सफ़रनामा एक संसार खिड़की के आरपार – ओमप्रकाश कश्यप

इकीसवीं शती का छठा वर्ष और मई महीने की उनीसवीं तारीख. हवा मंे गरमी और उमस. धूप में तेजी और तपिश. ऐसे मौसम में दिल्ली से अहमदाबाद की यात्रा. एक बेहद औपचारिक किस्म का सरकारी टूर. जिसकी भूमिका भी अप्रत्याशित और अचानक बनी थी. इसलिए बिना किसी खास तैयारी के…बिना किसी विशेष कार्यक्रम के यात्रा की शुरुआत की गई. राजधानी छोड़ते-छोड़ते खिड़की के बाहर घोर अंधेरा पसर गया. कहीं-कहीं टिमटमाती हुई रोशनियां भी नजर आ जातीं. किसी शहर या कस्बे की मौजूदगी का एहसास कराती हुईं. इससे अधिक कुछ नहीं. हां, कुछ भी नहीं. सिवाय बाहर से आती सन्नाटे की आवाज के. मन था कि कुछ पढूं…या कागज काले करते हुए इस सन्नाटे को अपने भीतर पसरने से रोकूं। किंतु सहयात्राी को सोने की जल्दी थी. उसने लाइट आॅफ करने के लिए मेरी ओर देखा. वातावरण का अभ्यस्त न होने के कारण नींद मुझसे दूर थी. परंतु खुद को अच्छा सहयात्राी दर्शाने के लिए मैंने अंधेरे के साथ जागना ही उचित समझा.
धड़क-धड़क-धूम-धड़क! रात के साथ-साथ रेलगाड़ी भी भागती रही. भागता रहा मन, खिड़की के आर-पार…

सुबह का मंद समीरण. हौले-हौले बहता. तन को मंद-मंद सहलाता हुआ. ऊर्जा से भरपूर. आबूरोड़ स्टेशन आने से पहले ही सूचना दे दी गई थी कि गाड़ी यहां पर दो मिनट रुकेगी. यात्रियों के उतरने से नीचे की सीट खाली होती है. मौका देख एक खाली बर्थ पर जम जाता हूं. वहां से गाड़ी के खिसकते ही पठार दिखाई देने लगे. दूर-दूर तक फैले हुए. काले पत्थरों को सूरज की किरणें सुरमई रंग देती हुई. खेतों के बीच कीकर, बबूल, पिलखन, पीपल, नीम, झरबेरियां, ढाक और कंटेली जैसे परंपरागत पेड़-पौधे. बरसों-बरस सूखे की मार झेलती आई इस धरती को देखकर यह अंदाजा लगा पाना जरा भी कठिन नहीं कि जीवन यहां कितना मुश्किल रहा होगा. इन परिस्थितियों में टिके रहना क्या आसान था? राजस्थान और गुजरात सीमांत प्रदेश हैं. बाहर से आए आतंकी, हमलावरों को सबसे पहले यहीं से निपटना पड़ा. सीधे-सादे दिखनेवाले इन लोगों से निपटना एकदम आसान नहीं है, यह प्रत्येक हमलावर समूह ने माना. अपने नदी-नालों, बीहड़ जंगलों, पहाड़ों यहां तक कि रेत, घास-पात और धूप से झुलसी इस धरती को बचाने के लिए यहां के लोगों ने कभी कोताही नहीं बरती. हर बार दुश्मन के दांत खट्टे किए. रणभूमि में बच्चा-बच्चा काल-भैरव बन गया. आमने-सामने के संघर्ष में हमलावरों को हमेशा मुंह की खानी पड़ी. प्रकृति ने इन्हें भीतर से मजबूत शायद इसीलिए बनाया है.
अंदरूनी टूटन के कारण कभी-कभी हार का मुंह भी देखना पड़ा. तो भी ये टूटे नहीं. महाराणा प्रताप, वीर दुर्गादास, दानवीर भामाशाह से लेकर पन्ना धाय तक; जाने कितनी बलिदान गाथाएं हैं. जाने कितने अलबेले मानुसों की जन्मभूमि रही है राजस्थान की यह धरा. इसकी मिसाल मिलना मुश्किल है. इसके कण-कण में रची-बसी ऐसी अनेक कहानियां हैं जो पूरी दुनिया को अपनी मिट्टी से प्यार करना सिखा सकती हैं. किसी राजस्थानी कवि की पंक्तियां मेरे कानों में ऊर्जा उंडेल रही हैंµ
पीथल रा आखर पढ़ता ई राणा की आंख्यां लाल हुई
ध्क्किार मनै, हूं कायर हूं, नाहर री एक दकाल हुईं
हूं भूख मरूं, हूं प्यास मरूं, मेवाड़ ध्रा आजाद रवै
हूं घोर उजाड़ौं में भटकूं, पण मन में मां की याद रवै
डिब्बे में रेडियो पर गुरुवाणी की आवाज गूंज रही है. वातावरण को पवित्राता के अहसास से भरती हुई. सोचता हूं कि डिब्बे में एक भी सिख-पंजाबी नहीं. यात्रियों में कुछ तो गुजराती बोल रहे हैं. कुछ राजस्थानी हैं. कुछ यात्राी जरूर दिल्ली से आए हैं. व्यापार के सिलसिले में अहमदाबाद की ओर जाते हुए. गांधी और नामदेव की परंपरा के लोग. मीरा और बाबा रामदेव के पुजारी. हम पंजाब की धरती से भी दूर हैं. स्थानीयता की मांग के अनुसार यहां बाबा रामदेव के भजन सुनाई देने चाहिए. या फिर किसी गुजराती संत की अमरवाणी. परंतु अपने इस क्षुद्र सोच पर तत्काल हैरानी होती है. जिस तरह राम-कृष्ण पूरे देश की आत्मा में समाए हैं. गांधी जैसे सबके हैं…राणा प्रताप की वीरगाथाएं सुनकर जैसे देश के किसी भी प्रांत के नागरिक का सीना गर्व से फूल जाता है. मीरा के भजन सुनकर पूरे वातावरण में जैसे भक्ति-भाव उमड़ने लगता है. मन पवित्राता के एहसास से भर जाता है. कबीर की साखियां जैसे सबकी हैं. रहीम-रसखान से सबका अपनापा है, वैसे ही नानक भी सबके हैं. डिब्बे में सभी गुरुवाणी को दत्तचित्त सुन रहे हैं. इस बोध के साथ मुझे भी गुरुवाणी में रस आनेलगता है. मन दुनिया के सत्य की खोज मंें आकुल हो दौड़ पड़ता है. जिसके लिए हमारे मनीषियों ने बरसों-बरस साधना की थी.
ट्रेन ने गति बढ़ा दी है. आबू रोड से दस-बारह किलोमीटर ही आए होंगे. इस बीच न जाने कितने पठार गुजरे होंगे बता पाना मुश्किल है. खिड़की से दूर एक विशालकाय काला बादल नजर आता है. क्षितिज की गोद से सिर उठाता हुआ. जरूर कहीं दूर जोरदार बारिश हो रही है. मैं अनुमान लगाता हूं. किंतु चंद मिनटों के बाद ही अपनी गलती का एहसास होने लगता है. जिसे मैं बादल समझ रहा था, वह तो मटैले रंग का भीमकाय पठार है. किसी विशाल अजगर की भांति पंूछ फैलाए लेटा हुआ. उसकी अगल-बगल और छोटी-छोटी कई पहाड़ियां हैं. मानो प्रकृति ने जतन से बुनी टोकरियों को उल्टा रख छोड़ा हो. कि विशालकाय बौंगे-बिटोरे हों. जिनमें प्रकृति ने अपनी महत्त्वपूर्ण समिधाएं सुरक्षित रख छोड़ी हों. अपने भीतर ये पठार जाने कितने संघर्ष, कितनी बलिदान कथाएं, कितने रहस्यों और जाने कितनी प्रेम कहानियों को छिपाए हुए हैं, बता पाना बहुत ही मुश्किल है.
