प्लेटो के आदर्शराज्य की शिक्षानीति—दो

प्लेटो का मानना था कि सभी मनुष्य अपूर्ण हैं, इसलिए उन्हें राज्य के रूप में संगठित-सुनियोजित होने की आवश्यकता पड़ती है. चूंकि हर व्यक्ति प्रत्येक कार्य में निपुण नहीं हो सकता, इसलिए राज्य का कर्तव्य है कि व्यक्ति की रुचि, योग्यता और सामर्थ्य के आधार पर उसके अनुकूल कर्तव्य का निर्धारण करे. प्लेटो का यह भी मानना था कि शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति स्वयं को समाज के लिए उपयोगी बना सकता है. शिक्षा की महत्ता को समझते हुए उसने ‘अकादमी’ की स्थापना की थी. प्लेटो का शिक्षा-दर्शन उसकी संवाद-पुस्तकों ‘रिपब्लिक’ तथा लॉजमें विस्तारपूर्वक सामने आया है. उसने न्यायाधारित समाज की परिकल्पना की थी, जिसमें सभी व्यक्ति अनुशासनबद्ध रहकर अपना सर्वोत्तम सहयोग दे सकें. कबीलाई योद्धाओं और तानाशाह सम्राटों से भरे यूनान में यह एक आदर्श कल्पना थी. प्लेटो का राज्य एक कल्पनालोक जैसा है. लेकिन वह आदर्श मनुष्य द्वारा अभिकल्पित वृहद नागरिक समाज के लिए है, जिसमें पराभौतिक शक्तियों का कोई हस्तक्षेप नहीं है. उल्लेखनीय है कि आदर्शलोक की अभिकल्पना भारतीय वेदादि ग्रंथों में भी गई है, लेकिन वहां आदर्शलोक की स्थापना बिना आध्यात्मिक शक्तियों की कृपा के असंभव है. प्लेटो यथार्थ और कल्पना के अंतर को भली-भांति समझता था. वह जानता था कि विचारों को सर्वत्र साकार कर पाना संभव नहीं होता. वे सिर्फ प्रेंरणादायी हो सकते हैं. इसलिए उसका यह भी मानना था कि विचारजगत, परिवर्तनशील वस्तुजगत की अपेक्षा अधिक स्थायी एवं वास्तविक होता है. रूसो ने अपनी पुस्तक ‘एमाइल’ में प्लेटो के संवाद ‘रिपब्लिक’ को शिक्षा-दर्शन की सबसे पहली पुस्तक माना है. ‘लॉजमें प्लेटो औपनिवेशिक नगर-राज्य के लिए न्यायिक व्यवस्था का विस्तृत खाका तैयार करता है. इन दोनों संवाद-पुस्तकों की विषयवस्तु प्लेटो के आदर्शराज्य की स्थापना के लिए समर्पित है. यद्यपि उनमें किंचित अंतर है, तथापि समाज में शिक्षा की अनिवार्यता को लेकर दोनों ही पुस्तकों में असंद्धिग्ध एकरूपता है. उल्लेखनीय है कि जहां ‘रिपब्लिक’ में उसने आदर्श राज्य की व्याख्या की है, वहीं लॉजमें उन व्यावहारिक पक्षों की गंभीर विवेचना की गई है, जिनके आधार पर किसी वांछित शासन-व्यवस्था को अनुकूल आकार दिया जा सकता है.

प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में लोगों को कुल तीन भागों में विभाजित किया है. पहला है—दास, जिनके लिए उसने इस ‘संवाद’ में विशिष्ट प्रावधान किए हैं. दूसरे हैं दस्तकार, हस्तशिल्पी यथा काष्ठकार, बुनकर, चर्मकार, दुकानदार, राज-मिस्त्री छोटे व्यवसायी, जो उत्पादन विपणन के लिए जिम्मेदार हैं और सही मायने में किसी भी समाज अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं. दास और शिल्पकार वर्गों को उसने नागरिकता के अधिकार से वंचित रखा है. तीसरी श्रेणी संरक्षक वर्ग की है, जिसको उसने पुनः दो भागों ‘पूरक’ अथवा ‘सहायक’ और ‘सक्षम’ में विभाजित किया है. राज्य के शासन को कुशलतापूर्वक चलाने की जिम्मेदारी इसी संरक्षक वर्ग की है. ‘पूरक’ अथवा ‘सहायक’ संरक्षक अपेक्षाकृत युवा होते हैं, जिनके ऊपर राज्य की आंतरिक एवं बाह्यः सुरक्षा का दायित्व होता था. पुलिस और सेना इनके अधीन होती हैं. संरक्षकों का दूसरा वर्ग शासन का वास्तविक कर्ता-धर्ता और नियामक होता है. राज्य की समस्त निर्णायक शक्तियां इसी वर्ग के अधीन होती हैं. प्लेटो ने अपने आदर्श राज्य के सर्वोच्च शासनाधिकारी के रूप में ‘दार्शनिक सम्राट’ को रखा है. दार्शनिक सम्राट वह बन सकता है जो बुद्धि, विवेक, साहस, ज्ञान, समानता, दयालुता, निष्पक्षता आदि मानवीय गुणों से संपन्न हो. ऐसे व्यक्ति के कंधों पर राज्य की सुरक्षा और शांति-व्यवस्था के साथ विकासदर को भी उत्तरोत्तर गतिमान बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है. उल्लेखनीय है कि प्लेटो के दो प्रमुख ‘संवाद’ ‘रिपब्लिक’ एवं ‘दि स्टेट्समेन’ में जहां दार्शनिक सम्राट का उल्लेख होता है, वहीं लॉजमें वह संरक्षक वर्ग में से चुने गए प्रतिनिधि-मंडल को राज्य की बागडोर सौंपने का समर्थन करता है. ‘लॉजप्लेटो के अंतिम दिनों की रचना है. ‘रिपब्लिक’ का लेखन लॉजसे लगभग बीस पहले संपन्न हुआ था. जिसमें उसने दार्शनिक सम्राट की परिकल्पना की थी और लोकतांत्रिक शासन-पद्धति की आलोचना. इससे लगता है कि लॉजतक आते-आते प्लेटो को लगने लगा था कि कुछेक व्यक्तियों, चाहे वे दार्शनिक ही क्यों न हों, के हाथ में सत्ता का सिमटना घातक हो सकता है, इसके निदान के लिए वह दार्शनिक मंडल के हाथों में सत्ता सौंपने का विचार प्रस्तुत करता है, जो गणतंत्र की भावना के अपेक्षाकृत निकट है.

प्लटो का मानना था कि आदर्शराज्य में बहुत अधिक फेरबदल की संभावना नहीं होती. अगर नागरिक ऐसा महसूस करते हैं, तो समझना चाहिए कि उनमें असंतोष बना हुआ है, यानी वहां राज्य के स्तर पर कोई कमी बनी है. आदर्श राज्य की तुलना उसने प्राचीन यूनानी मंदिर से की थी, जिसमें कोई बड़ा फेरबदल संभव नहीं होता. आदर्श राज्य के बदलाव व्यवस्था को और आदर्श एवं नीति-संपन्न बनाने के लिए होने चाहिए. संरक्षक वर्ग का दायित्व है कि वह स्वयं को राज्य-कल्याण के प्रति समर्पित रखे. उनमें भौतिक वस्तुओं, विशेषकर विलासितापूर्ण सामग्री के प्रति कोई आकर्षण नहीं होना चाहिए, इसलिए कि ऐसी वस्तुएं निरर्थक स्पर्धा और आपसी ईष्र्या को बढ़ाती हैं. इसलिए उन्हें इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि उनमें विलासिता की सामग्री के प्रति स्वतः अनाकर्षण हो. अभिभावकों को सैनिक की भांति करना चाहिए, जिसका दायित्व उसकी रक्षा करना है, जिसके लिए उसे नियुक्त किया गया है. उन्हें गंभीर और मननशील होना चाहिए, ताकि वे निजी आकांक्षाओं से बच सकें. संरक्षक वर्ग में निजी महत्त्वाकांक्षा के शमन के लिए प्लेटो उनके लिए सामूहिक आवास-बस्तियां बनवाने का सुझाव देता है. यही नहीं सामाजिक एकता के पक्ष में वह निजी संपत्ति के सभी प्रतीकों का सामूहिकीकरण करते हुए संरक्षक वर्ग के लिए सामूहिक आवास-कक्ष, मनोरंजनालय, यहां तक कि पत्नियों और बच्चों में भी साझेदारी का सुझाव देता है. प्लेटो ने शिक्षा के महत्त्व को स्वीकारा है, मगर इस बारे में प्लेटो के विचार उस समय आधुनिकता विरोधी जान पड़ते हैं, जब वह लिखता है कि शिक्षा का एक कृत्य यथास्थिति बनाए रखना भी है. वह ऐसे आविष्कारों का निषेध करता है, जो आदर्श समाज के लिए हानिकारक सिद्ध हों. और अपेक्षा करता है कि शिक्षा ऐसे परिवर्तनों से आगाह करने के लिए सचेतक की भूमिका भी निभाएगी. उसके अनुसार शिक्षा इन बदलावों का न केवल विरोध करती है, बल्कि अपसंस्करण की कोशिशों को नाकाम करने के लिए नागरिकों को सदैव तत्पर भी रखती है.

किंचित विरोधाभास के बावजूद प्लेटो का शिक्षा दर्शन पर्याप्त आधुनिक और अभिनव संभावनाओं से युक्त है. वह पहला विचारक था जिसने स्त्रियों की शिक्षा पर बराबर जोर दिया, खासकर ऐसे समय में जब उसके समकालीन विचारकों में से अधिकांश स्त्रिायों को घर की चारदीवारी से बाहर कोई जिम्मेदारी देने को तैयार न थे. प्लेटो के आदर्श राज्य में लड़के और लड़की की शिक्षा में कोई भेद नहीं था. लड़कियां लड़कों की भांति उनके साथ न केवल नंगी व्यायाम कर सकती थीं, बल्कि वे शिक्षा भी ग्रहण कर लेती थीं. उन्हें सेना के साथ सशस्त्र सैनिक के रूप में युद्ध में भाग लेने के अधिकार भी प्राप्त थे. शिक्षालयों में उनके साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं बरता जाता था. प्लेटो ने संरक्षक वर्ग के सदस्यों और उनकी संतान के लिए अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया है. दस्तकारों, शिल्पकर्मियों तथा दुकानदारों की शिक्षा के बारे में उसका मानना था कि उन्हें केवल उनके व्यवसाय से संबंधित प्रशिक्षण देना ही पर्याप्त होगा. दासों के लिए उसने शिक्षा को पूर्णतः अनावश्यक माना है. उल्लेखनीय है कि प्लेटो अभिजात नागरिकों की शिक्षा के बारे में तो क्रांतिकारी सुझाव देता है, किंतु बाकी जनसमाज की शिक्षा के प्रति उसके विचार परंपरागत और रूढ़िवादी हैं. इसके लिए प्लेटो को दोष देने के बजाय हमें यह भी मानना होगा कि वह स्वयं अभिजात्य वर्ग से था. शिक्षा को लेकर उसके विचार तत्कालीन परिस्थितियों के अनुकूल थे. उनमें बहुत परिवर्तनकारी चिंतन भी नहीं था, जैसा कि सतरहवीं-अठारवीं शताब्दी के फ्रांस में संभव हो सका, जहां रूसो ने शिक्षा को सभी वर्गीय भेदभावों से परे, सभी के लिए सुलभ करने की आवश्यकता पर जोर दिया. तथापि हमें प्लेटो की इसके लिए सराहना करनी होगी कि 2400 वर्ष पहले के समाज में उसने एक संपूर्ण शिक्षातंत्र की परिकल्पना की थी, जिसमें प्रशासन से लेकर शैक्षिक विषय-वस्तु पर गंभीरतापूर्वक विचार किया गया था.

आदर्शराज्य की परिकल्पना की स्थितियों की संभावना को आगे बढ़ाने वाली अपनी एक अन्य संवाद पुस्तक लॉजमें प्लेटो उसके अनिवार्य शिक्षातंत्र की विशेषताओं का सविस्तार उल्लेख करता है. उसके अनुसार पूरा तंत्र किसी कुशल पर्यवेक्षक की देखरेख में होना चाहिए, जो शिक्षा से जुड़े समस्त मामलों की विशद जानकारी रखता हो तथा जो समाज के सभी वर्गों, स्त्री, पुरुष आदि के बीच बिना किसी भेदभाव के शिक्षा का प्रसार कर सके. यह पूछे जाने पर शिक्षा का लाभ क्या है, प्लेटो इसी संवाद में एक एथेंसवासी के माध्यम से स्पष्ट करता है—

यदि तुम यह जानना चाहते हो कि शिक्षा का सामान्य लाभ क्या है, तो इसका उत्तर बहुत आसान है—शिक्षा मनुष्य को सदगुण-संपन्न करती है; और सद्गुण-संपन्न व्यक्ति विनम्रतापूर्ण व्यवहार करता है. अपनी विनम्रता के बल पर वह युद्ध में अपने शत्रुओं का दिल भी जीत लेता है.’1

प्लेटो यहां निर्दिष्ट करता है शिक्षा का दायित्व मंत्री स्तर के उस व्यक्ति को सौंपा जाना चाहिए तो उदार, गुणी और भेदभाव रहित हो. वह किसी प्रतिष्ठित परिवार में जन्मा हो तथा उसकी उम्र ‘कम से कम पचास वर्ष’ होनी चाहिए. उसको यह पता होना चाहिए कि उसका कार्य बाकी सभी मंत्रियों की अपेक्षा कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है. शिक्षा के लिए विद्यार्थी की उम्र कितनी हो? इस बारे में वह लिखा है कि बालक की शिक्षा का शुभारंभ यथासंभव न्यूनतम उम्र से कर देना चाहिए. यदि संभव हो तो उसके जन्म से अथवा उसके पहले से भी. उसके अनुसार शिक्षा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हिस्सा ही वह है, जो बचपन में सिखाया जाता है—इसलिए अभिभावक वर्ग का दायित्व है कि वह शिशु की शिक्षा का अनुकूल प्रबंध करे. ताकि बड़ा होने पर वह अपने कार्य में पूरी दक्षता प्राप्त कर सके. प्लेटो के अनुसार शिक्षा कभी समाप्त न होने वाला कृत्य है. उसके लिए उम्र की कोई सीमा नहीं है. इसलिए बालक को जहां तक संभव हो, जन्म से ही शिक्षा के लिए तैयार किया जाना चाहिए. प्लेटो प्रौढ़ शिक्षा का समर्थक था. उसके अनुसार ऐसे व्यक्तियों को जो किसी कारणवश बचपन में शिक्षा से वंचित रह गए हों, बड़ा होने पर शिक्षा दी जा सकती है. संरक्षक वर्ग को तो आजीवन, जन्म से लेकर सेवानिवृत्ति की अवस्था तक, कुछ न कुछ लगातार सीखते रहना चाहिए. ‘लॉजमें प्लेटो आदर्श राज्य में अधिकारियों की भर्ती की प्रविधियों के बारे में भी विस्तार सहित चर्चा करता है, जिसके अंतर्गत वह कानून-विशेषज्ञ संरक्षकों, पुजारियों, पहरेदारों, शिक्षा विभाग के मंत्री, न्यायाधीश आदि की भर्ती के तरीकों के बारे में सुझाव देता है. उसके अनुसार कानून सभी के लिए सुलभ होना चाहिए. न्याय से असहमति की स्थिति में व्यक्ति को अपील का अधिकार होना चाहिए—इसे ध्यान में रखते हुए वह अपील प्राधिकारी की नियुक्ति तथा अपील की प्रविधि का विस्तार सहित उल्लेख करता है.

रिपब्लिक’ में प्लेटो ने शिक्षा को दो प्रमुख वर्गों ‘संगीत’ एवं ‘व्यायाम’ में विभाजित किया है. यह विभाजन केवल नाम तक सीमित नहीं है. प्लेटो के लिए ‘संगीत’ का अर्थ हर उस बोध से है जिसको मनुष्य अपने जीवन में ग्रहण कर सकता है. उसी प्रकार ‘व्यायाम’ से उसका आशय लगभग वैसा ही है, जैसा आजकल ‘एथिलीट’ शब्द से है, जो शारीरिक और मानसिक स्वाथ्य दोनों पर जोर देता है. प्लेटो नागरिकों को शारीरिक और मानसिक रूप से हृष्ट-पुष्ट देखना चाहता था. धैर्य, अनुशासन और साहस को उसने शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य के रूप में लिया था. साहित्य के अंतर्गत बच्चों को क्या पढ़ाना चाहिए, इसपर भी वह नियंत्राण के पक्ष में था. खासकर प्राचीन यूनानी प्रेमकथाओं को लेकर, जिन्हें वह बालमनोविज्ञान के प्रतिकूल मानता था. लेकिन वह संगीत शिक्षा की अनुमति देता है. उसके अनुसार मां और नर्स का कर्तव्य है कि वे बच्चों को केवल साहस, धैर्य और कर्तव्यपरायणता से भरपूर कहानियां सुनाएं. होमर और हेसोद की रचनाओं को वह बालमनोविज्ञान के प्रतिकूल मानता था, इसलिए उसने ‘रिपब्लिक’ में इन कहानियों को सुनाए जाने का निषेध किया है. प्लेटो के अनुसार ये कहानियां ईश्वर के बारे में गलत पाठ पढ़ाती हैं. ये शिक्षा देती हैं कि ईश्वर भी कभी-कभी बुरे कार्यों में लिप्त हो जाता है, जो सर्वथा असत्य एवं भ्रामक है, जिसे तर्क द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता. प्लेटो के अनुसार किशोरों को पढ़ाया जाना चाहिए कि बुराइयां कभी भी ईश्वर की ओर से नहीं आतीं. सृष्टि में व्याप्त ‘शुभ-अशुभ’ में से केवल ‘शुभ’ ही ईश्वर की निर्मिति है. ‘अशुभ’ या तो भ्रांति है अथवा मानवीय लालच और अज्ञानता की उपज. इसलिए सुधार की आवश्यकता मनुष्य और उसकी समाज रचना में. प्लेटो के परमशुभ की धारणा का विस्तार सर्वेश्वरवादी दार्शनिक बरुच स्पिनोजा(1632—1677) तथा द्वंद्ववादी विचारक फ्रैड्रिक हीगेल (1770—1831) के दर्शन में देखने को मिलता है. इन दोनों ही दार्शनिकों ने शुभत्व की अवधारणा को स्वीकार किया है.

महान यूनानी कवि होमर की रचनाओं को बच्चों के लिए निषिद्ध मानने का अन्य कारण यह था कि उसकी रचनाएं प्रेम और संवेदना का पक्ष लेती हुई, उन्हें बढ़ावा देने का काम करती हैं. प्लेटो के अनुसार वे बच्चों को मृत्यु से डरना सिखाती हैं, जबकि शिक्षा का उद्देश्य बालकों में जोश भरना, वीरता और युद्धक्षेत्र में शहीद हो जाने की भावना पैदा करना भी है. अतः किशोरों को सिखाया जाना चाहिए कि दासता मृत्यु से कहीं बदतर है. इसलिए उन्हें रोने-धोने वाले मनुष्य की कहानी सुनाने से बचना चाहिए, भले ही वह व्यक्ति अपने किसी निकट मित्र अथवा संबंधी की मृत्यु के कारण शोक-निमग्न क्यों न हो. अनुशासन के रूप में प्लेटो चाहता था कि बच्चों को गंभीर रहने की शिक्षा दी जाए. उन्हें सिखाया जाना चाहिए कि जोर से हंसना अशिष्ठता का प्रतीक है. उसने होमर, हेसोद की रचनाओं को बालकों के लिए इसलिए भी अनुपयुक्त माना था, क्योंकि उनमें शानदार दावतों का गुणगान किया गया है. वे ईश्वर को लालची सिद्ध करती हैं. प्रकारांतर में वे बच्चों में धनसंग्रहण एवं विलासितामय जीवनशैली के प्रति ललक बढ़ाती हैं. इस प्रकार की कहानियां बालकों के धैर्य के लिए घातक हैं. वह बच्चों को ऐसी कहानियां सुनाने के पक्ष में भी नहीं था, जिसमें बुरे आदमी को सुखी और भले व्यक्ति को दुखी बताया गया हो. उसके अनुसार इससे बालक की अनैतिक जीवन के प्रति आसक्ति बढ़ सकती है. चूंकि कविताओं में करुणा, दया आदि मानवीय संवेगों का बढ़ा-चढ़ाकर बखान किया जाता है, इसलिए उसने युवा विद्यार्थियों को कवि और कविताओं से दूर रखने की सलाह दी है. नाटक को लेकर भी प्लेटो ने रोचक बात कही है. उसके अनुसार कोई भी भला व्यक्ति किसी बुरे व्यक्ति की नकल करने से बचेगा, जबकि प्रायः सभी नाटकों में खलनायक की मौजूदगी होती है. नाटककार एवं अभिनेता उस पात्र को जीवंत बनाने के लिए उसकी खलनायकी के तरह-तरह के रूप, कई बार बढ़ा-चढ़ाकर भी, दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं. परिणामस्वरूप लोगों को अपराध के नए तरीकों की जानकारी मिल सकती है. प्लेटो लिखता है कि न केवल खलनायक, बल्कि स्त्री, दास तथा अन्य निम्नवर्गीय व्यक्तियों का अभिनय भले व्यक्तियों को करना पड़ता है. इसलिए ऐसे नाटकों के प्रदर्शन पर रोक लगाई जानी चाहिए, विशेषकर बच्चों को तो उनसे दूर रखना ही श्रेयस्कर है. उनके लिए ऐसे नाटक लिखे जाने चाहिए जिसमें किसी भी दोषी, अपराधी अथवा चरित्राहीन व्यक्ति का उल्लेख न हो. चूंकि अधिकांश नाटक मंडलियों की राय में ऐसे नाटक लिखे जाने संभव नहीं हैं, इसलिए प्लेटो ने उन सभी को नगर से निर्वासित करने की सलाह दी है.

प्लेटो संगीत पर भी नजर रखने के पक्ष में था. खासकर बच्चों के संगीत को लेकर. उसका मानना था कि अभिभावक वर्ग का यह कर्तव्य है कि बच्चों को उसी संगीत का आनंद लेने दें, जो उनके लिए पूरी तरह उपयुक्त हो. जो उनके चारित्रिक विकास में सहायक हो. इस आधार पर उसने प्राचीन लीडियन और आयोनियन संगीत को बच्चों के मनोविज्ञान के प्रतिकूल मानते हुए उससे उन्हें दूर रखने का सुझाव दिया है. प्लेटो के अनुसार इस प्रकार का संगीत बच्चों में दुख तथा नैराश्य की भावना पैदा कर उन्हें भाग्योन्मुखी और शिथिल बनाता है. इसके स्थान पर उसने डोरियन तथा फ्राइजियन संगीत को बच्चों के लिए उपयुक्त माना है, इसलिए कि वह बच्चों में साहस, धैर्य एवं दृढ़ता की भावना का विकास करता है. उसका मानना था कि बच्चों के लिए तैयार की जाने वाली धुनें आसान होनी चाहिए. आवश्यक है कि उनसे साहस और आपसी तालमेल युक्त, सामूहिक जीवन का संदेश मिलता हो. बच्चों को सादा और संयमित जीवन की शिक्षा दी जानी चाहिए. उनका भोजन साधारण हो, जिसमें भुने हुए मांस-मछली तथा ऐसे ही साधारण व्यंजनों को सम्मिलित किया जा सकता है. विलासिता के प्रतीक चटनी, मिठाई जैसे चटकारेदार और स्वादिस्ट व्यंजनों को बच्चों के भोजन से दूर रखना चाहिए. यदि लोगों का रहन-सहन मर्यादित और संयमित होगा तो उनका स्वास्थ्य भी उत्तम रहेगा. उन्हें चिकित्सक की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

प्लेटो के अनुसार युवाओं को मर्यादित भाषण की शिक्षा दी जानी चाहिए. उन्हें न तो जोर से गाना चाहिए, न ही मुंह से कोई भद्दा मजाक करना चाहिए. लेकिन किशोरावस्था पार करते समय, उन्हें गाने और चीखने-चिल्लाने की शिक्षा दी जा सकती है. उन्हें अपने मुंह से ऐसी आवाज निकालने का अभ्यास कराना चाहिए, जो आतंक पैदा करती हो. यह भी अत्यावश्यक है कि उस समय वे स्वयं आतंकित न हों. उन्हें पीड़ा का अहसास भी कराया जाना चाहिए, परंतु इस प्रकार कि वह उनकी इच्छाशक्ति एवं संघर्ष-भावना को कमजोर न पड़ने दे. युद्ध की शिक्षा देने के लिए युवाओं को युद्धस्थल पर ले जा सकता चाहिए, किंतु उन्हें युद्ध में सीधे भाग लेने से यथासंभव बचाना चाहिए. इस तरह कठोर प्रशिक्षण से गुजरने के पश्चात ही बच्चे भविष्य में संरक्षक की भूमिका का सफल निर्वाह कर सकते हैं.

प्लेटो लैंगिक समानता का समर्थक था. ‘रिपब्लिक’ में उसने लड़कों और लड़कियों को संगीत तथा व्यायाम की एकसमान शिक्षा दिए जाने का समर्थन किया है. अपने समकालीन विचारकों से इतर वह लड़कियों को युद्ध की भी वैसी ही शिक्षा दिए जाने के पक्ष में था, जैसी लड़कों को—

समान शिक्षा आदमी को श्रेष्ठ संरक्षक तथा स्त्री को अच्छी संरक्षिका बनने में मदद करेगी, इसलिए कि दोनों का मूलभूत स्वभाव एक जैसा होता है.’2

बावजूद शैक्षिक समानता के प्लेटो स्त्रिायों को सक्रिय राजनीति से दूर रखने का समर्थक था. उसके अनुसार राजनीति का क्षेत्र स्त्रियों के लिए अनुपयुक्त है. न स्त्रियों के पास कुछ ऐसा है जिसके द्वारा वे राजनीति में कामयाब हो सकें. हालांकि कुछ स्त्रियां दार्शनिक प्रवृत्ति की हो सकती हैं. मगर यह गुण उन्हें अच्छी संरक्षिका तो बना सकता है, राजनीति में पारंगत नहीं. प्लेटो के अनुसार स्त्रिायों की अतिशय भावुकता ही उन्हें राजनीति के लिए अपात्र सिद्ध करती है. यह संभव है कि कुछ लड़कियों की रुचि युद्ध में हो, उनमें अच्छी सैनिक बनने के लक्षण भी हो सकते हैं. इसके बावजूद उन्हें सेना में भर्ती के योग्य नहीं माना जा सकता. प्लेटो के अनुसार राज्य के संविधान व्यवस्था होनी चाहिए कि वह स्त्राी और पुरुष में सादा रहन-सहन और सहजीवन के प्रति उत्सुकता एवं ललक को बढ़ावा दे. इसके लिए उन्हें बचपन से ही प्रशिक्षित किया जाना चाहिए. उन्हें एक ही रसोई का बना भोजन करने की प्रेरणा मिलनी चाहिए. वह विवाह-संस्था के परंपरागत स्वरूप में क्रांतिकारी परिवर्तन का समर्थक था. चूंकि उस समय राज्य छोटे थे और उनमें अक्सर युद्ध होते रहते थे, ऐसे में जनसंख्या के न्यूनतम स्तर को बनाया रखना भी एक बड़ी चुनौती थी. इसलिए प्लेटो ने संतानोत्पत्ति को नागरिक-धर्म माना है. ‘रिपब्लिक’ में उसने अनुशंसा की है कि खास अवसरों पर उतने पति-पत्नियों को, जितने जनसंख्या को स्थायी बनाए रखने के लिए आवश्यक हों, साथ-साथ रहने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए. यहां उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि प्लेटो ‘टाइमस’ में विवाह संस्था का निषेध करता है. ऐसे में संतति नियमन और प्रजनन का स्वरूप क्या होगा? विशेषकर उस राज्य में जो अपने प्रत्येक नागरिक की देखभाल करना, उसके हितों का संरक्षण करना अपना कर्तव्य मानता हो. इसपर टिप्पणी करते हुए सुकरात टाइमस को अपने पिछले संवाद की याद दिलाता है, जिसमें उसने अपने आदर्श राज्य के लिए व्यवस्था की थी कि उसमें—

सभी पत्नियां और बच्चे साझे होगे, संबंधों का निर्वाह इस प्रकार किया जाएगा कि कोई भी व्यक्ति अपने बेटे अथवा बेटी की पहचान न कर सके, बल्कि लोगों में यह धारणा बलवती रहे कि वे सब एक ही परिवार के अंग हैं. उम्र-विशेष तक सभी लड़के-लड़कियां स्वयं को भाई-बहन मानेंगे, जो उनसे बड़े हैं वे स्वयं को अपनी उम्र के अनुसार माता-पिता और दादा-दादी समझेंगे, इसी प्रकार युवा स्वयं को उनके बेटा-बेटी अथवा पोते-पोतियां मानेंगे.’3

प्लेटो बच्चों को जन्म से ही राज्य के संरक्षण में रखने और और पूर्व निर्धारित मापदंडों के अनुसार उनका पालन-पोषण करने का सुझाव देता है. किंतु वह मानता है कि शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर तथा हृष्ट-पुष्ट बच्चों का लालन-पालन अलग-अलग समूहों में होना चाहिए. कठोर निर्णय लेते हुए वह अःशक्त एवं अपंग बच्चों को अज्ञात स्थान पर रखने का सुझाव देता है. प्लेटो का लेखनकाल लंबा रहा है. अपने सुदीर्घ जीवन में वह पचास से अधिक वर्षों तक सक्रिय लेखन करता रहा. इसलिए उसके लेखन में कहीं-कहीं विरोधाभास भी नजर आते हैं. जैसे एक स्थान पर तो वह लिखता है कि बच्चों की प्राथमिक शिक्षा का दायित्व उनके माता-पिता का होगा. ‘रिपब्लिक’ में वह जोर देकर कहता है कि समाज में पति-पत्नी साझे होंगे और अभिभावक अपनी वास्तविक संतान के बारे कभी नहीं जान पाएंगे. वहीं दूसरी ओर लॉजमें वह माता-पिता को अपने बच्चों के साथ संतुलित व्यवहार करने का परामर्श देता है. वह अपेक्षा करता है कि आदर्श राज्य के माता-पिता अपने बच्चों को कानून की मर्यादाओं का पालन करने तथा अनुशासन में रहने की शिक्षा देंगे. वह लिखता है कि—

बच्चों की उपेक्षा उन्हें मानसिक रूप से चिड़चिड़ा, कमजोर तथा अधैर्यवान बना सकती है, उनके साथ दोषपूर्ण व्यवहार तथा अज्ञानतापूर्ण जोर-जबरदस्ती, मारपीट उन्हें कठोर, चापलूस, संकोची एवं एकांतजीवी बनाएगी. प्रकारांतर में वे सामान्य पारिवारिक और नागरिक जीवन जीने के अयोग्य हो सकते हैं.’4

प्लेटो का मानना था कि शारीरिक प्रशिक्षण, कसरत के बारे में बच्चों को उनके बचपन से ही सिखाया जाना चाहिए. शिशु के अच्छे स्वास्थ्य के लिए उसने गर्भवती महिलाओं को भी घूमने-फिरने तथा भोजन पर ध्यान देने की सलाह दी है. शारीरिक शिक्षा की भांति बच्चों का सांस्कृतिक प्रशिक्षण भी छोटी अवस्था से ही आरंभ कर देना चाहिए. अभिभावक कहानी के माध्यम से बच्चों को अपनी सभ्यता एवं संस्कृति के बारे में बता सकते हैं. लेकिन उन्हें वही कहानियां सुनाई जानी चाहिए जो उनकी उम्र के लिए उपयुक्त हों तथा उनके मानसिक विकास में सहायक सिद्ध हों. वह बच्चों को सुनाई जानी वाली कहानियों पर नियंत्राण रखने के पक्ष में था. उसका सुझाव है कि बच्चों को सुनाई जाने वाली कहानियां सरल, किंतु प्रभावयुक्त होनी चाहिए, जो उनके मानसिक स्तर के अनुकूल हों—तभी वे उन्हें रुचि लेकर पढ़ सकेंगे. बच्चों को सुनाई जाने वाली कहानियों को लेकर प्लेटो इतना सतर्क है कि वह होमर आदि प्राचीन यूनानी कवियों की रचनाओं को भी बच्चों के लिए निषिद्ध ठहराता है. कहानियों के अलावा खेल भी बच्चों के चरित्र विकास में सहायक होते हैं. इसलिए उसका मानना था कि बड़ा होने पर व्यक्तिमात्र के लिए जो भी आवश्यक है, उसकी शिक्षा उसको बचपन से ही, खेलों के माध्यम से दी जानी चाहिए. यदि किसी बालक में अच्छा भवन निर्माता बनने का गुण है, तो उसके खेलों की रूपरेखा इस प्रकार निर्धारित की जानी चाहिए, जिससे उसको भवन-निर्माण की बारीकियों की जानकारी खेल-खेल में मिलती हो. इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति काष्ठकला में रुचि रखता है तो उसको उस उद्यम के बारे में बताया जाना चाहिए. इससे बच्चों की रुचि में स्वाभाविक निखार आएगा. फलस्वरूप आगे चलकर अपने कार्य में पूरी तरह दक्ष सिद्ध होंगे.

प्लेटो प्रावधान करता है कि तीन से छह वर्ष तक के बच्चों को माता-पिता अपनी देखरेख में खेलने का अवसर दें. यह कार्य गृहणियां अधिक कुशलतापूर्वक कर सकती हैं, इसलिए उन्हें इसकी जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए. छह वर्ष का होते ही उसको स्कूल में भर्ती कर देना चाहिए. वहां प्रारंभ में उसको पढ़ना, लिखना और गिनती करना सिखाया जाए. छह वर्ष के बाद लड़के और लड़की को अलग-अलग, उनके कार्य और रुचि के अनुसार शिक्षा देने की अनुशंसा प्लेटो ने की है. लेकिन किसी भी प्रकार के लैंगिक भेदभाव से परे. लड़कियां चाहें तो वे सभी कार्य सीख सकती हैं, जो लड़कों के लिए निर्धारित हैं—

छह वर्ष की अवस्था लड़के-लड़की को अलग-अलग कर देने का समय होता है. तदनंतर लड़के को लड़कों के समूह में तथा लड़की को लड़कियों के साथ रहना चाहिए. उसके बाद उनकी पढ़ाई आरंभ कर देनी चाहिए. लड़कों को घुड़सवारी, तीरंदाजी, बर्छी तथा अन्य हथियार चलाने की कला. यदि स्वेच्छापूर्वक सीखना चाहें तो लड़कियों को भी इन सभी कलाओं में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, जब तक कि वे भारी हथियार चलाना सीख न जाएं. इसके लिए चाहे जितनी मेहनत करनी पड़े.’5

प्लेटो के अनुसार दस वर्ष का होते ही बालक की विधिवत शिक्षा आरंभ कर देनी चाहिए. उसके आगे 3 वर्ष तक उन्हें अक्षर-ज्ञान दिया जाना चाहिए. तेरह वर्ष का होते-होते बालक संगीत की धुनों को समझने-योग्य हो जाता है. उसके बाद पूरे तीन वर्ष तक, न इससे कम न अधिक उसको संगीत आदि कलाओं के विधिवत अध्ययन में जुटे रहना चाहिए. भले ही उसके माता-पिता की उसके अध्ययन में कोई रुचि न हो. इसके बाद यदि वह चाहे तो भी संगीत में उसको संगीत के और अध्ययन की अनुमति नहीं देनी चाहिए. प्लेटो एथेंस की समकालीन शिक्षा प्रणाली से असंतुष्ट था. उसको लगता था कि वर्तमान शिक्षा-पद्धति अंकगणित तथा ज्योतिष के अध्यापन के प्रति उदासीन है. जबकि प्राचीन यूनान में ये दोनों ही विषय खासे लोकप्रिय थे. इसलिए वह बच्चों को गणित और ज्योतिष पढ़ाए जाने के पक्ष में था. उसके अनुसार नृत्य, संगीत, व्यायाम तथा गणित जैसे विषय शिक्षा का अनिवार्य अंग होने चाहिए. और बिना यह जाने कि लड़का है या लड़की, सभी को यह शिक्षा अनिवार्यरूप से दी जानी चाहिए. संगीत, गणित तथा व्यायाम की पढ़ाई के अलावा बच्चों को सभी प्रकार के खेल भी सिखाना जरूरी है, ताकि वे शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहें.

