स्याह हाशिये-एक : लालची कभी बादशाह नहीं बनते

एक आदमी घूमते-घामते रास्ता भटक गया. वह ऐसे सुनसान जंगल मे पहुंचा जहां कोई नहीं था. दूर-दूर तक सिर्फ जंगल था. अकेले चलते हुए आदमी के जी में न जाने क्या आया कि वह खुद को जंगल का राजा समझने लगा. उसे लगने लगा कि पेड़-पौधे उसके लिए बंदनवार सजाए हुए हैं. हवा आ-आकर उसके कदमों को चूम रही है. रास्ते की धूल उसके चरणों से लिपटकर निहाल हुई जा रही है. इसी अभिमान से उसका सीना तनता चला गया.
‘मुझे खुद पर गर्व करने का पूरा अधिकार है….क्योंकि मैंने इस जंगल की खोज की है.’ आदमी ने अपनी ही पीठ ठोकनी चाही.
‘झूठ!’ सर-सर बहती हुई हवा ने आदमी के कान में कहा, ‘यह पगडंडी बता रही है कि तुमसे पहले भी अनगिनत प्राणी यहां से गुजर चुके हैं.’
‘मूर्ख रहे होंगे वे जो इतने बड़े जंगल को लावारिस छोड़ दिया. इसलिए वे मेरी गिनती में ही नहीं हैं. अब मैं आ गया हूं और ऐलान करता हूं कि यह सारा जंगल मेरा है.’ आदमी से पहले ही उसका अभिमान बोल उठा. हवा को काम था. वह मुस्कराती हुई आगे बढ़ गई. आदमी जंगल की पैमाइश करने लगा. उसी समय सामने से एक कुत्ता आता हुआ दिखाई दिया. वह मुंह लटकाए अपनी ही धुन में बढ़ा चला आ रहा था. आदमी ने कुत्ते को दुत्कारा. रास्ता छोड़ देने को कहा. परंतु कुत्ता भी जिद्दी था…नहीं माना.
‘जंगल में सब बराबर हैं. यहां किसी की मनमानी नहीं चलती.’ कुत्ता बोला.
‘कल तक यहां जंगलराज चलता था. अब जंगल मेरे अधिकार में है. आगे वही होगा जैसा मैं चाहूंगा. अब यहां वही रह पाएगा जो मुझे अपना स्वामी स्वीकार करेगा.’
अकस्मात कुत्ता जोर-जोर से हंसने लगा. आदमी को विस्मय हुआ—
‘तुम क्यों हंस रहे हो?’ आदमी ने पूछा.
‘बहुत खोटे भाग्य वाले हो तुम.’ कुत्ता बोला—‘मैं जंगल का देवता तुम्हारा भाग्य संवारने आया था. इस जंगल के साथ-साथ तुम्हें बेशुमार हीरे-जवाहरात भी देना चाहता था. ताकि तुम दुनिया के सबसे बड़े आदमी बनकर जिंदगी के मजे लूट सको. मगर तुमने मेरा अपमान किया है. खैर, तुम्हें जंगल ही चाहिए तो संभालो इसे….मैं चला.’ कुत्ता चलने को हुआ तो आदमी उसके कदमों पर गिर पड़ा….गिड़गिड़ाया….माफी मांगने लगा. कुत्ता शांत मन से उसकी पीठ से गुजरता हुआ आगे बढ़ गया. दूसरी ओर जाकर वह पलटा और आदमी को संबोधित करके कहने लगा— ‘बरसों पुराना साथ है हमारा. इसलिए मैं तुम्हारी नस-नस को पहचानता हूं. अपनी सभ्यता पर बड़ा गर्व है तुम्हें. मगर उनमें क्या यह कहीं नहीं लिखा कि लालची कभी बादशाह नहीं बनते और यदि बन जाएं तो उनके राज्य में चूहे ही फलते-फूलते हैं….इंसान नहीं.’
और इससे पहले कि आदमी उठकर अपनी धूल झाड़े, कुत्ता अपने रास्ते पर आगे बढ़ गया.
ओमप्रकाश कश्यप

2 टिप्पणियाँ

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2 responses to “स्याह हाशिये-एक : लालची कभी बादशाह नहीं बनते

  1. kya baat hai bahut hi achhi kahani,aur sahi bhi laalch buri bala hai

  2. kashyap omprakash

    धन्यवाद, आपकी हर प्रतिक्रिया मेरी मार्ग्दर्शक है-कश्यप

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