्षा के लिए प्रार्थना की जाती है. लंगर खोल दिए जाते हैं. लोग सोचते रहें कि इन दोनों में सच क्या है. धर्म का कौन-सा रूप असली है. शायद एक भी नहीं, शायद दोनों ही. सच तो यह है कि ये सभी इंसान के ऊपर हैं. उसकी मर्जी, जो चाहे चुने. और इंसान है कि गीत सदाचार के गाएगा और अपने लिए चुनेगा मक्कारियां ही.
दोपहर को ही खबर मिली थी कि इंदिराजी अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही हैं. डाॅक्टरों का एक दल उनकी देखभाल में लगा है. पूरे देश की धड़कनें बढ़ी हुई हैं. सब अपनी प्रिय नेता को सकुशल देखना चाहते हैं. चाहते हैं कि वे उठकर देश की बागडोर फिर अपने हाथों में ले लें. संभालें सबकुछ. इसलिए सब मनौतियां मांग रहे हैं. कोई उदास मन से बता रहा है कि एक-एक कर पूरी दस गोलियां उनके घायल शरीर से निकाली गई हैं. डाॅक्टरों को कुछ आस बंधी. किंतु नियति को कौन समझ पाया है. उस समय भी कौन समझ पाया था कि वह कोई नया ही खेल खेलना चाहती है. कुटिल और निर्मम. मृत्यु का पैशाचिकी तांडव…जो समय की धारा को पलट देता है. तूफान की तरह उठकर जो मासूम ज्योर्तिलिंगों को तहस-नहस करता चला जाता है. जिसके वार से न जाने कितने दीपकों से उनकी ज्योति छिनती रही है.
सुनकर सहसा धक्का लगा. अनहोनी ही थी. सरासर अनहोनी. कि वज्राघात या फिर सिर पर कड़कती हुई बिजली का गिर पड़ना. एक घोर कष्टदायक समाचार, जिसने धरती हो जैसे हिलाकर रख दिया था. समाचार था कि इंदिरा गांधी की हृदयगति रुक गई है. तब तक अस्पताल के दरवाजे पर सैकड़ों लोग जमा हो चुके थे. उससे कई गुना देश के कोने-कोने से बढ़े चले आ रहे थे. सभी सकते की हालत में थे. कि जैसे वज्रप्रहार से सुध-बुध खो बैठे हों. डाॅक्टरों को अपनी सीमा का बोध हो चुका था. काश! वे मृत्यु के उस पार झांकने में कामयाब होते. काश! कुदरत ने कुछ कश्मिाई ताकत भी उनके हाथों में सौंपी होती. किंतु भगवान नहीं थे वे. अस्पताल के बाहर, एक ओर रुदन मचा हुआ था. लोग जार-जार रो रहे थे. आंसुओं की जैसे बाढ़-सी आई हुई थी. कई स्त्रियां तो खबर मिलते ही बेहोश हो गईं. धैर्य बंधाने का साहस पुरुषों मंे भी कहां था? वे भी भीतर से टूटे हुए थे. कौन सोचता था कि ऐसी अनहोनी घट सकती है. जिसकी भृकुटी के बल ने पाकिस्तान के नापाक इरादों को चकनाचूर किया, उसके दो पाट कर बांग्लादेश की नींव रखी, वह आज धरती पर लेटी है…नियति की इससे बड़ी मार और क्या होगी.
किसी को भी विश्वास नहीं हो रहा था. कोई यह मानने को तैयार न था कि ऐसी अनहोनी भी घट सकती है. कि बाड़ ही खेत को खाने का दुष्कर्म कर सकती है. कि एक दिन रक्षक ही भक्षक बन जाएंगे. कि जिनको इंदिराजी ने स्वयं अपनी सुरक्षासेवा में लेने की सिफारिश की थी, वही गद्दारी कर जाएंगे. एक सपना बार-बार उनकी आंखों में सज जाता था. कि इंदिराजी भाषण जी दे रही हैं. कि बार्डर पर खड़े होकर बांग्लादेशियों को ढांढस बंधा रही हैं…देश के आमआदमी को तसल्ली दे रही हैं कि वह अकेला नहीं है…कि भारत महान है और वे इसकी महानता पर आंच हरगिज नहीं आने देंगी…कि उनके रहते हिम्मत खोने की जरूरत नहीं है. ना ही जरूरत घबराने की है. लोग देख-सुन रहे हैं कि इंदिराजी आतंकवाद से लड़ने के लिए लालकिले की प्राचीर से वक्तव्य दे रही हैं. दुश्मन मुल्क को ललकार रही हैं कि समय रहते संभल जाए…बाज आए अपनी ओछी हरकतों से. अगर शिव की तरह भारत का तीसरा नेत्र खुला तो वह तबाह और बरबाद हो जाएगा. उनकी जोशभरी आवाज रेडियो के जरिये प्रत्येक घर में अलख जगा रही है. वे गर्व से कह रही हैं कि जब तक मेरे खून का एक भी कतरा मौजूद है, हम आतंकवाद से लड़ते रहंेगे. कि भारत ने हर जंग जीती है. कि यह जंग भी हम ही जीतेंगे…जीत ही लेंगे. हां, हम ही जीतेंगे…जरूर जीतेंगे…
हम होंगे कामयाब…हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब एक दिन
हो…मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास,
हम होंगे कामयाब एक दिन
होगी शांति चारों ओर, होगी शांति चारों ओर…
हो मन में है विश्वास…होगी शांति चारों ओर एक दिन
हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब….