अठारह वर्ष तक विभिन्न विषयों की शिक्षा प्रदान करने के पश्चात बच्चों की परीक्षा भी ली जानी चाहिए. परीक्षा में सभी विषय जैसे हथियार चलाना, घुड़सवारी, संगीत, नृत्य, अंकगणित आदि, जिनका वह अध्ययन करता रहा है—सम्मिलित होने चाहिए. प्लेटो द्वारा उच्च शिक्षा के लिए विद्यार्थी की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष निर्धारित की गई है, जिसमें विद्यार्थी की पिछली प्रगति को देखते हुए प्रवेश दिया जाता था. उच्च शिक्षा के लिए प्लेटो द्वारा जो पाठ्यक्रम निर्धारित किया गया था, वह सोफिस्टों द्वारा तय पाठ्यक्रम से भिन्न था. दर्शन प्लेटो का पसंदीदा विषय था. इसलिए उसने उच्च शिक्षा के लिए दर्शनशास्त्र को अनिवार्य माना था. दर्शनशास्त्र की महत्त्वपूर्ण और प्रभावशाली धारा के रूप में उसने राजनीतिक दर्शन के अध्ययन पर भी जोर दिया है. उसने अकादमी में बीस वर्ष की अवस्था तक शिक्षा को अनिवार्य घोषित किया था. किंतु वह शिक्षा के मामले में व्यक्ति की रुचि और उसकी इच्छा का सम्मान करने का समर्थक था. इस कार्य में किसी भी प्रकार का दबाव उसे अस्वीकार था. अतएव—

प्लेटो ने अनुशंसा की थी कि व्यक्ति की संपूर्ण शिक्षा अनिवार्य निर्देशों के दबाव से मुक्त रहनी चाहिए. इसलिए कि किसी भी मुक्त आत्मा को पराधीनतापूर्ण स्थितियों में अध्ययन नहीं करना चाहिए. यही नहीं, जोर-जबरदस्ती से सिखाया हुआ ज्ञान मस्तिष्क में कभी ठहर ही नहीं सकता.’6

उच्च शिक्षा की अवधि अगले दस वर्ष तक संभव है. उसमें विद्यार्थी को दर्शन और राजनीति के अलावा हर उस विषय की शिक्षा दी जानी चाहिए, जो भविष्य में उसके लिए हितकारक सिद्ध हो सके. उच्च शिक्षा के दौरान निचले स्तर पर दी गई शिक्षा की पुनरावृत्ति भी साथ-साथ होती रहनी चाहिए, ताकि विद्यार्थी उसे याद रख सकें. राजनीति एवं दर्शन के अतिरिक्त उन्हें गणित, संगीत, विज्ञान, समाज विज्ञान, कानून आदि विषयों के बारे में भी सिखाया जाना चाहिए, ताकि वे बड़े होकर अभिभावक के रूप में अपने दायित्वों का निर्वाह भली-भांति कर सकें. तथापि यह अत्यावश्यक है कि विषयों का चयन विद्यार्थी की रुचि एवं मानसिक क्षमता के अनुसार हो. सुकरात को संवाद-शैली का जन्मदाता माना जाता है. प्लेटो के अधिकांश लेखन इसी शैली में है. अपने गुरु की शैली से प्रभावित प्लेटो का मानना था कि उच्च शिक्षा के आग्रही विद्यार्थी को संवाद-कला में निपुण होना चाहिए. इससे वह न केवल दूसरों के मंतव्य को भली-भांति समझ सकता है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अपने विचारों को भी तर्क-सहित, पूरी दृढ़ता एवं आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत कर सके. व्यक्ति को तर्ककला में निपुण होना चाहिए.

ध्यातव्य है कि सुकरात और प्लेटो के समकालीन सोफिस्ट विद्वान भी वाक्कला को शिक्षा के प्रमुख विषय के रूप में स्वीकार करते थे. उनके लिए शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य था, व्यक्ति खासकर अभिजात्य युवाओं को तर्ककला में निपुण बनाना, ताकि बातचीत के दौरान वे दूसरों को प्रभावित कर सकें. अपने भाषण और वाक्निपुणता से बड़े से बड़े समूह, यहां तक कि भीड़ को भी अपने प्रभाव में ले सकें. सुकरात और प्लेटो दोनों सोफिस्ट विचारकों का सिद्धांततः विरोध करते हैं. तथापि सोफिस्टों से अपने गहरे मतभेदों के बावजूद सुकरात ने वाक्कला की महत्ता को स्वीकारा है. विचारों के आदान-प्रदान के लिए सुकरात अपने शिष्यों के साथ अविरत संवाद करता है. उसका पूरा दर्शन प्लेटो की पुस्तकों में प्रभावशाली संवादों के रूप में सुरक्षित है. प्लेटो का अधिकांश लेखक संवाद शैली में है, इसी कारण उसकी पुस्तकों को ‘संवाद’ का विशेषण भी दिया जाता है. इससे तय है कि सुकरात और प्लेटो के वैचारिक स्तर पर चाहे जो मतभेद हों, मगर वह वाक्कला की शक्ति को परिचित और प्रभावित थे. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि संवाद-शैली प्राचीन यूनान की सबसे लौकप्रिय शैली थी. ऐसे में किसी भी विचारक के लिए उससे बच पाना असंभव था. किंतु सोफिस्टों के विपरीत सुकरात और प्लेटो वाक्कला को अपने विचारों को प्रकट करने का माध्यम मानते हैं. उनके लिए संवाद अपना मत प्रकट करने तथा दूसरों की सुनने का माध्यम है. तर्ककला में निपुण व्यक्ति का आशय ऐसे व्यक्ति से नहीं है, जो येन-केन-प्रकारेण अपनी बात दूसरों पर थोपना चाहता हो. उन्होंने ऐसे व्यक्ति को तर्कशास्त्री माना है, जो दूसरे मंतव्य और बातों की गहराई को भली-भांति समझ सके.इसकी व्याख्या करते हुए ‘रिपब्लिक’ में सुकरात के मुंह से कहलवाया गया है कि श्रेष्ठ—

तर्कशास्त्री वह है जो प्रत्येक वस्तु के मंतव्य, उसकी मूलभूत विशेषताओं को गहराई से समझ सके. जो लेशमात्र भी दुराग्रही न हो और स्वयं को वह इस धारणा से एकदम मुक्त रखता हो कि तर्क करते समय यदि किसी मुद्दे पर वह मात खाता है तो इसका आशय उसकी अज्ञानता अथवा बुद्धिमानी का अभाव है.’7

यह मानते हुए कि सभी व्यक्ति एकसमान बुद्धि-स्तर के नहीं हो सकते, प्लेटो ने सामान्य नागरिकों को प्रतिष्ठित दार्शनिकों, तर्कशास्त्रियों का अनुकरण करने की छूट दी है. इसके लिए आवश्यक है कि उस दार्शनिक या तर्कशास्त्री की बौद्धिक चेतना सत्य के अनुसंधान के प्रति समर्पित हो. जो विचारों से रूढ़िवादी तथा दुराग्रही न हो. जिसके तर्क के पीछे प्रतिपक्षी को पराजित कर यश प्राप्त करने के बजाय, उससे कुछ ग्रहण करने की स्वाभाविक जिज्ञासा और लग्न हो. प्लेटो का मानना था कि दर्शनशास्त्री को अंकगणित, ज्यामिति, खगोलविज्ञान तथा समन्वय-विद्या में निपुण होना चाहिए. इन विषयों का ज्ञान व्यक्ति को वैचारिक दृढ़ता तथा ऊंचे आत्मविश्वास के लिए परमावश्यक है—

ये विषय विद्यार्थी की आत्मा को वैचारिक दृढ़ता एवं आत्मविश्वास के उच्चतम स्तर तक ले जाएंगे. गणित यानी ‘अंकगणित’ तथा ‘ज्यामिति’, मस्तिष्क को व्यर्थ की उत्तेजना और सनसनी से मुक्त रख, उसका विशुद्ध विचारों से परिचय कराएंगे तथा आत्मा को विचार-जगत की वास्तविक ऊंचाइयों की ओर ले जाने में सहायक होंगे. ‘ज्यामिति’ वस्तुतः अनंत सत्ता की उपस्थिति की प्रतीति है. यही वह विषय हैं जिनके द्वारा कोई व्यक्ति समझ सकता है कि वह अपनी अवधारणाओं को तार्किक परिणति तक किस प्रकार पहुंचा सकता है. ‘खगोल विज्ञान’ की समझ आत्मा को बृह्मांड के अनूठे ऐक्यभाव और सांमजस्य-भावना से जोड़ती है. एकता अथवा सामंजस्यता की भावना असल में ‘खगोल विज्ञान’ की बहन है, यह व्यक्ति के मनस् को ज्ञान के शोध पर केंद्रित रखते हुए उसे संगीत-कला की बारीकियां समझाने में भी सहायक सिद्ध होती है.’8

प्लेटो का गणित के प्रति अनुराग उसपर पाइथागोरस के अनुयायियों के प्रभाव की देन था. उसके अनुसार जिज्ञासु व्यक्ति को अपने विचारों में सुस्पष्ट होना चाहिए. उसके भीतर सीखने की प्रबल इच्छा होनी चाहिए. स्वयं को समस्त पूर्वग्रहों से मुक्त रहते हुए उसे केवल ज्ञान के अनुसंधान के प्रति समर्पित रहना चाहिए. दर्शनशास्त्र अथवा तर्कशास्त्र के अध्ययन के लिए उसने न्यूनतम 30 वर्ष की वयस् निर्धारित की है. लेकिन दर्शनशास्त्र का विषयक्षेत्र अत्यंत व्यापक है, इसलिए इस विषय का अध्ययन-मनन करते हुए उसे इसमें एकदम डूब नहीं जाना चाहिए. उस अवस्था में व्यक्ति अपने सामाजिक-राजनीतिक दायित्वों को पूरा करने में असमर्थ सिद्ध होगा. अतः दर्शनशास्त्र आदि विषयों के 5 वर्ष के नियमित अध्ययन-मनन के पश्चात उसको वापस समाज की ओर मुड़ जाना चाहिए. अगले 15 वर्ष तक उसे सेना तथा अन्य राजकीय सेवाओं में, जहां वह स्वयं को सर्वाधिक सहज एवं उपयुक्त मानता हो, अथवा जहां राज्य को उसकी सेवाओं की सर्वाधिक आवश्यकता हो, अपना योगदान देना चाहिए. 50 वर्ष की अवस्था तक व्यक्ति वैचारिक और आनुभविक रूप से परिपक्व हो चुका होता है. इस अवस्था तक पहुंचने के बाद जो व्यक्ति ज्ञान की सभी शाखाओं में प्रवीण हो चुका हो, वह दूसरों के लिए आदर्श और अनुकरणीय है. ऐसे व्यक्ति की सेवाएं राज्य के लिए कानून बनाने, व्यवस्थित रखने के लिए ली जा सकती हैं. ऐसे सर्वगुण संपन्न व्यक्ति यदि चाहें तो अपना बाकी जीवन दर्शनशास्त्र का अध्ययन करने अथवा समाजसेवा करते हुए भी बिता सकते हैं. राजकीय अथवा सामाजिक सेवा से मुक्त होने के उपरांत उन्हें अपना शेष जीवन दर्शनशास्त्र और जीवन के वास्तविक सत्य के अनुसंधान, चिंतन-मनन को समर्पित कर देना चाहिए. यही उनके जीवन की वास्तविक उपलब्धि होगी.

प्लेटो की नगर-योजना में रहने वाले नागरिक वस्तुतः एक शिक्षित और विवेकवान समुदाय के सदस्य थे. उन्हें राजनीति, अर्थनीति तथा सामाजिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करने, उसको बेहतर बनाने के लिए सुझाव देने के पर्याप्त अधिकार थे. वह शिक्षा को परंपरा के दबावों से मुक्त कर, उसमें दर्शनशास्त्र, गणित, विज्ञान, खगोल विद्या, राजनीति, कानून आदि को सम्मिलित करने पर जोर देता है. उसका मानना था कि सभी नागरिकों को शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए, ताकि वे विकासोन्मुखी राजनीतिक निर्णय ले सकें तथा अपने राज्य और समाज को उन सभी दुष्प्रभावों से दूर रह सकें जो मानवीय अज्ञानता के कारण जन्म लेते हैं. यहां उल्लेखनीय है कि प्लेटो और उसका गुरु सुकरात दोनों दर्शनशास्त्र को सभी विषयों में श्रेष्ठतम मानते हुए उसके नियमित अध्ययन-मनन को विशिष्टतम मानवीय उपलब्धि में शुमार करते हैं. धर्म तथा तत्संबधी रूढ़ धारणाओं के लिए वहां कोई स्थान नहीं है, उसके स्थान पर दोनों मानवीय विवेक को महत्ता देते हैं. प्लेटो के लिए शिक्षा का लक्ष्य किसी व्यक्ति का निजी उत्थान नहीं है. वृहद सामाजिक हितों के आगे वह स्त्री-पुरुष की निजता को महत्त्व ही नहीं देता. वह व्यक्ति के अंतरंग काम-संबंधों को भी उनके राज्य के प्रति दायित्व का हिस्सा मानता है. वह लिखता है कि कोई भी दार्शनिक दर्शनशास्त्र का अध्ययन-मनन इसलिए नहीं करता कि उसके माध्यम से वह अपनी मुक्ति की कामना करना रखता है, न ही वह इस विषय को अपना जीवन इसलिए समर्पित करता है कि दुनिया को अपनी बौद्धिक क्षमताओं से चमत्कृत कर, ख्याति बटोर सके. उसके लिए शिक्षा का उद्देश्य राज्य की सेवा करना, समाज के निमित्त स्वयं को अधिकतम उपयोगी बनाना है.

यदि हम तुलनात्मक रूप से उस समय के भारतीय विचारकों, विशेषकर वैदिक साहित्य की बात करें तो पाते हैं कि वहां सारा जोर मोक्ष पर केंद्रित है. संसार को वहां माया और भ्रम माना गया है. इसलिए कुछेक को छोड़कर प्रायः सभी भारतीय विचारक इस ‘मायावी’ विश्व के मोहजाल से निकल भागने का उपाय सुझाते रहे हैं. मोक्ष की यह छटपटाहट व्यक्ति को कहीं न कहीं आत्मकेंद्रित और स्वार्थी भी बनाती है. भारतीय वांङमय में राज्य की सुरक्षा और उसकी देखभाल का दायित्व सम्राट का होता था, जिसको प्रायः युद्धकला और राजनीति की शिक्षा ही दी जाती थी. उसके असल मार्गदर्शक वे पुरोहित होते थे, जिनका काम यज्ञादि कर्मकांडों को संपन्न कराना तथा ऐसी व्यवस्था बनाए रखना था जो वर्ण-विभाजन की पोषक-समर्थक हो. रट्टा लगाकर ग्रंथों को कंठस्थ कर लेना उनके लिए विद्वता का पर्याय था. इससे तुलना की जाए तो प्लेटो ने शिक्षा को लेकर जो सुझाव दिए हैं, वे अधिक वैज्ञानिक एवं उपयोगी हैं. हालांकि सच यह भी है कि उसके काल्पनिक आदर्शराज्य में शिक्षा के समस्त अधिकार केवल समाज के अभिजात वर्ग तक सीमित थे. मजदूरों, लघु उद्यमियों और शिल्पकर्मियों को उसने केवल उतनी शिक्षा प्रदान करने का सुझाव दिया है, जितनी उनके व्यवसाय के लिए आवश्यक हो. जबकि दासों को उसके आदर्श नगर-राज्य में समस्त अधिकारों से वंचित रखा गया था. इन कमजोरियों के बावजूद प्लेटो के योगदान की अवहेलना कर पाना असंभव है. उसका मौलिक अवदान था—स्त्रियों को पुरुषों के समान शिक्षा का अधिकार देना. यद्यपि स्त्री-शिक्षा का वास्तविक उपयोग उसकी काल्पनिक नगर-रचना में संभव नहीं था, तथापि हमें ध्यान रखना चाहिए कि ये सुझाव प्लेटो ने उस समय दिए थे, जब पूरी दुनिया कबीलाई समुदायों में बंटी थी. उनके बीच मामूली-सी बात पर युद्ध छिड़ जाना एकदम सामान्य बात थी. ऐसे में एक आदर्श को लेकर समाज की व्यवस्थित परिकल्पना उसकी बौद्धिक विलक्षणता का ही पर्याय है. यही कारण है कि चौबीस शताब्दियां गुजर जाने के बाद भी प्लेटो आधुनिक विचारकों को प्रभावित करता है. व्यक्तिगत मान्यता चाहे जो हो, उसके विपुल साहित्यक भंडार में प्रत्येक विद्वान को प्रायः कुछ न कुछ मिल ही जाता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका

  1. ….if you ask what is the good of education in general, the answer is easy””that education makes good men, and that good men act nobly, and conquer their enemies in battle…-The Laws by Plato.

  2. The same education which makes a man a good guardian will make a woman a good guardian; for their original nature is the same.-REPUBLIC.

  3. ...for all wives and children were to be in common, to the intent that no one should ever know his own child, but they were to imagine that they were all one family; those who were within a suitable limit of age were to be brothers and sisters, those who were of an elder generation parents and grandparents, and those of a younger, children and grandchildren.- Plato in TIMAEUS, translated by Benjamin Jowett.

  4. …while spoiling of children makes their tempers fretful, peevish and easily upset by mere trifles, the contrary treatment, the severe and unqualified tyranny which makes its victims spiritless, servile, and sullen, renders them unfit for the intercourse of domestic and civic life.- LAWS.

  5. After the age of six years the time has arrived for the separation of the sexes, “”let boys live with boys, and girls in like manner with girls. Now they must begin to learn””the boys going to teachers of horsemanship and the use of the bow, the javelin, and sling, and the girls too, if they do not object, at any rate until they know how to manage these weapons, and especially how to handle heavy arms…LAWS.

  6. Plato recommended that all this study must be presented not in the form of compulsory instruction, because a free soul ought not to pursue any study slavishly’. Moreover, nothing that is learned under compulsion stays with the mind.’-Charles Hummel in his article PLATO, published in Prospects, vol. 22, no. 4, 1992.

  7. ....the dialectician as one who attains a conception of the essence of each thing? And he who does not possess and is therefore unable to impart this conception, in whatever degree he fails, may in that degree also be said to fail in intelligence?REPUBLIC.

  8. These disciplines lift the soul to the level of the immutable. Mathematics—arithmetic and geometry—liberate the mind from sensation, familiarize it with the world of pure thought and turn the soul towards the heights of the world of ideas. ‘Geometry is the knowledge of the eternally existent’ (Republic, 527b). It is through geometry that one learns how to manipulate concepts (Republic, 510–511). Astronomy initiates the soul to the order and immutable harmony of the cosmos. Harmony, a sister science of astronomy’s, focuses on the search for and knowledge of the laws of, and the order in, the world of sound.-Charles Hummel.

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Filed under प्लेटो के आदर्शराज्य की शिक्षानीति—दो

टीम अन्ना के नाम खुली चिट्ठी

प्रिय अन्ना जी,

आपसे मैंने चौबीस वसंत कम देखे हैं. फिर भी यदि मैंने आपको प्रिय संबोधन किया है, तो इसलिए कि आप मेरे उन अति प्रिय नायकों में से हैं, जिन्होंने इस छल-प्रपंच से भरी दुनिया में भी इंसानियत और नैतिकता को बचाए रखा है. आपके द्वारा रालेगणसिद्धि में किए गए कार्यों की भनक मेरे कानों तक डेढ़ दशक पहले ही पहुंच चुकी थी. उन दिनों मैं सहकारिता की वैचारिकी को समझने के प्रयत्न में था. सरकार मीडिया और पूंजीपतियों के साथ मिलकर नवउदारवाद के गीत गा रही थी. पूंजीवाद का सांड भारत की धरती पर छोटे-छोटे उद्यमियों, व्यापारियों, शिल्पकर्मियों को कुचलता हुआ आगे बढ़ रहा था. छोटे-छोटे धंधे तबाह हो रहे थे. मेहनत-मशक्कत द्वारा रोजी-रोटी कमाने वाले कामगारों का बुरा हाल था. टेलीविजन और समाचारपत्रों पर नवउदारवाद का रंग चढ़ा हुआ था. दोनों एक स्वर में स्पर्धा का गुणगान कर रहे थे. सहस्राब्दियों से सहयोग, सहअस्तित्व और सद्भाव में जीते आए भारतीयों को समझाया जा रहा था कि स्पर्धा से चीजें सस्ती होंगी, तरक्की के नए रास्ते खुलेंगे और जानलेवा महंगाई से मुक्ति मिलेगी. सोवियत संघ के पतन के पीछे वहां के नेताओं की निजी महत्त्वाकांक्षाएं, अदूरदर्शिता, लालच और अन्यान्य कमजोरियां थीं. लेकिन उसके पतन से लोगों ने समाजवाद को समय-बाह्यः विचारधारा मान लिया. अमेरिका को विकल्पहीन मान भारत जैसे देश उसकी आरती उतारने लगे थे. बिका हुआ मीडिया स्पर्धा के गुणगान में जुटा था. महानगरों की चमक-दमक से परे जो चंद अच्छे सहयोगाधारित प्रयास किए जा रहे थे, उन्हें जानने-समझने के लिए उसके पास न तो समय था न समझ. उस दौर में पांडुरंग आठवले, राजस्थान की ‘कुल्हड़ी’ संस्था की कर्मठ और दूरद्रष्टा महिलाओं तथा रालेगण सिद्धि में आपके सहयोगाधारित प्रयोगों के प्रति श्रद्धा मन में जगी, जो वर्षों तक बनी रही. इसलिए जब जनलोकपाल आंदोलन की हवा चली तो अंधेरे में लौ की किरण की तरह मैंने उस आंदोलन का मन ही मन स्वागत किया था. जब आपने ‘जनता सर्वोपरि’ कहा तो दिनकर की आपातकाल के दौरान लिखी वे पंक्तियां सहसा याद आने लगीं, जिनमें उन्होंने कहा था‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है.’ लेकिन बहुत जल्दी लगने लगा कि जिन लोगों के कंधों का सहारा लेकर आप उम्र के आठवें दशक में आंदोलन को बढ़ाना चाहते हैं, वे प्रदर्शन प्रिय, नाम-लिप्सा के मारे हुए लोग हैं. कैमरे और माइक की भूख उनमें आपसे कहीं अधिक है. ऐसे लोग तमाशा तो खड़ा कर सकते हैं, एक परिवर्तनकामी आंदोलन में रचनात्मक सहभागिता उनसे संभव नहीं है.

गांधी जी के बारे में आप मुझसे कहीं अधिक जानते हैं. उनका काम पहले दिखता था. वही जनता को अपनी ओर खींचता था. लेकिन आपकी टीम के सदस्य सबकुछ पलटने पर उतारू हैं. वे माइक पर अपना चेहरा दिखाने के लिए मचलते रहते हैं. भारतीय जनता इतनी समझदार तो है कि वह समझ ले कि माइक और कैमरों की ओर ललचाई दृष्टि से देखने वाले चेहरों में राजनीति की कितनी भूख है. राजनीतिक क्षेत्रों में पैठ बनाने का आपके सहयोगियों का उतावलनापन हरियाणा के चुनावों में कांग्रेस विरोध के माध्यम से नंगे सच की तरह सामने आया था. आप अच्छी तरह जानते हैं कि जनलोकपाल के समर्थन में घरों से निकले लोगों के मन में भ्रष्टाचार को लेकर आक्रोश था, जिससे कोई भी राजनीतिक दल बचा नहीं है. नेताओं के लिए राजनीति एक व्यापार है. सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के बीच वंशवाद को मौन सहमति मिल चुकी है. ऐसे में कोई नहीं कह सकता था कि केवल कांग्रेसी भ्रष्ट हैं और भाजपा, प्रकारांतर में आप जिसका समर्थन कर रहे थे, वह दूध के धुले नेताओं की पार्टी है. यह बात तो आपकी टीम के सदस्य भी नहीं मानते थे. इसलिए वे ‘किंतु-परंतु’ का सहारा लेते हैं. ‘देश में कांग्रेस पार्टी की सरकार है, इसलिए कांग्रेस को हराना है’—अरविंद केजरीवाल का यह तर्क बेतुका और तथ्यों से परे था. क्या वे नहीं जानते कि देश में कांग्रेस की न होकर ‘संयुक्त जनतांत्रिक मोर्चा’ की सरकार है. कांग्रेस के बहुमत के बावजूद यह संभव नहीं कि जब तक संजमो के बाकी दल न चाहें, अकेली सोनिया या कांग्रेस कोई बिल पास करा ही नहीं सकती. दूसरे लोकसभा में बिल पास होने से ही वह कानून नहीं बन जाएगा. इसके लिए उसको राज्यसभा से भी पास कराना जरूरी है. जहां कांग्रेस पार्टी अल्पमत में है. आपके चुनावी तीर का सामना कांग्रेस और संजमो के सहयोगी दलों ने चुनावी रणनीति से ही किया. उन्होंने लोकसभा में बिल पास करवा दिया. लेकिन राज्यसभा में, जहां भाजपा और उसके सहयोगी दलों का बहुमत है, उसके बड़े नेता मौन साधे रहे. वहां जिस तरह बहस चली, जनता समझ गई कि राजनीतिक दलों में से कोई भी लोकपाल अथवा जनलोकपाल जैसा बिल पास कराना नहीं चाहता. परिस्थितियों में आमूल परिवर्तन की जरूरत है, यह आप और आपके सहयोगी भी मानते हैं. इसके बावजूद उनके भाषण तथा रामलीला मैदान में किरन बेदी की नौटंकी से संदेश गया कि आप केवल कांग्रेस को हराने की राजनीति कर रहे हैं. यह भी कारगर होता यदि विपक्ष की जनता के बीच कुछ साख होती. संसद में विपक्ष की मान्यता प्राप्त भाजपा जनता के बीच पहले ही साख गंवा चुकी है, ऐसे में लोग आपके समर्थन में बार-बार घर से क्यों निकलते? खासकर उस मुंबई में जहां शिवसेना का प्रभाव हो और उसके नेता बाल ठाकरे खुलकर आपका विरोध करते आ रहे हों.

अन्ना जी, एक गांव का सुधार करने और देश को सुधारने में बड़ा अंतर होता है. भारत के गांवों का चेहरा-मोहरा आज भी सामंतवादी है. धर्म से साथ स्वार्थपूर्ण गठजोड़ कर वह समाज के बड़े वर्ग को सत्ता और संसाधनों से बेदखल कर देता है. शिखर पर गिने-चुने लोग बचे रह जाते हैं. जिन्हें उनके आपसी हित एक-दूसरे से जोड़े रखते हैं. वस्तुस्थिति से अनजान लोग इसी को विकास मान लेते हैं. देश में न केवल बहुरंगी सांस्कृतिक छटा है, बल्कि विभिन्न राजनीतिक दांवपेच, मान्यताएं और अनेक धार्मिक प्रपंच हैं. उनसे एक झटके में पार पाना संभव नहीं है. विशेषकर उस आंदोलन के जरिये जिसका स्वरूप ही प्रतिक्रियात्मक हो. जो दावा अराजनैतिक होने का करता हो, लेकिन आंदोलन का स्वरूप, भाषणबाजी, जनता को चेहरा दिखाने की ललक, आरोप-प्रत्यारोप ठीक वैसे ही हों, जैसे दूसरी राजनीतिक पार्टियों के हैं. जिसका कोई रचनात्मक कार्यक्रम न हो. ऐसी उखाड़-पछाड़ से कुछ दिनों के लिए गहमागहमी का माहौल जरूर बनाया जा सकता है, वास्तविक परिवर्तन जिसके लिए लंबे संघर्ष की आवश्यकता पड़ती है, इसके द्वारा सर्वथा असंभव है.

आमूल परिवर्तन के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता अनिवार्य है. साथ ही जरूरी है नेता और जनता के बीच प्रामाणिक संवादसेतु. निरंतर जनसंवाद द्वारा ही समर्पित और सत्यनिष्ठ कार्यकर्ताओं का समूह बनाया जा सकता है. यदि विचारधारा ठोस, आचरण निष्प्रह और नेतृत्व ईमानदार हो तो आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए अधिक व्यक्तियों की आवश्यकता नहीं पड़ती. कस्तूरी गंध की भांति उसका संदेश दूर तक जाता है और लोग उससे स्वतः जुड़ने लगते हैं. भीड़ को बहला-फुसलाकर चुनावों में ठप्पा तो लगवाया जा सकता है. मतदाता के पास बेहतर विकल्प न होने से यह काम आसान भी है. वास्तविक परिवर्तन के लिए लंबे समय और संयम की दरकार होती है. वहां केवल शिखर नेतृत्व के आचरण की पवित्रता, नैतिकता और दूरंदेशी ही लोगों को बांधे रख सकती है. नमक सत्याग्रह के लिए गांधीजी ने केवल 78 कार्यकर्ताओं को चुना था. यह उनका नैतिक आभामंडल था जो बिना किसी फेसबुकिया अभियान के डांडी यात्रा को देश-भर में व्यापक जनसमर्थन मिला था. 24 दिनों की 390 किलोमीटर की यात्रा पूरी करने के बाद वह यात्रा जब डांडी पर पहुंची तो वहां एक लाख से अधिक लोग जमा थे. साबरमती तट के अलावा भी देश में जगह-जगह नमक बनाया जा रहा था. लाखों सत्याग्रही आंदोलन के घरों से निकले हुए थे. औपनिवेशिक सरकार के दमन का विरोध करते हुए 80,000 से अधिक सत्याग्रही जेल जा चुके थे. वह आंदोलन नैतिकता के कंधों पर सवार होकर परवान चढ़ा था. कोई प्रतिक्रियात्मक सोच उसके पीछे नहीं था. देश को नमक सत्याग्रह के तुरंत बाद आजादी नहीं मिली थी. पूरे 17 वर्ष लगे थे. लेकिन उस आंदोलन ने इस देश के आम आदमी के भीतर राजनीति का एक जज्बा पैदा किया था. यह विश्वास उसके दिल में पैदा किया था कि लोग निडर हों तो दुनिया की बड़ी से बड़ी हुकूमत उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती. यह अवसर आपको भी मिला था, लेकिन आपके सहयोगियों की निजी महत्त्वाकांक्षा और उनपर लग रहे एक के बाद एक आरोपों से जनता का विश्वास इस आंदोलन से डिगा है. लोगों को यह आंदोलन एकसूत्री और सियासी चाल लगने लगा है. आप कह सकते हैं सरकार टीम अन्ना को बदनाम कर रही है. संभव है यह सच हो. लेकिन सत्ता चाहे देशी हो या विदेशी, उसका चरित्र अमूमन एक जैसा होता है. केवल चैतन्य जनसमाज द्वारा उसे नियंत्रित किया जा सकता है. जनता को जगाने, उसका विश्वास जीतने के लिए नेता को पहले उसके करीब आना पड़ता है. इसीलिए दूरदृष्टा गांधी सार्वजनिक जीवन में आने से पहले एक लंगोटी, घड़ी, लाठी और टोपी जैसे कुछ साधारण वस्तुओं को छोड़कर बाकी सब से नाता तोड़ चुके थे.

आप कहेंगे कि बार-बार गांधी को याद करना जरूरी क्यों? वह इसलिए कि आप अपने आंदोलन में गांधीजी के ‘औजार’ सत्याग्रह का इस्तेमाल कर रहे हैं. आप यह भी भली-भांति जानते हैं कि गांधी के रास्ते पर चलना साध्य और साधन की समानता के बगैर संभव ही नहीं हैं. वे जब तक दक्षिण अफ्रीका में रहे, तभी तक बेरिस्टर रहे. भारत आने के साथ ही उनका कायाकल्प हो चुका था. बेरिस्टर गांधी लंगोटीछाप बन चुका था. उन्हें मालूम था कि लोगों का विश्वास जीतने के लिए पारदर्शिता आवश्यक है. ईमानदार होना नहीं, दिखना भी चाहिए. न केवल नेता को, बल्कि उसके आसपास जुटे कार्यकर्ताओं को भी. उनके नैतिक आभामंडल ने विनोबा जैसे अनुयायी पैदा किए थे, जिनमें गांधीवाद गांधीजी के अपने आचार-व्यवहार से भी ज्यादा दमदार था. गांधीजी का आंदोलन ऐसे ही समर्पित कार्यकर्ताओं के कंधों पर टिका था. गांधीजी स्वयं खास अवसर पर ही नेतृत्व की जिम्मेदारी ओटते थे. आपकी टीम में कोई ऐसा नहीं है, जिसके कंधों पर किसी आंदोलन की जिम्मेदारी डाली जा सके. न किसी में इतना आत्मविश्वास है कि आपके प्रतिनिधि के रूप में स्वतंत्र आंदोलन की बागडोर संभाल सके. इसलिए वे हर जगह, हर बार आपको अनशन और आंदोलन के बहाने आगे ले आते हैं. एक मुखैटे की भांति वे आपका इस्तेमाल कर रहे हैं. आप सत्तर पार कर चुके हैं. शतायु हों यह कामना भी है. लेकिन आमूल बदलाव के लिए लंबे आंदोलन की दरकार होती है. आपकी उम्र और सेहत को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि आप लंबे समय तक किसी रचनात्मक आंदोलन में सक्रिय भागीदारी कर सकते हैं. कहीं ऐसा न हो आपके बाद टीम अन्ना की हालत भी बिना सोनिया की कांग्रेस या बिना अटलविहारी वाजपेयी के भाजपा जैसी बनकर रह जाए.

आप जो आंदोलन लेकर चले हैं उसकी सफलता के लिए ठोस वैकल्पिक विचारधारा का होना जरूरी है. यह काम गांधी के रास्ते चलकर भी हो सकता है. बशर्ते उसमें ‘टीम अन्ना’ के सभी सदस्यों की संपूर्ण आस्था हो. साथ में अपने बूते आंदोलन को आगे बढ़ाने का जज्बा. यदि अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण, किरन बेदी में ‘गांधीवाद’ के प्रति सच्ची आस्था का अभाव है? यदि उनमें अपेक्षित आत्मविश्वास गायब है? यदि वे मंच पर अपरिग्रही और निष्प्रह दिखना चाहें और पीछे अपने-अपने संगठन के जरिये करोड़ों का अनुदान पचाएं, तो वे आपके सच्चे साथी हो ही नहीं सकते. जनता नारों की हकीकत को जानती है. वह समझती है कि ‘अन्ना’ के नाम का जयकारा लगाने वालों के दिल में नाम और नामे दोनों की भूख है. इसलिए वे बारी-बारी से माइक झटककर मंच पर आते हैं. हर कोई हाथ लहरा-लहराकर जनता को अपना चेहरा दिखाना चाहता है. फिर बिना किसी ठोस रणनीति, वैकल्पिक राजनीतिक दर्शन या वर्तमान संसदीय लोकतंत्र में सुधार हेतु ठोस सुझावों के, सिर्फ एक जिद के लिए साल में तीन-तीन अनशन! हमारे घरों में औरतें साल में साठ-सत्तर व्रत रख लेती हैं. वे अच्छा करती हैं या बुरा, उसपर विचार करना इस लेख का विषय नहीं है. लेकिन रोज-रोज उपवास करने पर वे घर के सदस्यों तक का ध्यान अपनी ओर आकर्षित नहीं करा पातीं.

आप गांधीजी के अनुयायी हैं. आपको उनके बारे में बताने की जरूरत नहीं. गांधीजी कभी इकहरे आंदोलन पर विश्वास नहीं करते थे. उनकी अहिंसक लड़ाई एक से अधिक मोर्चों पर लगातार जारी रहती थी. उनके पास समर्पित कार्यकर्ताओं और नेताओं की पूरी टीम थी. प्रत्येक आंदोलन उनके द्वारा नामित सत्याग्रही हिस्सा लेते थे. विनोबा भावे, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल, आचार्य कृपलानी, कस्तूरबा गांधी, सरोजिनी नायडू, अबुल कलाम आजाद, हरिलाल गांधी जैसे अनेक नेता गांधीजी के साथ थे. सभी का स्वतंत्र व्यक्तित्व और नैतिक आभामंडल था. दुर्भाग्य की बात है कि आपकी टीम में जितने भी सदस्य हैं, एक आपको छोड़कर किसी की जनता के बीच नैतिक छवि नहीं है. सबके दामन पर दाग लगे हैं. आंदोलन से बाहर वे सभी जुगाडू़ किस्म के लोग हैं. ऐसे में जनता उनपर विश्वास करे भी तो कैसे? ‘मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना’ का नारा लगाने हर कोई अन्ना नहीं बन जाता. न मंच की पृष्ठभूमि पर महात्मा गांधी की तस्वीर लगा देने से किसी में गांधीजी की आत्मा उतर आती है. दुनिया में ‘गांधी’ एक विचारधारा एक आंदोलन पद्धति का पर्याय बन चुका है. उनके रास्ते पर चलना बिना उनके जैसा बने संभव नहीं है.