गुजरात और राजस्थान के सेठ दिग्विजयी रहे हैं. व्यापारिक कौशल का लोहा उन्होंने पूरी दुनिया से मनवाया है. अथक संघर्ष की प्रेरणा उन्हें कहां से मिली होगी? अगर यहां की धरती भी अपने उत्तरप्रदेश जैसी समतली और उपजाऊ होती तो क्या ये इतने बड़े उद्यम साध पाते. तो क्या प्रकृति ही उनके लिए वरदान बनी. उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश की जमीन उपजाऊ थी तो वहां के लोगों को जमकर मेहनत करना आया. उन्होंने एक जगह टिककर प्रकृति के रहस्यों को बूझने का काम किया. आध्यात्मिक ऊंचाइयां हासिल कीं. जिससे नए दर्शनों का उदय हुआ. मानवी मेधा सम्मानित हुई. गौतम, महावीर के उपदेशों ने दुनिया पर आध्यात्मिक विजय प्राप्त की. राम और कृष्ण की गाथाएं घर-गांव की धरोहर बन गईं. संगीत, नृत्य आदि ललित कलाओं का बहुमुखी विकास हुआ. काशी के भक्ति आंदोलन ने सुप्त मनुष्यता को जगाने कर काम किया. गुजरात और राजस्थान के क्षेत्रों में प्रकृति का बीहड़पन उनके जीवन में वरदान बनकर फला. इंसानी जिजीविषा ने संघर्ष का रास्ता थाम लिया. ऊंट, खच्चर, छकड़े आदि पर वे माल लादकर निकल पड़े. किस्मत आजमाने कि अपने कौशल से दुनिया पर फतह पाने. अपनों का साथ मिला. हिम्मत रंग लाई. धरती मां का वरदान खुलकर फलने लगा.
रेलगाड़ी भाग रही है. भागती जा रही है रेलµधूम-धड़क-धड़क-धड़क…
पालनपुर स्टेशन अभी-अभी गुजरा है. वहां की सुंदरता आंखों में बसी है. सब कुछ यदि ठीक-ठाक करीने से सजाया गया हो कितना अच्छा लगता है. स्टेशन लगभग खाली पड़ा था. दिन की शुरुआत में रोज ऐसा ही होता होगा. जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ेगा भीड़ बढ़ती जाएगी. बस यही अवसर है यहां के सौंदर्य को आत्मसात करने का. जिस राजधानी से मैंने अपनी यात्रा शुरू की थी वहां प्रगति की तेज रफ्तार इंसान को बौना बना देती है. देह से आत्मा को अलग कर उसको मशीन में तब्दील कर देती है. यहां के खुले परिवेश में हरेक आदमी अपने मन का राजा है. वह दूर-दूर तक फैली संपन्नता को भोग सकता है. बशर्ते मान ले कि दूसरे भी उससे कम नहीं. अपने-अपने मन के सभी राजा हैं. अगर यह मेरा भ्रम है, अगर मैं गलती पर हूं तो भी मुझे कोई मलाल नहीं. मैंने जो छवि यहां के सौंदर्य को लेकर अपने मानस में बसा ली है; उसे इसी रूप में बनाए रखना चाहता हूं. कभी-कभी भ्रम में रहना भी बड़े काम आता है.
गाड़ी किसी पुल के ऊपर से गुजर रही है. नीचे झांकता हूं. शायद कोई नदी हो…या चैड़ी सड़क. पर दिखाई पड़ता है दूर-दूर तक फैला जंगल. कीकर, बबूल, पिलखन और कांटेदार झाड़ियों से भरा हुआ. फिर पुल की प्रासंगकिता? कभी पानी बहता होता इसका भी संकेत नहीं. तो क्या यहां कोई नदी अंतःसलिला है? धरती की गर्भनाल से गुजरती हुई. और ये पेड़, हरी-भरी झाड़ियां इन पठारों द्वारा उसके ऊपर खेल-खेल में छोड़ दी गई वनस्पतियां हैं? काश! ऐसा हो. होगा जरूर. वरना रेत के साम्राज्य में जीवन कैसे पनप सकता था. मैं पल-भर के लिए आंखें झपकाता हूं. मानो सपना सजाकर सूखे की मार को झेल लेना चाहता होऊं. संभव है ऐसे सपने यहां के निवासी रोज सजाते हों.
भागती हुई ट्रेन से छापी पीछे छूट गई. वहां कुछ पुरानी इमारतों की झलक दिखाई दी थी. पाश्चात्य वास्तुशिल्प के उपयोग से बनाई हुईं. पूरा क्षेत्रा हरा-भरा है. चारों और पेड़ ही पेड़. किसी जमाने में संभव है अंग्रेज यहां आते हों. पिकनिक मनाने. सत्ता के मद से चूर. मैं उनके घोड़ों की टापों को सुनने का प्रयास करता हूं. पर सुनाई पड़ती हैं चीत्कारें. बिना किसी बात पीठ पर पड़ते चाबुकों से गूंजती मर्मांतक चीखें. इन इमारतों के निर्माण के लिए जाने कितनों को बेगार के लिए विवश किया गया होगा. मना करने पर जाने कितने अत्याचार किए गए होंगे. जाने कितनी जानंे ली गई होंगी. उनमें हो सकता है कोई दक्ष वास्तुशिल्पी भी हो. जो अवसर मिलने पर ताजमहल के जोड़ की इमारत बना पाता. पर उसे मौका कहां मिल पाया. शासक अपना धर्म भूलकर जब ताकत के प्रदर्शन पर लग जाता है तो ऐसी घटनाएं रोज होती हैं. पर निर्दोष चीखों की मार बहुत भारी होती है. उसकी आह से अच्छे-अच्छे साम्राज्य तबाह होते रहे हैं. लोग कुछ भी कहें. मुझे तो ब्रिटिश सत्ता के उखड़ने के पीछे यही चीखें सुनाई पड़ती हैं.
एक और पुल. बल्कि परस्पर समानांतर दो पुल. बराबर-बराबर लेटे हुए. एकांत मिलते ही आपस में जरूर बतियाते होंगे. अपने बीते दिनों के बारे में…उन दिनों की धूमधाम-भरी यादों और बातों को लेकर. वर्तमान का दर्द भी इन्हें खूब सताता होगा. चुपके-चुपके रोते होंगे. गमजदां, अकेले-अकेले. अपनी उपयोगिता और सूनेपन को लेकर. दोनों की लंबाई बराबर. सौ मीटर से ज्यादा ही रही होगी. दोनों के नीचे बस रेत ही रेत…कि रेत की नदी…कि सन्नाटे का अंतहीन जंगल…कि नीरवता से बुनी गई एक कविता साकार. कभी यहां सचमुच की नदी बहती होगी, इसका कोई संकेत नहीं. अगर पहले नदी थी और अब गायब है तो यह बुरी बात है. तबाही का संकेत है. विकास की दौड़ में हमने जो अनजाने या जानबूझकर गंवा दिया है, उसकी ओर साफ इशारा है. दोनों पुलों के बीच में एक कुंआ है. पुराने चलन का. पतली-पुरानी ईंटों से बना. कभी इसमें शीतल जल भरा रहता होगा. लाखों यात्रियों की प्यास बुझाई होगी इसने. सैंकड़ों प्यासों को जीवनदान दिया होगा. उस समय…तृप्ति के उन अमूल्य क्षणों में लोगों ने इसका कितना एहसान माना होगा.