हम होंगे कामयाब एक दिन….

कोई नहीं समझता था कि ऐसी अनहोनी भी घट सकती है. सभी जानते थे कि यह कितना बड़ा झूठ है. प्रधानमंत्री के पार्थिव शरीर के बारे में शहर की हवा में खबरंे घुमड़-घुमड़़ कर बाहर आ रही थीं. मगर एक बात हवा के पहले झोंके के साथ-साथ हवा में फैली थी. कि मरते समय उनका चेहरा देपोपम सौंदर्य से नहाया हुआ था. एक पुण्यात्मा अनंत में विलीन हो गई. अथवा उसने देश के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया था. मानो इस घटना का पूर्वाभास था. वे अक्सर कहा करती थीं कि:
‘मैं अगर मर भी गई तो मुझे इसका कोई अफसोस नहीं होगा. मेरे खून का एक-एक कतरा इस देश को और आगे ले जाएगा.’
उन्हीं इंदिरा गांधी का पार्थिव शरीर आज निश्चल और शांत पड़ा है. पीड़ा, भय और अशांति से कोसों दूर. उनकी पुण्यात्मा अनंत में लीन हो चुकी है. तेज, तेज में समाकर तेजोमय हो चुका है. उन्होंने देश के लिए आज अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया. जो वे सदा कहती आई थीं वही कर दिखाया. वह किया जिसका सपना हर राष्ट्रभक्त देखता है. मगर ऐसा नसीब सिर्फ कुछ ही लोग लेकर आते हैं. इस निविड़, डरावनी रात में मुझे वे शब्द याद आ रहे हैं जो उन्होंने अपनी हत्या से बस कुछ ही घंटे पहले कहे थे-µµ
‘अगर देश हित में मेरी जान भी चली जाए तो मुझे गर्व ही होगा. क्योंकि मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे खून का हर कतरा इस देश को सुदृढ़ और प्रगतिशील बनाएगा.’ कितना विश्वास था इन शब्दों में. पर जिसने भी सुना वही इस अप्रत्याशित से बयान पर चैंका था. एक सांसद ने तो यहां तक कह दिया था कि, ‘यह खून के कतरे वाली बात प्रधानमंत्री ने यहां क्यों उठाई?’
हां, कुछ तो रहस्य था इन शब्दों में. कुछ बात तो थी जो उनके होठों से सहसा फूट पड़ी थी. मानो पूर्वाभास हो. उन सांसद महोदय की तो बिसात ही क्या. समय के गर्भ में पलने वाली सचाई को बड़े-बड़े ज्ञानी-महात्मा, मुनि-तपस्वी भी कहां बूझ पाते हैं. जो हो इंदिराजी की हत्या के साथ ही आज एक युग का अवसान हो गया. आज इस सच को कोई माने या न माने. पर कल लोग जरूर मानेंगे. घड़ी की सुइयां चलते-चलते ठहर-सी गईं. प्रगति का रथ जो गहराता हुआ आगे बढ़ रहा था, सहसा लगी ठोकर से धराशायी हो गया. सुधि सारथि स्वयं अनंत को प्रस्थान कर गया. अकेला ही. अश्व दिशाभ्रम के शिकार होकर कहां-कहां जाएंगे, इस क्षत-विक्षत रथ को किस दिशा में ले जाएंगे, कौन जाने. महाज्योति का अवसान आज हुआ. इसका अंधकार युगों तक भटकाएगा. अवसाद में राजमार्ग सूने पड़े हैं. बाजार बंद…सिर्फ चर्चाएं हैं और डरावनी अफवाह. अनगिनत, बेलगाम घोड़ों से दिशाहीन दौड़ लगाती हुईं. बच्चे, बूढे़, जवान, औरत और मर्द सभी घबराए से पूछ रहे हैं:
‘अब क्या होगा…क्या होगा अब?’
क्रमश:

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