भारतीय लोकतंत्र की आज जो अवस्था है वह अनायास नहीं है. न ऐसा है जिसके बारे में कभी सोचा न गया हो. भारत में लोकतंत्र के नाम पर बनी विभिन्न संस्थाओं की आज जो दुर्दशा है वह अकल्पित भी नहीं है. लोकतंत्र की विसंगतियों के बारे में प्लेटो ने खुलकर लिखा है. 2400 वर्ष पहले लिखे गए उसके ग्रंथ ‘रिपब्लिक’ में लोकतंत्र की विस्तृत समीक्षा को देखा जा सकता है. यह आपको तय करना है कि जो परिवर्तन आप चाहते हैं, क्या वे संसदीय लोकतंत्र की वर्तमान व्यवस्था में संभव हैं? यदि ‘हां’ तो उसके लिए कौन-से कार्यक्रम जरूरी हैं और कैसे उन कार्यक्रमों पर चरणबद्ध तरीके से अमल किया जाए? यदि वांछित परिवर्तन संसदीय लोकतंत्र द्वारा संभव नहीं है तो भावी लोकतंत्र अथवा नए राजनीतिक दर्शन का स्वरूप क्या हो? उल्लेखनीय है कि लोकतंत्र उन्हीं देशों में बचा हुआ है जो किसी न किसी प्रकार पूंजीवाद को समर्पित हैं. इसलिए पूंजीवाद का विरोध कर रहे देश लोकतंत्र के वैसे समर्थक भी नहीं है. समस्या यह भी है कि पूंजीवाद का विकल्प कही जाने वाली समाजवाद और साम्यवाद जैसी विचारधाराओं का वैश्विक प्रभाव सिकुड़ रहा है. बीसवीं शताब्दी में मार्क्सवाद के विकल्प के रूप में श्रमिक संघवाद, अराजकतावाद, समष्ठिवाद और सहजीवितावाद जैसे नए राजनीतिक दर्शन आए हैं, लेकिन उनको आजमाया जाना बाकी है. मार्क्सवाद से प्रेरित-प्रभावित हैं ये सभी विचारधाराएं उसकी अपनी-अपनी तरह से अधुनातन व्याख्या करती है. जहां तक भारत की बात है, धर्म, जाति, सांप्रदायिकता के आधार पर बुरी तरह विभाजित समाज में इन विचारधाराओं के आधार पर परिवर्तन असंभव है. फिलहाल जो सबसे जरूरी है वह है आम जनता को लोकतंत्र और उसके विकल्पों से परचाना. उसको परिवर्तन के लिए मानसिक-शारीरिक रूप से तैयार करना, जो केवल नैतिक धरातल पर खड़े नायक द्वारा संभव हो सकता है. ऐसा नायक जो निजी नैतिकता के सम्मोहन से आगे बढ़ते हुए पूरे समाज में उसकी स्थापना करना चाहता हो. यह एक लंबा काम है, पर आमूल परिवर्तन के लिए विकल्पहीन भी है.

आधुनिक राजनीतिक दर्शन की सबसे बड़ी समस्या व्यक्तिहित तथा समाजहित में तालमेल बनाने की है. बदले हुए समय में व्यक्ति की राय और उसकी आकांक्षाओं की अवहेलना कर पाना संभव नहीं रह गया है. न ही शासक दल के लिए यह संभव है कि जनमत की उपेक्षा करते हुए वह मनमाना आचरण करे. इसलिए बदलाव अपरिहार्य हैं. लोगों के दिलों में यह विश्वास पैदा कराना जरूरी है कि यह कोरी राजनीति नहीं, वास्तविक परिवर्तन की लड़ाई है. महोदय, मुंबई में अपेक्षाकृत कम जनसमर्थन मिलने पर निराश होने की आवश्यकता नहीं है. हर आंदोलन की राह में ऐसे दौर आते हैं. परिवर्तन की लड़ाई किसी एक दिन में नहीं जीती जा सकती. सुनिश्चित जीत के लिए बार-बार चाल अदल-बदल कर प्रयास करने पड़ते हैं. इसलिए जरूरी है कि परिवर्तन का पहले खाका बनाया जाए. फिर ऐसे लोगों को आंदोलन से जोड़ा जाए जिनका कोई नैतिक आभामंडल हो. इसके अभाव में लोगों की भीड़ तो जुटाई जा सकती है, समर्पित और प्रतिबद्ध कार्यकर्ता पैदा नहीं होते. लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए एक मुखपत्र भी जरूरी है. फेसबुक आदि को त्वरित संदेश का माध्यम बनाया जा सकता है, सामान्य स्थिति में उनके माध्यम से सरकार पर दबाव भी बनाया जा सकता है. वैकल्पिक समाज की संरचना के लिए ठोस कार्यनीति और राजनीतिक दर्शन की पीठिका तैयार कर पाना उनसे सर्वथा असंभव है. यह अच्छा है कि आपने असफलता के कारणों की पड़ताल शुरू कर दी है. ‘टीम अन्ना’ को चूक का एहसास होना परिवर्तनकामियों को संतोष प्रदान कर सकता है. भविष्य के कार्यक्रम ऐसे हों जो जनता को उसकी उसकी ताकत और अधिकारों से परचाने के साथ-साथ लोगों को संकल्पनिष्ठ एवं कर्तव्यनिष्ठ बनने की प्रेरणा भी देते हों.

©ओमप्रकाश कश्यप

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2011 in review

The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2011 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

A New York City subway train holds 1,200 people. This blog was viewed about 7,300 times in 2011. If it were a NYC subway train, it would take about 6 trips to carry that many people.

Click here to see the complete report.

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हिंदी व्यंग्य की अवसान बेला

मैं यह मान लेता हूं कि साहित्यिक विधाएं कभी मरती नहीं. वे अपने पाठकों, लेखकों, आलोचकों, समीक्षकों और प्रशंसकों के बीच सदैव जीवंत बनी रहती हैं. यूं भी साहित्य को अक्षयवट कहा जाता है. सदाबहार, उसकी शाखाओं के विस्तार का सिलसिला कभी थमता नहीं. भू-स्पर्श के साथ ही वे नया रूप ले लेती हैं. जीवन की तरह उतार-चढ़ाव के दौर साहित्य में भी आते हैं. कभी कोई विधा विकास की तेज रफ्तार पकड़ लेती है, कभी ठहराव की शिकार हो जाती है. विधाएं जब-तब स्थानापन्न भी होती रहती हैं. जैसे कहानी पहले लोककथा के रूप में घर, चौपाल, गली, नुक्कड़, अलाव के आसपास कही-सुनी जाती थी, फिर वह किताबों में सिमटने लगी. एक समय किस्सागो का समाज में सम्मानजनक स्थान था. उनके नाम पर गली-मुहल्लों के नाम रखे जाते थे. वक्त के साथ पहले उनका मान-सम्मान गया, फिर पेशा. कहानी दादा-दादी, नाना-नानी के माध्यम से नौनिहालों का मनोरंजन करने लगी. इस लंबे अंतराल में प्रस्तुतिकरण का रूप बदला था, उद्देश्य नहीं. लोकसाहित्य की उपयोगिता भी समय के साथ निरंतर परवान चढ़ती गई. लेकिन भागम-भाग के इस युग में आज वह परंपरा दम तोड़ रही है, चौपालों पर घंटों तक अपनी किस्सागोई का जलवा बिखेरने वाले किस्सागो अब कहीं नजर नहीं आते, किंतु पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं, टेलीविजन, इंटरनेट आदि पर कहानी साहित्य की प्रमुख विधा के रूप में अपना सम्मान बनाए है. चार-साढ़ चार सौ वर्ष पहले तक चौपाई नामक छंद पद्य साहित्य की जान हुआ करता था. तुलसी ने ‘मानस और जायसी ने ‘पदमावत’ इसी छंद में रचा था. अतुकांत कविता के दौर में चौपाई, सवैया जैसे छंदों का प्रयोग घटा है. इधर छंदबद्ध कविता पर ही संकट-सा है. हालांकि लोकमानस में उद्धरणों, किवदंतियों के रूप में उनकी पैठ आज भी पहले जितनी ही है. अतः इस लेख के शीर्षक को लेकर व्यंग्य के प्रति यदि अवसादजन्य विचार उमड़ते हैं, तो उनको लेकर बहुत चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है. न इसके द्वारा चौंकाने का मेरा कोई इरादा है. इस सब के बावजूद इस शीर्षक का चयन अन्यथा नहीं है. बल्कि काफी सोच-विचार के उपरांत तय किया गया है. कुछ वर्षों से व्यंग्य को लेकर जो विचार मेरे मन में उठते रहे हैं, मैं कोशिश करूंगा कि उन्हें इस लेख के माध्यम से आपके समक्ष प्रस्तुत कर सकूं.

अपनी संपूर्ण आशावाद और सकारात्मकबोध के बावजूद मैं कहना चाहूंगा कि हिंदी व्यंग्य के लिए यह सबसे बुरा दौर है. ऐसे समय में जब हमारे समक्ष अनगिनत चुनौतियां हैं, जिस दौर में व्यंग्यकारों के नश्तर को और अधिक नुकीला और प्रहारक होना चाहिए, वे लगभग दिशाहीन और निस्तेज अवस्था में हैं. प्रतिकूल परिस्थितियों तथा उनके लिए जिम्मेदार कारकों को पहचान कर, उन पर व्यंग्य लिखने, जीवन समर में आगे बढ़कर चुनौतियों के साथ खेल खेलने तथा इसके लिए दूसरों को प्रेरित करने का सामर्थ्य वे खोते जा रहे हैं. व्यंग्य को लेकर होने वाली गोष्ठियों, सभाओं की संख्या निरंतर घट रही है. अखबारों में उसे लघुकथा जितना स्पेस दिया जाता है. पांच-छह सौ शब्दों से अधिक शब्दों की व्यंग्य-रचना इधर समाचारपत्रों में दिखाई नहीं देती. पत्रिकाएं 1000-1500 शब्दों से बड़ी रचना से बचती हैं. हालांकि आज भी दर्जन-भर व्यंग्य को समर्पित पत्रिकाएं देशभर में प्रकाशित होती हैं. बाकी भी व्यंग्य को किसी न किसी रूप में प्रकाशित करती ही हैं. पुस्तक रूप में हर वर्ष पचासियों व्यंग्य-कृतियां सामने आती हैं. मगर मुझे याद नहीं आता कि पिछले पांच-छह वर्षों में किसी व्यंग्य कृति ने हिंदी-समाज में व्यापक चर्चा बटोरी हो, पाठकों और समीक्षकों का मन समानरूप से मोहा हो. प्रायोजित विमर्श को छोड़ दिया जाए तो पुस्तकें आती हैं और गुमनामी में खो जाती हैं. साहित्य की दूसरी विधाओं के साथ भी कमोबेश यही स्थिति है, मगर व्यंग्य मुझे सर्वाधिक उपेक्षित लगता है. खासकर तब जब व्यंग्य का पाठकवर्ग विशाल हो. हर वर्ग, हर उम्र का पाठक उसको पसंद करता हो. हिंदी व्यंग्य के स्वर्णिम दौर जब हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, रवींद्रनाथ त्यागी जैसे दिग्गज व्यंग्यकार थे, की वापसी की आहट तक नहीं है. ज्ञान चतुर्वेदी से उम्मीद थी. मगर उनकी कलम की धार कभी की भौंथरी हो चुकी है. वे कॉलमजीवी बनकर रह गए हैं. वर्षों पहले ‘इंडिया टुडे’ की साहित्य वार्षिकी में प्रकाशित एक व्यंग्य रचना जिसमें उन्होंने मुर्गा के बहाने समाज और राजनीति पर व्यंग्य कसा था, के अलावा उनकी कोई और यादगार रचना मेरी नजर से नहीं गुजरी. हिंदी व्यंग्य के हरावल दस्ते के लेखकों को यह सुनकर शायद बुरा लगे, मगर मुझे कहने में किंचित संदेह नहीं है कि यह हिंदी व्यंग्य की अवसान बेला है. व्यंग्य का पाठक-प्रशंसक होने के नाते मैं चाहूंगा कि इसके वर्तमान परिदृश्य को लेकर उनके मन में यदि कुछ खुशफहमियां हैं, तो वे खरी साबित हों.

व्यंग्य को छोड़कर शायद ही किसी और विधा में सृजनधर्मियों को पहले और दूसरे नंबर पर रखने का चलन हो, लेकिन व्यंग्य लेखन में यह काम न केवल पूरी ठसक के साथ किया जाता है, बल्कि इसको समीक्षकों की मान्यता भी प्राप्त है. तदनुसार इस विधा में पहला और दूसरा स्थान हरिशंकर परसाई और शरद जोशी के लिए सुरक्षित है. तीसरे-चौथे की मारा-मारी में श्रीलाल शुक्ल और रवींद्रनाथ त्यागी आ जाते हैं. प्रथम चार में पहले दो लेखन को समर्पित फ्रीलांसर थे तो बाकी दो सरकार के वरिष्ठ ओहदेदार. पांचवे-छठे के लिए लंबी कतार है. रवींद्रनाथ त्यागी पांचवा स्थान लतीफ घोंघी को देते हैं. स्तरीकरण की इस परंपरा को व्यंग्यकारों और व्यंग्य-समीक्षकों के लिए छोड़ मैं कहना चाहूंगा कि व्यंग्य की जो मारक क्षमता परसाई और जोशी की रचनाओं में है, बाकी किसी व्यंग्यकार के पास न तो वैसी क्षमता है, न दृष्टि. परसाई अपनी देशज शैली में मारक हैं तो शरद के पास व्यंग्यात्मक स्थितियों को पकड़ने की सूक्ष्म दृष्टि है. दोनों की ताकत निर्भीक प्रस्तुति में है. रवींद्रनाथ त्यागी अपनी नौकरी की सीमाओं के चलते सीधा प्रहार करने से कतराते रहे. सरलीकरण के लिए उन्होंने हास्य-मिश्रित व्यंग्य की शरण ली. इसके बावजूद जब वे अपनी रंगत में हों तो लाजवाब हैं. श्रीलाल शुक्ल ‘रागदरबारी’ में सिमटे हैं. उससे बाहर उनका व्यंग्यकार करवट तक नहीं लेता. साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए इस उपन्यास की राही मासूम रजा के ‘आधा गांव’ से स्पर्धा थी. उस समय शुक्ल जी का अधिकारी होना काम आया. इस उपन्यास के कारण ही शुक्ल जी को हिंदी के शीर्षस्थ व्यंग्यकारों में पहचान मिली. शंकर पुणतांबेकर और लतीफ घोंघी ने लिखा खूब, परंतु उनके पास विट की कमी थी. साथ में विषय की सीमाएं भी.

परसाई और जोशी की शैली में भी मूलभूत अंतर था. परसाई की पारसाई लोकतत्व को साथ लेकर चलती है. वही उनकी रचनाओं को अधिक संप्रेषणीय और ग्राह्यः बनाकर उनमें सहज किस्सागोई भर देता है. उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता रचना की प्रहार क्षमता को बढ़ाती है, उसे स्वाभाविक विस्तार देती है. अतीत और वर्तमान दोनों के प्रति विवेकसम्मत आलोचनादृष्टि, जो शरद जोशी में उनसे कम और बाकी रचनाकारों जिन्हें उन दोनों से निचले क्रम में दिखाया जाता है, अत्यल्प है. परसाई स्थितियों पर चोट करते हैं. उनका व्यंग्य विसंगतियों से अपने आप उभरता है. इस कारण वह अधिक प्रभावी है. वे धर्म के नाम पर पाखंड रचने वालों की खबर लेते हैं तो माक्र्सवादियों की छद्म क्रांतिकारिता भी उनकी वक्रोक्तियों से बच नहीं पाती. ‘रानी नागफनी की कहानी’ के माध्यम से वे सामंतवाद पर निशाना साधते हैं. ‘भोलाराम का जीव’ तथा ‘वैष्णव की फिसलन’ में उनके सामने धार्मिक पाखंड और रूढ़ियां होती हैं. भारतीय समाज के चरित्र निर्माण में चूंकि धर्म की भूमिका बहुत व्यापक और बहुआयामी है. उसमें लंबे समय से अनेक कुरीतियां, भ्रांतियां और आडंबर जड़ जमाए हुए हैं. परसाई उनके सामने झुकते नहीं. रूढ़ियों और पाखंडों पर लिखते समय उनकी कलम और भी नुकीली हो जाती है. वहां वे सीधे व्यवस्था पर प्रहार करते हैं. विट तो शरद जोशी के पास भी खूब था. ‘अतृप्त आत्माओं की रेलयात्रा’ में उन्होंने धार्मिक पाखंड को तार-तार किया है. धर्म के नाम पर दिखावा करने वाले साधुओं की खबर ली है. परसाई के पास ऐसी रचनाओं का खजाना है. शरद जोशी अपनी लेखन ऊर्जा का उपयोग राजनीति की पैमाइश में अधिक करते हैं, उनका लगभग सत्तर प्रतिशत साहित्य राजनीति को लक्षित है. लेकिन दलीय राजनीति के प्रति तटस्थता के अभाव में वे सत्ता-विरोध का वैसा रूपक नहीं रच पाते जो परसाई अपनी लोकशाही की रौ में सहज ले आते थे. परसाई की रचनाओं में ऊंचे वर्ग का अनाचार है. ‘जीप पर सवार इल्लियां’ में शरद जोशी भ्रष्टाचार के मुद्दों पर अपनी जमीनी पकड़ का प्रमाण देते हैं, जिससे उनका व्यंग्य कुछ-कुछ इलीट बन जाता है. इसके बावजूद अपनी देहाती कड़क में परसाई उनपर सवाये पड़ते हैं. एक सामान्य पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी परसाई के व्यंग्य को समझ सकता है, जबकि अन्य व्यंग्यकारों की थाह को पाने के लिए दिमागी कसरत करनी पड़ सकती है.

परसाई और शरद जोशी दोनों ने ही कलम को अपनी आजीविका का माध्यम बनाया था. दोनों का लेखन जिन दिनों परवान चढ़ रहा था, समाज में स्वप्नभंग की अवस्था में था. देश उन सपनों का हश्र देख रहा था, जो स्वाधीनता संग्राम के दौरान नेताओं द्वारा दिखाए गए थे. उनमें नेहरू का पंचशील का नारा भी था, जो चीन से मिली बुरी शिकस्त के बाद तार-तार हो चुका था. देश की जनता सकते जैसी हालत में थी. परसाई देख रहे थे कि दोष अकेले नेताओं का ही नहीं है, उन लोगों का भी है जो उन्हें चुनकर अपना भविष्य संवारने की जिम्मेदारी के साथ संसद में भेजते हैं, लेकिन मतदान के समय उम्मीदवार के चरित्र के बजाय उसकी जाति, धर्म या सामाजिक हैसियत के अनुसार निर्णय लेते हैं. उन लोगों में वे भी थे जो विभाजन के दौरान एक-दूसरे के खून के प्यासे हो उठे थे. दोष उन पुजारियों, मौलवियों, तांत्रिकों और पादरियों का भी है जो स्वार्थ के लिए धर्म के नाम पर पाखंड रचते तथा लोगों को बरगलाते तथा प्रकारांतर में उनका भावनात्मक, आर्थिक, सामाजिक शोषण करते हैं. वे जानते थे कि धर्म और जाति जैसी संस्थाओं की सदाशयता को लेकर चाहे जो दावे किए जाएं, अपनी मूल संरचना में हर धर्म सामंतवाद का पोषण करता है. जातीय विभाजन उसको मजबूती प्रदान करता है. धर्म का पहला हमला व्यक्ति के विवेक और सहिष्णुता पर होता है. परिणामस्वरूप वह अपनी दुर्दशा के कारणों की पहचान पराभौतिक, असांसारिक शक्तियों के रूप में करने लगता है, जिससे दुरवस्था की वास्तविक जिम्मेदार शक्तियों को मनमानी करते रहने का अवसर मिल जाता है. निहित स्वार्थ के लिए सामंत और पूंजीपति धार्मिक पाखंड को संरक्षण प्रदान करते हैं. व्यक्तिमात्र का विवेकीकरण न बाजार चाहता है, न राजनीतिज्ञ और न पूंजीपति. बाजार को उपभोक्ता चाहिए, राजनीतिज्ञों को मतदाताऐसे जो कभी कोई तर्क न करें. कठपुतली की तरह इशारों पर नांचें. धर्म आदमी का ध्यान जीवन समस्याओं और उसके कारकों से हटाकर वायवी दुनिया की ओर ले जाता है और शोषण के सहायक, उत्पीड़क और संरक्षक की भूमिकाएं एक साथ निभाता है. इस समझ के साथ परसाई ने धर्म और राजनीति दोनों को अपनी आलोचना के दायरे में रखा और व्यंग्य के सिद्ध कलमकार बने.

नवभारत टाइम्स’ में ‘प्रतिदिन’ लिखने से पहले जोशी ‘नई दुनिया’ के लिए कॉलम लिखा करते थे. वे तब भी व्यंग्य के मुखर हस्ताक्षर थे. ‘प्रतिदिन’ लिखने के दौरान हिंदी के बड़े पाठक समूह से उनका साबका पड़ा. उन दिनों भारतीय जनता राजनीति का खेल देखकर हैरान थी. आपातकाल थोपने के लिए इंदिरा गांधी को सजा देने वाली जनता, ‘जनता पार्टी’ के नेताओं की उच्छ्रंखलता और आपसी खींचतान से उकता चुकी थी. विकल्प के अभाव में उसने पुनः इंदिरा गांधी को सत्ता सौंपी थी. फिर एक ऐतिहासिक घटनाक्रम के दौरान इंदिरा गांधी की हत्या, सहानुभूति की लहर के चलते राजीव गांधी की ताजपोशी को भी उसने देखा था. ‘जनता पार्टी’ के प्रयोग के रूप में असफल हो चुकी दक्षिणपंथी शक्तियां इस बार विश्वनाथ प्रताप सिंह के पीछे लामबंद थीं, जो पूरे देश में राजीव गांधी की राजनीतिक अपरिपक्वता और उनके शासन में पल रहे भ्रष्टाचार के विरुद्ध अलख जगाने में लगे थे. शरद जोशी विश्वनाथ प्रताप सिंह के व्यक्तित्व से सम्मोहित थे. उन्होंने राजीव गांधी की राजनीतिक अपरिपक्वता से उत्पन्न स्थितियों तथा बाद में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के विरुद्ध रचे जा रहे कांग्रेसी-गैरकांग्रेसियों के षड्यंत्र पर तीखे प्रहार किए. ‘प्रतिदिन’ की लोकप्रियता के साथ ‘नवभारत टाइम्स’ और शरद जोशी का नाम भी लोगों की जुबान पर छाने लगा. कहा जा सकता है कि शरद जोशी में राजनीतिक परिपक्वता थी. बारीक अन्वीक्षण की क्षमता थी उनमें. इसलिए उनके कॉलम व्यंग्य के साथ-साथ राजनीतिक विश्लेषण का भी आनंद देते थे. ‘प्रतिदिन’ की लोकप्रियता का कारण भी यही था, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा कांगे्रस विरोध और प्रकारांतर में राजीव गांधी के विरोध तक सीमित था. एक अच्छा साहित्यकार सत्ता के प्रतिपक्ष में रहता है. परसाई सदैव प्रतिपक्ष को साधते रहे. दल विशेष का समर्थन-विरोध शरद जोशी को स्थितियों के बारीक अन्वीक्षण-विश्लेषण का अवसर तो देता है, लेकिन उनकी सीमाओं को संकुचित भी करता है. इसलिए परसाई की पारसाई जोशी के ‘नावक के तीर’ पर सवाई पड़ती है. परसाई और जोशी के अलावा भी अनेक व्यंग्यकारों ने समाचारपत्रों में नियमित कॉलम लेखन किया, लेकिन प्रतिबद्ध दृष्टि के अभाव में वे अपेक्षित सफलता पाने में नाकाम रहे. इस कमी को कुछ व्यंग्यकारों ने ‘हास्य-व्यंग्य’ लिखकर पाटने की कोशिश की, जिसका खामियाजा अंततः व्यंग्य-विधा को उठाना पड़ा.

कॉलम लेखन’ ने हिंदी व्यंग्य को लोकप्रिय बनाया. उसको ढेर सारे पाठक भी दिए. लेकिन एक गंभीर मानी जाने वाली विधा का लोकप्रियता की डगर पर चल पड़ना, अंततः उसी के लिए हानिकर सिद्ध हुआ. ‘नई दुनिया’ और ‘नवभारत टाइम्स’ की देखा-देखी लगभग सभी समाचारपत्रों ने व्यंग्य के लिए कॉलम तय कर दिए. व्यंग्यकारों के लिए अभिव्यक्ति के रास्ते खुलते गए. उसने व्यंग्यकारों की बड़ी पौध तैयार की, लेकिन समाचारपत्रों को व्यंग्य के बजाय बाजार से मोह था. इसलिए उन्हें उतने ही लंबे व्यंग्य की दरकार थी, जिसको पाठक खड़े-खड़े बांच सके. उनके लिए व्यंग्य-रचना का महत्त्व दावत में चटनी या अचार जितना था. हिंदी व्यंग्यकार उसी को अपना लक्ष्य मानकर अपनी ऊर्जा खपाने लगे. परिणाम यह हुआ कि कॉलम की सीमा-रेखा से बाहर की रचनाएं लिखना, समाचारपत्र-पत्रिकाओं की शब्द सीमा को लांघकर अपने और पाठकों के मनोनुकूल लेखन करनाहिंदी व्यंग्यकारों के लिए मुश्किल होता गया. छपास-मोह से ग्रस्त लेखक भूल गए कि मीडिया के लिए व्यंग्य केवल एक ‘उत्पाद’ है, जिसके द्वारा वह अपने कुछ नए उपभोक्ता बना सकता है. उसको व्यंग्य की मारक क्षमता, उसकी उद्देश्यपरकता से कुछ लेना-देना नहीं है. बाजार सदैव उन वस्तुओं पर ध्यान केंद्रित रखता है, जो उसके काम की हों. उन कार्यों को बढ़ावा देता है जो उसकी स्वार्थ-सिद्धि के आड़े न आते हों. जो भी वस्तु अथवा विचार उसकी सुखसत्ता को चुनौती देने का प्रयास करता है, उसके चारों ओर वह इतना महीन और मारक जाल बिछाता है कि अच्छे से अच्छे विद्वान, अर्थशास्त्री और समाजविज्ञानी धोखा खा जाते हैं. समाचारपत्रों द्वारा व्यंग्य-कॉलमों को प्रमुखता देना उनका अपना स्वार्थ था. सर्कुलेशन’ की स्पर्धा के बीच किसी भी तरह बाजार से अधिकाधिक पाठक बटोर लेना. जैसे-जैसे समाचारपत्र-पत्रिकाओं का ‘ब्रांड’ सफल होने लगा, उन्होंने व्यंग्य के प्रति उपेक्षा दर्शाना आरंभ कर दिया. व्यंग्य-कालमों के प्रबंधन की जिम्मेदारी ऐसे कर्मचारियों को सौंपी जाने लगी जिन्हें न तो व्यंग्य की समझ थी, न उनमें साहित्यिक रचनात्मकता ही थी. परिणामस्वरूप व्यंग्य का॓लमों की रचनाओं का स्तर गिरने लगा. इसका प्रतिकूल प्रभाव उसकी लोकप्रियता पर भी पड़ा. ऊपर से बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में पूंजीवाद ने जैसे-जैसे अपना प्रभाव जमाना आरंभ किया, नकार और आलोचना को ‘अनुत्पादकता’ एवं ‘अनुशासनहीनता’ का पर्याय माना जाने लगा. पूंजीवाद प्रेरित ‘सकारात्मक सोच’ के प्रति सम्मोहन ऐसा बढ़ा कि असहमति को भी नकार का प्रतीक बन गई. ‘बी पा॓जिटिव’ विकास और प्रबंधनकला का मूलमंत्र मान लिया गया. परिणामस्वरूप व्यंग्य जो ‘नकार’ के रास्ते ‘निर्माण’ को समर्पित होता है उपेक्षित होने लगा. व्यंग्य-कॉलमों के आकर सिकुड़ने लगे. शरद जोशी के जमाने में जो कॉलम सात-आठ सौ शब्दों की जगह लेता था, वह डेढ़-दो सौ शब्दों पर सिमट गया. इससे गंभीर व्यंग्यकारों का कॉलम लेखन से मोहभंग होना ही था. यहां उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि व्यंग्य कॉलम शरद और परसाई से पहले से ही लिखे जा रहे थे. गोपाल प्रसाद व्यास ‘दैनिक हिंदुस्तान’ में अर्से से ‘नारद जी खबर लाए हैं’ लिखते आ रहे थे. लेकिन व्यास जी हास्य कवि थे. उनके लेखन में विट का अभाव था. दूसरे उनका अतीत के प्रति अतिरेकी सम्मोहन भी गंभीर व्यंग्यकार बनने की सबसे बड़ी बाधा था.

व्यंग्य की अवसानोन्मुखी अवस्था तक पहुंचाने के लिए राजनीतिक परिवर्तनों का योगदान भी कम न था. शरद जोशी के लेखन का इतना प्रभाव रहा कि व्यंग्य मुख्यतः राजनीति और भ्रष्टाचार तक सिमट गया. चूंकि अधिकांश व्यंग्यकार नौकरीपेशा मध्यवर्ग से थे, इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि व्यंग्यकारों ने अपनी अभिव्यक्ति का सबसे सुरक्षित कोना चुना था. धर्म के नाम पर आडंबर, जातिगत विभाजन, सांप्रदायिकता, ऊंच-नीच, समाज में उत्तरोत्तर जड़ जमाते पूंजीवाद और उपभोक्तावाद, सरकार द्वारा बहुराष्ट्रीय कंपनियों, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोश के समक्ष निःशर्त समर्पण, समाज में निरंतर कमजोर पड़ते नागरिकबोध जैसी प्रमुख समस्याओं पर वे प्रायः मौन साधे रहे हैं. भू्रण हत्या, घटते लैंगिक अनुपात जैसे विषयों पर अच्छी तो अच्छी साधारण कोटि की रचनाएं भी देखने को नहीं मिलीं. बीच में 1992 में बाबरी मास्जिद के ध्वंस के समय भी ऐसी स्थितियां बनी थीं, जब व्यंग्यकार सरकार और प्रशासन को आड़े लेकर साहित्यिक मोर्चा संभाल सकते थे. परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ. भारतीय जनता पार्टी’ के शासनकाल में तो अधिकांश व्यंग्यकारों ने संभवतः मान ही लिया था कि उनका अभीष्ठ प्राप्त हो चुका है. यह कुछ ऐसा ही था, जैसे बसपा की सरकार बनने पर कुछ दलितों द्वारा यह मान लेना कि दलित अस्मिता का संघर्ष पूरा हो चुका है. मेरी निगाह में यही सोच व्यंग्य के पराभव का प्रमुख कारण बना.

इकीसवीं शताब्दी भी व्यंग्य के लिए और भी भारी सिद्ध हुई. संतोष की बात इसके पहले दशक में ‘व्यंग्य-यात्रा’ जैसी पत्रिकाओं का प्रकाशन आरंभ होना रहा. ‘अट्टहास’ और ‘व्यंग्य तरंग’ भी इस अवधि में नियमित बनी रहीं. लेकिन ये पत्रिकाएं व्यंग्य के गए वैभव को पटरी पर लाने में नाकाम सिद्ध हुईं. आज व्यंग्य लेखन से ऊर्जा गायब है. इस अवसान बेला में यदि उसमें कुछ हलचल बाकी है तो निश्चित रूप से इसका श्रेय प्रेम जनमेजय को दिया जाना चाहिए जो ‘व्यंग्य-यात्रा’ को नियमित रूप से निकाल रहे हैं. लेकिन किसी पत्रिका को निकालने के लिए केवल संपादकीय समर्पण पर्याप्त नहीं होता. उसके लिए मौलिक लेखकीय ऊर्जा की दरकार भी होती है. ‘व्यंग्य यात्रा’ और बाकी व्यंग्य पत्रिकाएं इस मोर्चे पर बहुत आश्वस्त नहीं कर पातीं. व्यंग्य आज भी बासी पड़ चुके विषयों से काम चला रहा है. नए विषय, नया जीवनबोध, नई चेतना और ऊर्जा उससे नदारद है. उसकी मुख्य प्रेरणाएं आज भी राजनीति के गलियारों से निकलती हैं, भ्रष्टाचार आज भी व्यंग्यकारों के सर्वाधिक पसंदीदा विषयों में से है. जिनका यहां स्पष्ट कर दें कि व्यंग्य का राजनीतिक और भ्रष्टाचार केंद्रित होना बुरा नहीं है. कूड़ा-करकट जहां अधिक हो वहीं ज्यादा सफाई की जरूरत पड़ती है. ऐसी अवस्था में प्रस्तुतिकरण का रचनापन व्यंग्य की मौलिकता को बढ़ा सकता है. यह काम निरी मध्यवर्गी मानसिकता द्वारा संभव नहीं है, जिसका प्रमुख चरित्र आज समझौतावादी हो चुका है. वर्षों पहले रवींद्र कालिया ने त्रिवेणी सभागार में अपने वक्तव्य में व्यंग्य को ‘निठल्लों का लेखन’ कहा था. उसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी. उन दिनों शरद जोशी संभवतः जीवित थे और उनका ‘प्रतिदिन’ व्यंग्य के क्षेत्र में हलचल मचा रहा था. आज हालात बदल चुके हैं. रवींद्र कालिया की टिप्पणी में मुझे सच नजर आने लगा है. मुझे लगता है कि व्यंग्य इन दिनों सुविधाभोगी मध्यवर्ग का लेखन बना है. वे सिर्फ लिखने के लिए लिखते हैं. कलावादी दृष्टिकोण व्यंग्यकारों पर हावी है. प्रतिबद्धता के अभाव में ही दृष्टि बासी पड़ चुके विषयों से परे नहीं जा पाती, जबकि परिस्थितियां व्यंग्य के लिए आज पहले से कहीं अधिक अनुकूल हैं.

लेखकीय चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं. व्यंग्यकार के लिए नए विषयों की कमी नहीं. संसदीय लोकतंत्र अधोगति की ओर है. बाजार ने संबंधों और सांस्कृतिक प्रतीकों पर कब्जा कर लिया है, राजनीति पर परिवारवाद हावी है. एक नए वर्णाश्रम धर्म का उदय हो रहा है. भविष्य में जनता जनता रहेगी, नेता नेता. भ्रष्टाचार अंतरराष्ट्रीयकरण की डगर पर है. टेलीविजन ‘लीलाकेंद्र’ बनता जा रहा है. धार्मिक ‘लीलाओं’ की बाढ़ आई हुई है. इधर कुछ वर्षों से एक नए देवता ‘शनि’ का अवतार हुआ है. आदमी के दिल में पैठे डर और असुरक्षाबोध को भुनाने के लिए ‘शनिदेव’ के मंदिर तेजी से बनाए जा रहे हैं. टेलीविजन भी ‘शनि-लीलाओं’ का प्रदर्शन कर रहा है. कैसी विडंबना है, मंगलग्रह की यात्रा को तत्पर लोग कंप्यूटर से खेल खेलते, मोबाइल पर ‘चैट’ और इंटरनेट से संवाद करते हैं, लेकिन देवताओं से हमेशा डरे रहते हैं. उन देवताओं से जो अपने भविष्य को लेकर स्वयं आक्रांत हैं. इन विसंगतियों पर व्यंग्यकार मौन हैं. बदली हुई परिस्थितियों के अनुकूल अपने विचारों, अभिव्यक्तिकला में परिवर्तन करने में वे असमर्थ रहे हैं. उनके निजी पूर्वग्रह व्यंग्य-लेखन पर हावी हैं. दक्षिणपंथी शक्तियों से ऊर्जस्वित जनलोकपाल समर्थक आंदोलन और सरकार के मंत्रियों के बेलगाम, मर्यादाविहीन आचरण ने समाज को महीनों से उद्वेलित बनाए रखा, जनता और संसद के अधिकार-क्षेत्र को लेकर महीनों बहस चली, अनेक व्यंग्यात्मक स्थितियां बनीं. व्यंग्यकार इस मुद्दे पर भी चुप्पी साधे रहे. उनका यह मौन व्यंग्य और व्यंग्यकार दोनों के लिए नुकसानदेह सिद्ध हो रहे है. उपर्युक्त का अभिप्राय यह नहीं कि व्यंग्यकार के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता अनिवार्य है. प्रतिबद्ध होना दूसरी विधाओं के लिए अनिवार्य हो सकता हैव्यंग्यकार के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता से ज्यादा जरूरी है अपने लेखन के प्रति निष्ठावान होना. यदि वह दक्षिणपंथी है तो रहे, लेकिन व्यंग्यकार होने के नाते उसका दायित्व है कि वह दक्षिपंथी विचारों, संस्थाओं में व्याप्त वौद्धिक जड़ता को अपने लेखन का निशाना बनाए. और यदि उसका विश्वास वामपंथ में है तो उसका कर्तव्य है कि वह वामपंथ के विचलन पर अपनी वक्रोक्ति का प्रहार करे. यदि ऐसा नहीं है तो यह माना जाएगा कि वह अपने लेखनकर्म के प्रति ईमानदार नहीं है. तब वह और कुछ हो सकता है, व्यंग्यकार कदापि नहीं हो सकता. व्यंग्य को ऐसे ही निष्ठावान रचनाधर्मियों की आवश्यकता है जिनकी दृष्टि से खुद से जग तक जाती हो. जो पैनी दृष्टि से अपने आसपास व्याप्त विसंगतियों को रचना के जरिये उभार सकें. ऐसे ही व्यंग्यकार इस अवसानबेला में नवोन्मेष की दस्तक दे सकते हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

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प्लेटो के आदर्शलोक में शिक्षा नीति : लैंगिक समानता का प्रथम स्वप्न

राज्य की एकता और अखंडता सर्वोपरि है. इसके लिए प्लेटो ने सुझाव दिया था कि राज्य का आकार कभी भी तय सीमा से अधिक नहीं होना चाहिए. लोगों को अपने विकास के, तरक्की के अवसर भी मिलने चाहिए. इसके लिए उचित होगा कि प्रशासन को समानता के दायरे में रखा जाए. उसमें किसी भी प्रकार का वर्गीय विभाजन, ऊंच-नीच की भावना नहीं होनी चाहिए. लोगों में कर्तव्य-भावना जाग्रत हो, उनमें इतना विवेक हो कि वे राज्य के कल्याण के लिए आवश्यक नियम-कानून बना सकें. वे शारीरिक रूप से स्वस्थ और मजबूत हों, ताकि युद्धकाल में शत्रु के समक्ष मोर्चे पर डटे रह सकेंइसके लिए प्लेटो शारीरिक और बौद्धिक दोनों ही प्रकार की शिक्षा पर जोर देता है.