उन दिनों चांदनी इसमें नहाने आती होगी. बरसात में मेंडक इसमें बादल-राग सुनाते होंगे. बादलों से झरती बूंदें जब इसमें टप-टप गिरती होंगी तो कितना मधुर संगीत बजता होगा. पूर्णिमा का थका-थका चांद इस कंुए के पानी में अपना अक्स देखने के बाद ही आगे बढ़ता होगा. अब वो दिन कहां…अब तो महज एक खंडहर है. पुराने वक्त और परंपराओं का. लोकश्रुति में लाखा बंजारे का जिक्र मिलता है. अपने काफिले के साथ व्यापार के सिलसिले में वह दूर-दूर तक निकल जाता था. जहां भी पड़ाव डालता वहां अपने भारी-भरकम कुनबे की प्यास बुझाने के लिए नया कुंआ खोदता. समय आने पर बंजारा तो अपने काफिले के साथ आगे बढ़ जाता. कुंए के रूप में उसकी स्मृतियां बची रह जातीं. कुदरती धरोहर के समान. वर्षों पहले किसी बंजारे ने यहां भी डेरा डाला होगा. उसी ने इस कुंए को गढ़ा होगा. बंजारा संस्कृति के साथ ही उसकी पहचान भी मिट-सी गई है. भ्रष्ट और हरामखोर नेताओं को स्मृतियों में बनाए रखने के लिए हमारी सरकारें जितना खर्च करती हैं, उसका यदि एक अंश भी इस लुप्तप्रायः संस्कृति को बचाने के लिए खर्च किया जाए तो मनुष्यता का कितना कल्याण हो. विदग्ध क्षणों में अनुपम मिश्र और राजेंद्र सिंह की याद आती है. सुकून से मन को दुलारती हुईं. राजस्थान के जलस्तर को सुधारने और वहां की बंजर धरा को जलधार से नहलाने के लिए वे और उनके साथी जो कुछ कर रहे हैं, उसकी याद से मन को तसल्ली मिलती है. कामना करता हूं कि उनका अभियान दिन-दूनी रात चैगुनी तरक्की करे. उन्हें कर्मठ और ईमानदार कार्यकर्ता आदि मिलते रहे।
सुबह के साढ़े आठ का समय. गाड़ी ऊंझा को छोड़कर आगे बढ़ी है. यह नाम हजारों बार सुना-सुनाया है. बचपन से लेकर आज तक. ऊंझा फार्मास्युटिकल कंपनी. देश की आयुर्वेदिक दवाएं बनाने वाली बड़ी कंपनियों में से एक. इसके उत्पादों की गुणवत्ता की कभी प्रतिष्ठा थी. कई बार मैं इसके उत्पादों का स्वाद चख चुका हूं. अब वह बात नहीं रही. आधुनिकता की दौड़ में, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से जिन्हें नुकसान पहंुचा है, उनमें से एक यह भी है. नजर दौड़ाकर देखता हूं कि शायद कहीं पर दिखाई पडे़. मगर नहीं. नजर पड़ती है रिलायंस के पैट्रोल पंप पर. भारत की आधुनिक चाल से कदम मिलाकर चलती कंपनी. जिसने देश की राजनीति का पूरा-पूरा लाभ उठाया है. लाभ उठाना बुरी बात नहीं. लेकिन दूसरों का हक मारकर…सफर में इस तरह के खयाल से जी नहीं दुखाना चाहता. अब पीढ़ियां ही आकलन करेंगी कि आधुनिकता की यह अंधदौड़ हमें कहां ले जाकर छोड़ेगी, यह सोचकर तुरंत उससे बाहर हो जाता हूं.
बीच में कोई छोटा स्टेशन पड़ा था. नाम नहीं पढ़ सका उसका. कसूर मेरा नहीं. जब हम रफ्तार में होते हैं तो जाने ऐसे कितने ही स्थलों को नजरंदाज कर जाते हैं. कितने ही अवसर हमारी मुट्ठी में आने से पहले फिसल जाते हैं. भूल जाते हैं कि हमारी गति केवल हमारी नहीं. उसके पीछे इन्हीं का योगदान है. खुद को और हमें आजाद रखने के लिए यहां के लोगों ने जो बलिदान दिए हैं, खून बहाए हैं, उनका भारी एहसान हमारे ऊपर है. हमारी आजादी इन्हीं का निकष है. इसे न माने तो भारी कृतघ्नता होगी. इतिहास ऐसी भूलें जानबूझकर करता है. बड़े कालखंड को खंगालने के प्रयास में वह इतनी तेजी से दौड़ लगाता है कि आम आदमी पर उसकी नजर तक नहीं पड़ती. वह उन लोगों का जिक्र भी नहीं करता जिन्होंने वक्त को जिया है. ऐसे बेईमान इतिहास से कौन सबक ले! कौन उसे याद रखे? इसीलिए तो इतिहास हमेशा महज इतिहास रहता है. हकीकत कभी बन नहीं पाता.
डिब्बे के दूसरे कक्ष में राजनीति पर गर्मागरम बहस चल रही है. हमारा समाज खाली बहसों के लिए जरूर जाना जाता है. और कुछ हो या ना हो, बहस में कमी नहीं आने देगें. खासकर मध्यमवर्ग और उससे आगे पहंुचे लोग. जिन्हें यह गुमान है कि वे पढ़े-लिखे हैं. कि वे राजनीति के बारे जानकारी रखते हैं. बहस में संलिप्त मेरे सहयात्राी अधिकांश सरकारी कर्मचारी हैं. प्रायः सभी किसी न किसी बहाने सरकारी खर्च पर यात्रा कर रहे हैं. इनकी बहस का कोई परिणाम चाहे न निकले पर इससे इनके नपुंसक आक्रोश का शमन तो हो ही जाता है. बीती रात कुछ डाॅक्टर भी डिब्बे में सवार थे. कुछ सरकारी अस्पतालों के तो कुछ अपना क्लीनिक चलाने वाले. जिनके लिए जहां स्वार्थ सधे वही उनका देश. जहां खूब कमाई हो वही सच्ची मातृभूमि. उन्हें आबूरोड स्टेशन पर उतरना था. किसी मीटिंग में हिस्सा लेने आए थे. इधर आरक्षण के विरोध में दिल्ली, मंुबई समेत देश के बाकी हिस्सों में जो आंदोलन चल रहा है. वे सब उसी के प्यादे थे. राजधानी से इतनी दूर बैठक का औचित्य? कहीं बैठक महज बहाना तो नहीं, आऊटिंग पर जाने का.
राजधानी से सैकड़ों मील दूर. सामाजिक यथास्थिति कायम रखने के लिए फिर कोई नई बिसात बछेगी. किसी अवसरवादी वजीर के इशारे पर फिर किसी षड्यंत्रा की नींव रखी जाएगी. अग्रेंजों को मान-सम्मान से बुलाकर उन्हें अपने सिर-माथे बिठाने वाले, उनके शासन में सबसे अधिक लाभ उठाने वाले, यही लोग हैं. लाभ में अपने ही देशवासियों की हिस्सेदारी इनसे सहन नहीं होती. इस संबध में की गई संवैधानिक व्यवस्थाएं इनके लिए मखौल हैं. सभी अपना-अपना मंतव्य उडेंल रहे हैं. सभी को लगता है कि आरक्षण लागू होते ही प्रतिभाओं के लिए अवसर कम पड़ जाएंगे. यह कोई नई बात भी नहीं. सामाजिक समानता के नाम पर जब भी किसी ठोस शुरुआत की ओर सरकार कदम बढ़ाती है, इन्हें प्रतिभा पर संकट नजर आने लगता है. जैसे सबके सब अपनी प्रतिभा के बल पर ही नौकरी में आए हों. इनके किसी चाचा-ताऊ, नाते-रिश्तेदार की इसमें कोई भूमिका ही न रही हो. ना योगदान उन रुपयों का हो जो नौकरी में आने के लिए बतौर रिश्वत दिए होंगे. जिनके पास साधन हैं वे किसी भी तरह से नौकरी में आ सकते हैं. पर जिस वर्ग के पास उनका अभाव है, वह तो आरक्षण जैसी व्यवस्थाओं का ही इंतजार करेगा. कम से कम उस समय तक जब तक इसका कोई विकल्प नहीं मिलता.
प्रतिभा के सवाल पर इनसे जरूर पूछा जाना चाहिए कि इनकी नकलची प्रतिभा हजार पिछले हजार सालों में कौन-सा नया दर्शन या प्रौद्योगिकी दे पाई है. जिन रामायण-महाभारत को ये पूजते नहीं अघाते, वे भी तो वंचितवर्ग की प्रतिभाओं की देन हैं. फिर राजनीति और प्र्रशासन के क्षेत्रा में लागू आरक्षण से अगर कुछ नहीं बिगड़ा तो डाॅक्टरी, इंजीनियरी के क्षेत्रा में पिछड़ों के आ आने से कौन-सी आफत आ जाएगी. हां, आफत तो आने ही वाली है. इसलिए कि सरकारी नौकरी का क्षेत्रा, जहां आजकल आरक्षण की व्यवस्था लागू है, ऐसा क्षेत्रा है जिसका पूरी तरह दोहन हो चुका है. नई भर्तियां लगभग बंद पड़ी हैं. बढ़ती स्पर्धा के दौर में इंजीनियरी और मेडीकल कमाऊ क्षेत्रों में से हैं. जिनपर अभी तक इनका वर्चस्व है. आरक्षण के प्रभाव से यह वर्चस्व खंड-खंड टूटेगा. इसी से डरे हुए लोग अपने मन की भड़ास निकाल रहे हैं. पर वक्त की चाल को. परिवर्तन के दबावों को, ये कब तक रोक पाएंगे. सैंकड़ों वर्ष से वंचित वर्ग अपने अधिकारों के प्रति सजग हुआ. सरकार करना चाह रही है, ठीक है. न करेगी तो उत्पीड़न का शिकार रहे लोग अपना हक छीनकर ले लेंगे. जनमत के दबावों को शासन कब झेल पाया है. यही उसकी विशेषता है और यही आग्रह भी.