शिक्षा के बारे में उसके विचार आधुनिक के करीब तथा किसी भी प्रकार के पूर्वग्रह से मुक्त थे. वह समाज में स्त्री-पुरुष के बीच किसी भी प्रकार के भेदभाव को अस्वीकार करता था. उसका मानना था कि स्त्री और पुरुष बराबर हैं. इसलिए स्त्रियों को भी पुरुषों के समान पढ़ने-लिखने के अवसर मिलने चाहिए. उन्हें समाज के सर्वश्रेष्ठ संरक्षकों के अधीन रखा जाना चाहिए, जो उनके साथ समानतापूर्ण व्यवहार कर सकें. उल्लेखनीय है कि प्लेटो से जीवनकाल में एथेंस में स्त्री-पुरुष अधिकारों में काफी अंतर था. स्त्रियों को पुरुषों से अलग, एकांत स्थल पर रहना पड़ता था. सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेने की उन्हें मनाही थी. समाज में भी उन्हें केवल कामेच्छापूर्ति तथा संतानोत्पत्ति का साधन माना जाता था. ऐसे में प्लेटो ने खुलकर लिखा था कि उन्हें पुरुषों के समान ही शिक्षा तथा अन्य अवसर प्राप्त होने चाहिए, ताकि वे भी अपना विकास कर सकें. प्लेटो का यह विचार इस भावना से प्रेरित था कि मनुष्य की आत्मा ही महत्त्वपूर्ण है, वही ‘शुभ’ की संरक्षक है. लेकिन वह एक उभयलिंगी सत्ता है. हालांकि उसने माना कि स्त्री और पुरुष की स्वभावगत भिन्नताएं और शारीक्षिक क्षमताएं अलग-अलग हो सकती हैं. सामान्यतः ये समाज और स्थानीय लोकाचारों में अंतर का परिणाम होती हैं. तथापि यह भेद कहीं से भी प्राकृतिक नहीं है. अतः समाज को स्त्री के साथ बजाय किसी प्रकार का भेदभाव करने के, उन्हें वे सभी अवसर देने चाहिए जो उनके मानसिक और शारीरिक विकास के लिए अत्यावश्यक हैं.

प्लेटो ने यह भी स्वीकार किया था कि स्त्री और पुरुष को साथ-साथ शिक्षा देने, साथ-साथ व्यायाम कक्षाओं में हिस्सा लेने की अनुमति देने से कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां उत्पन्न हो सकती हैं. सामान्य लोकाचार के विपरीत होने के कारण लोग आरंभ में उनका उपहास भी उड़ा सकते हैं. एक प्रश्न के उत्तर में वह उन स्थितियों पर भी विचार करता है जब लड़के और लड़की को साथ-साथ व्यायाम करते देख, विशेषकर जब लड़कियां अर्धनग्न अवस्था में व्यायामरत हों, उत्पन्न हो सकती हैं. उस अवस्था में लड़के उनका उपहास भी कर सकते हैं. यदि स्त्री वुजुर्ग अथवा देखने में असुंदर है तो इसकी संभावना अधिक भी हो सकती है. इसके बावजूद व्यापक हित में उन्हें मात्र इसी कारण से शारीरिक और अकादमिक शिक्षा से वंचित नहीं किया जाना चाहिए.

रिपब्लिक’ के पांचवे खंड में वह स्त्री-पुरुष की शारीरिक एवं मानसिक भिन्नताओं पर चर्चा करता है और इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि ये आभासी हैं. पांचवे खंड में एडीमेंटस, पोलीमार्क्स और ग्लुकोन के साथ चर्चा में हिस्सा ले रहा सुकरात कहता है कि जिस प्रकार घर की देखभाल के लिए कुत्ते का चयन करते समय यह नहीं देखा जाता कि वह नर है अथवा मादा, केवल उसके गुणों पर ध्यान पर रखा जाता है, इसी प्रकार सामाजिक दायित्वों के अनुपालन के लिए भी स्त्री और पुरुष के भेद को नजरंदाज किया जाना चाहिए. यदि फिर भी कोई मानता है कि स्त्री और पुरुष की कार्यक्षमताओं में अंतर होता है तो भी कार्य-विभाजन के समय इस अंतर की उपेक्षा की जानी चाहिए. प्लेटो ने सुकरात से कहलवाया है—

और यदिस्त्री और पुरुष की देहयष्टि, उसके कार्य अथवा प्रदर्शन में यदि कोई अंतर लक्षित भी होता है, तो हम यह कहते हैं कि उस कार्य अथवा प्रदर्शन का दायित्व-भार उनमें से ही किसी अन्य को सौंप दिया जाना चाहिए(जो उस कार्य को करने में अधिक निपुण हों). लेकिन वह अंतर यदि सिर्फ बाहरी पहनावे और देह-रचना तक सीमित है तो इसका यह अभिप्राय कदापि नहीं है कि स्त्री पुरुष से भिन्न अथवा कमतर है तथा उसको किसी क्षेत्र-विशेष में शिक्षित किया ही नहीं जा सकता, इसलिए हमें अपने अभिभावकों तथा उनकी पत्नियों को एक ही स्तर की शिक्षा देनी चाहिए. इस मामले में किसी भी प्रकार का भेद करना अनुचित एवं न्याय भावना के विरुद्ध होगा.’

ऐसा नहीं है कि अपने विचारों में प्लेटो ने सर्वत्र उदारता ही बरती हो. यदि ऐसा होता तो आज से करीब चौबीस सौ वर्ष पहले ही यूनान में वास्तविक लोकतंत्र को बढ़ावा मिलता है. कम से कम उस दिशा में मौलिक चिंतन कुछ तो आगे बढ़ता. दरअसल प्लेटो और सुकरात दोनों ही स्पार्टा की सादगी से बेहद प्रभावित थे. एक युद्ध-समर्पित समाज बनाने के लिए स्पार्टा ने अपने नागरिकों से उनका निजी जीवन छीन रखा था. परंतु प्लेटो के लिए व्यापक राज्य हितों के लिए यह बलिदान बहुत मामूली था. यद्यपि सादगी की कीमत वहां के नागरिकों को अपने अस्मिताबोध से चुकानी पड़ती थी. राज्यहित के आगे वहां व्यक्तिहितों को गौण माना जाता था. यही नहीं, व्यक्ति को अपनी महत्त्वाकांक्षाएं, जीवन की खुशियां, यहां तक कि अपनी पारिवारिक पहचान भी राज्य के पक्ष में भुलानी पड़ती थी. प्लेटो सुदृद्ध राजनीतिक तंत्र के पक्ष में था. इसके लिए राज्य का अधिनायकवादी रवैया भी उसको स्वीकार्य था. शिक्षा, कला, स्वास्थ्य-रक्षण आदि के प्रति वह इसलिए आग्रहशील है. क्योंकि वह केंद्र की मजबूती और खुशहाली के लिए भी अत्यावश्यक है. प्लेटो की निगाह में राज्य के आगे व्यक्ति की अपनी इच्छा-आकांक्षाएं अर्थविहीन है. यहां तक वह बच्चों को भी उनके माता-पिता से अलग राज्य के संरक्षण में इस प्रकार पाले जाने का अनुमोदन करता है, ताकि माता-पिता और संतान में से कोई भी परस्पर पहचान न सके. प्लेटो की अंतिम संवादिका है—‘लॉज’. जिसमें वह ऐसी सलाह देता है, जो आधुनिक समाज में शायद ही मान्य हो. हालांकि उन दिनों स्पार्टा में ऐसी वही व्यवस्था थी, परंतु प्लेटो का इसे समर्थन इसलिए हैरान करने वाला है, क्योंकि वह संभवतः पहला विचारक है जो स्त्री-पुरुष समानता के पक्ष में आवाज उठाता है. स्त्री की शिक्षा एवं स्वास्थ्य-रक्षण की अनिवार्यता पर जोर देते हुए वह लिखता है कि—

अभिभावक वर्ग की पत्नियां तथा उनकी संतान संयुक्त होनी चाहिए. इस तरह कि किसी भी माता-पिता को उसकी संतान के बारे में कोई जानकारी न हो, न ही कोई बालक अपने माता-पिता के बारे में जान पाए.’

यह संदेह व्यक्त करने पर कि पत्नियों और बच्चों के संयुक्त रहने पर क्या विवाद नहीं होंगे? प्रत्युत्तर में प्लेटो आश्वस्त करता है कि स्थिति ठीक इसके विपरीत होगी. पत्नी और संतान के एक होने से लोगों के बीच परस्पर अधिक भाईचारा, विश्वसनीयता और पारिवारिकता भी पनप सकती है, जो उन्हें एक-दूसरे से सहयोग के लिए प्रेरित करेगी. संयुक्त पत्नियों और बच्चों की परिकल्पना के पीछे प्लेटो की असली मंशा अभिभावक वर्ग को पारिवारिक संबंधों तथा भावनात्मक बंधनों से मुक्त करने की थी, ताकि वे समाज के प्रति पूर्णतः एकनिष्ठ रहकर अपने दायित्वों का परिपालन कर सकें. उसका मानना था कि बच्चे और पत्नियां संयुक्त होंगे तो निजी संपत्ति की आवश्यकता भी खत्म हो जाएगी. इसलिए उससे बच्चों को राज्य के संरक्षण में रखने का सुझाव दिया था. यह संभावना व्यक्त करने पर कि संयुक्त संतान होने पर बच्चों की उपेक्षा होने लगेगी—प्लेटो की प्रतिक्रिया थी कि इससे लोग बच्चों के लालन-पालन पर संयुक्तरूप से अधिक ध्यान देंगे. बालक परिवार की आर्थिक हैसियत से मुक्त एक समानतापूर्ण वातावरण में पलेगा. इसलिए बच्चों के पालन-पोषण में कोई कमी नहीं आएगी.

परिवार की अवधारणा को समाप्त करने के पीछे प्लेटो का मानना था कि इससे एक ऐसे स्वयं अनुशासित शासकवर्ग का विकास हो सकेगा जो अधिक संगठित, एकात्मक, सहिष्णु तथा प्रतिद्विंद्वता की भावना से मुक्त हो. स्पार्टा का नागरिक जीवन युद्ध की अनिवार्यताओं से संचालित था. प्लेटो स्पार्टा की समाज-व्यवस्था से कितना प्रेरित था. इसका अनुमान उसकी इस मान्यता से भी लगाया जा सकता है कि वह जहां हृष्ट-पुष्ट बच्चों का विशेष ध्यान देने पर जोर देता है, ताकि वे बड़े होकर अच्छे सैनिक का धर्म निभा सकें. वह शारीरिक-मानसिकरूप से कमजोर बच्चों को शेष बच्चों से अलग रखने की सलाह देता है. अपने आदर्श राज्य में प्लेटो विवाह-संस्था को अनावश्यक मानता था. उसका मानना था कि—

समाज में स्त्री-पुरुष की एक संयुक्त जीवनचर्या होनी चाहिए….उनकी शिक्षा संयुक्त रूप से हो, उनके बच्चे संयुक्त परिवेश में रहें. फिर चाहे वे युद्ध पर हों अथवा शांति काल में आम शहरी का जीवन बिता रहे हों—बच्चों का पालन-पोषण भी संयुक्तरूप से करें. वे साथ-साथ काम करें, ऐसे ही जैसे कि कुत्ते एकजुट होकर शिकार करते हैं. स्त्रियों-पुरुषों के संबंध भी सामूहिक हों तथा वे अपने कर्तव्य का पालन इतनी निष्ठा के साथ करें, जितना कि वे अधिकतम कर सकते हैं. कोई भी कानून का उल्लंघन न करे, काम-संबंधों के प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखा जाए.’

बच्चों के संयुक्त पालन-पोषण की परिकल्पना के पीछे उसका विचार था कि इससे लोग अपने बारे में सोचना छोड़कर पूरे समाज के बारे में सोचेंगे. अपने राज्य के बारे में सोचेंगे. शिक्षा के बारे में प्लेटो के विचार अपने समय के किसी भी अन्य विद्वान की अपेक्षा कहीं अधिक प्रगतिशील थे. वह शिक्षा के मामले में किसी भी प्रकार की जोर-जबरदस्ती अथवा दबाव का विरोध करता था. उसका मानना था कि—

एक स्वतंत्र व्यक्ति को कुछ भी दबाव में नहीं सीखना चाहिए. अनिवार्य शारीरिक व्यायाम शरीर को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता, किंतु जोर-जबरदस्ती की शिक्षा कभी दिमाग में नहीं ठहरतीइसलिए दबाव को छोड़ो, बच्चों को खेल-खेल में सीखने दो.’

करीब 2400 वर्ष पहले जब तक यूनानी समाज में नागरिकबोध पर्याप्तरूप से विकसित नहीं हुआ था, प्रायः सभी समाज कबीलों में बंटे थे. उनके बीच आपसी युद्ध और तनातनी सामान्य बात थी. युद्ध के कारण भी मामूली होते थे. मगर उन युद्धों में अनेक निर्दोष मारे जाते थे. जो गिरफ्तार होते, उन्हें विजेता पक्ष दास बनाकर अपने अधिकार में ले लेता था. बाकी जीवन उन्हें इसी गुलामी में बिताना पड़ता था. ऐसे में राज्य में शांति-व्यवस्था बनाए रखना प्रत्येक विचारक की समस्या थी. इसका एक उपाय उन्हें मजबूत केंद्र के रूप में दिखाई देता था. भारत में चाणक्य की भांति प्लेटो भी एक सुदृढ़ केंद्र का समर्थक था. राज्य की संगठित ताकत को कोई खतरा न हो, इसलिए उसका सुझाव था कि राज्य यह ध्यान रखे कि उसके नागरिकों के दिमाग में क्या चल रहा है. खासकर बुद्धिमान लोगों के. स्पार्टा में तो कला, साहित्य आदि जो व्यक्ति को अंतर्मुखी बनाते हैं, को गैरजरूरी माना गया था. प्लेटो स्वयं भी स्पार्टा से प्रभावित था. युवावस्था में प्लेटो ने स्वयं भी प्रेम कविताएं लिखी थीं. शायद इसी लगाव के कारण वह साहित्य और कलाओं का सीधे विरोध तो नहीं करता. वह राज्य को ऐसे लोगों पर नजर रखने की सलाह देता है. उसके अनुसार—

राज्य का सबसे पहला काम होगा गल्पकथा लेखकों पर पाबंदी लगाना, और उसके बाद अच्छी और बुरी गल्पकथाओं का चयन करना, हम चाहेंगे कि माताएं और धाय बच्चों को वही कहानियां सुनाएं जो उनके लिए निर्धारित की गई हैं. उन कहानियों को बच्चों में लोकप्रिय बनाएं जो उनके हाथ-पैर सक्रिय बनातीं यानी उन्हें परिश्रम करना सिखाती हों. समाज में फिलहाल सुनी-सुनाई जा रही कहानियों में से अधिकांश बकवास हैं, इसलिए उनका विरोध किया जाना चाहिए.’

साहित्य और कलाओं में यथार्थवाद का समर्थक प्लेटो प्राचीन यूनानी कवियों होमर और हेसोद की रचनाओं को भी बच्चों के लिए नुकसानदेह मानता है. उसका मानना है कि इन कथाओं को बच्चों को सुनाना उनके आगे ‘झूठ बोलने, बल्कि भद्दा झूठ बोलने जैसा’ है. कलात्मक चित्रकला का विरोध करते हुए उसने कहा था कि चित्रकार अपनी कूंची से प्रकृति का जो चित्र खींचता है, उसका सच से कोई वास्ता नहीं होता. वह जिस फंतासी को अपने चित्र के माध्यम से दर्शाना चाहता है, वह बच्चों को एक ऐसी बनावटी दुनिया से परचाती से है, जो यथार्थ से एकदम परे है. इसलिए बच्चों को ऐसी चित्रकला और कथा-साहित्य से दूर रखना चाहिए. सुकरात का विचार था कि बच्चे यथार्थ और कल्पनाजगत में अंतर करने में असमर्थ होते हैं, इस कारण कभी-कभी वे कल्पनाजगत को ही वास्तविक संसार मानकर व्यवहार करने लगते हैं. इसलिए प्रारंभ में उन्हें ऐसी कहानियां सुनाई जानी चाहिए जो नैतिक शिक्षा देने वाली हों.

स्मरणीय है कि उस समय प्राचीन यूनान में कला और साहित्य की स्थिति भारत के रीतिकालीन कला-साहित्य के समान थी. यूनानी सम्राट प्रतिष्ठित कलाकारों एवं दार्शनिकों को अपने आश्रय में रखते थे. ऐसे उपकृत विद्वान अपनी प्रतिभा का उपयोग अपने आश्रयदाता को प्रसन्न करने के लिए करते थे. प्लेटो ने ऐसे साहित्य को बच्चों से दूर रखने को कहा है. उसका मानना था कि सभी मनुष्य अपने आप में अपूर्ण हैं और उनके अनेक लक्षण जानवरों से मिलते-जुलते हैं. मगर वह यह भी मानता कि शिक्षा के माध्यम से मनुष्य अपने आप को ऊपर उठा सकता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

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समाजवाद का उत्तरपक्ष

प्रश्न है कि इकीसवीं शताब्दी के आरंभ में समाजवाद को कैसे लिया जाए? क्या राजनीतिक दर्शन के रूप में यह आज भी प्रासंगिक है? विशेषकर ऐसे समय में जब पूंजी का बोलबाला हो और उसके समर्थक अर्थविज्ञानी समाजवाद को डूबा हुआ जहाज मान चुके हों. समाजवाद का समर्थन करते आए विद्वानों में हताशा का माहौल हो. मनुष्यता की कीमत पर प्राप्त आधुनिक सुख-सुविधाओं के आगे वह नतमस्तक हो. दरअसल उनीसवीं शताब्दी के मध्याह्न तक समाजवाद का ग्राफ जितनी तेजी से ऊपर चढ़ा, वाद में उतनी ही तेजी से नीचे खिसकता गया. एक-एक कर उसके गढ़ पूंजीवाद के गाल में समाते चले गए. सोवियत संघ का बिखराव उसके ताबूत की अंतिम कील साबित हुआ. रही सही कसर चीन ने पूंजीवाद की गोद में शरण लेकर पूरी कर दी. मात्र ढाई-तीन दशक पहले तक दुनिया की आधी आबादी के सपनों में छाया रहने वाला समाजवाद आज उजड़ा हुआ दयार है, जिसपर बात करना भी बौद्धिक पिछड़ापन माना जाने लगा है. हालांकि बौद्धिक रूप से आज भी उसका तेज ज्यों का ज्यों है.

हालांकि हताशा के कठिन दौर में भी पूंजीवाद के विकल्प के रूप में समाजवाद की भावना से औत-प्रोत नित नए विचार सामने आ रहे हैं. पूंजीवादी शोषण से खिन्न और उसके असंतुष्टों का दायरा बढ़ता ही जा रहा है. यह विरोध विश्व के अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार से, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप आकार ले रहा है. यह अनायास नहीं है कि उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी के प्रायः सभी मौलिक विचारक, साहित्यकार, दार्शनिक और वैज्ञानिक समाजवाद के समर्थक रहे हैं. इनमें जान स्टुअर्ट मिल, बट्रेंड रसेल, आ॓स्कर वाइल्ड, अल्बर्ट आइंस्टाइन, जा॓न रस्किन, एमाइल दुर्खीम, अंतोनियो ग्राम्शी, रोजा लेक्जमबर्ग, पीटर क्रोप्टोकिन, थोरो, चे ग्वेरा, चार्ल्स डिकेंस, आ॓स्कर वाइल्ड जैसे लेखक, विचारक समाजवाद के समर्थक रहे हैं. इस अवधि में पूंजीवाद यदि मजबूत हुआ तो समाजवाद ने भी स्वयं को नए-नए विचारों से लैस किया है. पूंजीवाद के एक से बढ़कर एक विकल्प वह लाया है, भले ही उनकी पहुंच कुछ देशों, समाजों, समूहों तक सीमित हो और पूंजीवाद की खाकर रात-दिन गाल बजाने वाला मीडिया उसकी पहुंच और प्रभावक्षेत्रों की लगातार उपेक्षा करता आ रहा होफिर भी दुनिया के प्रायः सभी क्षेत्रों में उसकी सार्थक-सशक्त-सारगर्भित उपस्थिति है. इस बीच पूंजीवाद और समाजवाद की बीच भी परस्पर आदान-प्रदान हुआ है. समाजवादी हलचलों से प्रेरणा लेते हुए पूंजीवाद ने स्वयं को उदार बनाया है तथा श्रमिक बीमा, स्वास्थ्य बीमा, आवास जैसी सुविधाएं भी जोड़ी हैं, हालांकि उनकी पहुंच सीमित क्षेत्रों तक है और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को अभाव और शोषण की स्थितियों में जीना पड़ता है.

दूसरी ओर पूंजीवाद से प्रेरणा लेते हुए समाजवाद ने भी अपनी उग्रता को कुछ कम किया है. मानव-स्वातंत्र्य के पक्ष में समाजवाद और लोकतंत्र की नजदीकियां बढ़ी हैं, जिसका सुफल समष्ठिवाद, सहजीवितावाद, गणतांत्रिक समाजवाद जैसे नए समाजार्थिक दर्शन हैं, जो राज्य के समानांतर अथवा उसके बिना भी स्वतंत्रता और समानता के लक्ष्य को पाने के लिए संकल्पबद्ध हैं. उत्पादन के पूंजीवादी तरीकों, यहां तक कि सघन उत्पादन तकनीक से उसको परहेज नहीं है. गणतांत्रिक समाजवाद का समर्थन तो घोर पूंजीवादी देशों में भी किया जाने लगा है. कई बार तो पूंजीवाद अपनी असल मंशा छिपाने के लिए भी गणतांत्रिक समाजवाद का नारा लगाने लगता है. समाजवाद सैद्धांतिक वाद-विवाद में पड़ने के बजाय अब सीधे कार्रवाही में विश्वास करने लगा है. हालांकि विश्व में युवा मार्क्स और माओ जिदांग को आदर्श मानने वाले उग्र साम्यवादियों की कमी नहीं है, तो भी उसके आधुनिक संस्करण जैसे समष्ठिवाद, श्रमिकसंघवाद आदि हिंसा से सुरक्षित दूरी बनाए रखने में विश्वास रखते हैं. पूंजीवाद को टक्कर देने में समर्थ सहकारिता आंदोलन भी किसी न किसी रूप में इसी भावना से संचालित हैं. दूसरी ओर पूंजीवाद से सम्मोहित ऐसे अमेरिकापरस्त विचारकों की भी कमी नहीं है, जो गर्व से कभी ‘इतिहास का अंत’ तो कभी ‘विचारधारा का अंत’ जैसी घोषणाएं करते रहते हैं.

इधर कुछ विद्वान कह रहे हैं कि गणतांत्रिक समाजवाद राजनीतिक-समाजार्थिक चिंतन की पराकाष्ठा है. विचार-हंस इससे ऊंची उड़ान नहीं भर सकता. इससे बेहतर अर्थदर्शन कुछ भी संभव नहीं. ऐसे विद्वानों की भी भारी संख्या है जो पूंजीवाद पर अटूट भरोसा रखते हैं और मानते हैं कि ऊपरी वर्ग की समृद्धि वहीं नहीं टिकी रहेगी, वह रिसकर निचले स्तर की ओर जाएगी. इससे प्रकारांतर में गरीबी हटेगी. समाज में समृद्धि आएगी.ऐसे विद्वानों की संख्या भी बहुतायत में है जो गणतांत्रिक समाजवाद को पूंजीवाद का छल मानते हैं. उनके अनुसार गणतांत्रिक समाजवादी और कुछ नहीं, बल्कि पूंजीवाद का लोकलुभावन चेहरा है. जबकि गणतांत्रिक समाजवादियों का मानना है कि हिंसा अथवा सर्वहारा क्रांति द्वारा आर्थिक-राजनीतिक शक्तिकेंद्रों पर बलात् अधिकार जमा लेने से वास्तविक और स्थायी परिवर्तन संभव नहीं. आवश्यकता है कि आर्थिक-राजनीतिक असमानता को दूर करने हेतु ठोस राजनीतिक-सामाजिक परिवर्तन का सहारा लिया जाए.मानवमात्र की मूलभूत अच्छाई में विश्वास रखते हुए वे हिंसा के बजाय हृदय-परिवर्तन को प्राथमिकता देते हैं. गणतांत्रिक समाजवादी पूंजीवाद के प्रति आलोचनात्मक रुख अपनाते हैं, मगर उनका मानना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा पूंजीवाद की उग्रता को समाप्त करना संभव है. चाल्र्स एंथनी क्रासलेंड(1918—1977) जैसे अर्थविज्ञानी इस विचारधारा के समर्थक हैं. उनका मानना है कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूंजीवाद ने स्वयं को बदला है तथा बदली हुई परिस्थितियों में वह अपेक्षाकृत बड़े लोकहितैषी के रूप में उभरा है. इस आधार पर वह मानता है कि सर्वहारा क्रांति अथवा हिंसा का सहारा लिए बिना भी, पूंजीवादी तरीकों से अर्जित आय के लोकोपकारी कल्याण-कार्यक्रमों में निवेश तथा जनसुविधाओं में विस्तार द्वारा सामाजिक समानता के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. श्रम सहकारिताएं तथा नागरिक संगठन इस लक्ष्य को और भी आसान बना सकते हैं. इसके लिए वे अधिक आय वाले नागरिकों पर आनुपातिकरूप में अधिक आयकर लगाकर विकास के लिए अपेक्षित पूंजी अर्जित करने का पक्ष लेते हैं. इससे पूंजी का प्रवाह स्वाभाविक रूप से निचले वर्गों की ओर होने लगता है. यह अहिंसक और मंथर क्रांति है, और हृदय परिवर्तन पर आश्रित होने के कारण अपेक्षाकृत अधिक स्थायी है. अपने समर्थन के लिए वे विद्वान जान स्टुअर्ट मिल के स्वाधीनतावादी समाजवाद का भी उदाहरण देते हैं. मिल का कहना था कि गणतांत्रिक समाजवाद असल में मुक्त उपभोक्तावाद को मान्यता दिए जाने जैसा है, लेकिन यदि इससे व्यक्तिमात्र की स्वाधीनता की रक्षा होती है तो इसमें कुछ अनुचित भी नहीं है. अपनी पुस्तक ‘दि प्रिंसिपल्स आ॓फ पा॓लिटिकल इकानामी(1848)’ के परिवर्धित संस्करण में मिल ने कहा था—

जहां तक आर्थिक विचारधारा का प्रश्न है, अर्थशास्त्र के सिद्धांतों में ऐसा कुछ नहीं है, जो किसी समाजवादी रणनीति पर आधारित विचारधारा को प्रतिबंधित करता हो.’

गणतांत्रिक समाजवाद को अमेरिका में भी भरपूर समर्थन मिला. विशेषकर शीत युद्ध के दौर में अमेरिकी अर्थशास्त्री सोवियत संघ की आलोचना के लिए इस विचारधारा को मान्य ठहराते रहे. लेकिन यह उनकी तात्कालिक कूटनीति का हिस्सा था. इसलिए सोवियत संघ के पतन के बाद उसने समाजवाद से पूरी तरह किनारा कर लिया है. लेकिन इससे यह मान लेना अनुचित होगा कि अमेरिका में समाजवाद के लिए कोई स्थान ही नहीं है. वहां समाजवादी आंदोलन की शुरुआत उनीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में ही हो चुकी थी. अमेरिकी समाजवादियों के आमंत्रण पर ही राबर्ट ओवेन वहां पहुंचा था और उसने जोसीह वारेन जैसे सहयोगियों को साथ लेकर सहजीवन पर आधारित बस्तियां बसाने का निर्णय किया था. ‘न्यू हार्मोनी’ वहां सहकारिता के दर्शन पर आधारित पहली बस्ती थी. ‘सोश्लिस्ट लेबर पार्टी’ का गठन वहां पर 1876 में हुआ. 1901 में वहां ‘सोश्यिलिस्ट पार्टी आ॓फ अमेरिका’ का गठन किया गया. अमेरिकी बहुमत की पसंद भले ही समाजवाद कभी नहीं बन सका, लेकिन एक सशक्त विपक्ष के रूप में उसकी 1901 के बाद से निरंतर उपस्थिति रही है. कई राष्ट्रपति चुनावों में कई बार पार्टी के प्रतिनिधि पूंजीवाद समर्थित उम्मीदार को जबरदस्त टक्कर दे चुके हैं. औद्योगिक सुधार के लिए कई सफल हड़तालें समाजवादियों के नाम रही हैं. लेकिन अमेरिका में समाजवाद की लोकप्रियता को लेकर सबसे चौंकाने वाले परिणाम रासम्सेन रिपोर्ट में सामने आए. 2007 की भीषण आर्थिक मंदी के के प्रभाव के आकलन के लिए रासम्सेन की अध्यक्षता में एक सर्वे कराया गया था. अपनी रिपोर्ट में समिति ने अमेरिका में समाजवाद के प्रति बढ़ते रुझान की ओर संकेत किया था. रिपोर्ट के अनुसार यद्यपि 53 प्रतिशत अमेरिकी नागरिक पूंजीवाद को बेहतर मानते हैं, समाजवाद के समर्थन में मात्र 20 प्रतिशत नागरिक थे और 27 प्रतिशतों ने अपनी स्पष्ट राय जताने में असमर्थता प्रकट की थी. लेकिन इससे इतना तो स्पष्ट है कि दुनिया में पूंजीवाद का डंका बजाने वाले अमेरिका में उसके विरुद्ध माहौल बनता जा रहा है. वहां लगभग आधे लोग ऐसे हैं जो पूंजीवाद के या तो सीधे विरोध में हैं अथवा उसकी उपयोगिता को लेकर सुनिश्चित नहीं हैं. सर्वे का सबसे चौंकाने वाला निष्कर्ष यह था कि 30 वर्ष से कम के युवकों में से मात्र 37 प्रतिशत नागरिक पूंजीवाद के पक्ष में थे. शेष 33 प्रतिशत समाजवाद के और लगभग 30 प्रतिशत अनिर्णय की स्थिति में थे. उल्लेखनीय है कि रासम्सेन द्वारा जो प्रश्नावली सर्वे के लिए नागरिकों में दी गई थी, उसमें पूंजीवाद और समाजवाद को परिभाषित नहीं किया गया था और अमेरिका में समाजवाद का अर्थ प्रायः ‘गणतांत्रिक समाजवाद’ से ले लिया जाता है. जो कम से कम गणतंत्र के बारे में पूंजीवाद से निकट संबंध रखता है.

आशय है कि राज्य के स्तर पर अमेरिका में भले ही पूंजीवाद फल-फूल रहा हो, मगर वहां लोकतंत्र आधारभूत संस्थाओं ने नागरिकों को अपने हितानुरूप समानांतर संगठन चलाने का प्रशिक्षण भी दिया है. इसलिए वहां सहजीवितावाद, श्रमिकसंघवाद, समष्ठिवाद जैसे समाजवाद के आधुनिक रूप भी जहां-तहां अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं. चूंकि वहां जनजीवन में पर्याप्त समृद्धि है, इसलिए थोड़ी-बहुत शिकायतों से अधिक नागरिक असंतोष वहां नहीं पनप पाता. लेकिन प्रकट रूप में अमेरिका की नीति पूंजीवाद को प्रश्रय देने की है, ताकि दुनिया-भर में फैली उसकी पूंजीवादी कंपनियों को बढ़ावा मिले. वहां के पूंजीवाद समर्थित अर्थशास्त्रियों के लिए समाजवाद और फासीवाद में कोई अंतर ही नहीं है. अमेरिकी अर्थनीति के समर्थन में नोबल पुरस्कार विजेता अमेरिकी अर्थशास्त्री फ्रैड्रिक आ॓गस्ट हायक के विचारों की व्याख्या करते हुए ‘फ्यूचर फ्रीडम फाउंडेशन’ के अध्यक्ष जेकब हा॓नबर्गर लिखते हैं—

नाजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद तथा फासीवाद की अर्थनीतियों तथा कल्याण राज्य अमेरिका की नियंत्रित अर्थनीति में कोई अंतर नहीं है.’

क्या सचमुच नाजीवाद, फासीवाद और समाजवाद में कोई अंतर नहीं है? क्या सचमुच समाजवाद की डगर अंततः तानाशाही की ओर ले जाती है? इन्हीं के बीच से एक प्रश्न उभरता है कि क्या समाजवाद का कोई भविष्य है? इस प्रश्न एक स्वाभाविक प्रश्न और जुड़ा हुआ है कि क्या समाजवाद का अपना कोई अतीत था? एक राजनीतिक दर्शन के रूप में समाजवाद का उदय और पूंजीवाद का जन्म लगभग साथ-साथ हुआ. दोनों मानव-मात्र को सुखी देखना चाहते हैं. दोनों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थक हैं तथा व्यक्ति को स्वतंत्र इकाई मानते हैं. दोनों का दावा मानव-मात्र को अधिकतम सुख पहुंचाने का है. अंतर सिर्फ उत्पादन पर अधिकारिता को लेकर है. पूंजीवाद में आर्थिक संसाधन चंद हाथों तक सिमटे होते हैं. समाजवाद में उत्पादन प्रणाली पर राज्य अथवा श्रमिकों का, जिन्हें वह वास्तविक उत्पादक मानता है—अधिकार होता है. पूंजीवाद में पूंजी के बल पर एक विशेषाधिकार संपन्नवर्ग पनपने लगता है. जो स्वयं निष्क्रिय रहता है, लेकिन उत्पादन के लाभ पर अपना अधिकार जमाए रहता है. कहीं न कहीं उसको यह भय भी होता है कि वास्तविक उत्पादक यानि श्रमिकवर्ग कभी भी अपने अधिकारों के लिए उपस्थित हो सकता है. अतः अपने सुरक्षित भविष्य, सुनिश्चित लाभ हेतु श्रमशक्ति पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए प्रयत्नरत रहता है. इसके लिए वह स्वचालित तकनीक का चयन करता है तथा अपने लाभ का बड़ा हिस्सा तकनीकी शोध पर खर्च करता है, मशीनों की अधिकाधिक मदद करता है, जो उसके लिए उत्पादन की जिम्मेदारी निभाते हुए लाभ में हिस्सेदावेदारों को कम से कम करने का काम करती हैं. हालांकि पूंजीपति जिसको पूंजीवाद के आलोचक निष्क्रिय उत्पादक कहते हैं, वह सदैव निष्क्रिय नहीं होता. वह शारीरिक के बजाय बौद्धिक श्रम में दक्ष होता है. अपनी पूंजी और बुद्धिबल द्वारा वह श्रमिकों से पूरा काम लेता है. वह श्रमिकों को अपना बुद्धिसामर्थ्य उपयोग करने की वहीं तक अनुमति देता है, जहां तक वे उसका हित साधन करते हैं. कहा जा सकता है, कि पूंजीवाद में समाज का बौद्धिक सामथ्र्य कुछ व्यक्तियों का हित सोचने लगता है. सामंतवाद में भी पूंजीवाद की भांति सभी लोगों को अपनी बौद्धिक क्षमताओं का अपने लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जाती. इस कार्य के लिए सामंतवाद धर्म को सहायक बनाता है, जो मनुष्य का ध्यान इहलौकिक समस्याओं तथा उनके कारणों की ओर से हटाकर अमत्र्य संसार की ओर ले जाते हैं. धर्म भौतिक संसार की आलोचना करता है, ऐंद्रियक सुखों को छलावा बताता है. इसके लिए उनको राजसत्ता का पूरा समर्थन प्राप्त होता है. राजसत्ता से अपनी निकटता का लाभ उठाकर धर्मसत्ता के शीर्ष पर विराजमान लोग स्वयं तो ऐंद्रियक सुखों में डूबे रहते हैं, जबकि जनसाधारण को अपरिग्रह और अस्तेय का दर्शन बघारते थे.

सतरहवीं शताब्दी में जब मशीनों ने रोजगार छीनने आरंभ किए तो उनकी आलोचना ने जोर पकड़ा. यह वास्तविक उत्पादक के हाथों में उत्पादन का श्रेय छिन जाने जैसी सामान्य घटना नहीं थी. चूंकि मशीनें त्वरित उत्पादन करती थीं, इसलिए उत्पाद की खपत के लिए नए बाजारों की आवश्यकता थी. नए बाजारों की खोज ने ब्रिटिश उपनिवेशों को जन्म दिया. यह संभवतः पहली बार हो रहा था जब साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं की पहल व्यापारिक दलों की ओर से आरंभ हुई थी. मशीनों ने पहले लोगों के हाथों से रोजगार छीना. उससे पहले मनुष्य औजारों से काम लेता था. लेकिन वे मनुष्य के सहायक की भूमिका निभाते थे. पाषाण युग से ही विकासयात्रा में औजार मनुष्य का हमसफर बने थे. मशीनों ने मनुष्य को उत्पादक के स्थान से बेदखल कर दिया था. पहले उत्पादन पर उनका अधिकार होता था जो अपने श्रम-कौशल से उसको संभव बनाते थे. मशीनों ने ऐसे व्यक्तियों को उत्पादक बनाने का काम किया, जिनमें ऐसे कौशल का अभाव था, और जो सिर्फ अपनी पूंजी के बल पर अपने लिए मशीनें खरीद सकते थे. कार्य में प्रवीणता उत्पादक होने की शर्त नहीं रह गई थी. इसलिए ऐसे लोग भी उत्पादक की ओर आकर्षित हुए जो अपनी पूंजी के बल पर उत्पादन का लाभ उठाने को तैयार थे. बाजार की ललक ने लोगों से उनकी जमीनें और प्राकृतिक संसाधन छीनना भी आरंभ कर दिया था. पूंजीपतियों का आग्रह था—तुम हमारे कारखानों में काम करो, हमारे कारखानों में बना माल उपयोग में लाओ, अपनी धरती, अपने संसाधन, अपने सपने और महत्त्वाकांक्षाएं हमें सौंप दो. वे हमारे कारखानों के काम आएंगे. बदले में हम तुम्हें नया सामाजिक बोध देंगे. जिसमें व्यक्ति सिर्फ अपने लिए जीता है. अपने सारों ओर मौजूद लोगों पर संदेह करता है. अंतर्मन में समाए डर से मुक्ति तथा सामाजिकता की तलाश में वह मायावी दुनिया में घुसता चला जाता है.

उल्लेखनीय है कि मायावी दुनिया का यह सच सामंतवादी समाज में भी था. यहां तो काम पूंजीपतियों के पैसे पर पलने वाले समाजविज्ञानी और अर्थशास्त्री और नौकरशाह करते हैं, सामंतवाद में वह पुरोहितवर्ग के जिम्मे था. पूंजीवाद की भांति पुरोहितवाद भी शीर्षस्थ वर्ग के हितों को समर्पित था. पूंजीवादी तकनीक द्वारा रची गई आभासी दुनिया का सपना दिखा लोगों का ध्यान उनकी वास्तविक समस्याओं की ओर से हटाए रखता है. पुरोहित इसके लिए धर्म, स्वर्ग, नर्क जैसी भ्रांत और अतींद्रिय कल्पनाएं रचता है. समाज में उस समय भी शिल्पकार वर्ग का यथेष्ट सम्मान नहीं था. मनुष्य की पहली आवश्यकता भोजन था. और अनाज पर जमींदार का अधिकार होता था. जो यह कहकर कि जिस भूमि पर अनाज उपजा है, वह उसके स्वामित्व में है, अनाज का बड़ा हिस्सा घर ले जाता था. तथा गांव-देहात की बाकी जनता, जिसमें नाई, बुनकर, काष्टकार, लौहकार, चर्मकार, कुंभकार आदि सम्मिलित थे, उन्हें अनाज के छोटे हिस्से से संतोष करना पड़ता था. एक बुनकर से कहीं अधिक उन दिनों भी पुरोहित सम्मान का पात्र था, जो धर्म के क्षेत्र में भक्त और भगवान के बीच दलाल की भूमिका निभाता था. कर्मकांडों और आडंबरों की उसकी दुनिया का बड़ा महत्त्व था. सामंतवर्ग उसको सम्मान देता था, इसलिए कि पुरोहित की दिखाई दुनिया के बहाने वह जनसाधारण का ध्यान अपने शोषण, उत्पीड़न से दूर रख सकता था. लोगों का भरमाए रखने में उसको विशेषज्ञता प्राप्त थी. पुरोहित वर्ग भी अपने काम की निस्सारता को समझता था. वह यह सब यजमान की संतुष्टि के लिए करता था. हालांकि उन दिनों भी ऐसे अवसर आए जब शिल्पकारों, छोटे व्यापारियों ने राजनीति और धर्मसत्ता को समझौता करने के लिए बाध्य कर दिया. मगर उन संगठनों का प्रभाव सीमित लोगों पर था. दूसरे धर्मसत्ता को चुनौती देने का हौसला भी उनमें नहीं था. सच तो यह है कि वे धर्मसत्ता के संरक्षण में ही स्वायत्तता चाह रहे थे. आशय यह है कि कि पूंजीवाद ने ऐसा कुछ नहीं किया जो सामंतवादी व्यवस्था में पहले से ही मौजूद न हो. बल्कि अपने स्वार्थ के लिए ही सही, पूंजीवाद ने शिक्षा का सरलीकरण किया. उसे विभिन्न क्षेत्रों में फैलाया. इसलिए कि कारखानों और बाजार पर पकड़ बनाए रखने के लिए उसे विभिन्न क्षेत्रों के कुशल पेशवरों की जरूरत थी. पूंजीवाद ने दुनिया को नवीनतम शोध दिए, जीवन को सुविधामय बनाया. संचार, यातायात, कृषि, चिकित्सा, आवास आदि अनेक क्षेत्र हैं जहां पूंजीवाद ने सफलता का परचम लहराया लेकिन हमें मालूम होना चाहिए कि इन्हीं क्षेत्रों में ऐसी कई चूक भी हुई हैं, जिन्हें विज्ञान का अभिशाप कहा जा सकता है. पूंजीवादी सोच के चलते नई चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार हुआ, जिससे जीवन संभाव्यता में आशानुरूप सुधार हुआ. बड़ी महामारियां अब प्रायः नहीं आतीं. लेकिन पूंजीवाद ने जो कुछ किया वह सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए किया है. उसने तनाव कुंठा, हृदयरोग, रक्तचाप, जैसी बीमारियां भी दी हैं. पूंजीवादी तंत्र द्वारा विकसित किए गए रिऐक्टरों ने विद्युत उत्पादन की ओर कदम बढ़ाया है तो ऐसे परिस्थिकीय संकट भी पैदा किए हैं, जिनसे जब-तब सभ्यता पर संकट मंडराने लगता है.

पूंजीवाद का स्वभाव है कि वह हर काम में अपना मुनाफा देखता है. जिसमें उसका लाभ न हो उसे वह अनुत्पादक मानता है. यहां लाभ का अभिप्राय मौद्रिक लाभ से है जो प्रायः पूंजीपति वर्ग का उत्प्रेरक होता है. सहकार जैसे गैरपूंजीवादी उपक्रम मौद्रिक लाभ के बजाय सामाजिक लाभों को वरीयता देते हैं. जबकि पूंजीवाद ऐसे उत्पाद जिससे केवल जनता को लाभ हो और पूंजीपति को अपेक्षित धनलाभ न पहुंचता हो, उन्हें अनुत्पादक मानकर उनकी ओर से वह मुंह फेरे रहता है. उदाहरण के रूप में हम साइकिल और हल को ले सकते हैं. साइकिल आम आदमी की जरूरत है, हल भारतीय किसान की. आजादी से पहले भी साइकिल और हल का मूलभूत आकार-प्रकार ऐसा ही था, जैसा आज है. यही हल के साथ है. उसका रूप पिछले पचास-सौ वर्ष में अपरिवर्तित रहा है, जबकि इस बीच विज्ञान ने अवर्णनीय तरक्की की है. इसके बावजूद इन लोकोपयोगी यंत्रों की कार्यक्षमता में सुधार लाने के लिए कोई शोध पिछले पांच-छह दशकों में नहीं हुआ, जबकि कार, रेफरीजरेटर, टेलीविजन, कंप्युटर, मोबाइल जैसी वस्तुओं के दिन-प्रतिदिन नए-नए माॅडल बाजार की शोभा बढ़ाते रहते हैं. चूंकि अधिकांश शोधों में पूंजीपति का धन लगा होता है, अतएव उनका विस्तार उन्हीं क्षेत्रों में होता है, जहां पूंजीपति के वर्गीय हित साधे जा सकें. पूंजीवादी का स्वार्थ नवीनतम उपभोक्ता वस्तुओं तथा उनके नए-नए माॅडल विकसित कर बाजार पर एकाधिकार कायम करने तक सीमित नहीं होता. बल्कि वह उत्पादन पद्धति का भी निरंतर स्वचालीकरण करता जाता है, जिससे उत्पादन में श्रमिकों का योगदान घटता है. इससे बेरोजगारी बढ़ती है और मनुष्य की उपयोगिता पूंजीपति के निए नए बाजारों की खोज तक सिमटकर रह जाती है. कह सकते हंै कि पूंजीवादी व्यवस्था में मनुष्य को जो मिला है, उसकी बहुत बड़ी कीमत उसको अदा करनी पड़ी है. इसमें मनुष्य को सबसे बड़ा आघात यह जानकर लगता है कि पूंजीपति की निगाह में उसका मूल्य महज एक उपभोक्ता जितना है, जो उसके मुनाफे के लिए उसके कारखानों में अपना श्रम बेचता है, प्राप्त मजदूरी से अपनी आवश्यकता की वस्तुएं खरीदता है, और उनके उपभोग द्वारा इतनी ऊर्जा अर्जित कर लेता ताकि अगले दिन कारखाने में जाकर पूंजीपति के लिए काम कर सके. पूंजीपति मजदूरी के रूप में उसको इतना ही देता है, जिससे वह तैयार होकर अगले दिन काम पर आ सके. अपने प्रत्येक उपभोक्ता को वह लाभ के उपकरण के रूप में देखता है और निरंतर इस प्रयास में रहता है कि लाभानुपात को कैसे बढ़ाया जाए. इस बीच वह अपना शोषणकारी चेहरा कतई सामने नहीं आने देता. इसके उलट जो सामने आता है, वह दाता का पूरी तरह बनावटी चेहरा होता है, जिसको और लोकलुभावन बनाए रखने के लिए वह अपने साथ समाज-विज्ञानियों, अर्थशास्त्रियों और राजनीतिज्ञों की पूरी फौज रखता है, जो लगातार उसका महिमामंडन करते रहते हैं. अपने पक्ष में शास्त्रीय समर्थन जुटाए रखने के लिए वह दान का सहारा लेता है. अपनी पूंजी के नितांत छोटे हिस्से का उपयोग वह दान और लोककल्याण के नाम पर करता है, इससे धर्म और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में लगी शक्तियां अनायास ही उसकी ओर आकर्षित होती हैं. पूंजीपति इस अवसर का उपयोग अपने उत्पाद के लिए नए अवसरों की खोज तथा पूंजीवाद के प्रति सहानुभूति अर्जित करने के लिए करता है. दान, चैरिटी आदि की मद में खर्च की गई धनराशि पर वह सरकार से कर लाभ अर्जित करता है. राजसत्ता और धर्मसत्ता का समर्थन पूंजीपति को समाज में अतिरिक्तरूप से प्रतिष्ठित करता है. इससे सरकार और अन्य संस्थाओं का ध्यान उसके शोषण की ओर नहीं जा पाता.

सामंतवाद में सहायक की भूमिका में धर्म होता है. वहां यह प्रसारित किया जाता है, ज्ञान की सभी धाराएं तथा उसके समस्त प्रकल्प, माध्यम आदि एकमात्र धर्म से जन्मते तथा उसी में समाते चले जाते हैं. इसलिए सामंतगण धर्माचारियों, पुरोहितों, तांत्रिकों को अपने सान्न्ध्यि में रखा करते थे. पूंजीवाद का धर्म के प्रति रवैया कभी आलोचनात्मक तो कभी सहयोगकारी होता है. चूंकि पूंजीवादी कारखानों में सभी प्रकार के उत्पाद विनिर्मित होते हैं, इसलिए उसको अपनी छवि सर्वहितैषी, सर्वकल्याणक, सर्वसहयोगी की गढ़नी पड़ती है. वह परंपरा-पोषक और परंपराभंजक साथ-साथ होता है. अपने नए उत्पादों को खपाने के लिए वह उपभोक्ता के मनस् में अपनी आधुनिक छवि गढ़ता है, ताकि वैज्ञानिक शोधों के आधार पर नए उत्पाद बाजार में लाकर उनसे मुनाफा कमा सके. प्रत्येक धर्म अपने कुछ विशिष्ट प्रतीकों एवं कर्मकांडों से पहचान पाता है. वही बहुसंख्यक वर्ग की जीवनशैली को निर्धारित करते हैं. उनके पीछे बड़ा बाजार होता है. पूंजीपतियों का एक वर्ग इन्हीं कर्मकांडों, प्रतीकों में बाजार की नई-नई संभावनाएं खोजता हुआ भाड़े के पुरोहितों, पंडितों, आचार्यों की सहायता से उनसे जुड़ी वस्तुओं का बाजार विनिर्मित करता है. कह सकते हैं कि पूंजीवाद एक ओर तो समाज में ज्ञान-विज्ञान के नए-नए रूपों को स्थापित करने हेतु प्रयासरत होता है, दूसरी ओर वह धर्म और अध्यात्म पर प्रायोजित बहसें चलाकर उनका अधिक से अधिक स्थूलीकरण करता चला जाता है. परिणामस्वरूप धर्म और अध्यात्म की दूरी लगातार बढ़ती जाती है. यह स्थिति धर्म के बाजारीकरण के लिए मददगार सिद्ध होती है. आवश्यकता पड़ने पर वह धर्म की आलोचना करता है, लेकिन वहां भी उसका ध्यान अपने लिए नए बाजारों की खोज पर होता है. इस तरह धर्म की आलोचना करते-करते पूंजीवाद उसके सहायक की भूमिका में आ जाता है. इसके उदाहरण के रूप में कांबड़ यात्रा को ले सकते हैं. बाजार और पूंजीवाद के आसरे पल रहे बुद्धिजीवियों तथा लोकप्रिय राजनीति के जरिये सत्ता की वैतरिणी से गुजरने की चाहत रखने वाले राजनीतिज्ञों के लिए कांबड़ियों की बरसोंबरस बढ़ रही संख्या, अपने-अपने प्रभावक्षेत्रों का विस्तार करने का अनूठा अवसर सिद्ध होती है. इसलिए तमाम असुविधाओं के बावजूद पूंजीवाद के प्रभावक्षेत्र वाले समाचारपत्र तथा समाचार चैनल उन यात्राओं की प्रशंसा ही करते हैं. इससे यात्रियों का जोश बढ़ता है और उनकी संख्या भी. पूंजीवाद यात्रापयोगी वस्तुओं के उत्पादन-वितरण द्वारा वहां भी लार्भाजन का अवसर खोज लेता है. लाभ की यह प्रवृत्ति अंतहीन होती है, जो सामाजिक शुचिता, पवित्रता, शांति, सद्भावना और मानवीय सौहार्द की कीमत पर निरंतर बढ़ती जाती है.

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मनुष्य को उपभोक्ता से अधिक कुछ न समझने वाला, मशीन को जीवित मनुष्य ये अधिक महत्त्व देने वाला पूंजीवाद मनुष्यता का भविष्य नहीं हो सकता. तो क्या साम्यवाद मनुष्यता का भविष्य बन सकता है? सर्वहारा क्रांति का आवाह्न करते समय मार्क्स ने तो यही कहा था कि भविष्य साम्यवाद का है. पूंजीवाद तो अपनी करनी आप भुगतेगा. अपने ही हाथों उसका सर्वनाश होगा. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. उल्टे बीसवीं शताब्दी में साम्यवाद के जो गढ़ बने थे, शताब्दी का उत्तरार्ध आते-आते वे एक-एक कर स्वयं ढहते चले गए. अतः एक स्वाभाविक-सा प्रश्न उपजता है कि पूंजीवाद से निपटने का सही रास्ता क्या हो? समाज में उत्तरोत्तर बढ़ती उपभोक्तावादी ललक, आर्थिक-सामाजिक विषमताओं पर काबू कैसे पाया जाए? बाजार में व्याप्त स्पर्धा और एकाधिकारवाद को किस प्रकार परस्पर पूरक, सहयोगी, सर्वोपकारी एवं सौहार्दमय उत्पादनतंत्र में बदला जाए? इतना तो हम मान ही चुके हैं कि पूंजीवाद बेहतर विकल्प नहीं है. इसलिए यदि अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई को रोकना है, यदि संस्कृति को बाजार बनने से बचाना है, यदि मनुष्य के उत्तरोत्तर उपभोक्ताकरण पर अंकुश लगाना है, यदि इस पृथ्वी और यहां के वासियों को परिस्थितिकीय संकट से उबारते हुए स्पर्धा रहित, समानतामूलक और सहयोगाधारित समाज की रचना करनी है, यदि आपसी अंतद्र्वंद्व, डर, पीड़ा, घुटन, संत्रास, वेदना, तनाव, ईष्र्या, द्वैध, चिंता और आपाधापी से भरे समाज को विवेकवान, संवेदनशील, सौहार्दमय, सदभावना और सामंजस्य पूर्ण बनाना है, तो पूंजीवाद के प्रेत को बोतल से बाहर छोड़ देना नासमझी है. लेकिन पूंजीवाद को यह बढ़त आसानी से नहीं मिली. इसके पीछे भी कहीं न कहीं मार्क्स वाद की दुर्बलताएं छिपी हैं. वैचारिक जकड़बंदी द्वारा मार्क्स वाद यह तो दर्शा ही चुका है कि उसके आधार पर समतामूलक, सर्वकल्याणकारी विश्व-समाज का गठन संभव नहीं. इसलिए कि परंपरागत धर्म की आलोचना के साथ उसके निषेध का नारा लगाने वाले मार्क्स वाद ने अपने प्रभावक्षेत्र के विस्तार के लिए अंततः उन्हीं रास्तों का उपयोग किया जिन्हें धर्म बहुत पहले अपनाता आया था. इसमें बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों की मार्क्स और उसके विचारों के प्रति अंधश्रद्धा भी सम्मिलित है. ऐसा नहीं है कि इस बीच मार्क्स वाद के स्वस्थ आलोचना बिलकुल संभव न हो सकी, किंतु इतना अवश्य हुआ कि मार्क्स वाद के आधार पर गठित राज्यों के स्वस्थ सैद्धांतिक आलोचना को भी असहनीय बनी रही. परिणाम यह हुआ कि मार्क्स वाद में वे सभी जड़ताएं, टोटम और विकार घर करते गए, जो परंपरागत धर्म के क्षरण का कारण बने थे या जिनके कारण धर्म रूढ़िवाद का शिकार होकर जीवन से पलायनोन्मुखी बन जाता है. यहां तक कि साम्यवाद की जिस सैद्धांतिकी को मार्क्स ने अपने जीवन के उत्तरार्ध में विकसित किया था, वैचारिक अंधश्रद्धा के चलते वह निरंतर प्रदूषित होती चली गई और मार्क्स वाद साम्यवाद के अपने ही लक्ष्य के दूर, ‘सर्वहारा के अधिनायकवाद’ तक सिमट कर रह गया, जिसके खतरे के बारे में स्वयं मार्क्स ने आगाह किया था.

उपर्युक्त विश्लेषण का अभिप्राय यह नहीं कि मार्क्स वाद अप्रासंगिक हो उठा है.उनमें अब भी काफी कुछ मौलिक और समाज को बदलने का सामथ्र्य मौजूद है. अतएव आवश्यकता उससे मुक्ति की न होकर उसके परिष्करण की है. बीसवीं शताब्दी में मार्क्स वाद की इस आधार पर तीखी आलोचना की गई कि उसने राज्य के समक्ष मनुष्य सत्ता को अत्यधिक बौना कर दिया है. विशेषकर रूसो के स्वाधीनतावाद, मिल के व्यक्ति-स्वातंत्रय, थाॅमस पेन(1737—1809) के मानवाधिकारवादी विचारों के प्रवाह तथा लोकतंत्र की बयार ने ‘व्यक्तिमात्र’ को महत्त्वपूर्ण बना दिया था. इससे लोकतांत्रिक समाजवाद की प्रतिष्ठा और स्वीकार्यता बढ़ी. किंतु लोकतंत्र की अपनी दुर्बलताएं हैं. जनमत के वास्तविक मुद्दों से भटकने के साथ ही उसको अल्पसंख्यक का राजतंत्र बनते देर नहीं लगती. चुने गए जनप्रतिनिधि अपनी विशिष्टताबोध को बनाए रखने के लिए पूंजी की शरण में चले जाते हैं. इससे विकास के वास्तविक मुद्दों से लोगों का ध्यान हट जाता है. पूंजीवाद की निगाह में मानवमात्र एक उपभोक्ता है. वह उसको उपभोग के लिए स्वतंत्र देखना चाहता है. इसी के चलते समाजवादी विचारधारा के पूंजीवाद और समाजवाद के सभी आधुनिकतम रूप इस तथ्य से तो एकमत हैं कि मानव-स्वातंत्रय की रक्षा करनी चाहिए. दरअसल मानव-स्वातंत्रय ही एक ऐसा बिंदू है जिसपर ये दोनों एकमत हैं. इसलिए भविष्य का समाजार्थिक दर्शन ऐसा नहीं हो सकता जो मानव-स्वांतत्रय का विरोध करता हो. लेकिन यह भी ध्यान रखना अनिवार्य है कि मनुष्य मात्र का हित समाज के हित से अलग नहीं हो सकता. इसी को केंद्र में रखकर समाजवाद कहता है कि समाज में—सब एक के लिए काम करे और एक सबके कल्याण के प्रति समर्पित हो. मगर यह तभी संभव है जब प्रत्येक मनुष्य मुक्त हो. उसको यह एहसास हो कि वह समाज-कल्याण के निमित्त समर्पित है. दूसरी ओर यह भरोसा भी उसको हो कि संकट के समय वह कतई अकेला नहीं होगा. उसका संकट समाज का संकट होगा और समाज का प्रत्येक सदस्य व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से उसकी सहायता के लिए तत्पर होगा. व्यक्तिगत और सामाजिक आकांक्षाओं का रचनात्मक तालमेल ही एक सफल समाजदर्शन की पीठिका बन सकता है. बीसवीं शताब्दी के विचारकों के समक्ष सबसे बड़ी समस्या यह रही कि व्यैक्तष्ठि और समष्ठि में तालमेल कैसे बनाया जाए. कुछ इस प्रकार की व्यक्ति की अबाध स्वाधीनता के साथ उसकी कार्यक्षमता और सामाजिक प्रतिबद्धताएं भी अप्रभावित बनी रहे. समाज में आर्थिक विषमता फैलाए बिना विकासदर बनी रहे. समष्ठिवाद, संघवाद, अराजकतावाद, सहजीवितावाद, श्रमिक संघवाद जैसी अनेक विचारधाएं इस कालखंड में उभरीं. जिन्होंने मार्क्स वादी गरिमा के साथ पूंजीवाद की असल मनोवृत्तियों को पकड़ते हुए समाजवाद के किंचित लाभों को भी अपनाते जाने पर जोर दिया. असल में मनुष्यता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती भी यही है कि किस प्रकार व्यक्तिहित और समाजहित में तालमेल बनाया जाए. बीसवीं शताब्दी में समष्ठिवाद, श्रमिकसंघवाद, अराजकतावाद और सहजीवितावाद, संगठनवाद समष्ठि में व्यैक्तष्ठि एवं समष्ठि में एक विश्व-समाज का दर्शन मानवाधिकारों की सुरक्षा, सहभागिता और सहअस्तित्व की जरूरी शर्तों पर अमल करने से ही निकल सकता है.

पूंजीवाद से मुक्ति की छटपटाहट

पूंजीवाद से मुक्ति की छटपटाहट अलग-अलग देशों में अलग-अलग तरीके से दिखाई पड़ रही है. कहीं वह आर्थिक औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया से आने के लिए उत्सुक है. तो कहीं समाज में बड़ी आर्थिक असमानता अंतःसंघर्ष की स्थिति पैदा कर रही है. और असंतुष्ट वर्ग शोषण से मुक्ति के लिए आर्थिक व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहे हैं. कुछ देशों में जनता में बढ़ रहा क्रांतिबोध तानाशाही से मुक्ति का जोश पैदा कर रहा है. विशेषकर 2011 के प्रारंभिक महीनों लीबिया, यमन, मिश्र में नागरिक चेतना ने जो अंगड़ाई ली, उसने अन्याय और दमन की प्रतीक सामंती सत्ताओं को हिलाकर रख दिया है. उनका संघर्ष अभी जारी है, हालांकि पूंजीवाद आधुनिकता और व्यक्तिस्वांत्रय के नाम पर आंदोलन को अपने प्रभाव में लेने का प्रयास कर रहा है. इससे उसकी सफलता की संभावनाएं इसलिए भी हैं, ये जनक्रांतियों आधुनिक संचार तकनीक पर अतिरिक्तरूप से निर्भर हैं. ऐसा कोई वैश्विक क्रांतिकारी चेहरा इनके पीछे नहीं है, जिसमें लोगों का लंबे समय तक नेतृत्व करने का सामथ्र्य हो, न ही कोई बड़ा विचार इसके पीछे है, जो अपने साथ लोगों को बांधे रख सके. इसलिए यह प्रश्न अब भी अपनी जगह है कि बीसवीं शताब्दी में समाजवाद का क्या रूप होगा. राज्य आश्रित समाजवाद अपनी असफलता दर्शा चुका है. बीसवीं शताब्दी में सोवियत क्रांति की असफलता के बाद एक के बाद एक कई देशों ने राज्य-आश्रित समाजवाद को अपना था. परंतु देखा गया कि सत्ताएं अपना मूल चरित्र कभी नहीं बदलतीं. इसी कारण जनमत के दबाव में जिन देशों ने राज्याश्रित समाजवाद को अपनाया गया था, वे सभी एक-एक कर पूंजीवाद की शरण में जाते रहे. समाजवादी व्यवस्थाओं की इस अवस्था पर बुद्धिजीवियों ने विचार कर कुछ सुझाव भी दिए. इससे समाजवादी राजनीतिक दर्शन के नए रूप सामने आए. अराजकतावाद, श्रमिकसंघवाद, समष्ठिवाद, सहजीवितावाद आदि राजनीतिक दर्शन नए न होकर भी इसलिए चर्चा का विषय बने कि उनीसवीं शताब्दी में मार्क्स वाद की आंधी में इन नए विचारों की विद्वानों का ध्यान की नहीं कहा गया है. अधिकांश बुद्धिजीवी-राजनेता जिनमें लेनिन ट्राटस्की, रोजा लेक्समबर्ग, अंतोनियो ग्राम्शी आदि सम्मिलित हैं, मार्क्स वाद के भीतर रहकर भी उसमें संशोधन-परिष्करण के पक्ष में थे. कालांतर में मार्क्स वाद की विश्वव्यापी असफलता ने अराजकतावाद, श्रमिकसंघवाद, समष्ठिवाद आदि समाजवाद की समानधर्मा विचारधाराओं को एकाएक चर्चा के केंद्र में ला दिया. मार्क्स वाद के विकल्प के रूप में बीसवीं शताब्दी में तेजी से उभरी इन विचारधाराओं की प्रमुख कमजोरी यह है कि ये साम्यवाद-मार्क्सवाद की भांति साधारणजन के बीच अपनी पैठ बनाने में असफल सिद्ध हुई हैं. इसलिए बीसवीं शताब्दी के प्रमुख प्रतिभाशाली दार्शनिकों, विचारकों ने समाजवाद के इन युवा प्रकल्पों को अपनी रचनात्मक मेधा से समृद्ध किया है, तथापि ये जनमानस में पैठ न होने के कारण ये अकादमिक बहसों का हिस्सा जान पड़ती हैं. हालांकि सहजीवितावाद, श्रमिकसंघवाद के समर्थकों की संख्या अमेरिका जैसे ठेठ पूंजीवादी देश में भी है. लेकिन वे किसी प्रभावकारी भूमिका में नहीं हैं.

स्वयं को पूंजीवाद का विकल्प कहने वाले ये राजनीतिक-आर्थिक दर्शन किसी न किसी रूप में राज्य नामक संस्था का विरोध करते हैं तथा उसकी उपस्थिति को समाजवाद और श्रमकल्याण पर संकट के रूप में देखते हैं, परंतु कानून-व्यवस्था पर आए आसन्न संकट से निपटने, बाहरी आक्रमण के सामय देश-समाज की अस्मिता की सुरक्षा के लिए कोई सशक्त और संदेहरहित विकल्प इनके पास नहीं है. वे यह मान लेते हैं कि दुनिया के प्रायः सभी देशों में श्रमिकों की समस्या तथा उनकी चुनौतियां एक समान हैं, अतएव समाजवाद की ओर बढ़ते श्रमिक संगठन स्वयं को विश्व-समुदाय का अभिन्न अंग समझेंगे. इस तरह सीमाओं के संघर्ष, बाहरी आक्रमण जैसी स्थितियां ही नहीं रहेंगी. पूरा विश्व समाजवाद के झंडे के नीचे होगा. इस आदर्शोन्मुखी परिकल्पना को भारत में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के नाम से जाना जाता है. परंतु वे भूल जाते हैं कि राज्यों का निर्माण केवल केवल राजनीतिक-आर्थिक कारणों से नहीं होता. धर्म भी राज्य-निर्माण में महती भूमिका निभाता है. आज भी दुनिया के पचास प्रतिशत देशों में धर्म निर्णायक शक्ति बना हुआ है. पाकिस्तान जैसे देशों का तो गठन ही धर्म के आधार पर हुआ है. ऐसे देशों को श्रमिकसंघों की परिसीमा में कैसे लाया जाएगा, इसके बारे में ये विचारधाराएं कोई सुझाव नहीं देतीं. फिर धर्म स्वयं में गजब की संगठन शक्ति रखता है. बल्कि आर्थिक मसलों से अधिक संगठन की सामथ्र्य धर्म में देखी गई है. अधिकांश धर्म अर्थोपार्जन को हेय दृष्टि से देखते हैं. ऐसे में धर्माधारित संगठनों, समूहों को समाजवाद की परिसीमा में कैसे लाया जाएगा, इसके बारे में भी कोई सुझाव समाजवाद के इन नए प्रकल्पों के पास नहीं है. शायद इसीलिए वे धर्म को उपेक्षित कर आगे बढ़ जाना चाहते हैं. कहा जा सकता है कि धर्म को लेकर समाजवाद के नए प्रकल्प भी उसी गलतफहमी का शिकार हैं, जो गलतफहमी कभी मार्क्स वाद ने की थी. जिसके कारण साम्राज्यवादी-सामंतवादी ताकतों को उसकी आलोचना का आधार मिला और अनेक ऐशियाई देशों में मार्क्स वाद आते-आते रह गया. समाजवाद के ये प्रकल्प मनुष्य को आर्थिक-राजनीतिक प्राणी के रूप में देखते हैं. जबकि ‘अर्थ’ और ‘राज्य’ के अलावा भी मनुष्य की चेतना को प्रभावित करने वाले अनेक कारक हैं. एक कारक संस्कृति भी है, जो मनुष्य की पूरी जीवनपद्धति को प्रभावित करती है. ग्राम्शी ने संस्कृति के आधार पर ही समाज में पलने वाले वर्गभेद की व्याख्या की है.

धर्म नैतिकता का उपयोग आध्यात्मिक मान्यताओं के अवलंबन के रूप में करता है. अध्यात्म चेतना मानव-मात्र का विषय है. हर कोई सृष्टि और जीवन के रहस्यों को लेकर विशिष्ट सोच रखता है. धर्म नहीं मान्यताओं का सामान्यीकरण करता है. उनके प्रकटीकरण हेतु कुछ कर्मकांडों का विधान रचता है. धर्म का मूल्य समाजीकरण का विषय है, अपने औचित्य को बनाए रखने के लिए ही धर्म नैतिकता का सहारा लेता है. तो क्या समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए राज्य का धर्म की शरण में आना उपयुक्त स्थिति है? क्या समाजवाद को समर्पित कोई राज्य धर्म का उपयोग अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक उपकरण के रूप में कर सकता है? इसका उत्तर ‘न’ में है. इसलिए कि धर्म की नींव भले ही कुछ मानवमात्र की अध्यात्मिक जिज्ञासा के निदान और कुछ नैतिक मान्यताओं पर रखी जाती हो, परंतु जिस आध्यात्म संपदा को वह अपनी धरोहर मानता है, उसका पूरा का पूरा अभिकल्पन सामंती परिवेश से युक्त होता है. प्रत्येक धर्म सृष्टि के मूल में किसी सर्वशक्तिमान सत्ता के योगदान की बात करता है. जो इतना शक्तिसंपन्न है कि बैठे-ठाले संकेतमात्र से अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर सकता है. सर्वगुणसंपन्नता को महत्त्व दिए जाने का यही संस्कार कुछ लोगों को दूसरों से स्वयं को श्रेष्ठ ठहराने का बहाना देता है. ईश्वर की यह अभिकल्पना समाज के शीर्षस्थ वर्ग द्वारा अपनी श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए की गई है. इसके अनुसार जो बैठे-ठाले सबकुछ सहजता से प्राप्त कर सके, जिसको परिश्रम करना ही न पड़े वही श्रेष्ठ है. जबकि समाजवाद का प्रयास होता है, समस्त सुखों में सभी की साझेदारी. इस दायित्व के लिए वह राज्य को नियुक्त करता है तथा समस्त संसाधन उसके अधीन रखने का सुझाव देता है. यह देखते हुए कि सत्ता का प्रत्येक रूप कभी न कभी तानाशाही का रूप ले लेता है, समाजवाद के आधुनिक संस्करण राज्यसत्ता का विरोध करने लगे हैं. समाजवाद के इन नए प्रकल्पों के अनुसार समाजवाद विशिष्टता का नहीं साधारणतम के संगठित प्रयास की परिणति होता है. इस प्रकार वह धर्म की सैद्धांतिकी जो किसी न किसी सर्वशक्तिमान केंद्रीय सत्ता पर विश्वास रखती से विपरीत आचरण रखता है. आध्यात्मिकता की खोज के लिए धर्म का नारा होता है—‘स्वयं को पहचानो.’

अकेले व्यक्ति की अंतर्यात्रा समाजवाद के लिए विशिष्ट महत्त्व नहीं रखती. इसलिए वह नारा देता है उल्लेखनीय है कि भारत, श्रीलंका आदि ऐशियाई देशों में समाजवाद की असफलता का एक कारण यह भी रहा कि वहां की जनता सहòाब्दियों से धर्म और राजशाही की जकड़न में रहने के कारण लोकतांत्रिक परिवेश में रहने का अभ्यास भूल चुकी थी. उस जकड़न से बाहर लाने के लिए जब-जब इन देशों में प्रयास किया गया, तब तक रूढ़िवादियों ने उसको धर्म और संस्कृति पर हमला बताकर लोगों के चिंतन की धारा ही पलट दी. ‘खुद को पहचानो(नो दाइसेल्फ)’ के स्थान पर नए मनुष्य का नारा होना चाहिए—‘अपने जैसा बनो(बी दाइसेल्फ). अर्थात वह बनो, जो तुम बनना चाहते हो. उन लोगों के साथ जुड़ो जो तुमको पसंद हैं. उस संगठन अथवा समूह के साथ हितों का साझा करो, जिसको तुम्हें सर्वाधिक हितकारी लगता हो. वह करो जिससे तुम्हें अधिकतम लाभ की संभावना हो. ‘स्वैच्छिक सहभागिता’ आधुनिक समाजवादी चिंतन का मूल सिद्धांत है. आस्कर वाइल्ड का कहना है—

सभी संगठन पूर्णतः स्वैच्छिक होने चाहिए. केवल स्वैच्छिक संगठनों में ही मनुष्य पूर्णतः प्रसन्न रह सकता है.’