कीकर के पेड़ों के पीछे छिपी कोई बेनाम-सी बस्ती दिखाई देती है. गरीब गुजराती महिलाएं, हाथ में लोटा लिए निवृति के लिए जाती हुईं. कुछ महीने पहले तक सैन्सेक्स बारह हजार से ऊपर था. पिछले साल हुए दंगों के बावजूद गुजरात की प्रगति उसी गति से जारी है. पर विकास इन औरतों के जीवन तक क्यों नहीं पहुंच पाता? उसका छलावापन यहां आकर जाहिर होने लगता है. ऐसा कब तक चलेगा? इस बात पर रोज बहस चलती हैं. पर कोई आंदोलन, कोई प्रभावी पहल, कोई नई शुरुआत इस स्थिति से उबरने के लिए नहीं होती. रात-भर जो ‘विद्वान’ आरक्षण के सवाल पर सरकार को कोसते रहे उन्होंने भी तो ऐसे दृश्य देखे होंगे. क्या उनके पास कोई ऐसा कार्यक्रम, विचार ऐसा नहीं है जो इन औरतों के जीवन में सुधार ला सके.
रेडियो पर नए गीत बज रहे हैं. याद आया. रात को सोने से पहले भी गीत बजाए गए थे. सत्तर-अस्सी की दशक में बनी फिल्मों से. कानों में शहद घोलते हुए. फिर दिन के आरंभ में नए गीत क्यों. यात्राी तो वही हैं. क्या इतनी जल्दी इनकी पसंद बदल गई? कहीं ऐसा तो नहीं है कि रात को विश्राम के लिए संगीत में जो भावप्रवणता चाहिए, सपनों में खो जाने के लिए जो मनस्थिति चाहिए, वह पुराने गीत ही बना पाते हैं. जैसे जीवन के अंतिम चरण मंे गीता और रामायण की गीतिका में डूबने को मन अकुलाने लगता है. इस प्रांत की जो बात मुझे सर्वाधिक लुभा रही है, वह है यहां का खुलापन. संभव है पुराने शहरों, वहां के गली-कूंचों में दिल्ली और गाजियाबाद जैसी ही भीड़भाड़ हो. उसी तरह की जिंदगी की खिच-खिच और खींचतान हो. मन पर काबू गांठता हूं. खिड़की के आर-पार बिखरे सौंदर्य को छोड़कर कुछ और सोचना भी नहीं चाहता. दाल-भात खाते समय कंकरों की बात करना शोभा नहीं देता.
एनाउंसमेंट हुआ हैµ हम शीघ्र ही मैहसाणा पहंुचने वाले हैं. बड़े-बड़े होर्डिंग्स बता रहे हैं कि कोई खास शहर है. आधुनिकता की ओर लंबी-लंबी छलांगे लगाता हुआ. दूसरों से आगे निकलने के प्रयास में बुरी तरह से हांफता. आधुनिक संस्कृति की एक पहचान यह भी है कि यह पसीने को मेकअप से बाहर नहीं आने देना चाहती. इससे पैदा हुई उमस कालांतर में भले ही फंुसी-फोड़ों के रूप में देह से बाहर फूट पड़े. गुजरात में प्रवेश के बाद पहली बार बहुमंजिली इमारतें, धुंआ उगलती चिमनियां दिखाई पड़ी हैं. पूरे स्टेशन की बगल में इंडियन आॅयल की रिफाइनरी थी. मानो उसकी पीठ पर सवार होने की आतुरता में हो.
गुजरात को लेकर पौराणिक संदर्भ याद आने लगता हैµ यहां आकर तो भगवान को भी दोष लगा था. जरासंध से मथुरा की रक्षा के लिए भागे कृष्ण ने द्वारिका में ही शरण ली थी. लोग उन्हें आज भी रणछोड़ कहते हैं. वे भूल जाते हैं कि राजा का सबसे बड़ा धर्म अपनी प्रजा की रक्षा करना है. और लड़ाइयां हमेशा युद्धों से ही नहीं जीती जातीं. कृष्ण के स्थान पर कोई और राजा होता तो अपनी ऐंठ को बचाने के लिए पूरी प्रजा को तबाही में झोंक देता. खुद रंगमहल में मजे से लेटा रहता. बच जाता तो ठीक, नहीं तो भागकर कहीं और शरण लेने का उद्यम करता. कृष्ण ने जो किया वह उनके समान कोई योगेश्वर ही कर सकता है. उन्होंने बिना किसी जिद या दुराग्रह के अपनी प्रजा को महत्त्व दिया. उसकी रक्षा की. और दुराचारी को भी माफ नहीं किया. अपने गुस्से को, कोप को भीतर ही छिपाए रखा. द्वारिका पर, अपनी नई राजधानी पर उसकी छाया तक नहीं पड़ने दी. तभी वह योगेश्वर कहे जाते हैं.
महैसाणा में दो मिनट का विराम लेने के बाद गाड़ी आगे बढ़ती है. गुजरते ही फिर एक पुल. सौ मीटर से अधिक लंबाई. पर नीचे केवल रेत ही रेत. कांटेदार जंगल. झाड़ियां, कीकर और बबूल के पेड़. तपती धूप में इस जमीन पर क्या गुजरती होगी, मैं केवल इसकी कल्पना ही कर पाता हूं. इसी से मन घबराहट होने लगती है. शहर के विकास के बहाए जाने वाले पानी से कुछ बूंदंे बचाकर यदि इस धरती को भी पिलाई जाएं तो जंगल में मंगल होते कितनी देर लगेगी. तब भी क्या यहां कीकर और बबूल के पेड़ ही उगेंगे? खेतों मंे ज्वार की फसल खड़ी है. सूखे से यही संघर्ष कर पाती है. गेहूं और धान जैसी नाजुक फसलें नहीं. महैसाणा के बाद हरियाली बढ़ जाती है. पठारों का दिखना भी कम हो गया है. लगता है कि मैं अपने उत्तरप्रदेश से होकर सफर कर रहा हूं. वही हरियाली. खेतों में काम करते किसान, उनकी औरतें. खुले मैदानों में लुका-छिपी का खेल खेलते बच्चे. अपना बचपन याद आने लगता है.
रेल भाग रही है. भागती जा रही है रेल. आगे, आगे और आगे…धूम-धड़ाधक…धूम-धड़ा. धूम-धड़ाधक…धूम-धड़ा!
जमुदन, छोटा सा स्टेशन. प्लेटफार्म जमीन को छूता हुआ. कुछ सीटे यात्रियों को बैठकर प्रतीक्षा करने के लिए बनाई गई हैं. पत्थरों की निमर्तियां. हरी टाइलों से सजी हुईं. कतार में मानो बराबर-बराबर लेटी हुई हों. दिन के आरंभ में सभी खाली हैं. जैसे-जैसे सूरज चढ़ेगा, इनके कद्रदान भी बढ़ते चले जाएंगे. कच्छ की खाड़ी से सटा हुआ गुजरात. गांधी की जन्मस्थली. राष्ट्रपिता के जीवन की प्रारंभिक असफलताओं का गवाह रहा गुजरात. गांधीजी जब तक यहां रहे, नाकाम इंसान ही कहलाए. इस जमीन को छोड़ने के बाद ही उन्हें प्रसिद्धि मिली. यहां के वही सेठ पनपे जो दूर कोलकाता, मंुबई और दिल्ली में जा बसे. यहां का संघर्ष और सूझ-बूझ उनके बहुत काम आई. नाम और नामा खूब कमाया. अपने प्रांत का नाम रोशन किया. पर अपनी जन्मस्थली को वे भूल कभी नहीं पाए. गांधीजी भी कहां भुला पाए थे. इसीलिए अपने और अपने अनन्य भक्त विनोबा के आश्रम के लिए उन्होंने गुजरात को ही पसंद किया था. अपनी मिट्टी का कर्ज कैसे चुकाया जाता है, कोई गुजरातियों से पूछे.
उफ्! फिर एक सूखी नदी. ज्वार के खेत. कंटीली झाड़ियों का फैला हुआ जंगल. केयाल सेढावी. एक नाकुछ-सा स्टेशन. धरती पर सिमटा हुआ. सूखी नदी पर जीर्ण-सा पुल. गाड़ी कब उसके ऊपर से गुजर गई पता ही नहीं चला. मानो अपने मामूलीपन से सहमा हुआ हो. या अपने गौरवशाली अतीत की यादों में खोया हुआ हो. वर्तमान किसी के पास हो न हो, भारत जैसे संस्कृति-प्रधान देशों में अतीत सभी के पास होता है. एक छोटी-सी लाइन समानांतर चली जा रही है. बड़ी देर से. जरूर वह गांवों और कस्बांे को जोड़ती होगी. यह दर्शाती हैं कि चीजें भले ही छोटी होकर रह जाएं. मगर वे बहुत दूर तक जा सकती हैं.