स्वैच्छिक सहभागिता उन्हीं समाजों में संभव है, जहां लोगों को अपने मन का करने की आजादी हो. जहां लोकतांत्रिक परिवेश हो. इसका दूसरा छोर ‘व्यक्तिवाद’ की ओर जाता है. समाजवाद में राज्य की मर्जी सर्वोपरि होती है. वहां व्यक्ति-विशेष के बजाय संपूर्ण समाज के कल्याण पर जोर दिया जाता है. प्रश्न उठता है कि क्या व्यक्तिवादी माहौल में समाजवाद की उपस्थिति संभव है? यदि सभी को अपने मन की करने, मर्जी का व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता होगी तो फिर लोग दूसरों से क्यों जुड़ेंगे? क्यों कोई दूसरे के लिए अपने सुख का बलिदान करने को तैयार होगा? जबकि इच्छाओं का सामान्यीकरण समाजवाद की पहली शर्त है. व्यक्तिवादी वातावरण में पूंजीपति को कैसे दोषी ठहराया जा सकता है, क्योंकि उसका संपत्ति अर्जित करने का चाहे जो रास्ता रहा हो, है तो आखिर वह भी एक व्यक्ति ही? उसको भी इच्छानुरूप व्यवसाय चुनने की उतनी ही स्वतंत्रता है, जितनी दूसरों को! और यदि सभी अपनी मर्जी की करने को स्वतंत्र होंगे तो व्यक्तिगत कामनाओं और लालचों पर कैसे अंकुश साधा जाएगा? आर्थिक विषमता को कैसे कठघरे में लाया जा सकता है? समाजवादियों के लिए तो ये सब पुरानी समस्याएं हंै. इसके लिए वे राज्य को अतिरिक्तरूप से अधिकार-संपन्न बनाने पर जोर देते हैं. जबकि समाजवाद के आधुनिक संस्करण यह मानकर कि राज्य का चाहे जो स्वरूप हो, वह अंततः मनमाना आचरण करने लगता है, राज्य का ही निषेध करते हैं. यद्यपि आजकल यह माना जाने लगा है कि लोकतांत्रिक समाजवाद राजनीतिक दर्शन की सर्वोच्च उड़ान है, तथा उससे परिपक्व राजनीतिक दर्शन की परिकल्पना संभव ही नहीं है. पर इन सभी का एक निहितार्थ है. वह है व्यक्तिगत संपत्ति का निषेध. समाजवाद के नए रूप व्यक्तिगत संपत्ति का परोक्षतः निषेद्ध करते हुए उसको सामूहिक अधिकारिता में ले आना चाहते हैं. लेकिन इन्हें अमेरिका तथा यूरोप के उन देशों में ही सफलता मिल पाई है, जहां पूंजीवाद पहले से ही काफी मजबूत है. भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देशों में में जहां पूंजीवाद अपनी जड़े तेजी से गहरी करता जा रहा है, और उसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं, समाजवाद के नए प्रकल्प समष्ठिवाद, सहजीवितावाद, श्रमिकसंघवाद, संगठनवाद यहां उतने असरकारक नहीं बन पाए. आखिर क्यों? असल में ये समाज धर्म और क्षेत्रीयता की जकड़बंदी में इतने गहरे फंसे हैं कि उससे बाहर निकल पाना इनके लिए संभव ही नहीं हो पा रहा है. भारत में तो धर्म के अलावा जाति भी समाज को बांटने वाला प्रमुख कारक है, जिसके चलते यहां व्यक्तिगत संपत्ति का निषेध कर पाना संभव नहीं हो पाया है. जाति की विशेषता है कि वह जन्म के आधार पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्वतः अंतरित होती है. जाति के साथ व्यक्ति के व्यवसाय की अवधारणा भी जुड़ी है. प्रत्येक व्यक्ति जब जन्मना आधार पर अपने व्यवसाय से जुड़ा है तो उसके आधार पर होने वाले हानि-लाभ और संपत्ति संबंधी अधिकारों से उसको वंचित कर पाना जातिप्रथा पर प्रहार किए बिना संभव ही नहीं है. लेकिन इन देशों मंे तेजी से बढ़ती आर्थिक असमानता और पूंजीवाद की मनमानी के चलते यह बात साफ हो चली है कि जनता लंबे समय तक शोषण को सह नहीं पाएगी. और जनता का संघर्ष आज का नहीं है. यह शताब्दियों पुराना है, हालांकि भारत जैसे संस्कृति अधीन समाजों में उसकी धमक बहुत अधिक सुनाई नहीं पड़ती है, लेकिन यत्र-तत्र उसकी उपस्थिति का अनुभव आसानी से किया जा सकता है. यहां एक बार फिर पू्रधों को याद करना आवश्यक है. ‘संपत्ति क्या है?’ पुस्तक में वह सीयेस के ‘थर्ड एस्टेट’ के विचार को विस्तार देता हुआ कहता है—

यह थर्ड एस्टेट क्या है?’

कुछ नहीं!’

इसको क्या होना चाहिए?’

सब कुछ.’

राजा क्या है?’

जनता का सेवक’

यदि राजा हमारा सेवक है तो उसका कर्तव्य है हमें रिपोर्ट करे, हमारा आदेश माने.’

यदि वह हमें रिपोर्ट करता, हमारा आदेश मानता है तो वह हमारे नियंत्रण में है.’

यदि वह हमारे नियंत्रण में है तो उसकी कुछ जिम्मेदारियां हैं.’

यदि उसकी कुछ जिम्मेदारियां हैं तो उसको दंडित किया जा सकता है.’

यदि उसको दंडित किया जा सकता है तो उसको उसके अपराध के अनुसार दंड जाएगा.’

यदि उसको अपराध के अनुसार दंड जाएगा तो उसको मृत्युदंड भी संभव है.’

उल्लेखनीय है कि जिस समय सीयेस ने थर्ड एस्टेट को लेकर अपनी मामूली पंपलेट के आकार की थी पुस्तक लिखी, उस समय फ्रांसिसी जनता की हालत बहुत बुरी थी. राजा और अधिकारी विलासिता में डूबे थे. ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार व्याप्त था. धर्मसत्ता राजनीति से सांटगांठ कर जनता को बरगलाती और मजे लूटती थी. आम जनता की कहीं सुनवाई न थी. अपनी दुर्दशा के कारण जनसाधारण के मन में धर्मसत्ता और राजसत्ता के प्रति आक्रोश पनप रहा था. उसको हवा देने के लिए कवि, लेखक, साहित्यकार, विचारक, दार्शनिक अपनी-अपनी तरह से प्रयास कर रहे थे. समाज और जनाकांक्षाओं का नए सिरे से विश्लेषण किया जा रहा था. सीयेस और समकालीन विचारकों ने तत्कालीन फ्रांसिसी समाज को तीन हिस्सों में बांटा है. प्रथम एस्टेट, द्वितीय एस्टेट तथा तृतीय एस्टेट. प्रथम एस्टेट में धर्माचार्य और पुरोहित वर्ग सम्मिलित थे, जिनपर कथित रूप से धर्म के संचालन की जिम्मेदारी थी. प्रथम एस्टेट में हालांकि कोई औपचारिक विभाजन न था, तो भी भीतर ही भीतर यह वर्ग दो प्रमुख भागों ‘उच्च’ एवं ‘निम्न’ वर्ग में विभाजित था. पहले वर्ग में बिशप तथा चर्च के प्रतिष्ठित अधिकारीगण आते थे, जो धर्मसत्ता में ऊंचा स्थान रखते थे. दूसरे वर्ग में सहायक पादरी, नर्स, चर्च के सेवादार आदि आते थे, जिनकी संख्या प्रथम एस्टेट के कुल सदस्यों की संख्या का 90 प्रतिशत थी. 1789 यानी सीयेस के जीवनकाल में प्रथम एस्टेट के सदस्यों की संख्या लगभग 130000 थी, जो उस समय की फ्रांस की कुल जनसंख्या का आधा प्रतिशत थी.

द्वितीय एस्टेट में फ्रांस के अभिजन तथा राजकुल से जुड़े लोग आते थे. यह वर्ग राजसत्ता के निकटस्थ था और स्वयं को धर्मसत्ता के अधीन मानता था. हालांकि उसकी अपनी सत्ता भी धर्मसत्ता के समानांतर थी. इस वर्ग में वरिष्ठ नौकरशाह, सेनापति, उच्च राजकीय अधिकारी वगैरह भी आते थे, जो उन दिनों के कानून के अनुसार केवल अभिजन वर्ग के हो सकते थे. वे समाज के प्रतिष्ठित नागरिक माने जाते थे. उनसे जबरन काम नहीं लिया जा सकता था. इस वर्ग को प्रत्यक्ष कर संबंधी छूट भी प्राप्त थी. द्वितीय एस्टेट के सदस्यों का संख्यानुपात फ्रांस की कुल जनसंख्या का मात्र 1.5 प्रतिशत था. शेष 98 प्रतिशत जनसंख्या तृतीय एस्टेट के अंतर्गत आती थी. एक तरह से यह छोटे व्यापारियों, उत्पादकों का समूह था, जो बहुसंख्यक होकर भी अधिकार और संपत्ति के मामले में बहुत पिछड़े हुए थे. तृतीय एस्टेट में भी दो प्रकार के लोग थे. 8 प्रतिशत हिस्सा शहरी सीमा में रहने वाले नागरिक वर्ग का थे. उनमें से अधिकांश व्यापारी, नौकरशाह और वेतन भोगी मजदूर थे. बाकी 90 प्रतिशत में ग्रामीण किसान, खेतिहर मजदूर, मिल मजदूर आदि सम्मिलित थे. तृतीय वर्ग के पास अपनी कोई संपत्ति नहीं थी. न उन्हें राजनीति में हिस्सा लेने के अवसर प्राप्त थे. अपनी कोई संपत्ति न होने के कारण यह वर्ग अपनी जीविका के लिए अभिजन जमींदारों, नौकरशाहों के अधीन कार्य करने को विवश था. बदले में उन्हें जो वृत्तिका प्राप्त होती थी, उसका बड़ा हिस्सा उनसे कराधान के रूप में वापस ले लिया जाता था. इस वर्ग में छोटे शिल्पकार भी सम्मिलित थे, जिनके व्यवसाय मशीनीकरण के कारण तेजी से छिन रहे थे. रोजगार का संकट, गरीबी, कराधान की लगातार बढ़ती दरें आदि तृतीय एस्टेट के सदस्यों की कुछ सामान्य समस्याएं थीं, जो उन्हें एक करती थीं. फ्रांसिसी क्रांति दरअसल इसी तृतीय स्टेट के आक्रोश की परिणति थी. सीयेस के पुस्तिका ने जादूई असर किया था. प्रूधों लिखता है कि सीयेस की पुस्तक के पांच वर्ष के अंदर ही स्थिति एकदम पलट चुकी थी. उसके बाद तीसरी स्टेट ही सबकुछ थी. सम्राट, अभिजन, तथा धर्माधिकारी वर्ग अपनी चमक-दमक गंवा चुके थे. फ्रांसिसी नवोदय की चमक पूरे यूरोप में कौंधी थी. इसके फलस्वरूप इंग्लेंड, जर्मनी, इटली, स्पेन आदि देशों में समाजवादी चेतना का विस्तार हुआ, हालांकि उसका स्वरूप विभिन्न देशों की परिस्थिति के अनुसार परिवर्तनशील था.

आधुनिक भारत की यदि तत्कालीन फ्रांसिसी समाज से तुलना करें तो स्थिति में बहुत अधिक अंतर नजर नहीं आता. बल्कि अठारवीं शताब्दी के फ्रांसिसी समाज की जो दुरवस्था थी, भारतीय समाज की स्थिति आज भी उससे कुछ अलग नहीं है. कहने को इस देश में लोकतंत्र है. मगर व्यवहार में पूरी राजनीतिक सत्ता पांच-छह सौ राजनीतिक परिवारों के बीच सिमटी हुई है. बारी-बारी से वही लोग सत्ता में आते रहते है. उनके बीच लोकतंत्रीय छूट का लाभ उठाकर यदि को नया प्रतिनिधि चुनकर आ भी जाए तो संसदीय बहुमत की राजनीति में उसकी आवाज नक्कारखाने में तूती बनकर रह जाती है. उच्च वर्ग के चक्रव्यूह को तोड़ने की न तो वह हिम्मत जुटा पाता है, न इसके लिए उसको व्यापक जनसमर्थन ही मिल पाता है. यही वर्ग अपने चहेतों के साथ राजनीतिक और उच्च नौकरशाही के रूप में सत्ता को कब्जाए रहता है. अर्थतंत्र की हालत भी इससे बेहतर नहीं है. देश के उत्पादन तंत्र पर भी लगभग चार-पांच सौ बड़ी कंपनियों का अधिपत्य है. उनमें भी मात्र आठ-दस उद्यमी ऐसे हैं जिनका पूरे व्यापारतंत्र के आधे से अधिक हिस्से पर कब्जा है. यह स्थिति तब है जबकि भारतीय संविधान में आर्थिक असमानता को उखाड़ फंेकने का आवाह्न किया गया है. संविधान से कट जाने के कारण ही भारतीय राजनीति और समाज में अनेकानेक बुराइयां आ चुकी हैं. संसदीय राजनीति का आज भले ही कोई विकल्प नजर न आता हो, किंतु यह भी सच है कि भारतीय लोकतंत्र में आज वे सभी बुराइयां आ चुकी हैं, जिनकी ओर प्लेटो ने संकेत किया था. लोकतंत्र के नाम पर भारतवासी अर्थसत्ता, धर्मसत्ता और कुलीतंत्र के मकड़जाल में जी रहे हैं. अस्सी प्रतिशत राजनीति विकास की परिधि से बाहर है. ऐसे में भारत के लिए सर्वाधिक उपयुक्त रास्ता जिससे यह देश पूंजीवादी प्रभुत्व के दायरे से बाहर आ सके कौन-सा हो सकता है? इसका एक विकल्प महात्मा गांधी ने सुझाया था. वह था ग्रामीण स्वराज्य और आर्थिक विकेंद्रीकरण का. वह अपने आप में एक बेहतर व्यवस्था हो सकती है. परंतु भारत के संबंध में उसकी उपयोगिता इसलिए संदेह से परे नहीं है, इसलिए कि यहां एक तो अशिक्षा का साम्राज्य है, विशेषकर गांवों में अभी भी पचास प्रतिशत आबादी अशिक्षितों की है, शिक्षितों में भी अल्पशिक्षित ही अधिक हैं. उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों की जनसंख्या तो पढ़े-लिखों का पांच-छह प्रतिशत ही है. दूसरा कारण जो इससे भी अधिक चिंतनीय है, वह भारतीय समाज में व्याप्त जातिप्रथा है, जिसको फासीवाद से प्रेरणा मिलती है. जातिप्रथा में समाज का बहुसंख्यक वर्ग सिर्फ इस कारण कि उसका जन्म किसी कुल या जाति विशेष में नहीं हुआ, विकास के अवसरों यहां तक कि सामान्य मान-सम्मान से भी वंचित कर दिया जाता है. महात्मा गांधी समाज का बदलाव तो चाहते थे, परंतु भारतीय समाज के जातिवादी ढांचे से उन्हें कोई शिकायत न थी. इसलिए ग्राम स्वराज्य से समानता के अपेक्षित लक्ष्य की प्राप्ति उस समय तक संभव नहीं है, जब तक देश में जाति प्रथा है. भारत में मार्क्स वाद की दस्तक उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ही हो चुकी थी. 1925 में ‘भारतीय साम्यवादी पार्टी’ का विधिवत गठन हुआ. लेकिन भारतीय समाज की संरचना और साम्यवादी दलों का नेतृत्व प्रायः उच्चस्थ वर्गों के अधीन रहने के कारण यहां साम्यवादी चेतना का भरपूर विस्तार नहीं हो सका. साम्यवादी विचारधारा के विकास के लिए न केवल धार्मिक रूढ़ियों पर प्रहार किया जाना आवश्यक था, बल्कि इसके जातिवादी ढांचे को तोड़ना भी आवश्यक था. मगर इस ओर से निरपेक्ष रहने के कारण भारतीय साम्यवाद एक प्रकार से बुर्जुआ राजनीति का प्रतीक बना रहा. आजादी के बाद राममनोहर लोहिया ने अवश्य जातिव्यवस्था पर प्रहार किए, परंतु भारतीय जनमानस की धार्मिक छवि को बदलने के लिए वे भी कुछ खास नहीं कर पाए. विशेषकर धार्मिक मान्यताओं को लेकर तो वे भी भारत की लोकप्रिय राजनीति का ही परिष्कृत संस्करण जान पड़ते हैं. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि आजादी के तुरंत बाद देश में दक्षिणपंथी राजनीति मजबूत हो चुकी थी, जो ब्राह्मणवादी व्यवस्था को बनाए रखना चाहती थी. समाज के जातिवादी ढांचे को लेकर भारत के मार्क्सवादी नेताओं को भी कोई शिकायत न थी. चूंकि दक्षिणपंथी विचारों को प्रश्रय देने वाली पार्टियां दूसरी भी थीं तथा भारतीय साम्यवादी नेता समाज के उत्पीड़ित वर्ग का विश्वास जीतने में असफल सिद्ध हुए थे, इसलिए आजादी के साठ वर्ष बाद भी भारत में साम्यवादी राजनीति अपना असर छोड़ने में असमर्थ रही हैं. बीते दो दशकों में तो उदार आर्थिक नीतियों ने तो प्रशासन और मीडिया में पूंजीवाद के इतने प्रशंसक खड़े कर दिए हैं कि उनके प्रभाव में साम्यवादी राजनीति की आमजन तक पहुंच भी घटी है.

तो क्या यह मान लिया जाए कि पूंजीवाद के अंधकूप से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है? भारत में साम्यवादी राजनीति के दिन लद चुके हैं? वर्तमान और भविष्य पूंजीवाद के हाथ में है और वह अनिश्चित समय तक अपनी मनमानी करता रहेगा? रूस में साम्यवादी राजनीति के पराभव के उपरांत अराजकतावाद, समष्ठिवाद, श्रमिकसंघवाद, सहजीवितावाद, संगठनवाद, अराजक समष्ठिवाद आदि समाजवाद के जो नए विकल्प आए हैं, क्या उनका भारतीय समाज में कोई भविष्य अथवा उपयोगिता नहीं है? यह तो कहना सरासर अनुचित होगा कि भारतीय और समाज में परिवर्तन की संभावनाएं लुप्त हो चुकी हैं. भविष्य ऐसे घटाटोप के घेरे में जिससे लंबे समय तक मुक्ति असंभव है. लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि भारतीय समाज जब तक जातिवादी ढांचे को बनाए रखता है, जब तक यहां कथावाचक या पुरोहित स्तर के लोग स्वयं को भगवान कहकर जनता को बरगलाते रहेंगे, जब तक समाज में अशिक्षा का साम्राज्य है—उस समय तक भारतीय समाज में किसी स्थायी परिवर्तन की उम्मीद नहीं की जा सकती. हालांकि इसी घटाटोप और नाउम्मीदी के बीच परिवर्तन की हल्की-सी सुगबुगाहट पिछले कुछ वर्षों में देखने को मिली है. भारत में जिस प्रकार भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनता में चेतना फैली है. मिश्र और यूनान के प्रचीनतम देशों से जैसी खबरें आ रही हैं, उनसे तो लगता है कि पूरे विश्व में तानाशाही और पूंजीवाद की वर्चस्वकारी नीतियों के विरोध में माहौल बन चुका है. लोग बदलाव चाहतें हैं. खुशी की बात यह है कि इस बार जनता खुद सड़क पर है, नेता या तो बचाव की मुद्रा में हैं अथवा उसके पीछे. प्रथम दृष्टया इसे विचारहीन क्रांतियों का दौर भी कहा जा सकता है, लेकिन इस जनआड़ोलन से जो नवनीत निकलेगा, वह अवश्य ही आमूलपरिवर्तनकारी होगा, जिसका सपना हर मानवतावादी विचारक देखता है.

ओमप्रकाश कश्यप

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प्लेटो का श्रम-विभाजन का सिद्धांत एवं राजनीतिक चिंतन

प्रारंभिक समाज में सामाजिक संबंधों की स्थापना मनुष्य की जैविक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वस्तुओं के मुफ्त आदान-प्रदान के माध्यम से हुई थी. वह एक स्वाभाविक शुरुआत थी. उत्पादन-संबंधों की प्रारंभिक अवस्था में प्रत्येक व्यक्ति उस वस्तु को जो उसके पास उसकी आवश्यकता से अधिक होती, दूसरे व्यक्ति को देता था. बदले में वह दूसरों से अपनी जरूरत की वस्तुएं ग्रहण भी करता था. मनुष्य ने एक-दूसरे से सहयोग करना, आपस में मिलकर रहना, उत्पादों का परस्पर आदान-प्रदान करना आपसी समझौते के अंतर्गत केवल अपने अनुभव के बल पर सीखा था. इसके लिए न तो कोई लिखित सामाजिक संविदा थी न कोई संविधान. आदमी को यह सब अपने हितों के अनुकूल लगता था, इसलिए वह ऐसा करता था. प्लेटो का विचार था कि—

हमें अपने सपनों के राज्य का निर्माण उसके आरंभ से ही करना चाहिए. तभी वह, अपने आप को हमारी आवश्यकताओं के अनुसार ढाल सकेगा. हमारी सर्वप्रथम और सबसे बड़ी जरूरत पर्याप्त भोजन का प्रबंध करना है, जिसके सहारे हम जीवित रह सकते हैं. अगली आवश्यकता सिर पर छत की होती है तथा तीसरी वस्त्रदि सामग्री की.’

समाज के प्रत्येक नागरिक को उसकी आवश्यकता की वस्तुएं प्राप्त कैसे हों? उत्पादनतंत्र का नियोजन और नियंत्रण कैसे संभव हो? आज से 2400 वर्ष पहले प्लेटो इसके लिए श्रम-विभाजन की सलाह देता है. किंतु श्रम-विभाजन का यह विचार सीधे प्लेटो की कलम से नहीं आता. यह प्लेटो की महानता और अपने गुरु के प्रति समर्पण का ही सुफल है कि वह अपने विचारों को सुकरात के मुंह से सामने लाता है. श्रम-विभाजन की अनिवार्यता को स्वीकारते हुए सुकरात ‘रिपब्लिक’ के दूसरे खंड में कहता है कि हम सभी अपूर्ण हैं. हमारी आवश्यकताएं इतनी हैं कि हममें से कोई भी इस योग्य नहीं कि अपनी सभी जरूरतों को पूरा कर सके. इसलिए हमें दूसरों के सहयोग की जरूरत पड़ती है. मनुष्यता के कल्याण के लिए राज्य का गठन अनिवार्य है और राज्य को सुव्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए हमें—‘हमें कम से एक किसान की जरूरत पड़ेगी. दूसरी भवन-निर्माता की तथा तीसरी बुनकर की.’ ये तीनों ही मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं क्रमशः भोजन, आवास तथा वस्त्र को पूरा करने में सक्षम होंगे. पर ये तीनों तो मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएं हैं. इनसे जीवन तो संभव है, परंतु विकास के वांछित रास्ते प्रशस्त नहीं होते. विकास एवं जीवन की गतिशीलता के लिए और भी कई वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है. दूरदृष्टा प्लेटो विकास के स्थायित्व के लिए बहुत आगे की सोचते हुए एक आदर्श समाज का खाका तैयार करता है.

ईसा से चार सौ वर्ष पहले श्रम-विभाजन का विचार सिर्फ मूलभूत आवश्यकताओं के प्रबंधन तक सीमित नहीं था. खासकर प्राचीन यूनान के एथेंस जैसे शहरों में, जहां एक अतिसंपन्न व्यापारी वर्ग पनप चुका था और मनुष्य की आवश्यकताएं भोजन, वस्त्र और आवास से आगे बढ़ चुकी थीं. इसलिए सुकरात और वार्तालाप में हिस्सा ले रहे उसके साथी महसूस करते हैं कि किसान, भवन-निर्माता और बुनकर के अलावा कम से कम दो प्रकार के व्यक्तियों की आवश्यकता समाज को पड़ेगी. उनमें से एक मोची हो सकता है, जो बाकी लोगों के लिए जूतों का निर्माण करेगा तथा दूसरा व्यापारी, जो समाज में वस्तुओं की आपूर्ति की जिम्मेदारी संभालेगा. उल्लेखनीय है कि एथेंस में सामाजिक वर्गीकरण की यह कोशिश पहली न थी. 594 ईस्वी पूर्व में उसके महानायक सोलोन ने लोगों के आर्थिक स्तर को देखते समाज को चार वर्गों में विभाजित किया था. अपने उद्देश्य में उसको सफलता भी मिली थी. उससे पहले एथेंस एक गरीब राज्य था, उसके आसपास गांवों का समूह था, जहां किसान अंगूर और लौंग की खेती द्वारा जैसे-तैसे अपना गुजारा करते थे. समाज में विकट आर्थिक असमानता थी. सोलोन ने गरीब किसानों को कर्ज मुक्ति दिलाकर एक नई शुरुआत की थी, जिससे एथेंस के विकास को नई दिशा मिली और कुछ ही दिनों में वह यूनान का प्रमुख नगर-राज्य बन गया. बहरहाल, अपने लघुत्तम समाज की स्थापना के लिए प्लेटो चार या पांच प्रकार के व्यक्तियों की आवश्यकता अनुभव करता है. उसका मानना था कि राज्य की सफलता मात्र श्रम-विभाजन द्वारा संभव नहीं. अधिक जरूरी यह है कि समाज के विभिन्न वर्गों में समुचित तालमेल हो. वे एक-दूसरे की आवश्यकताओं को समझें तथा अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का विधिवत पालन करें. वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि प्रत्येक व्यक्ति उस कार्य को चुने जिसे वह सबसे अच्छी तरह कर सकता है—जिसको करने से उसे सर्वाधिक संतुष्टि प्राप्त होती हो. प्लेटो की समाज-रचना में स्त्री-पुरुष का कोई भेद न था. उसका मानना था कि स्त्री एवं पुरुष दोनों के भीतर एक ही आत्मा का वास है, जो न स्त्री है, न ही पुरुष. इसलिए प्रत्येक प्राणी को अपनी रुचि के अनुकूल व्यवसाय का चयन करने का अधिकार है—

कार्य तभी श्रेष्ठ और सरल होगा जब प्रत्येक व्यक्ति को उपयुक्त समय पर मनोवांछित कार्य चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता होगी, ऐसा कार्य जो उसकी रुचि और प्रकृति के सर्वाधिक अनुकूल हो.’

प्लेटो मानता था कि मानवमात्र में से कोई भी संपूर्ण नहीं है. प्रत्येक की सीमा है. वह कार्य-विशेष को ही दक्षतापूर्वक कर सकता है. परंतु उसकी आवश्यकताएं अनेक हैं. किसान का कार्य केवल अनाज उत्पादन से नहीं चल जाता. उसको रहने के लिए घर, पहनने के लिए वस्त्र, खेती करने के लिए औजार भी चाहिए. यदि वह अपनी जरूरत का सारा सामान उत्पादित करने का प्रयास करे तो इसमें वह शायद ही सफल हो सके, किंतु यदि वह अपनी ऊर्जा किसी एक काम में लगाता है, तब वह अपनी आवश्यकता से अधिक उत्पादन कर सकता है. उस उत्पाद का आदान-प्रदान वह उन व्यक्तियों के साथ बहुत आसानी से कर सकता है, जो उसकी आवश्यकता की शेष वस्तुओं को बनाने में दक्ष हैं. प्लेटो के अनुसार बड़े सामाजिक समूह यानी शहरों में लुहार, बढ़ई, रसोइये, राजगीर, भवन-निर्माता, मोची, बुनकर आदि कामगार तो होने ही चाहिए. इनके साथ-साथ व्यापारी, बैंकर, सेवाप्रदाता शिल्पकर्मी आदि भी समुचित संख्या में हों, ताकि वहां एक सफल नागरिक जीवन फल-फूल सके. ‘रिपब्लिक’ में वह सुकरात के मुंह से कहलवाता है कि मध्य वर्ग में आने वाले पढ़े-लिखे व्यक्ति, दुकानदार, व्यापारी आदि मिलकर बैंक, दुकान आदि की देखभाल करें. ताकि लोगों को उनकी जरूरत की वस्तुएं आसानी से, समय पर और उचित मूल्य पर प्राप्त होती रहें. प्लेटो विभिन्न व्यवसायों की जरूरत तथा उनके वर्गीकरण तक ही स्वयं को सीमित नहीं रखता. वह आगे बढ़कर उन उद्यमों के लिए दक्ष कारीगरों, दस्तकारों और किसानों के रहने की व्यवस्था की भी परिकल्पना करता है. उसके अनुसार व्यापारी को बाजार में, किसान और दस्तकार को अपने उद्यम के निकट ही रहना चाहिए, ताकि आवश्यकता पड़ने पर उनके ग्राहक उनसे संपर्क कर सकें.

प्लेटो तथा उसका शिष्य अरस्तु जिसने आगे चलकर समाज को ज्यादा बारीकी से विभिन्न प्राणी वर्गों में विभाजित किया था, जो आज तक मान्य है, ऐसी सामाजिक व्यवस्था चाहते थे, जिसमें व्यक्तिमात्र अपने पूरी योग्यता एवं सामर्थ्य का उपयोग कर सके. जहां व्यापारी व्यापार द्वारा धनार्जन करें, चिकित्सक लोगों के स्वाथ्य-लाभ का ध्यान रख सकें, सैनिक आवश्यकता पड़ने पर भीतरी और बाहरी संकट से देश की रक्षा करें. दस्तकार वर्ग जैसे काष्ठशिल्पी, लौहकार, चर्मकार, दर्जी, राजमिस्त्री, बुनकर आदि अपने-अपने क्षेत्र में कार्यरत रहते हुए सामाजिक विकास में अपना यथासंभव योगदान दें. ‘पालिटक्स’ में अरस्तु ने लिखा था कि शासक के राज-कौशल की सफलता तब है, जब राज्य के सभी लोग, अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार कर्तव्यपालन में लीन हों. राज्य अनुशासित एवं विकासमान अवस्था में हो तथा सभी लोग खुश हों. उसी अवस्था में राज्य में ‘शुभत्व’ की व्याप्ति संभव है. सुकरात के मन में परमसत्ता के प्रतीक के रूप में जन्मी ‘शुभत्व’ की संकल्पना को अरस्तु और प्लेटो न केवल समर्थन देते हैं, बल्कि दोनों ही उसे अपनी-अपनी तरह से आगे भी बढ़ाते हैं. उनके बीच मतांतर हैं, चीजों को देखने की दृष्टि भिन्न-भिन्न है, तो भी लक्ष्य को लेकर वे अविवादित रूप से एक हैं. प्लेटो का मानना था कि ‘शुभत्व’ के प्रत्यय को एक दार्शनिक सम्राट ही भली-भांति समझ सकता है. इसलिए उसने शासक के रूप में दर्शनशास्त्री की वकालत की थी. उसका मानना था कि राष्ट्रवादी शासक बजाय लोकोन्मुखी व्यवस्था के अपने इर्द-गिर्द सत्ता और शक्ति का केंद्र बनाए रखने पर जोर देगा. और जितना वह अपनी स्वार्थ-पूर्ति पर जोर देगा उतना ही सत्ता के छिन जाने का डर भी बढ़ता जाएगा. किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए वह कल्याणकारी समाज की स्थापना के बजाय सैन्य कार्रवाही में दक्ष राज्य की स्थापना पर जोर देगा. इससे समाज में शक्ति की होड़ पैदा होगी तथा स्तरीकरण को बढ़ावा मिलेगा. यह ‘शुभत्व’ नहीं, उसकी भ्रांति ही कही जाएगी.

सुकरात, प्लेटो और अरस्तु की दार्शनिक-त्रयी के तीनों विद्वान सदस्य ‘शुभत्व’ को अत्यधिक महत्त्व देते थे. हालांकि ‘शुभत्व’ संबंधी तीनों की अवधारणा भिन्न है. सुकरात के लिए केवल ‘ज्ञान ही परमशुभ’ है. प्लेटो ने ‘शुभत्व’ का थोड़ा-सा विस्तार किया. उसने भी माना कि वास्तविक ज्ञान का बोध होना ही ‘शुभत्व’ का प्रतीक है. लेकिन उसकी की प्राप्ति सर्वथा आसान भी नहीं है. यह व्यक्ति की अपनी कमजोरियों, स्वार्थकामनाओं से बाधित होती रहती है. उसके लिए ‘शुभत्व’ ज्ञान की उपलब्धता के साथ सामाजिक और राजनीतिक चेतना का भी पर्याय है, जिसके कारण कुछ विचारक उसको भौतिकवादी भी मानते हैं. हालांकि प्लेटो की विचारधारा उस भौतिकवाद से बहुत दूर है, जिसका विस्तार हमें माक्र्स एवं ऐंगल्स के चिंतन में दिखता है. प्लेटो का भौतिकवादी चिंतना भी भावनाओं से लबरेज है. तो भी समाज के विभिन्न वर्गों में विभाजन की उसकी योजना आधुनिक जीवन से बहुत कुछ मिलती है—

इस तरह हमारे आदर्श राज्य की रचना तो पूरी हुई. अब हम वहां के नागरिकों के जनजीवन, उनके रहन-सहन के ढंग पर चर्चा करते हैं, जैसा कि हमने उनके बारे में अभी तक निश्चित किया है. क्या वे अपने भरण-पोषण के लिए अनाज उत्पादन की जिम्मेदारी नहीं संभालेंगे तथा अपनी आवश्यकतानुसार अन्य वस्तुओं यथा जूते, वस्त्र, शराब आदि का निर्माण नहीं करेंगे? एक बार गृह-निर्माण के दायित्व से मुक्त होने के बाद ग्रीश्मकाल में वे सामान्यतः नंगे तन-बदन रहकर काम करेंगे, किंतु सर्दी में ठंड से बचने के लिए उन्हें भरपूर वस्त्रों सहित जूतांे की भी दरकार होगी. गेंहूं और जौ के आटे को मांडकर अपने लिए वे स्वादिष्ट केक और डबलरोटियों का निर्माण करेंगे. पकाए हुए भोजन को स्वच्छ पत्तियों अथवा यत्न से बुनी गई स्वच्छ चटाइयों पर परोसेंगे. बिस्तर के लिए उन्हें साफ चादरों की भी जरूरत होगी, जिसके लिए वे सर्वोत्तम सामग्री का चयन करेंगे. पवित्र अवसरों पर वे अपने परिवार के साथ महान देवता के लिए उपवास रखेंगे, उसके बाद स्वयं की बनाई मदिरा का सेवन कर, सिर पर फूलमालाएं धारण कर, उत्सव मनाते हुए वे देवता की अभ्यर्थना करेंगे. युद्ध और गरीबी जैसी आपदाओं पर नजर रखते हुए वे इस बात का भी पूरा ध्यान रखेंगे कि उनका परिवार उनके द्वारा स्थापित जीवनमूल्यों का पालन करे.’

अपनी राज्य योजना में प्लेटो उन सभी वस्तुओं की परिकल्पना करता है, जो नागरिकों के स्वस्थ, सुखी एवं संपन्न जीवन के लिए अनिवार्य मानी जाती हैं. ये वे न्यूनतम आवश्यकताएं हैं, जिनके बिना मानव-जीवन असंभव है. इन अनिवार्य वस्तुओं में वह उत्तम मदिरा के अलावा मक्खन, पनीर, फलों तथा अन्य खाद्य सामग्रियों की भी अपने नागरिकों के रोजमर्रा के भोजन के रूप में कामना करता है, जिससे वे वृद्धावस्था में भी स्वस्थ एवं शांतिमय जीवन बिता सकें तथा वैसा ही जीवन अपने बच्चों के लिए भी सौंप सकें. सुकरात इससे भी परिचित था कि व्यक्ति की कामनाओं का अंत नहीं है. इसलिए चर्चा में भाग ले रहा ग्लुकोन जब उससे जीवन के लिए आधुनिकता की प्रतीक कुछ और वस्तुओं जैसे सोफा सेट, डाइनिंग टेबिल आदि को भी आदर्श राज्य के नागरिकों के जीवन में शामिल करने को कहता है, तो सुकरात उसके विरोध में नए तर्क के साथ उपस्थित हो जाता है—‘निःसंदेह समाज में ऐसे भी व्यक्ति होंगे जो सादा जीवन से संतुष्ट न हों. उन्हें आराम के सोफा, भोजन के लिए मेज-कुर्सी, इत्र-फुलेल, स्वादिष्ट केक यहां तक कि रखैलों की जरूरत पड़ेगी, वह भी एक तरह के नहीं, बल्कि जितने हैं, सभी प्रकार के. जीवन में इन वस्तुओं की अनिवार्यता को स्वीकारते हुए हम अपने उन वस्तुओं की सूची से आगे निकल जाते हैं, जिन्हें हमने अभी तक जीवन की मूलभूत आवश्यकता माना है, जैसे भोजन, वस्त्र, आवास और जूते आदि. फिर तो हमें खूबसूरत कलाकृतियों, इंब्राडरी, सोने और हाथी दांत की वस्तुओं को भी इस सूची में सुरक्षित रखना पड़ेगा.’

ग्लुकोन इसपर सहमति व्यक्त करता है. सुकरात मानो इसी की प्रतीक्षा में हो. अपने तर्क को और आगे बढ़ाते हुए वह कहता है कि अगर व्यक्ति की आवश्यकताएं इसी तरह अंतहीन विस्तार लेती रहीं तो एक दिन प्रत्येक व्यक्ति तथा समूह की अंतहीन इच्छाएं होंगी. हालांकि यह राज्य का दायित्व होगा कि वह न्याय के हित में अपने नागरिकों को वे सभी वस्तुएं उपलब्ध कराए, जिन्हें वे अपने लिए आवश्यक मानते हैं. परंतु क्या किसी राज्य के लिए यह संभव है कि वह अपने नागरिकों की समस्त कामनाओं की पूर्ति कर सके. व्यावहारिक दृष्टि से यह काम कठिन ही नहीं बल्कि असंभव होगा. और वह भूमि जो अपने नागरिकों की समस्त मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है, एक दिन छोटी पड़ने लगेगी. निरंतर बढ़ती हुई कामनाएं समाज में असंतुलन और आक्रोश पैदा करेंगी, और तब—

यह धरती जो अपने नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है, बहुत छोटी पड़ जाएगी….उस अवस्था में हम पड़ोसी की जमीन का कुछ हिस्सा चाहेंगे, ताकि उससे अपनी सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें. लेकिन जिस प्रकार हमारी निगाह पड़ोसी की रोटी पर है, वैसे ही उसकी निगाह भी, यदि वह भी अपनी विलासिता को अनियंत्रित तरीके से बढ़ाता रहा तो, हमारी रोटी पर होगी.’

इससे राज्यों के बीच संघर्ष की स्थिति पैदा होगी. उसको नियंत्रित करने के लिए ढेर सारा श्रम और संसाधन खपाने पड़ेंगे. इससे विकासधारा अवरुद्ध होगी. तब, प्लेटो के अनुसार युद्ध अपरिहार्य हो जाएगा. राज्य को अपनी सुरक्षा पर भारी-भरकम धनराशि खर्च करनी पड़ेगी. चूंकि दुश्मन राज्य के नागरिकों की भी ऐसी ही महत्त्वाकांक्षाएं होंगी, इसलिए अपने राज्य के नागरिकों तथा उनकी संपत्ति की सुरक्षा के लिए सेना को हर समय युद्ध के मोर्चे पर सन्नद्ध रहना पड़ेगा. प्लेटो के अनुसार कामनाओं की अंतहीन स्थिति में युद्ध अपरिहार्य हो जाएगा. एक अन्य महत्त्वपूर्ण संवाद-पुस्तक ‘फीडियो’ में वह कहता है कि—

सभी युद्धों का एक ही ध्येय है—संपत्ति हड़पना.’

आगे वह लिखता है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है. इसलिए भारी-भरकम सेना के बावजूद राज्य के लिए अपने अस्तित्व को कायम रखना निरंतर कठिन होता जाएगा. आंतरिक और बाह्यः चुनौतियां उसकी एकता एवं अखंडता पर प्रहार करने लगेंगी. इसके बाद वह उस निष्कर्ष की ओर बढ़ता है, जो ‘रिपब्लिक’ के दूसरे खंड का प्रतिपाद्य विषय है. उसके अनुसार नागरिकों की अंतहीन कामनाएं समाज में असंतोष को बढ़ावा देंगी, जिससे वह दूसरे की संपत्ति पर लालच-भरी नजर रखेगा. यह स्थिति अशांति को बढ़ावा देगी. इससे राज्य में अराजकता फैल सकती है. उस अवस्था में राज्य की देखभाल कौन कर सकता है? प्लेटो के अनुसार यह यह काम दार्शनिकों के एक समूह को सौंपा जाना चाहिए. ऐसे योग्य व्यक्तियों को जो मित्रों और शत्राुओं में भेद करना जानते हों. दार्शनिकों को और क्या करना चाहिए—

उन्हें अपने शत्रुओं के प्रति खतरनाक तथा मित्रों के लिए विनम्र होना चाहिए. यदि ऐसा नहीं है तो वे स्वयं को, इससे पहले कि शत्रु आकर उन्हें नष्ट करे, अपने आप नष्ट कर लेंगे.’

प्लेटो दार्शनिक सम्राट की उपयोगिता का बखान हालांकि अपने गुरु सुकरात के माध्यम से करता है, परंतु यह परिकल्पना प्लेटो की अपनी कल्पना थी. राज्य-संरक्षकों के रूप में वह ऐसे सर्वगुणसंपन्न व्यक्तियों को नियुक्त करना चाहता था, जो न केवल युद्धनीति, बल्कि राजनीति, प्रबंधन, सुरक्षा, उत्पादन, कला एवं संस्कृति संरक्षण में भी पारंगत हों. संरक्षक-वर्ग में युवा और अनुभवी दोनों को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. किंतु युवा संरक्षकों को वृद्ध संरक्षकों के अनुभवों का लाभ मिले—यह अनुशासनात्मक प्रावधान भी वह अपने ‘रिपब्लिक’ में करता है. उसके अनुसार युवा संरक्षकों का चयन उनकी योग्यता के आधार पर किया जाना चाहिए. संरक्षकों का दायित्व है कि वे ‘कुत्ते’ की भांति प्राण-प्रण से राज्य की सुरक्षा में जुटे रहें. यहां ‘कुत्ता’ शब्द का प्रयोग आलंकारिक है और वह सुदृढ़ सरकार के लिए प्रयुक्त है, जिसके कर्ता-धर्ता अपने दायित्वों के प्रति सजग हों. समाज-रचना में प्लेटो जिस सादगी और सरलता का पक्ष लेता है, वह स्पार्टा से प्रेरित थी. जहां व्यक्ति को पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त रखा जाता था. प्लेटो ने हालांकि उद्यमी वर्ग को निजी संपत्ति रखने की अनुमति दी थी, साथ ही उसने संरक्षक दार्शनिकों को यह अधिकार भी दिया था कि वह संपत्ति के अतिरिक्त जमाव पर नजर रखे. इसी प्रकार यदि कहीं गरीबी बढ़ती जा रही है तो उसको भी नियंत्रण में रखे, ताकि समाज में आर्थिक संतुलन कायम रहे. वह मानता था कि संपत्ति का असमान विभाजन, यानी समाज का अमीर और गरीब वर्ग में विभाजन सामाजिक आक्रोश को बढ़ावा देगा, जो सामाजिक शांति और सद्भाव के लिए कभी भी चुनौती बन सकता है.

राजनीतिक दर्शन

प्लेटो दार्शनिक सम्राट का पक्षधर था. लोकतंत्र को लेकर भी वह बहुत आशान्वित नहीं था. उसके अनुसार ऐसे लोगों को राज्य की बागडोर नहीं सौंपी जा सकती, जो मंदबुद्धि, अस्थिर और भीड़ का आचरण करने वाले हों, जिन्हें दर्शन का जरा-भी ज्ञान न हो. उसके अनुसार लोकतांत्रिक पद्धति लोगों को बहुमत की राय के अनुसार शासित होने तथा आचरण करने के लिए बाध्य करती है. बहुमत के आकलन के लिए सिर्फ उस पक्ष के लोगों की संख्या देखी जाती है. किसी कारण मतदान प्रक्रिया से बाहर रह गए अथवा छोड़ दिए गए लोगों तथा अल्पमत वाले नागरिकों की इच्छा का वहां कोई मूल्य नहीं होता. इसलिए उन्हें अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए बहुमत की प्रतीक्षा करनी पड़ती है. इस तरह लोकतंत्र में वे लोग सत्ता से बाहर रह जाते हैं, जो अल्पमत में हैं, भले ही वे कितने ही बुद्धिमान, योग्य तथा तार्किक रूप से सही क्यों न हों. प्लेटो पाइथागोरेस के अनुयाइयों के इस तर्क से सहमत था कि लोकतंत्र ‘असमान लोगों की समानता’ है, जिसमें अल्पमत नागरिकों को बहुमत की राय के अनुरूप अनुसरण करने के लिए बाध्य किया जाता है. प्लेटो के अनुसार दार्शनिक मंडल को शासन की जिम्मेदारी सौंपने से लोकतंत्र की अनेक बुराइयों से बचा जा सकता है.

प्लेटो ने सुदीर्घ और सक्रिय जीवन जिया. इस अवधि में वह लगातार लेखन करता रहा. उसका लिखा विपुल साहित्य आज भी हमें उपलब्ध है. हालांकि उसमें बाद के विचारकों द्वारा प्रक्षेपण भी खूब हुआ है, मगर किसी भी ख्यातिनाम विचारक के लिए यह अनहोनी या असामान्य घटना नहीं है. लेकिन जिन पुस्तकों को विद्वान प्लेटो द्वारा रचित मानते हैं, उनमें भी ऐसे कई विरोधाभास हैं, जिनसे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उसके विचार लगातार बदलते रहे थे. किसी भी विचारक के लिए यह एकदम स्वाभाविक बात है. आदर्श राज्य अथवा सरकार की अवधारणा में भी उसके पूर्ववर्ती और परिवर्ती विचारों में अंतर देखने को मिलता है. प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ और ‘ला॓ज’ में आए कुछ विचार तो आज भी विद्वानों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं.

प्लेटो अपने गुरु सुकरात की इस विचार से सहमत था कि मनुष्य तीन प्रकार की ऐषणाओं से युक्त होता है. पहली ऐषणा उसकी मूलभूत आवश्यकताओं से निर्मित होती है—यथा आवास, भोजन, वस्त्रदि. दूसरी ऐषणा मन यानी जिज्ञासा होती है जिसमें वह अपने भीतरी और बाहरी संसार के बारे में कुछ धारणाएं बनाता हैं, जिससे उसका जीवन संचालित होता है. इन दोनों के बीच समन्वय करने वाली तीसरी ऐषणा अथवा प्रवृत्ति उसका तर्कसामर्थ्य अथवा विवेक है, जो उसको बाकी प्राणियों से विशिष्ट दर्शाता है. तथा जिसके द्वारा वह सभ्यता और बोध के उच्चतम स्तर की ओर गतिमान रहने का प्रयास कर सकता है. मनुष्य की इन तीन प्रवृत्तियों अथवा ऐषणाओं के आधार पर सुकरात ने समाज को भी तीन वर्गों यथा उत्पादक, संरक्षक तथा शासक में विभाजित किया है. इस विभाजन के अनुसार समाज के तीन निम्नलिखित अंग हैं—

1. उत्पादक: इस वर्ग में समाज के वे लोग सम्मिलित हैं जो उसके भरष-पोषण यानी उत्पादन का दायित्व वहन करते हैं. इनमें किसान, मजदूर, लौहार, बढ़ई, दुकानदार, गड़हरिये, राजमिस्त्री, प्लंबर आदि आते हैं, जो अपने श्रम-कौशल से समाज की विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं. हम मानव शरीर में इसकी तुलना पेट से कर सकते हैं.

2. संरक्षक: संरक्षक वर्ग का समाज में वही स्थान है, जो मानव शरीर में छाती और भुजाओं का है. ऐसे लोग जो बहादुर एवं साहसी हैं, जो शारीरिक रूप से मजबूत तथा खतरों का सामना करने को तत्पर रहते हैं वे सैन्य सेवाओं के लिए उपयुक्त होते हैं. ऐसे व्यक्तियों को राज्य की सेवा की जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए. चूंकि इन कार्यों के लिए विवेक की भी आवश्यकता होती है, अतएव इन्हें मानव शरीर में ‘आत्मन्’ के तुल्य माना गया है.

3. शासक: शरीर में जो काम मस्तिष्क का है, वही काम समाज में प्रशासक वर्ग का है. ऐसे व्यक्ति तो बुद्धिमान और तार्किक हैं, जिनमें धैर्य और आत्मनियंत्रण की भावना है, जो ज्ञान के प्रति समर्पित, उदार एवं सबके कल्याण की सोचने वाले हैं. वे समाज के प्रशासक वर्ग में चुने जा सकते हैं. प्लेटो ने इन्हें समाज का मस्तिष्क माना है. ऐसे व्यक्ति समाज में हालांकि बहुत कम संख्या में होते हैं, तो भी समाज के हित के लिए यह जरूरी है कि नेतृत्व की जिम्मेदारी इन्हीं लोगों को सौंपी जाए.

प्लेटो के समय में एथेंस में जो गणतांत्रिक पद्धति प्रचलन में थी, उसके समर्थकों का विश्वास था कि समाज में बहुत कम ही लोग होते हैं, जिनमें शासन करने का गुण होता है. कुछ अर्थों में प्लेटो भी उनसे सहमत था. किंतु उसका मानना था कि शिक्षा के द्वारा व्यक्ति के ज्ञान और विवेक में सुधार लाकर उसे शासन करने योग्य बनाया जा सकता है. इसके लिए प्लेटो ने जलयान के कप्तान तथा डाक्टर का उदाहरण दिया था. उसके अनुसार जिस प्रकार जलयान पर नियंत्रण करने अथवा रोगों से उपचार के लिए विशिष्ट ज्ञानयुक्त पेशवरों की आवश्यकता होती है. इसी प्रकार शासन करना भी विशिष्ट योग्यता की अपेक्षा करता है. दार्शनिक समर्थन के पीछे प्लेटो की मान्यता थी कि वे न केवल विवेकवान एवं दूरदृष्टा होते हैं, बल्कि उनमें सत्य के प्रति तीव्र आग्रहशीलता भी होती है. अधिकतम लोगों को अधिकतम विवेकवान कैसे बनाया जाए? समाज की जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए अधिकतम दार्शनिक कैसे पैदा किए जाएं? फिर दार्शनिकों की विवेकशीलता भी सनातन नहीं. उनका बौद्धिक क्षरण भी संभव है. ऐसी समस्याओं पर ‘रिपब्लिक’ में विस्तार सहित चर्चा की गई है. उल्लेखनीय है कि प्लेटो के आदर्शलोक में किसानों, शिल्पकर्मियों, सौदागरों, तथा मजदूरों को तो रहने का सम्मानजनक स्थान था. परंतु उसने इत्र-फुलेल का धंधा करने वालों, वेश्याओं, पेस्ट्री अथवा केक बनाने के कारखानों, सुनार, हाथी-दांत आदि पर नक्काशी करने वालों, बग्गी बनाने वालों, कवियों और चित्रकारों के लिए बहुत कम स्थान था. उसका मानना था कि ये वे प्रशाधन हैं, जिनका समाज के उच्चवर्गीय लोग ही उपयोग कर सकते हैं.

राज्य और प्रशासक के बारे में भी प्लेटो के विचार अपने समकालीनों से हटकर थे. अपने विचारों के पक्ष में उसने कई रोचक तर्क भी दिए हैं. लोकतंत्र के बारे में टिप्पणी करने से पहले वह प्रश्न करता है—‘निकृष्ट लोकतंत्र अथवा तानाशाही? इनमें आपकी दृष्टि में क्या श्रेष्ठतर है?’ वह प्रश्न उछालकर ही शांत नहीं हो जाता. उसपर आगे भी विचार करता है. लंबे विमर्श के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि एक बुरे लोकतंत्र की अपेक्षा बुरे तानाशाह के शासन में रहना अच्छा है. इसलिए कि लोकतंत्र में पूरा समाज बुरे काम में संलिप्त होता है, बजाय व्यक्ति अथवा समूह-विशेष के. यह कुछ ऐसा ही है जैसे जहाज के कप्तान के कंपार्टमेंट में पूरी भीड़ घुस आई हो. अंदर आए लोगों में से प्रत्येक अपनी हांक रहा हो. कोई किसी की सुनने, धैर्यपूर्वक विचार करने या अपना पक्ष रखने को तैयार न हो. दूसरी ओर जहाज का कप्तान भी मनमानी करने लगे तो वह भी राज्य के लिए अहितकर सिद्ध होगा. अतः अत्यावश्यक है कि दूसरे नागरिकों की भांति कप्तान भी लोकतांत्रिक नियमों का पालन करे. यह तभी संभव है जब कप्तान दूरंदेश और सबके प्रति समान व्यवहार करने वाला हो. उसमें दूसरों की इच्छा-आकांक्षाओं के प्रति सम्मान हो. प्लेटों का यह विचार जहां लोकतंत्र का समर्थन करता है, वहीं उसकी समस्याओं की ओर इशारा भी करता है. वह मानता है कि राज्य में विभिन्न विचारधाराओं के समर्थक व्यक्ति हो सकते हैं. नागरिकों में से कुछ अभिजाततंत्र और कुछ कुलीनतावाद के समर्थक हो सकते हैं. उन्हीं में से कुछ को तानाशाह से लगाव हो सकता है. जबकि कुछ लोकतंत्र को सर्वोत्तम शासन पद्धति मानते होंगे. नागरिकों के इन मतांतरों में यदि समुचित समन्वय न हो तो उनमें आक्रोश पनप सकता है. व्यापक असंतोष की स्थिति अंततः तानाशाही व्यवस्था को पनपने का अवसर दे सकती है, जो प्रकारांतर में अराजकता की जननी है.

प्लेटो की विचारधारा में प्रारंभिक समाजवाद के लक्षण स्पष्ट नजर आते हैं. उसके अनुसार अत्यधिक धन और निर्धनता दोनों ही कार्य की गुणवत्ता एवं कारीगर की कार्यकुशलता पर प्रतिकूल असर डालते हैं. अत्यधिक धन ‘विलासिता, सुस्ती तथा अभिजात्यबोध पैदा करता है. दूसरी ओर निर्धनता से कार्यकुशलता का हृास होता है, यह व्यक्ति को ‘ओछा और समझौतावादी’ भी बनाती है. समाज में धन के असमान वितरण से ही शासक वर्ग का जन्म तथा उसको मनमानी करने का अवसर प्राप्त होता है. इन स्थितियों से सर्वथा बच पाना संभव नहीं. इसलिए आवश्यक है कि शासन की बागडोर ऐसे लोगों के हाथों में सौंपी जाए जो दार्शनिक प्रवृत्ति के हों. जो समाज में विचारों और राज्य-कल्याण को धन से अधिक महत्त्व देते हों. जिनके लिए व्यक्तिमात्र का सुख भी उतना ही महत्त्वपूर्ण हो, जितना उनका अपना सुख. प्लेटो की यही मान्यता दार्शनिक सम्राट की परिकल्पना का आधार बनी. चूंकि व्यक्ति की अपनी दुबर्लताएं होती हैं, कोई भी अपने आप में परिपूर्ण नहीं है. इसलिए किसी एक को सारे अधिकार दिए जाने से तानाशाही की स्थिति पैदा हो सकती है. उससे बचने के लिए अत्यावश्यक है कि निर्णय की प्रक्रिया में अधिकतम लोगों को भागीदार बनाया जाए. इसके लिए वह ‘संरक्षक’ वर्ग की नियुक्ति का सुझाव देता है. प्लेटो व्यवस्था करता है कि संरक्षकों के लिए शिक्षा की न्यूनतम योग्यता निर्धारित होगी. उनपर राज्य की अंदरूनी और बाहरी सुरक्षा की जिम्मेदारी होगी, इसलिए उनके लिए अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण के साथ राजनीतिक-सामाजिक दर्शन का ज्ञान भी अत्यावश्यक होगा.

अपने आदर्शलोक के लिए प्लेटो साधारण नागरिकों के कर्तव्यों का भी निर्धारण करता है. उसके अनुसार संरक्षक वर्ग के अलावा शेष नागरिकों को बड़े ही सहज भाव से, किंतु उनकी रुचि एवं योग्यताओं का ध्यान रखते हुए विभाजित किया जाएगा. प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व होगा कि वह निर्धारित कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा के साथ करे. चिकित्सक का कर्तव्य होगा कि वह नागरिकों के स्वास्थ्य की भली-भांति देखभाल करे और उन्हें शारीरिक रूप से हृष्ट-पुष्ठ बनाए रखने में अपना भरपूर योगदान दे. व्यापारी वर्ग का दायित्व होगा कि वह राज्य में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को बनाए रखे, तथा व्यापार में निजी हित की अपेक्षा राज्यकल्याण को सर्वोपरि समझे. शारीरिक रूप से अस्वस्थ और असाध्य रोगों के शिकार नागरिकों के प्रति प्लेटो का रवैया अनुदारता पूर्ण था. वह उन्हें समाज के लिए अनावश्यक मानते हुए करीब-करीब मरने के लिए छोड़ देता है. उसने संरक्षकों के लिए न्यूनतम आयु भी निर्धारित की है. उसका मानना था कि पर्याप्त अध्ययन और प्रशिक्षण के बाद, करीब पचास की अवस्था में व्यक्ति संरक्षक का दायित्व वहन करने योग्य हो जाता है. उसके अनुसार संरक्षक का जीवन सादा और आचरण दूसरों के लिए अनुकरणीय होना चाहिए. उसका सुखामोद दर्शनशास्त्र के अध्ययन, राज्य कल्याण के लिए चिंतन-मनन में होना चाहिए. प्लेटो कुछ परिस्थितियों को छोड़कर व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा का विरोधी था. समाज में आर्थिक समानता बनाए रखने के लिए उसने व्यवस्था की थी कि राज्य में संरक्षक का दायित्व संभालने वाले व्यक्तियों को भी अन्य नागरिकों की भांति सामूहिक भोजनालय में भोजन करना होगा. मनोरंजन के लिए अपने पास कुछ वस्तुएं रखने का अधिकार उसने संरक्षकों को दिया है. पर उसके वह संपत्ति का भोग राज्य की अमानत की भांति करना चाहिए—

उन्हें (गार्जियन को) सैनिकों की भांति सामूहिक आवास-स्थलों में सबके साथ रहना होगा तथा सबके साथ सामूहिक भोजनालय में भोजन करना होगा. उन्हें यह समझना चाहिए कि उन्हें सोने और चांदी के गहनों की कतई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनके हृदय उससे कहीं अधिक पवित्र स्वर्गीय स्वर्ण-आभा और रजत-आभाओं से दीप्तिमान हैं…’

संरक्षक वर्ग जब इस प्रकार आदर्श और जीवनमूल्यों से भरपूर आचरण करेगा, जब वह अपनी कामनाओं की पूर्ति राज्य-कल्याण और जनसाधारण के उद्धार में देखने लगेगा, तो राज्य की अनेक समस्याएं यथा संपत्ति के लिए युद्ध, सामाजिक असंतोष, अंतद्र्वंद्व आदि स्वतः समाप्त होते जाएंगे. उनके आचरण से अन्य नागरिक भी प्रभावित होंगे. उस अवस्था में पूरा राज्य एक समान नागरिक चेतना और नैतिक भावनाओं से अनुशासित होगा. ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो ने ऐसे राज्य को आदर्श माना है. ऐसा राज्य निम्नलिखित सद्गुणों से स्वतः अनुशासित होगा—

ज्ञान : शासन प्रणाली के कामकाज में.

साहस : सुरक्षा प्रणाली की कार्रवाही में.

सहिष्णुता : शासनतंत्र के समस्त कार्यकलापों में.

उपर्युक्त तीन सदगुणों को हम प्लेटो के आदर्शराज्य का लक्षण भी मान सकते हैं. आगे वह व्याख्या करता है कि ‘संरक्षक’ स्वयं ‘ज्ञान’ का प्रतिरूप होंगे, उन्हीं से ज्ञान की धारा समाज के अन्य वर्गों में प्रवाहित होगी. वे साहसी भी होंगे तथा उनके साहस से प्रेरणा लेकर सैन्यदल राज्य की सुरक्षा को संगठित होंगे. समाज के विभिन्न वर्गों तथा प्रशासनतंत्र के में आपसी सामन्जस्य और सहिष्णुता अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं. मगर यह तभी संभव है, जब शासक, प्रशासक एवं उत्पादक शक्तियों के बीच संपूर्ण तालमेल एवं विश्वास की भावना हो.

राज्य की अवधारणा को लेकर प्लेटो ने जो विचार प्रस्तुत किए थे, उनके साथ विडंबना रही कि वे शायद ही कभी किसी राज्य में शासन प्रणाली के रूप में अपनाए जा सके. स्वयं प्लेटो का शिष्य अरस्तु ही अपने गुरु के राजनीतिक विचारों से असहमत था, अपनी महत्त्वपूर्ण कृति ‘दि पाॅलिटिक्स’ मंे उसने एक सुदृढ़ केंद्र का समर्थन किया है. लेकिन वहां दार्शनिक सम्राट का कोई उल्लेख नहीं है. दरअसल अरस्तु के समय तक राजनीतिक में साम्राज्यवाद के बीज अंकुराने लगे थे. ‘दि पाॅलिटिक्स’ में अरस्तु ऐसी ही राजनीति का समर्थन करना दिखाई पड़ता है. हालांकि नवप्लेटोवाद के व्याख्याताओं में से एक ब्रिटिश दार्शनिक कार्ल रेमंड पोपर(28 जुलाई, 1902—17 सितंबर, 1994) जैसे कुछ विद्वानों ने नवप्लेटोवाद के कुछ लक्षण पूर्व सोवियत संघ की शासन प्रणाली में अनुभव किए थे. उसके अनुसार सोवियत संघ—

नवप्लेटोवाद का आधुनिक उदाहरण था. इसलिए कि वहां एक अभिजात किस्म का शासक वर्ग (सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी) था, राज्य में शिक्षा के प्रति तीव्र लगाव, लैंगिक समानता पर पूरा जोर तथा पारिवारिक संस्था के प्रति अनाकर्षण का भाव था. इसके साथ ही वह व्यक्तिगत संपत्ति की भावना का निषेध करता था. हालांकि, यह भी सच है कि अपनी अत्यधिक समृद्धि और ज्ञान की होड़ के कारण ही वह तंत्र नाकाम भी हुआ, जिसकी कल्पना प्लेटो ने की थी.’

स्पष्ट है कि प्लेटो ने न केवल आदर्श राज्य के लक्षणों की व्याख्या की है, बल्कि क्षरणशील राज्य-व्यवस्थाओं के गहन अध्ययन के उपरांत यह भी बताया है कि ऐसे राज्य, जहां न्याय की अवमानना हो, नागरिक समाज में सहिष्णुता एवं सामंजस्य-भावना का अभाव हो, की अंतिम नियति क्या हो सकती है.! कैसे वह अवनति को प्राप्त होगा! उसका मानना था कि अन्यायी तंत्र में बुराइयां सिर्फ ऊपरी स्तर तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे निचले स्तरों पर भी फैलती चली जाती हैं. इसका नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ता है. एक दिन पूरा समाज विकृति का रूप धारण कर अपने ही बोझ से धराशायी हो जाता है. सोवियत संघ में कुछ ऐसा ही हुआ था. उसकी स्थापना एक समानता-आधारित समाज की परिकल्पना के साथ की गई थी, जो स्वयं को किसी भी प्रकार की स्पर्धा से सर्वथा मुक्त रखेगा तथा परस्पर सहयोग एवं सहिष्णुता की भावना के साथ शासन कार्य करेगा. परंतु सोवियत शासकों ने कल्याण का अपने नागरिकों के बीच समविभाजन करने के बजाय, जो कि साम्यवाद का वास्तविक लक्ष्य था, स्वयं को अंतहीन स्पर्धा और हथियारों की दौड़ में झोंक दिया. यह जानते हुए भी कि पूंजीपति व्यवस्था में हथियारों का निर्माण भी लाभ की वांछा के साथ किया जाता है. इसलिए अमेरिका जैसे पूंजीवादी देश के शासक देश जहां निजी पूंजी के दम पर बनी हथियारों की कमाई से फल-फूल रहे थे, हथियारों का बाजार कम न हो इसके लिए दुनिया में यहां-वहां युद्ध थोपते रहना वहां राजनीति का चरित्र बन चुका था, वहीं सोवियत शासक नागरिकों के खून-पसीने से अर्जित सरकारी पूंजी द्वारा उन्हें स्पर्धा में पछाड़ देना चाहते थे. यह कार्य लंबे समय तक नामुमकिन था. केंद्रीय शासन के स्तर पर स्पर्धा की यह भावना धीरे-धीरे नागरिकों के आचरण में उतरती गई. अंततः वही सोवियत गणराज्य के पतन का कारण बनी. प्लेटो के राजनीतिक दर्शन का यदि गहराई से अध्ययन किया जाए तो अंततः हम इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि यह संभावना वह आज से 2400 वर्ष पहले ही व्यक्त कर चुका था. अमेरिका के साथ स्पर्धा करते हुए सोवियत संघ ने जो राह पकड़ी वह न केवल प्लेटो बल्कि उत्तरवत्र्ती माक्र्सवादी धारा के भी विपरीत थी.

यहां उल्लेख करना प्रासंगिक है कि जिस समाज में प्लेटो का जन्म हुआ वहां शीर्षस्थ वर्ग के लिए संपत्ति हासिल करना उतना ही महत्त्वपूर्ण था, जितना राजनीति में हिस्सा लेना. वहां व्यक्ति की संपत्ति के आधार पर ही उसका राजनीतिक स्तर तय किया जाता था. यही नहीं राजनीतिक भागीदारी के लिए व्यक्ति का न्यूनतम संपत्तिधारक होना अनिवार्य था. प्लेटो के अनुसार व्यक्तिवादी महत्त्वाकांक्षाएं वहां प्रेरक शक्ति का रूप धारण कर चुकी थीं. इससे उसको डर था कि समाज के शीर्षस्थ वर्ग के बीच संपत्ति की अंधी होड़ उसको विभाजित भी कर सकती है. संपत्ति के असमान विभाजन की स्थिति में जो उससे वंचित हैं, गरीब और विपन्न हैं वे भी शांत नहीं रहते. उन्हें हमेशा अपने अस्तित्व पर संकट की अनुभूति बनी रहती है. इससे मुक्ति की छटपटाहट उन्हें सत्ता-संघर्ष में वापस ले आती है. जीवन के अभाव और संघर्ष उन्हें लालची और अवसरवादी बनाते हैं. परिणामस्वरूप वे केवल अपने बारे में सोचने लगते हैं. उनका सारा सारा ध्यान भौतिक संपदा प्राप्त करने तक सीमित हो जाता है. मनुष्यता, ईमानदारी, सहिष्णुता और समर्पण जैसे आदर्श उनके लिए अर्थहीन हो जाते हैं. एक दिन वे सत्ता-शिखर पर काबिज भी हो जाते हैं, जिसमें उन्हीं के समान कुछ लोगों की साझेदारी होती है. सही मायने में वह अल्पतंत्र होता है, जिसमें शक्ति और संसाधन कुछ हाथों तक सीमित होकर रह जाते हैं. प्लेटो की यह परिकल्पना उनीसवीं शताब्दी में मजदूर क्रांति के बाद पेरिस कम्यून के रूप में सच होती दिखाई पड़ती है. इस विमर्श के उपरांत प्लेटो इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि समाज में—

भौतिक समृद्धि जैसे-जैसे अपनी चरमावस्था की ओर बढ़ती है, वैसे-वैसे मनुष्यता सिकुड़ती चली जाती है….धनवानों की महत्त्वाकांक्षाओं के बीच बढ़ती स्पर्धा उनके सभी प्रयासों को धनार्जन तक सीमित कर देती है. सत्तासीन अल्पवर्ग गरीबों से घृणा करता है तथा धनवानों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहन देता है. परिणामस्वरूप वे समस्त पुरस्कारों तथा मान-सम्मान पर कब्जा जमाए रखते हैं.’

अल्पतंत्रत्मक सत्ता के दोषों की व्याख्या करता हुआ प्लेटो आगे लिखता है कि सत्तारूढ़ अत्पवर्ग धनार्जन को न केवल अपने जीवन का ध्येय बना लेता है, बल्कि वह यह व्यवस्था भी करता है कि समाज की कुल निधियां बहुत सीमित वर्ग तक सिमटकर रह जाएं. उसका यह काम अपने पैरों पर स्वयं कुल्हाड़ी मारने जैसा होता है. क्योंकि समाज की कुल धन-संपदा का मुट्ठी-भर लोगों तक सिमट जाना बाकी लोगों को अपनी स्थिति पर सोचने के लिए प्रेरित करता है. जनता में उस अन्यायी व्यवस्था के विरुद्ध आक्रोश पनपने लगता है. वे उसके विरुद्ध एकजुट होने लगते हैं. यह स्थिति समाज को लोकतंत्र की ओर ले जाती है. परंतु प्लेटो उसपर अधिक विचार नहीं करता. इसलिए कि उसके विचार में लोकतंत्र की अगली परिणति अराजकता में होती है. सामान्यतः अराजकता को राजनीतिक-सामाजिक अव्यवस्था का पर्याय माना जाता है. अठारहवीं शताब्दी में पियरे जोसेफ प्रूधों ने अराजकता का विचार लोगों के सामने प्रस्तुत किया था. उसके अनुसार अराजकता विवेकवान समाज के आत्मानुशासन और स्वतः मर्यादानुपालन के साथ बाहरी सत्ता की आवश्यकता के गौण हो जाने वाली अवस्था है. समाज यदि स्वतः अनुशासित हो तो बाहरी कानून अप्रासंगिक हो जाते हैं. दूसरी ओर प्लेटो की अराजकता से सामाजिक अव्यवस्था और राजनीतिक सत्ता के महत्त्वहीन हो जाने का संकेत मिलता है. लोकतंत्र के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए प्लेटो ‘रिपब्लिक’ में लिखता है कि लोकतांत्रिक शासन जनमानस में मुक्ति का एहसास पैदा करता है. प्रत्येक नागरिक को यह बोध होता है कि वह कुछ भी कहने, करने के लिए स्वतंत्र है. लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को अपना मनपसंद कार्य चुनने की आजादी होती है. अतः प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन को इस प्रकार निर्धारित करता है, जिससे वह अधिकाधिक सुखोपभोग कर सके. इससे समाज में अराजकता फैलती जाती है. परिणामस्वरूप राष्ट्र का हित, समाज-कल्याण का लक्ष्य व्यक्तिगत स्वार्थभावना के चलते पीछे छूटता जाता है. इस प्रकार लोकतंत्र स्वेच्छापूर्वक अपनाई गई अराजकता का विविधवर्णी तंत्र है. देखने में यह बहुत आदर्श और मानवीय लगता है, किंतु प्रकारांतर में इसकी परिणति एक क्रूर तानाशाही व्यवस्था में होती है. इसलिए कि जनता के समर्थन पर चुनकर आए लोग कानून और संविधान के नाम पर ऐसी कार्रवाहियां जनता पर थोपते हैं, जो उनके वर्गीय हितों को पुष्ट करती हैं, जिनसे कल्याणकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में बचा जाना चाहिए. विश्व के दो बड़े देश, भारत और अमेरिका आज लोकतांत्रिक होने का दावा करते हैं. लेकिन अमेरिकी लोकतंत्र जहां पूंजीवादी शक्तियों के आगे समर्पित है, वहीं भारत में धार्मिक और जातीय समूह इसे मनमाना मोड़ देने में सक्षम हैं. इन स्थितियों में लोकतंत्र को लेकर आज से 2400 वर्ष पहले प्लेटो कहा एकदम सच लगता है.

लोकतंत्र के प्रति प्लेटो की अवधारणा उसके लंबे राजनीतिक अनुभवों से जन्मी थी. सुकरात को एथेंस की उस सरकार ने दंडित किया था, जो स्वयं के लोकतांत्रिक होने का दावा करती थी. तीस सदस्यीय उस सभा में जो सुकरात के मुकदमे की साक्षी थी, के मात्र तीन सदस्य सुकरात का स्पष्ट विरोध कर रहे थे. शेष सदस्य चुप रहकर उनका मूक समर्थन कर रहे थे. जो सुकरात के समर्थन में थे, उनकी आवाज में इतना दम नहीं था कि उसके विरोधियों का मुंह बंद करा सकें. उनमें कुछ प्लेटो जैसे सुकरात के युवा सदस्य भी थे, जिनकी वयस् मतदान के लिए निर्धारित न्यूनतम वयस् से कम थी. लोकतंत्र की कमजोरी का उल्लेख का करते हुए प्लेटो ने स्पष्ट किया था कि उसमें नेतागण अलग-अलग पृष्ठभूमियों से चुनकर आते हैं, जिनके हित भिन्न-भिन्न होते हैं. कभी-कभी धर्म, जाति, क्षेत्राीयता, भाषा संबंधी मुद्दे इतने गहरे हो जाते हैं कि वे प्रतिनिधि केवल अपने वर्गीय हितों को साधने पर ध्यान देते हैं, अतः वृहद सामाजिक-राष्ट्रीय लक्ष्य पीछे छूटते चले जाते हैं. चूंकि सभी अपने हित साधन को प्राथमिकता देते हैं, इसलिए उनके बीच राष्ट्रीय मुद्दों पर आम सहमति बन पाना असंभव-सा हो जाता है. उसके अभाव में अक्सर ऐसा भी होता है कि वे अपने उन हितों को भी नहीं साध पाते, जिन्हें लेकर उन्होंने चुनाव लड़ा था, जबकि निर्धारित अवधि के बाद जनता के सामने जाना उनकी लोकतांत्रिक विवशता बन जाती है. उस अवस्था में चुनाव में जीत के लिए वे अलोकतांत्रिक तरीके अपनाते हैं. चूंकि जनप्रतिनिधियों का अनैतिक आभामंडल क्षीण होता है, कभी-कभी वे खासे बदनाम भी होते चुके होते हैं, जिन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया की कमजोरियां सत्ता-शिखर ते ले जाती हैं—ऐसे सदस्य प्रशासन पर अपनी पकड़ नहीं बना पाते, जिसके कारण शासन के स्तर पर अराजकता की स्थिति बन जाती है. इसकी ओर प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में संकेत किया है. परिणामस्वरूप लोकतंत्र विरोधी शक्तियों को मनमानी करने का अवसर मिल जाता है. ऊपर से एक दिखता समाज भीतर ही भीतर अनेक वर्गों, जनसमूहों में बंट जाता है. उन सबकी समस्याएं एक जैसी होती हैं, समस्याआंे के कारक एक समान होते हैं. बावजूद इसके समस्याओं से निपटने के रास्तों पर उनके बीच कभी आम सहमति नहीं बन पाती है. इससे समाज सामाजिक-राष्ट्रीय मुद्दों पर एकमत होने के बजाय क्षुद्र स्वार्थांे के आधार पर बंट जाता है. समस्याओं के लिए जिम्मेदार शक्तियां लोगों को धर्म, क्षेत्रीयता, जाति, वर्ग, भाषा, प्रांतीयता आदि ऐसे मुद्दों पर बांटे रखती हैं, जिनका उनकी समस्याओं तथा विकास से को संबंध नहीं होता. प्रकारांतर में पूरा समाज—

तीन वर्गों में बंट जाता है. इनमें पहला है—पूंजीपति वर्ग(हालांकि प्लेटो ने इस शब्द का उल्लेख नहीं किया है), जो किसी न किसी बहाने धन-संचय के काम में लगा रहता है. दूसरी आम जनता, जो राजनीति के नाम से कतराती है, पर भ्रष्ट एवं स्वार्थी राजनयिकों का साथ देते हुए रात-दिन अपने काम में जुटी रहती है. तीसरा वर्ग उन स्वार्थी, प्रवंचक, धोखेबाज नेताओं का होता है जो अपने तात्कालिक हितसाधन के लिए जनोत्तेजना फैलाने का बहाना खोजते रहते हैं.’