घुमासन! एक और साधारण-सा स्टेशन. अगल-बगल से निकलते भेड़ांे के काफिले दिखाई पड़े. पुरातन घुमक्कड़ संस्कृति के प्रतीक सेदृ भारतीय संस्कृति की एकरूपता के पीछे इस तरह के काफिलों का पूरा-पूरा योगदान है. इस बारे में किसी को बताने की जरूरत नही. इन्हीं घुमक्कड़ काफिलों में मीणा जाति के लोग चला करते थे. मिट्टी को सूंघकर वे धरती के गर्भ में मौजूद मीठे पानी के ठिकाने का अता-पता साफ बता देते थे. धरती से कान टिका उसके भीतर मौजूद जलतरंगों की गति भांप लेना उनके लिए बाएं हाथ का खेल था. अब वो हुनर और हुनर के वैसे कद्रदान कहां. खेतों में काम करती लड़कियां दिखाई पड़ीं. मेहनतकश ग्रामीण जिंदगी से परचाती हुईं. यह दृश्य वर्षों तक मेरी स्मृति में कैद रहेगा. फिर एक बूढ़ी औरत खिड़की के सामने से गुजरी. दो बच्चों के साथ. उनकी उंगलियां थामे हुए. जरूर उनकी दादी रही होगी. शायद काम पर जा रही हो. धरती का हिस्सा चाहे कोई भी हो. ममता का रूप-रंग बिल्कुल एक जैसा है. मिट्टी का रंग चाहे जैसा हो. मां एक समान होती है. उसका मन एकदम पवित्रा होता है. भरोसा नहीं है, फिर भी कामना करता हूं बड़े होने पर ये बच्चे भी उस बुढ़िया का सहारा बनें.
खिड़की के बाहर जिंदगी कहीं ज्यादा मेहरबान है. सुबह की ताजगी को सांसों में भरती प्रकृति. शांत रहकर आत्मसात् करने से ही दिन-भर की जद्दोजहद के लिए आवश्यक ऊर्जा जमा कर पाएंगे हुजूर. गर्ज आपकी है इसलिए शांत रहिए और इससे आती स्फूर्तिदायक हवा को धीरे-धीरे अपने मानस में उतरने दीजिए. खिड़की से एक बुजुर्ग दिखाई पड़ते हैं. सफेद धोती और घुटनों को छूता हुआ कुर्ता. सूरज की किरणों के परस से दमकता हुआ. कमर पर हाथ टिकाए धीरमना टहलते हुए. मानो बीते दिन दुनिया के किए-धरे का अवलोकन करने निकले हों. कुछ गलत हुआ तो घर जाकर टोकेंगे…जरूरत पड़ी तो डांटेंगे भी. वह दृश्य मुझे अपने गांव की याद दिला गया. यहां से कोई हजार किलोमीटर दूर. पर कोई अंतर नहीं. ठीक ही तो कहते हैं कि भारत एक है. पूरब से पश्चिम…उत्तर से दक्षिण तक. यही बड़प्पन, बड़ों द्वारा की जाने वाली यही साज-संवार, संस्कृति की यही विरासत हमें हजारों वर्ष से एक किए हुए है.
औद्योगिक क्षेत्रा शुरू हो चुका है. महानगरीय संस्कृति की पहचान. दूसरी पहचान के रूप में झुग्गियां भी होनी चाहिए. पूछने पर सहयात्राी बताते हैं कि अहमदाबाद सिर्फ पचीस मिनट आगे है. शहर कैसा होगा, उसके बारे में बताने के लिए फैक्ट्रयों की यह कतार ही काफी है. मन ही मन कामना करता हूं कि मेरा आकलन गलत निकले. अहमदाबाद बाकी शहरों से हटकर हो. वहां विकास स्वर्यस्फूर्त भावना के साथ पहुंचा हो. उसमें उन लोगों की साझेदारी हो जो उसके भोक्ता हैं. उनकी नहीं जो सिर्फ नारे लगाते हैं. जिनके लिए विकास भी सिवाय नारे के और कुछ नहीं. उन्हें अपने लिए विकास की जरूरत नहीं. खुद को और अपनों को तारने के लिए भ्रष्टाचार ही काफी है. उसी से पांच-सात पीढ़ियोें के लिए इंतजाम हो जाता है.
साबरमती स्टेशन के बारे में सहयात्राी जिक्र कर रहे हैं. मुझे साबरमती के उस अधनंगे फकीर की दुबारा याद आ जाती है जिससे कभी ब्रिटिश सरकार कांप उठती थी. जिसके हाथों में हथियार के नाम पर केवल एक लाठी थी. पर जो अपने समय का सर्वाधिक ताकतवर और कूटनीतिक योद्धा था. जिसके नाम से अंग्रेजों के दिल में हौल मच जाता था. मन उस पवित्रा साबरमती के दर्शनों को अकुलाने लगाता है. यह सोचकर कि साबरमती आश्रम भी यहीं कहीं होगा मैं इधर-उधर कुछ खोजने का प्रयास करता हूं. दिखाई पड़ती है बहुमंजिली इमारतें. जिनसे आती दुर्गंध मन मैला करने को सन्नद्ध है. नदी के पास आश्रम तो दिखाई नहीं पड़ा. दिखाई दिया थर्मल पाॅवर प्लांट और चंद होटल. और रेलवे की पटरी के सहारे-सहारे हजारों की तादाद में बनी झुग्गियां. ये हमारे औद्योगिक सफर की त्रासदी हैं.
कल शाम से ही मन भारी-भारी है. राजधानी का सफर. कभी नाश्ता तो कभी खाना. बैठे-ठाले का भोजन. पेट और मंुह को जरा भी आराम नहीं. इस व्यवस्था के अभ्यस्त लोगों के लिए सुविधाओं का मतलब शायद जीमना-भर है. थर्ड क्लास खाने और वेटरों के पिचके चेहरांे से जाहिर है कि यात्रियों की जेब की कीमत पर चलाए जाने वालीे यह कैंटीन अपने भीतर कितना भ्रष्टाचार समेटे हुए है. आधुनिकता का कांसेप्ट हमारे यहां सिर्फ पेट भरने, मुंह चलाने के लिए आया है. सामाजिक न्याय की भावना के साथ नहीं. हमारे संचार माध्यम भी तो यही परोस रहे हैं. आधुनिकता के नाम पर परोसे जाने वाले व्यंजनों से पेट भारी होने लगा है. घड़ी देखकर समय का अंदाज लगाता हूं. फिर आंखें मींच लेता हूं.

मई का इकीसवां दिन. वापसी का सफर. खाना, लेटना. फिर वही बेचैनी-भरी नींद.
रात गुजरते ही पवित्राता का एहसास लिए भीनी-सी सुबह. ताजगी से भरपूर. राजस्थान का एक इलाका. हरियाणा से गलबहियां लेता हुआ. एक साथ तनी कई पहाड़ियां. बराबर -बराबर फैली हुई. जैसे मां प्रकृति ने सृष्टि के पोषण के लिए अपने स्तन उघाड़ दिए हों. पहाड़ी की जड़ में बनी एक झोंपड़ी में नन्हा-सा दिया टिमटिमा रहा है. उसके दूसरी ओर भी गांव-खेत रहे होंगे. इनके आर-पार भी जीवन पलता होगा. स्मृति की कोठर में झांककर देखता हूं. दशरथ मांझी को, जमींदार के खेत में दनादन फावड़ा चलाते हुए. पांच फुट का कद. गहरा तांबई रंग. मेहनत से पकी देह. पसीने से नहाई हुई. माथे से लप-झप झरता हुआ पसीना गालांे से ढुलककर गले की शिवालिकों में कुछ पल आराम फरमाता है. फिर वहां से नए जोश के साथ भागीरथी-धार आगे बढ़ती है. पसलियों की मेखमालाएं उसे रोक नहीं पातीं. इकहरी काया भीगकर चमकने लगती है. ढुलकते हुए स्वेद-बिंदु कुछ ही क्षणों में नाभि-केंद्र तक जा पहुंचते हैं. कुछ देर वहां विश्राम करतंे हैं. मानो पसीने की आरामगाह हो नाभि. वहां से ढुलकते हुई जांघों को छूने लगते हंै. फिर बिना पल गंवाए ऐड़ी से होकर धरती में समा जाते हंैं.
दशरथ माथे पर आए पसीने को पोंछकर बार-बार गांव की ओर देखने लगता है. आंखों पर हथेली टिकाए. सहसा एक छाया को अपनी ओर बढ़ते देख आंखें चमकने लगती हैं. पति को खाना पहुंचाने जाती दशरथ मांझी की पत्नी. रोज का काम. पहाड़ी की चढ़ाई. चढ़ते-चढ़ते वह हांफने लगती है. माथे से पसीना चुचियाने लगता है. इधर-उधर नजर दौड़ाकर देखती है. अकेली पाकर गले में पड़ी धोती को हटाकर हवा करने लगती है. उन्नत वक्ष, पर्वत शिखरों का मान-मर्दन करने में सर्वथा समर्थ. पांव पति के निकट पहुंचने को आतुर. गठी-गदराई हुई देह. तपा हुआ यौवन. ऐसी पत्नी को भला कोई क्यों न प्यार करे.
पल्लू से हवा कर वह मन को तसल्ली देती है. कि पति की भूख-प्यास व्याकुलता बढ़ा देती है. ऊपर आसमान में आंख तरेरते सूरज को कोप से देखती है. फिर जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाने लगती है. रास्ते से ध्यान हटकर पति की श्रम-क्लांता देह पर चला जाता है. पिय की भूख-प्यास श्रमबदना अर्धांगिनी गहराई से अनुभव करती है. मन करता है कि पंख हों और उड़कर अपने कमेरे मर्द तक जा पहुंचे. उड़ नहीं पाती, इसलिए तेज चलने का प्रयास करती है. कि तभी…एक अनहोनी…कि सर्जना की भूमिका गढ़ता हुआ उसका बायां पांव एक दुस्साहसी पत्थर से टकराता है. वह ओंधे मुंह धड़ाम से गिर पड़ती है. धोती फट जाती है. माथे पर खून छलकने लगता है. चोट की ओर से बेपरवाह वह बिखरे भोजन को जल्दी-जल्दी समेटती है. मन ही मन अपनी नादानी को कोसती है. फिर आगे बढ़ जाती है. पैरों में पायल गाती हैµछूम-छमा छम…छम्मक छम!
रेलगाड़ी दौड़ रही है. खिड़की के उस पार वनस्पतियां हवा से बातें कर रही हैं. इस पार मेरा मन उड़ा जा रहा है. कल्पना पंख पसार रही हैµ
‘बड़ी देर कर दी?’ प्रतीक्षारत दशरथ मांझी फावड़े को एक ओर फेंककर अपनी प्राणप्रिया की ओर खिंचा चला आया. चेहरे पर उल्लास है. आंखों में चमक. मन-मीत की झलक ने देह-क्लांति को धो डाला है. तभी रसप्रिया के माथे पर झलक आए खून को देखता है. दिल जोर से धड़क उठता है. फटी धोती पर निगाह पड़ते ही भूख एकाएक मर जाती है. उल्लास फीका पड़ जाता है. अपने अंतज्र्ञान से स्थिति की कल्पना करता है. फिर कोप से नंगी-निर्लज्ज पहाड़ी को ताड़ता है. चेहरा तमतमाने लगता है. मन में एक अनोखा संकल्प अंगड़ाई लेने लगता है…
सर्जना को गढ़ने के लिए ऐसा संघर्ष जरूरी है…बहुत ही जरूरी.
‘ठाकुर सा, कोई दूसरा मजूर तलाश लीजिए.’
‘क्यों तुझे क्या हुआ?’
‘हमें जरूरी काम आ पड़ा है.’
‘कितने दिन का काम है.’ मेहनती और भरोसे के आदमी को काम से जाते देख जमींदार अपना नफा-नुकसान सोचता है.
‘मालूम नहीं.’
‘मालूम नहीं…तू पगला तो नहीं गया रे?’
जवाब दिए बिना दशरथ वहां से चला आया. अप्रत्याशित और अकल्पनीय. अगले दिन से उसके हाथ में कुदाल आ जाता है. देखता हूं कि उसने पहला वार उसी स्थान पर किया है जहां उसकी प्राणप्रिया को ठोकर लगी थी.
दशरथ मांझी पहाड़ी काटेगा….!
दशरथ मांझी रास्ता बनाएगा…!
दशरथ मांझी पगला गया है….!
दशरथ मांझी का दिमाग घूम गया है…!
दशरथ मांझी तो गया…!
लोग गलत नहीं कहते. दशरथ मांझी का यह पागलपन ही तो है. दिहाड़ी का काम छोड़कर काम पर लगा है. अकेला, मौन. किसी से बात भी तो करता. किसी से मदद भी तो नहीं मानता. समंदर पर पुल बनाते समय भगवान राम ने भी बंदर-भालूंओं की मदद ली थी. दशरथ मांझी क्या रामजी से भी ऊपर है. जो अकेला ही पहाड़ काटने में लगा है.
नहीं, अकेला कहां है. उसके हाथों में उसका कुदाल है. और कुदाल से भी कंटीला और भरोसेमंद है, उसका संकल्प.
पत्नी ने प्रीति से मनाया और रीति से भी. मान से समझाया और गुमान से भी. कि जाने दीजिए. ये पहाड़ियां तो कुदरत की मुट्ठियां हैं. बंद और तनी हुईं. और कुदरत के आगे तो हम सभी बच्चे हैं. उससे हार-जीत कैसी. वक्त के आगे तो राम और कृष्ण को भी हार माननी पड़ी थी. वक्त ही खराब था जो राजा नल पर ओखा पड़ी. भुनी हुई मछली हाथों से फिसल गई. दशरथ मांझी का इरादा फिर भी हार नहीं मानता. उसकी इकहरी तांबई देह में हौसला दसों दिगंत का है. आंखों में हजार सूरज का तेज है. मानस में वैश्वानर का महासंकल्प उतर आया है.
वक्त के आगे एकाएक टूट जाने वाले फिसड्डी लोग दशरथ मांझी को पागल करार देते रहे. लेकिन वह हठी मानस, इरादों का पक्का, अपनी कुदाल और फावड़े के साथ अकेला ही जूझता रहा. दिन आते-जाते रहे. मौसम का बदलना जारी रहा. जाने कितने सूरज डूबे और उतरे. जाने कितनी बार उल्कापात हुआ. कितने नए चांद उगे. परंतु वह अपने संकल्प से डिगा नहीं. साल दर साल वक्त गुजरता रहा. लोग दशरथ मांझी को कुदाल चलाते देखते और पागल कहकर अपना रास्ता थाम लेते. इस बीच उसके बालों पर सफेदी झलकने लगी. पति की चिंता में उसकी प्रसन्नवदना प्राणप्रिया के बाल भी सफेद पड़ने लगे. मांस लटकने लगा. मगर संकल्प मुर्झाया नहीं. बल्कि दिनोंदिन जवान होता गया. इरादा हर रोज मजबूत होता रहा. पहाड़ को सबक सिखाने का. ऊंचाई को मात देने का.
तपे-तपाए पूरे बीस साल बीत गए. मेहनत का फल सामने आया. जहां पहाड़ी बाधा बनती थी वहां अब सड़क पसरी हुई थी. जो रास्ता सिर उठाए चलता था वह अब कदमों में बिछा था. दशरथ और उसकी प्राणप्रिया के चेहरांे पर मुस्कान थी. गर्व भरी और पाकीजा. सफेद बालों के बावजूद उसका न सौंदर्य फीका पड़ा था, ना ही अरमान. अपने संकल्पी पति की सफलता पर वह इतरा रही थी. उसकी निगाह बार-बार धरती पर लेटी उस पथरीली सड़क तक चली जाती है जो उसके पति ने उसे सौगात में दी है. बचपन मे ताजमहल के बारे सुना था उसने. सुना था कि बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी की याद में वह हसीन इमारत गढ़वाई थी…ऊंह! चीन का बादशाह जब दीवार बनवा रहा था तो उसने अत्याचार की हदें पार कर दी थीं. उसके सैनिक जाते और गांव-गांव से गरीब किसानों और मजदूरों को हांक लाते. उन्हें भूखे-प्यासे बेगार पर झोंक दिया जाता था. चीन के गौरव में उन हजारों लाखों मजदूर-किसानों की हड्डियां दफन हैं. ताजमहल के लिए भी बादशाह ने न जाने कितनों से बेगार ली होगी…कितनों को सूली पर चढ़ाया होगा…कितनों को उनके अपनों से दूर, बेघर-बार किया होगा. मगर दशरथ मांझीं सिर्फ अपना पसीना बहाया है. इसीलिए उसकी सौगात का महत्त्व हजारों बादशाहों की सौगात से बढ़कर है. उसके पसीने की बूंद-बूंद अनमोल है. सोचते-सोचते गर्वोन्मत हो जाती है दशरथ मांझी की प्राणप्रिया…प्रफुल्लित हो उठता हूं मैं.
पूरा इलाका दशरथ के संकल्प के आगे नत है. उसका पति अब उसका कहां रहा. वह तो पूरे गांव का नायक है. जिले-भर से लोग उसका काम देखने आ रहे हैं. जोे लोग दशरथ को पागल कहा करते थे आज उसके गांव का वासी होने के कारण गर्वोन्मत हैं. अकेले आदमी का इतना बड़ा हौसला…ऐसा अद्भुत कारनामा. कहीं देखा न सुना. जो काम बडे़-बड़े राजा नहीं कर सके, बड़ी-बड़ी सरकारें जिसके आगे झुकती चली गईं. हजारों साल में आज तक जो कोई नहीं कर पाया, वह अकेले मानस ने कर दिखाया. दशरथ को पागल कहकर उसकी हंसी उड़ाने वालों के लजाए चेहरे जमीन में गढ़े हुए हैं. दशरथ ने तो अपनी आलोचनाओं की ओर ध्यान ही नहीं दिया था. कर्मयोगी भला क्यों सोचे कि वे सब किसलिए शर्मिंदा हैं. क्यों माफी मांग रहे हैं मन ही मन…
इतिहास स्वयं को दोहराता है. कोई तो दशरथ मांझी होगा जो इन पहाड़ियों का मान-मर्दन करने आगे आएगा. पहाड़ियों में काम करते किसानों को देखकर लगता है कि ये भी तो छोटे दशरथ मांझी ही हैं. उसी के देश, उसी की माटी में पले-बढ़े लोग. इन्होंने भी तो अपने पौरुष केे कमाल से पत्थर को तराशकर उसको उपजाऊ बनाया है.
नहीं, इतिहास में अवतार कई हुए हैं. आगे भी होते रहेंगे. परंतु दशरथ मांझी सिर्फ एक है. केवल एकµ ना भूतो ना भविष्यिति!

इस समय हम हरियाणा की पावन धरती पर हैं. रेवाड़ी जंकशन को रेलगाड़ी हौले-हौले पार कर रही है. मानो मुंह देखने आई औरतों के बीच मानिनी दुलहन केलि करने लगे. दूर-दूर तक फैले खेतों और उनमें लहराती फसलों को देखता हूं. जिनमंे किसानों की मेहनत साफ झलकती है. मेहनतकशों में औरत और मर्द दोनों ही सम्मिलित हैं. बल्कि औरत ज्यादा. मर्द तो खेत का काम निपटाकर चैपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाने लग जाते हैं. औरत को देर रात तक चैके-चूल्हे मंे खटना पड़ता है. उसके बाद भी आराम कहां? पति का जी बहलाने के लिए रोज रात को अप्सरा होने का नाटक भी जरूरी है. बावजूद इसके यहां लड़कियों को जन्मते ही मार डालने का रिवाज है. बेटी का पिता कहलाने से मर्दों की मूंछें नीची होने लगती हैं. मन शर्म से घिना जाता है. सभ्यता के लिए इससे अधिक खतरनाक, इससे ज्यादा शर्मनाक, इससे ज्यादा विचारणीय और भला क्या हो सकता है. सूरज निकलने को है. हरियाणा में नई चेतना का सूरज कब निकलेगा…कब ये लोग औरत का सम्मान करना सीखेंगे?
मैं याद करता हूं किसी विद्वान की बात- यदि सूरज सलामत है तो अंधेरे की मौत अवश्यंभावी है. इस विचार के साथ ही मन हल्का होने लगता है. नए जोश के साथ बाहर देखता हूं. दूर तक फैली उपजाऊ धरती. दुश्मन का जी जलाते, खेतों में काम करते किसान. और ऊपर आसमान में आशीर्वाद लुटाते हुए भगवान भास्कर. धरती के विस्तृत प्रांगण में खेलते अधनंगे बच्चे. अपनी भूख-प्यास से बेखबर. पशुओं के चारे-पानी के इंतजाम के लिए हाथों में दरांत, बगल में टाट का टुकड़ा संभाले जाती हुई कमेरी स्त्रिायां. घरों से उठती गरमा-गर्म धूम्र रेख. जीवन को विस्तार देती बच्चों की टोलियां. मेंड पर चरती दुधारू-गाय और भैंस. वर्षों के बाद ऐसा दृश्य देखने को मिला है. कंक्रीट के जंगलों में निवास करने वालों का ऐसा भाग्य कहां. मुझसे भी तो तीस साल से रूठा हुआ है.
लाइन क्लीयर ना होने से गाड़ी किसी छोटे स्टेशन पर ठहरी हुई है. पास के ही किसी गांव से मंगल गीत गाने की आवाज आ रही है. गीत वरना के हैं या वरनी के, समझ नहीं आता. लेकिन इतना तय है कि कोई दांपत्य की डोर थामकर चालने का निश्चय कर ही चुका है. मैं स्टेशन को पहचानने का प्रयास करता हूं. पर किसी भी नामपट्ट तक नजर नहीं जाती. चलने पर ही मालूम होता है कि पटौदी की ओर जाने वाली सड़क के किनारे बना स्टेशन है. यहीं के नवाब मंसूर अली खां पटौदी किसी जमाने में भारतीय किक्रेट की शान हुआ करते थे. उन्हीं का अभिनेत्राी पत्नी से पैदा हुआ बेटा आजकल फिल्मों में नाम और नामा दोनों कमा रहा है. काले हिरन के शिकार में उसका भी नाम है. कानूनी अभियुक्त है. इस खयाल के साथ अपने देश की न्याय व्यवस्था पर गर्व होने लगता है. फिर सोचता हूं कि सामंती संस्कार क्या आदमी के खून में शामिल होते हैं. वही पीढ़ी दर पीढ़ी आगे जाते रहते हैं. उनका सिर्फ अपनी खुशी, अपने स्वार्थ से नाता होता है. दुनिया की हरेक शै उन्हें अपने सुख के लिए जान पड़ती है.
पातली आकर गाड़ी फिर ब्रेक में आ गई. यहां खेतों में फुहारे से सिंचाई होती देख मन हर्षाने लगता है. धीरे-धीरे ही सही नई तकनीक किसानों के जीवन में आ रही है. अभी तक हर सफलता-असफलता के लिए वे अपने भाग्य को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं. तकनीक का कमाल देखकर उनका आत्मविश्वास वापस लौटे तो यह सोने पर सुहागे जैसी बात होगी. यहां के खुले-खुले खेतों को देखकर अपने उत्तरप्रदेश की याद आती है. दोनों में सफलता के अंतर्सूत्रा तलाशने का प्रयास करता हूं. कोई खास भेद नजर नहीं आता. किसान किसी भी प्रांत का हो. बिना श्रम के उसका गुजारा नहीं. पर हरियाणा के किसान को शायद कुछ ज्यादा ही मेहनत करनी पड़ती है. उसको पानी के अभाव, पठारीय जमीन, बंजरपन से ज्यादा जूझना पड़ता है. बावजूद इसके ये ज्यादा भाग्यवादी नहीं. खुद पर भरोसा रखते हैं. यह भरोसा विपरीत परिस्थितियों की देन ठहरा.
हरियाणा उत्तरप्रदेश के ब्रजमंडल से संस्कृति के सूत्रा उधार लेता है. जीवन में उतारने से पहले आर्यसमाज के स्पर्श से उनका परिमार्जन करता है. उनसे अपने जीवन को रसमय बनाता है. कुरुप्रदेश तक आते-आते यह रसधारा रिक्त होने लगती है. उसी रूखेपन को वह मेरठ मंडल के क्षेत्रों में उतार देता है. अब आप इसे संस्कृति की पराजय माने या कुछ और. या उस युद्ध का असर माने जो आज से करीब चार हजार साल पहले महाभारत के नाम से संपूर्ण आर्यावर्त के योद्धाओं के बीच लड़ा गया था. जिसमें इस क्षेत्रा की कुल अठारह अक्षौहिणी सेनाएं खेत रहीं. जिसके ख्ूान से यह जमीन आज भी लाल है. साम्राज्यवादियों की सत्ता पिपासा का जहर कितनी शताब्दियों को पीना पड़ा है, यह हमारे सामने है. हमारी सभ्यता और संस्कृति पर आक्षेप लगाता हुआ. युद्ध हमेशा बुरे होते हैं. परंतु उनके पीछे निहित कारण भी बुरे ही हों जरूरी नहीं. इसी धरती है पर योगेश्वर कृष्ण ने गीता में शंखनाद करते हुए कहा था-
‘अर्जुन उठ! युद्ध कर.’
‘किस से, अपने ही बंधु-बांधवों से भगवन्?’
‘युद्ध में जो सामने है वह दुश्मन है. उससे कैसा अपनापन.’
‘पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण…’
‘अपने-पराये का भेद छोड़. कायरता मत दिखा. गांडीव उठाकर लक्ष्य साध. निष्काम कर्तव्य की ओर बढ़.’
इसके बाद गांडीव की टंकार के साथ जो भीषण युद्ध शुरू हुआ, उसमें जो रक्त बहा, उसी के कारण यहां की मिट्टी आज तक लाल है. उस दिन अगर कृष्ण उपदेश नहीं देते…या अर्जुन ही कृष्ण की बात टाल देते…अर्जुन की बात मानकर कृष्ण भी रथ को युद्धस्थल को दूर ले जाते तो? संभव है कि महाभारत का युद्ध टल जाता. जिन पांडवों ने कौरवों को धूल चटाई, एक न एक दिन वे भी वक्त के हाथों मार खाते. बाद के दिनों में यह भी संभव है कि इतिहास का न्याय पांडवों के वंशजों के हाथों में हस्तिनापुर की गद्दी सौंप देता. सत्य के भवन के हजार खंबों की तरह कुछ भी संभव था. संभव है. तो होने को कुछ भी हो सकता था. लेकिन इतना तय है कि तब गीता नहीं होती. अगर होती भी तो उसका इतना महत्तम नहीं होता. वह घर-घर पूजी नहीं जाती. कौरव या पांडव भी इतने दिनों तक याद नहीं किए जाते. इतिहास में चीजांे का होना ही महत्त्वपूर्ण नहीं होता. वे कब हुईं यह भी महत्त्वपूर्ण होता है. समय को चैथा आयाम बताने वाले बीसवीं शताब्दी के सबसे जीनियस वैज्ञानिक आइंसटाइन को मैं मन ही मन नमन करता हूं.
रेलगाड़ी भाग रही. उससे भी तेज गति से भाग रहा है मेरा मन.
कल शाम गाड़ी चलने से कुछ ही मिनट पहले सामने की सीट पर एक लड़का आ विराजा था. सामान के नाम पर सिर्फ एक बैग उठाए. जवान, भरा हुआ बदन. आंखों पर चश्मा, सुनहरी डंडियों वाला. थोड़ा प्रयास करे तो कामयाब माॅडल बन सकता है. महंगे जूते, जीन्स और कमीज से लगता है कि शायद हो भी. निचली सीट एक और सज्जन के नाम रिजर्व देख उसे हल्की-सी झंुझलाहट हुई. बिना कुछ कहे वह ऊपर की सीट पर चला गया. पूरी रात तकिये को सीने से कसे वह सोया रहा. जैसे कि डरा हुआ हो. कि ममत्व को तरसते-तरसते ही बचपन पीछे छूट चुका हो. सोने से पहले जूते भी नहीं उतारे. भारी-भरकम जूतों के साथ पूरी रात बिताना अपने आप में एक सजा थी. पर उसे इसका ध्यान तक नहीं था. कहीं यह घर से नाराज होकर तो नहीं भागा, उसकी ओर ध्यान जाते ही यह सवाल मन में उभर आता था. सुबह उतरने से कुछ देर पहले वह सामने की सीट पर बैठ गया. नई दिल्ली आने के बारे में सवाल किया. तब लगा कि दिल्ली में नया आया है.
‘दिल्ली में कहां जाना है?’ मैं अपनी जिज्ञासाओं का शमन कर लेना चाहता हूं.
‘होटल रिजर्व है.’
‘कौन-सा?’
वह उतर जाता है. बिना कोई जवाब दिए. अज्ञान आशंकाओं का जन्मदाता है…इन दिनों राजधानी में जिगोलो संस्कृति जोर पकड़ रही है. कहीं यह भी…अपने इस विचार को मैं मन में अधिक देर तक नहीं रखना चाहता. घबराकर फौरन निकाल फेंकता हूं.
जिस सीट पर मैं हूं बराबर में एक बुजुर्ग दंपति अपने नाती को लेकर यात्रा कर रहे हैं. लड़का जिद्दी है. रात को बात-बात पर अपनी नानी से झगड़ता रहा. तरह-तरह की फरमाइशें थीं उसकी. शायद मां-बाप का लाडला, इकलौती संतान हो. यह भी तो संभव है कि तीन-चार लड़कियों के बाद पैदा हुई बहुप्रतीक्षित नर संतान हो. अभी से अपने पुरुषवादी अहंकार के प्रति सचेत. साठ साल की नानी भी गोया उसके आगे एक लौडी है. जिसे वह जैसे चाहे दुत्कार सकता है. उसके साथ मारपीट कर सकता है. बच्चे को देख कुछ सवारियां सहमी हुई हैं. मैं भी सहमे बिना रह नहीं पाता.
गढ़ी हरस्वरूप आकर गाड़ी फिर ठहर गई. दायीं ओर फैला हुआ प्लेटफार्म है. ईंटों का बना. निर्जनता में उसके सौंदर्य को अच्छी तरह निहार सकता हूं. इस स्टेशन का जिक्र करते हुए सहकर्मी प्रदीप धुल ने बताया था कि यहां से छोटी पटरी फरीदपुर तक जाती है. जहां फूलों की खेती खूब होती है. फूलों को मंडी तक पहुंचाने के लिए एक रेलगाड़ी भी चलाई गई है. फूलों का इस्तेमाल अभी तक देवता पर चढ़ाने के लिए होता रहा है. या फिर शृंगार के लिए. मुझे निराला की कविता की याद हो आती है. जिसमें वे अपने हिस्से से ज्यादा का सेवन करने के लिए फूल को लताड़ते हैं. जो भी हो. इस क्षेत्रा के लिए फूल समृद्धि के वाहक बने हैं. रेलगाड़ी चलने से इलाके के लोगों को कितनी सुविधा हुई होगी. मैं कल्पना करता हूं. इसी के साथ फूलों के प्रति अनुराग बढ़ने लगता है.
गढ़ी हरस्वरूप से आगे बढ़ते ही कंक्रीट का जंगल नजर आने लगता है. उसे देखते ही सारा उत्साह मर जाता है. कलम थकान का अनुभव करने लगती है. राजधानी अब ज्यादा दूर नहीं. हम विकास के नाम पर खड़े किए गए ऐसे जंगल में प्रवेश करने जा रहे जहां सभी कुछ बनावटी है. कुछ भी असली, कुछ भी मौलिक नहीं. अब टांकने के लिए शायद ही कुछ नया हो. शायद ही कुछ हो जो मेरे अनुभव को विस्तार दे पाए. इसलिए कागजों को समेटता हूं. कलम को विराम देता हूं. धन्यवाद के साथ कि सफर में लगातार मेरे साथ बनी रही. उन शब्दों का भी एहसान मानता हूं जिनकी डोर पर तने-तने मैं इतनी दूर तक चला आया. कल्पना और यथार्थ को परस्पर जोड़नेवाली डोर पर तना-तना. सफर की मुश्किलों को अंगूठा दिखाता हुआ. बाहर से उद्घोषक की परिचित-सी आवाज सुनाई पड़ती है. गाड़ी नई दिल्ली रेलवे स्टेशन को छू रही है. सहयात्रियों की देखादेखी में भी अपने मामूली-से सामान को उठा लेता हूं.
स्टेशन की भीड़-भाड़ में निदा फाजली का एक शेर बरबस मेरे होठांे पर सवार हो जाता है-
ये कायनात का फैलाव तो बहुत कम है
जहां समा सके तन्हाई वो मकाम भी दे.
-ओमप्रकाश कश्यप,
opkaashyap@gmail.com

1 टिप्पणी

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One response to “सफ़रनामा एक संसार खिड़की के आरपार – ओमप्रकाश कश्यप

  1. इस पोस्ट को यदि कुछ भागों में बांट दिया जाता तो पढने में ज्यादा रस आता

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