इसका दुष्परिणाम होता है कि राष्ट्र अपने उन लक्ष्यों से दूर चला जाता है, जिनको सामने रखकर उसका गठन किया गया था. आमजनता का अपने प्रतिनिधियों और राजनीतिक व्यवस्था से विश्वास टूट जाता है. व्यापक सामाजिक असंतोष एवं जनाक्रोश का लाभ उठाने के लिए उन्हीं के बीच से कोई व्यक्ति आगे आता है. राजनीतिक अराजकता एवं फूट का लाभ उठाते हुए वह सबकुछ अपने अधीन कर लेता है. नागरिकों से उनके सामान्य अधिकार छीन लिए जाते हैं. अवसर का लाभ उठाते हुए पूंजीवादी ताकतें जो पहले उदंड और स्वार्थी नेताओं के साथ थीं, खेमा बदलकर वे तानाशाह के समर्थन में उतर आती हैं. उल्लेखनीय है कि तानाशाह बनकर जनाधिकारों ही हत्या करने वाला शासक दिखने में भला एवं नेकनीयत प्रतीत होता है. सत्ता पर कब्जा जमाते समय उसका नारा भी व्यापक लोकहित के निमित्त व्यवस्था-परिवर्तन का होता है. लेकिन सबकुछ अपने अधीन रखने, सत्ताकेंद्रों पर छा जाने की उसकी निरंकुश वृत्ति समाज के बहुसंख्यक वर्ग को निर्णय प्रक्रिया एवं राजनीतिक अधिकारों से बेदखल कर देती है. दोहरे चरित्र का उद्घाटन करते हुए प्लेटो ‘रिपब्लिक’ में लिखता है कि अपने आरंभिक दिनों में वह, स्वयंभू सत्ताओं का खंडन करते हुए, प्रत्येक व्यक्ति का खुली मुस्कान के साथ विनम्रतापूर्वक स्वागत करता है. धीरे-धीरे वह अपने मित्रों तथा आम जनता के दिल में जगह बना लेता है, वह कर्जदाताओं को राहत देता है, भूमि का जनता और अपने समर्थकों के बीच विभाजन करता है तथा एक उदार एवं सहिष्णु वातावरण तैयार करता है. मगर यह स्थिति बहुत लंबे समय तक नहीं रह पाती. उसके मनसूबे उस समय साफ होते हैं, जब वह अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिए अघोषित युद्ध का सहारा लेता है. वह अपने शत्रुओं तथा मित्रों को अलग-अलग खेमों में बांट देता है. लोगों से उनके सामान्य अधिकार छीन लिए जाते हैं. हालांकि उस समय भी दिखावे के तौर पर वह आम जनता के हित और उसके कल्याण की ही बात कहता है. हिटलर जैसा तानाशाह भी स्वयं को समाजवादी कहता था. वस्तुतः बड़े से बड़े तानाशाह के दिल में भी जनता का डर समाया होता है. जनविद्रोह को रोकने के लिए वह अपनी ताकत का भ्रम पैदा करता है, उदारता का मुखौटा लगाता है. राष्ट्रीयता का बढ़-चढ़ कर बखान करता है. पर उसकी ये सभी कोशिशें एक दिन वृथा सिद्ध होती है. जनविद्रोह की संभावित घटना को टालने, लोगों की एकजुटता को रोकने के लिए वह—

सामान्य भोजों, दावतों, क्लबों, शिक्षा सदनों तथा ऐसे ही अन्य संस्थानों पर जो लोगों को परस्पर करीब लाते हैं, प्रतिबंध लागू करता है. वह हर उस रास्ते का अनुसरण करता है जो लोगों को परस्पर अजनबी बनाते हुए, उन्हें एक-दूसरे से दूर ले जाने में सहायक हो.’

अरस्तू तानाशाही व्यवस्था का विस्तार से उल्लेख करता है. तानाशाह के शासन में प्रत्येक नागरिक पर कड़ा अनुशासन और सरकार की पैनी नजर होती है. उसके दिल में समाया हुआ डर उसको कभी भी निद्र्वंद्व नहीं होने देता इसलिए वह शासन को लगातार कठोर बनाता चला जाता है. अरस्तु ने अपनी पुस्तक ‘दि पाॅलिटिक्स’ में तानाशाही व्यवस्था के लक्षणों का विस्तार सहित उल्लेख किया है. वहीं प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ में हम विभिन्न राजनीतिक दर्शनों की छाया देखते हैं, जिनमें वह दार्शनिक सम्राट के पक्ष में अपना निर्णय सुनाता है. एक कवि हृदय विचारक की एथेंस की तानाशाही के प्रत्युत्तर में ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही थी. अरस्तु ने अपेक्षाकृत परिपक्व राजनीतिक दर्शन प्रस्तुत करते हुए ‘दि पालिटिक्स’ की रचना की, जिसमें उसने नैतिकता को पहले रखते हुए कहा कि राज्य वास्तव में परिवारों में सुखामोद एवं असंतोष की संतुलित उपस्थिति है, जो आत्मनिर्भर एवं सुखी-समृद्ध जीवन के लिए अनिवार्य है. वह समाज को नैतिकता की पुण्य-भूमि मानता था. संविधान निर्माता को उसने शिल्पकर्मी माना. उसके अनुसार समाज वह पदार्थ है, जिसे वह अपने शिल्पकर्म से संवारता है. प्लेटो की आरंभिक संवाद पुस्तक ‘प्रोटेगोरस’ में प्रोटेगोरस सुकरात से प्रश्न करता है कि जिस प्रकार तलवारबाजी, घुड़सवारी, युद्धनीति के शिक्षक आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं, उसी प्रकार नैतिकता और सद्गुण के शिक्षक क्यों उपलब्ध नहीं होते? इसपर सुकरात का उत्तर था कि सद्गुण और नैतिकता के लिए अलग से कोई अध्यापक हो ही नहीं सकता, क्योंकि इनकी शिक्षा तो संपूर्ण समाज द्वारा दी जाती है. आशय है कि समाज में नैतिकता हो, तभी वह नवागत उसके सदस्यों में अंतरित हो सकती है.

अरस्तु का जन्म सुकरात को मृत्युदंड दिए जाने के 15 वर्ष बाद, 384 ईस्वी पूर्व हुआ था—प्लेटो द्वारा अकादमी की स्थापना से करीब एक वर्ष बाद. लगभग 18 वर्ष की अवस्था में उसने प्लेटो द्वारा स्थापित अकादमी में प्रवेश लिया. वहां लगभग बीस वर्षों तक उसने शिक्षार्जन किया. अरस्तु द्वारा अकादमी को छोड़ने तक प्लेटो की मृत्यु हो चुकी थी. तदनंतर अरस्तु ने अकादमी और यूनान दोनों को छोड़कर एशिया माइनर की ओर प्रस्थान किया, जहां अगले पांच वर्ष उसने दर्शन और विज्ञान के अध्ययन में बिताए. इस बीच मेकाडोनिया के सम्राट फिलिप द्वितीय के आमंत्रण पर वह मेकादोनिया पहुंचा. वहां उसको सिकंदर के अध्यापन का दायित्व सौंप दिया गया. युवा और महत्त्वाकांक्षी सिकदंर में उसको महान सम्राट के लक्षण दिखाई दिए. 300-400 ईस्वी पूर्व का समय इतिहास का वह दौर है जब लोग छोटे-छोटे कबीलाई राजाओं के आतंक, उनकी सनकों और मनमाने आचरण से तंग आ चुके थे. यह माना जाने लगा था कि राज्य के कल्याण के लिए बड़े राज्य की स्थापना अपरिहार्य है. ये प्रयास यूनान और भारत में लगभग साथ-साथ हो रहे थे. जो प्रयोग अरस्तु ने सिकंदर के रूप में यूनान के मेकाडोनिया राज्य में आरंभ किया था. ठीक वही कार्य चाणक्य(350 ईस्वी पूर्व—283 ईस्वी पूर्व) चंद्रगुप्त मौर्य को लेकर भारत में दोहरा रहा था. अरस्तु तथा चाणक्य दोनों सुदृढ़ केंद्र के समर्थक थे तथा उसके लिए कूटनीति का सहारा लेने से भी उन्हें गुरेज नहीं था. अरस्तु की राज्य की अवधारणा प्लेटो से पूरी तरह भिन्न थी. उसने स्पष्ट लिखा था कि ‘राज्य वाणिज्यिक प्रसार और आपसी सुरक्षा हेतु गठित समूह-मात्र नहीं है.’ बल्कि वह ऐसी व्यवस्था है, जिसमें प्रत्येक नागरिक अपनी स्वतंत्रता का आनंद लेते हुए अमन-चैन के साथ रह सकता है. अच्छा राजनयिक वह है जो अपने नागरिकों की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को समझता और उनका सम्मान करता हो.

समाज के बारे में अरस्तु की धारणा अपने गुरु प्लेटो से भिन्न थी. उसके लिए समाज उन मानवीय वृत्तियों का स्रोत है, जो मनुष्य को एक-दूसरे के हित के लिए परस्पर संगठित होने, परिवारों का गठन करने, मैत्री स्थापित करने, दूसरों को नियंत्रित कर उनपर अपना अधिपत्य जमाने, नकारात्मक वृत्तियों जैसे लालच, क्रूरता, दैन्य, स्वार्थपरता आदि से दूर रहने तथा ज्ञानार्जन की चाहत, सामंजस्य, उदारता, ईमानदारी, सहिष्णुता आदि के लिए प्रेरित करती है. अरस्तु ने मनुष्य को ‘बुद्धिमान पशु’ माना था. उसके समानांतर समकालीन चीनी दार्शनिकों ने मनुष्य को ‘नैतिक पशु’ कहकर परिभाषित किया था. उल्लेखनीय है कि प्लेटो की भांति अरस्तु का जन्म भी एक अभिजात्य परिवार में हुआ था. वह सुकरात और प्लेटो के आदर्शवाद से प्रभावित था, किंतु अपने अनुभव से वह समझ चुका था कि उनका आदर्शवाद छोटे-छोटे राज्यों के आपसी युद्धों, मनमुटावों को रोकने में नाकाम रहा है. इसलिए वह जतन से मनुष्य को राजनीति का पाठ पढ़ाता है, जो उसको बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में संगठित होने के लिए प्रेरित कर सके. सुदृढ़ राजनीतिक केंद्र की अनुशंसा करते समय वह नैतिकता और आदर्शवाद को बिसराता नहीं—यही उसकी महानता है. यद्यपि उसके इस चिंतन में जगह-जगह विरोधाभास भी हैं. एक स्थान पर उसने राज्य को नागरिकों का वह सीमित समूह भी माना है, जो नगर में राजनीतिक गतिविधियों का संचालन करने के लिए जिम्मेदार होते हैं. अरस्तु का यह अभिजात्यीय संस्कार ही है, जिसके कारण वह स्त्रिायों, दासों, साधारण पेशेवरों को ‘नागरिकता’ की परिभाषा से अलग रखता है, जबकि प्लेटो ने स्त्रिायों को भी ‘नागरिक’ माना था. अरस्तु के अनुसार—

कुछ आदमीस्वभाव से ही दूसरों पर निर्भर होते हैंइसलिए सही मायने में उन्हें या तो दास कहा जा सकता है अथवा ऐसा ही कोई चलता-फिरता प्राणी.’

यहां प्रश्न स्वाभाविक है कि अरस्तु ने जिन्हें ‘नागरिक’ की गरिमा से महिमामंडित किया है, उनका जीवन कैसा होगा? राज्य तथा उनके बीच क्या संबंध होंगे? अरस्तु के अनुसार नागरिकों के जीवन और कर्तव्यों का निर्धारण करने का दायित्व राज्य का है. यह बहुत कुछ उस संविधान पर निर्भर होगा जिसको वे नागरिक अपने लिए उपयुक्त मानते हैं. उसने तीन प्रमुख राज्य प्रणालियों का उल्लेख अपनी पुस्तक ‘दि पालिटिक्स’ में किया है. वे हैं—राजशाही, कुलीनतंत्र तथा संवैधानिक आधार पर चुनी गई सरकारें अथवा जनतंत्र. जैसा कि स्पष्ट है तीनों में निर्णायक शक्तियां क्रमशः एक के हाथ में, कुछ व्यक्तियों के हाथ में तथा वृहद जनसमाज के हाथों में होती हैं. यद्यपि जनसामान्य की राय को भी कई ऐसे कारणों से प्रभावित किया जाता है, जिनका व्यक्ति के सामाजिक-राजनीतिक विकास से कोई संबंध नहीं होता. लोकतांत्रिक दल समाज को जाति, धर्म, क्षेत्रीयता, भाषा जैसे समूहों में बांट देते हैं. जिससे लोक की शक्ति क्षीण हो जाती है. स्वार्थी राजनयिकों द्वारा बाद में उसका मनमाना दुरुपयोग किया जाता है. उपर्युक्त तीनों के अतिरिक्त सरकार के कुछ अन्य रूप भी संभव हैं, जो व्यक्तियों की आपसी समझ और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं. अरस्तु इनमें से किसी एक का पक्ष लेने के बजाय ‘श्रेष्ठतम व्यक्तियों द्वारा श्रेष्ठतम शासन’ की पद्धति को अपनाने का पक्ष लेता है—

अभी तक हमने तीन प्रकार की शासन प्रणालियों पर विचार किया है तथा पाया है कि इन तीनों में से वही सर्वश्रेष्ठ है, जो सर्वोत्तम व्यक्तियों द्वारा शासित हो. यह किसी एक व्यक्ति द्वारा शासित प्रणाली भी हो सकती है, किसी परिवार द्वारा और बहुत-से व्यक्तियों द्वारा भी, जो शेष समाज को मनुष्यता की सर्वोन्नत अवस्था तक ले जाने में सक्षम हों, जिनमें शासन करने की पर्याप्त क्षमता हो, और जो इस प्रकार शासन करें, जिससे अधिकतम लोगों का अधिकतम कल्याण संभव हो तथा जिसको अधिकतम लोग स्वीकार करते हों. इससे अंततः हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि एक अच्छे व्यक्ति के गुण तथा सर्वोत्तम सरकार में नागरिक के गुण एकसमान होते हैंयह तथ्य स्वतः प्रमाणित है.’

शब्दों के थोड़े ऐर-फेर के साथ इस तथ्य को प्लेटो भी स्वीकार करता है. अपने संवाद ‘स्टेट्समेन’ में युवा सुकरात ‘अच्छी सरकार’ के विषय पर चर्चा करते हुए अजनबी यात्राी से कहलवाता है कि—

यह मानने में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि संविधान का अनुसरण करना-कराना ही सम्राट का पवित्र कर्तव्य है. इसमें सर्वोत्तम यह नहीं है कि कानून शासन करे, बल्कि उचित यह होगा कि मनुष्यमात्र, सम्राट को ज्ञान एवं शक्ति का सर्वाेच्च केंद्र मानते हुए स्वयं शासन करे….क्योंकि कानून स्वयं यह नहीं समझ पाता कि सबके लिए सर्वोचित एवं सर्वाेत्तम क्या है, इसलिए वह सर्वश्रेष्ठ को लागू करने में भी असमर्थ रहता है. मनुष्यों एवं उनकी कार्यशैलियों का व्यावहारिक अंतर तथा उसके द्वारा संचालित अनेकानेक कार्यक्रमों में अंतहीन अनियमिततताओं की व्याख्या किसी एक सामान्य तथा सार्वभौमिक नियम द्वारा असंभव है.’

अरस्तु स्वाधीनता को मनुष्य का मूल अधिकार मानता था, हालांकि स्वाधीनता की उसकी अवधारणा समाज के विशेषाधिकारसंपन्न वर्ग तक सीमित थी. विशेषाधिकार संपन्न वर्ग से उसका तात्पर्य अभिजात वर्ग से था, जिसके पास संसाधनों की प्रचुरता थी. एथेंस, स्पार्टा समेत प्राचीन यूनानी राज्यों में राजनीतिक अधिकार इसी वर्ग के अधीन थे. अपने गुरु प्लेटो की भांति अरस्तु ने भी राज्य को यह अधिकार दिया है कि वह अपने लाभ के लिए संपत्ति और संसाधनों की देखभाल और व्यवस्था करे. इस अर्थ में हम प्लेटो और अरस्तु दोनों को समाजवादी मान सकते हैं, हालांकि ‘समाजवाद’ नामक पद का जन्म उस समय तक नहीं हो पाया था. वे दोनों इस बात को लेकर भी एकमत थे कि बच्चों का जन्म और उनका पालन-पोषण राज्य की देखरेख में इस प्रकार हो कि वे बड़े होकर स्वस्थ एवं सुशिक्षित नागरिक बन सकें. उन्हें वही शिक्षा मिलनी चाहिए, जैसा कि राज्य के लिए उचित हो—

जनता से जुड़े सभी मामलों का प्रबंधन सर्वमान्य पद्धतियों द्वारा सार्वजनिक रूप से किया जाना चाहिए. हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नागरिकों में से प्रत्येक केवल स्वयं तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी का संबंध राज्य से है.

प्लेटो की भांति अरस्तु भी केवल राज्य को उसके कर्तव्यों के बारे में निर्देशित कर शांत नहीं हो जाता. वह उन रास्तों पर भी विचार करता है कि जिनसे जनसाधारण के जीवन को अनुशसित एवं सुखमय बनाया जा सके. उसके अनुसार राज्य की भूमिका सुव्यवस्थित परिवार के मुखिया के समान होनी चाहिए, जो बच्चों(नागरिकों) का पालन-पोषण नैसर्गिक स्नेहानुराग तथा निष्ठापूर्वक करना अपना पवित्र कर्तव्य मानता है. परिवार(नागरिकों) का मुखिया होने के नाते वह भली-भांति जानता-समझता है कि उसकी संतान(नागरिकों) में से कौन किस योग्य है, तथा कौन किस काम को खुशी-खुशी तथा सफलतापूर्वक पूरा कर सकता है. इसलिए वह ऐसी व्यवस्था करता है, जिसमें प्रत्येक नागरिक समाज के विकास में, कर्तव्यपालन का आनंद उठाता हुआ, अपना सर्वोत्तम योगदान दे सके. राज्य-प्रबंधनकर्ता यानी मुखिया कोई स्वयंभू सम्राट भी हो सकता है. यदि किसी अकेले व्यक्ति में ये गुण न हों तो राज्य के विधिवत संचालन के लिए लोकतंत्र को भी अपनाया जा सकता है. आशय यह है कि अरस्तु के लिए शासन-प्रणाली उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितनी राज्य का विकास. उसके अनुसार राजसत्ता का स्वरूप चाहे जैसा हो, उसका अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत रहना अनिवार्य है. ‘पाॅलिटिक्स’ में एक स्थान पर वह गणतंत्र का समर्थन करता हुआ भी नजर आता है. वह मानता है कि विशेष परिस्थितियों में ‘बहुसंख्यक की राय को हीशासन का अधिकार’ सौंपना ही बेहतर होता है. संभवतः अपने जीवन के कड़वे अनुभवों से वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि—

किसी अकेले व्यक्ति की राय हमेशा उतनी बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं हो सकती. इस बात की सदैव पर्याप्त संभावना रहती है कि सभी नागरिक परस्पर मिल-बैठकर जो निर्णय लेते हैं, वह श्रेष्ठतर होता हैजैसे सामूहिक भोज किसी अकेले व्यक्ति के खर्च पर दी गई दावत की अपेक्षा कहीं अधिक आनंददायक होता है.’

आदर्श राज्य की स्थापना प्लेटो और अरस्तु दोनों की ही चिंताओं में शामिल थी.इस बारे में प्लेटो का सोच आदर्शात्मक था, जबकि अरस्तु व्यावहारिक धरातल पर भी विचार करता है. हालांकि अपने लक्ष्य में पूर्ववर्ती विचारकों, गुरुओं से सामंजस्य रखते हुए अरस्तु भी ऐसी व्यवस्था के गठन पर जोर देता है, जहां ‘शुभत्व’ एवं ‘कल्याण’ की सर्वत्र व्याप्ति हो. ऐसे राज्य की स्थापना हेतु प्लेटो ने राज्य की बागडोर किसी दार्शनिक के हाथों में सौंप देने का सुझाव दिया था, जबकि अरस्तु परिस्थितियों के अनुसार सर्वोत्तम राज्यप्रणाली के चयन का मार्ग सुझाता है. उल्लेखनीय है कि प्लेटो के ‘दार्शनिक राजा’ का विचार उसके जीवनकाल में भी अनुपयोगी सिद्ध हो चुका था. स्वयं प्लेटो सायराकस सम्राट डायोजिनियस प्रथम के दरबार में महत्त्वपूर्ण पद पर रह चुका था. उसके दरबार में और भी कई विद्वान विचारक थे, किंतु उनकी उपस्थिति केवल दरबार की शोभा बढ़ाने के लिए थी. उसका उद्देश्य अन्य राजाओं पर अपनी बुद्धिमत्ता की धाक जमाना होता था. प्लेटो, डीओन सहित अन्य विचारकों, दार्शनिकों की उपस्थिति भी डायोजिनियस प्रथम की निरंकुशता पर लगाम लगाने में नाकाम सिद्ध हुई थी. सायराकस के अलावा भी अन्य कई स्थानों पर दार्शनिकों की पहल पर उदार एवं प्रगतिशील समूहों की स्थापना की कोशिश भी हो चुकी थी, लेकिन वे सभी प्रयास अल्पकालिक तथा असफल सिद्ध हुए थे. इससे यह मान लेना अनुचित होगा कि प्लेटो की संकल्पनाओं अथवा आदर्श राज्य को लेकर उसकी अभिकल्पना में दोष था. न ही यह सोचना उचित होगा कि आदर्श की स्थापना के प्रति प्लेटो की निष्ठा संद्धिग्ध थी. वस्तुतः उसकी विचारधारा व्यावहारिकता से परे, दार्शनिक गुणों, मानवीय सर्वोच्चता, सत्य के प्रति तीव्र आग्रहशीलता, न्याय और वास्तविक सौंदर्य पर केंद्रित है. उसमें वह ऊंचाई है जिसको शायद ही कभी प्राप्त किया जा सके. तथापि उसमें आदर्श व्यवस्था के रूप में मानव समाज को प्रेरित करते रहने का गुण है. स्वयं प्लेटो की प्रेरणा का आधार सुकरात का वह पत्र है, जो उसने एथेंस के गणतंत्र द्वारा दिए गए मृत्युदंड पर अमल की प्रतीक्षा करते हुए, कारावास से अपने शिष्यों-समर्थकों के लिए लिखा था. पत्र में वह सभी तात्कालिक शासन प्रणालियों, यहां तक कि दार्शनिक राज्य की अवधारणा से भी निराश दिखता है. उस पत्र में सुकरात लिखता है कि—

मैं अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि सभी समकालीन राज्य बड़े ही निकृष्ट ढंग से शासित थे, साथ ही यह कि उनके संविधान मानव कल्याण के सर्वोच्च लक्ष्य के हित में, व्यवस्था में आमूल परिवर्तन करने में अक्षम थे. सही मायने में, मुझे यह मानने के लिए बाध्य किया गया कि सामाजिक और व्यक्तिगत न्याय की स्थापना की अंतिम धुरी केवल सच्चे दर्शन में ही केंद्रित है. मनुष्यता का भला, संकटों से उसकी मुक्ति उस समय तक असंभव है, जब तक कोई सच्चा-भला दार्शनिक राजनीतिक सत्ता प्राप्त नहीं कर लेता अथवा अकस्मात ऐसा कोई चमत्कार नहीं हो जाता कि राजनयिकगण सच्चे दार्शनिक बन जाएं.’

इस वक्तव्य में सुकरात की निराशा की झलक साफ देख सकते हैं. अपने गुरु से प्रेरित प्लेटो के राजनीतिक दर्शन की सीमा भी यही है कि जिस प्रकार वह अपने आदर्शलोक की परिकल्पना पर दृढ़ है, उतना उस परिकल्पना को यथार्थ में साकार करने के तरीकों पर नहीं. इस कमी के चलते आदर्शलोक केवल पुस्तकों और चिंतन-मनन की विषयवस्तु बनकर रह जाता है. तो भी यह प्लेटो ही जो गत 2400 वर्षों से विचारकों-दार्शनिकों को निरंतर प्रभावित करता आ रहा है. उसका यह कथन आज भी सर्वाधिक स्वीकार्य है कि सामाजिक संगठनों का सर्वाधिक सक्षम रूप वही हो सकता है, जिनमें व्यक्ति और समूह सभी के अलग-अलग कर्तव्य और विशिष्टताएं निर्धारित हों. वह सामाजिक, राजनीतिक एवं शैक्षिक आधार पर समाज के स्तरीकरण को स्वीकार तो करता है, किंतु उसका यह स्तरीकरण स्थायी नहीं है. वह जन्माधारित न होकर व्यक्ति की कार्य-कुशलता, रुचि एवं योग्यता पर आधारित है. वह यह मानता था कि सभी मनुष्य अपूर्ण हैं, लेकिन पर्याप्त शिक्षा, प्रशिक्षण आदि द्वारा उन्हें इस योग्य बनाया जा सकता है कि वे दिए गए कर्तव्यों का निष्पादन भली-भांति कर सके.

प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में चर्मकार, काष्ठकार, बुनकर, योद्धा, नाविक, चिकित्सक, राजमिस्त्री आदि भिन्न-भिन्न शिल्पकर्मियों तथा उनके व्यवसायों का उल्लेख किया है, किंतु उनके बीच न तो किसी प्रकार का आर्थिक विभाजन अथवा स्तरीकरण है, न ही उन्हें जन्म के आधार पर उसी व्यवसाय में रहने के लिए बाध्य किया जाता था—जिस प्रकार भारत में वेद एवं मनुस्मृति को आधार बनाकर समाज का वर्ग-विभाजन किया गया, जिससे भारतीय समाज में ऊंच-नीच की धारणा बलवती हुई. निहित स्वार्थों के कारण ब्राह्मणवाद के पोषक धर्माचार्यों-पुरोहितों द्वारा इस व्यवस्था का लगातार पोषण-पल्लवन किया जाता रहा. परिणामस्वरूप समाज में अनेकानेक अंतर्द्वंद्वों तथा विक्षोभ पैदा हुए, जिनकी मार से भारतीय जनसमाज अभी तक कराह रहा है. प्लेटो द्वारा सुझाया गया सामाजिक स्तरीकरण वास्तविकताओं और व्यावहारिक मजबूरियों के कारण है. उसका कहना था कि लोग संगठित रहते हुए अपने-अपने कर्तव्य का पालन करें. उसने राज्य की तुलना एक मानव शरीर से की है, जिसका शीर्ष, हृदय और शरीर सभी कुछ होता है. यह तभी हृष्ट-पुष्ट रह सकता है जब शरीर के सभी अंग-उपांग अपने अपने दायित्वों का निर्वहन अपने पूरे सामर्थ्य, मनोयोग और निष्ठापूर्वक करें. यही ‘रिपब्लिक’ का वास्तविक और चिर-प्रासंगिक संदेश है.

 © ओमप्रकाश कश्यप

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प्लेटो का समाजार्थिक दर्शन : न्याय की अवधारणा

रिपब्लिक’ में प्लेटो ने अपने राजनीतिक दर्शन के मूलभूत तत्वों की रूपरेखा प्रस्तुत की थी. गंभीर चिंतन के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि समाज के गठन का उद्देश्य अयाचित और किसी कल्याण-भाव से प्रेरित नहीं है. यह सीधे-सीधे व्यक्ति के स्वार्थ से जुड़ा है. चूंकि अकेले मनुष्य के लिए जीवन की अनेक दुश्वारियां थीं, इसलिए उसने समूह में रहना सीखा. समूह को स्थायित्व प्रदान करने, उसमें शांति-व्यवस्था बनाए रखने, विकास और सुखानंद के लिए उसने कुछ नियमों का विन्यास किया. कालांतर में ये नियम सभ्यता का प्रतीक बनकर जटिल सामाजिक संबंधों में ढलते चले गए. आज से करीब पांच हजार वर्ष पहले मनुष्य व्यापार में तरक्की कर चुका था. उसने नौकाओं और भारी जलयानों की सहायता से लंबी समुद्री यात्रएं करना सीख लिया था. दुर्गम स्थानों की यात्रा के लिए वह पशुओं की मदद लेता था. रास्ते में हिंस्र पशुओं और दस्युओं का खतरा था. उनसे निपटने के लिए उसने भाड़े के सैनिक रखने आरंभ किए.

सैन्यबल और धन-संपदा दोनों ही ताकत का प्रतीक थीं, व्यक्ति के पास जब इनका प्राचुर्य हुआ तो उसकी महत्त्वाकांक्षाएं अंगड़ाई लेने लगीं. प्रारंभ में जिन स्थानों से उसको वाणिज्यिक लाभ पहुंचता था, उन स्थानों पर सीधे अथवा अपने सहयोगियों की सहायता से अपने उपनिवेश कायम करने लगा. प्रारंभ में जो राज्य बने उनका क्षेत्रफल बहुत कम, नगर-विशेष की सीमा तक होता था. निश्चितरूप से तत्कालीन नगर-राज्य की स्थापना एक स्वतंत्र एवं आत्मनिर्भर आर्थिक-राजनीतिक इकाई के रूप में की गई होगी. शीघ्र ही मनुष्य को लगने लगा था कि विकास की निरंतरता के लिए संबंधों का विस्तार अत्यावश्यक है. ऐसी कार्यकारी संस्थाओं की आवश्यकता है जिनके द्वारा संबंधों को मर्यादित और नियंत्रित किया जा सके. इससे नए राजनीतिक दर्शन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी.

आदिम मानवीय जिज्ञासा केवल जीवन और प्रकृति के रहस्यों के अन्वेषण तक सीमित थी, जिसके कारण दर्शनों का विस्तार हुआ. बहुत शीघ्र मनुष्य को लगने लगा कि केवल पराभौतिक सत्ता की खोज से काम चलने वाला नहीं है. जीवन को अधिक सुविधासंपन्न बनाने तथा प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए प्रकृति को समझना भी अनिवार्य है. इसलिए बुद्धिजीवियों का ध्यान इहलौकिक सत्यों के अन्वेषण की ओर गया, जिससे ज्ञान-विज्ञान की खोज के नए रास्तों का विकास हुआ. ईसा से 426 वर्ष पहले जन्मे यूनानी दार्शनिक वैज्ञानिक डेमोक्रिटिस ने लोकभ्रांतियों का खंडन करते हुए घोषणा की कि चंद्रमा पर दिखने वाली छाया वस्तुतः उसकी सतह पर बने ऊबड़-खाबड पठार हैं. उसने नीहारिकाओं का रहस्योद्घाटन करते हुए बताया कि रात में आसमान में नजर आने वाली दूधिया नदी, वास्तव में तारों का प्रकाश है, जो अरबों की संख्या में विराट अंतरिक्ष में फैले हुए हैं.

हालांकि लोकमानस सूर्य, चंद्र आदि ग्रह-नक्षत्रों की भावनात्मक कहानियां आगे भी गढ़ता रहा, तो भी डेमोक्रिटिस के लेखन से आने वाले विचारकों को एक नई दिशा मिली. लोगों को लगा कि विश्वसमाज और उसकी उत्पत्ति की तह में जाने का एक तरीका यह भी हो सकता है, जो दूसरे की अपेक्षा कहीं अधिक वस्तुनिष्ठ और तर्कसम्मत है. इससे आगे चलकर विज्ञान के विकास को नई दिशा मिली. देखा जाए तो वह समय दुनिया की सभी बड़ी सभ्यताओं भारत, यूनान, मिश्र, चीन में वैचारिक क्रांति के उद्घोष का था, जिसमें महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, सुकरात, कन्फ्यूशियस, अजित केशकंबलि आदि का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने अपने मौलिक चिंतन से प्रचलित धर्म-दर्शन की जड़ता और उसके पोंगापंथी सोच पर तीखा प्रहार किया. लगभग यही वह दौर था जब व्यवस्थित राजनीतिक दर्शन पर विचार किया गया, जो धार्मिक आग्रहों से पूरी तरह स्वतंत्र था.

यह नया चिंतन विज्ञानवादी सोच के साथ-साथ उभर रहा था. राज्य की उत्तरोत्तर बढ़ती महत्ता को पहचानकर डेमोक्रिटिस ने ही सपना देखा था कि कोई तो होगा जो राज्य के मामलों को दूसरे सभी मामलों पर तजरीह देगा. कुछ इस तरह कि सबकुछ संतुलित-सा लगे. जो न तो वास्तविकता से बहुत परे, विवादपूर्ण हो, न ही किसी सार्वजनिक शुभ से इतर विषयों पर जोर देता हो. उसकी निगाह में राज्य का प्रबंधन किसी भी अन्य कार्य से अधिक महत्त्वपूर्ण और श्लाघनीय कर्म था. उसके अनुसार ऐसे राज्य के लिए जिसको सही ढंग से व्यवहृत किया जा रहा है

विकास का सर्वोत्तम रास्ता है कि सबकुछ इसी(राज्य)पर निर्भर हो. यदि राज्य की सुरक्षा हुई तो बाकी सब सुरक्षित रहेगा; और यदि राज्य को नष्ट किया गया तो शेष सभी नष्ट हो जाएगा.’

डेमोक्रिटिस का यही सोच आगे चलकर प्लेटो, अरस्तु आदि के राजनीतिक चिंतन की प्रेरणा बना. पश्चिमी समाज में सुकरात की स्थिति एक धार्मिक आचार्य के तुल्य है. उसने हालांकि स्वयं कुछ नहीं लिखा था, लेकिन एक मसीहा की भांति उसका गहरा प्रभाव पूरे यूरोपीय चिंतन पर बना हुआ है. सुकरात के बारे में दुनिया जो भी जानती है, वह प्लेटो सहित सुकरात के अन्य शिष्यों, समकालीनों के माध्यम से ही. तो भी यह सुकरात के सोच का अनूठापन ही था कि उसको प्लेटो जैसे विचारकों ने अपना गुरु माना. धर्म-दर्शन के क्षेत्र में जिस आदर्शवाद का पक्ष सुकरात लेता था, प्लेटो ने उसी के माध्यम से अपने राजनीतिक दर्शन की परिकल्पना की. यही कारण है कि प्लेटो का राजनीतिक दर्शन धार्मिक टच लिए हुए है. सुकरात का उल्लेख उसने तेजस्वी विद्वान व्यक्ति के रूप में किया है, जो ‘शुभ’ को पहचानने तथा उसका अनुसरण करने की आवश्यकता पर जोर देता है. वह ईश्वर की परंपरागत अवधारणा से भिन्न, यद्यपि उसकी कुछ समानताएं लिए हुए है. प्लेटो एथेंस की राजनीतिक उथल-पुथल का साक्षी रहा था.

सुकरात से करीब 40 वर्ष छोटे प्लेटो ने एथेंस और स्पार्टा के बीच तीस वर्ष तक चलने वाले युद्ध को अपनी आंखों से देखा था. वह 429 ईस्वी पूर्व की एथेंस की प्लेग का भी साक्षी रहा था, जिसमें उसके महान योद्धा और राजनीतिज्ञ पेरीक्लीस समेत अनेक बहादुर सैनिकों को जान गंवानी पड़ी थी. 401 ईस्वी पूर्व में एथेंस की हार के बाद वहां के सम्राट को अपदस्थ कर विजयी स्पार्टा ने वहां तीस सदस्यीय संसद की स्थापना की थी. उसके बाद कुछ समय तक सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहा, मगर उसके बाद एथेंस में भ्रष्टाचार और तानाशाही का बोलबाला हो गया. इस तरह प्लेटो ने राजशाही और कुलीनतंत्र दोनों का अनुभव था. गणतंत्र के नाम पर गठित परिषद के सदस्य निजी अहं के शिकार होकर मनमानी करने लगे. परिषद कुलीनतंत्र की हठधर्मी का माध्यम बन चुकी है.

इन दोनों राजनीतिक प्रणालियों से निराश प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में दार्शनिक सम्राट की अनिवार्यता पर जोर दिया था. वह स्वयं एक अभिजात परिवार से था, एथेंस के सम्राट से उसका संबंध था, इस कारण वह स्वयं को एथेंस की राजनीति का उत्तराधिकारी भी मानता था. उसको सक्रिय राजनीति में योगदान देने का अवसर तो कभी न मिल सका, तो भी राजनीति उसके दिलो-दिमाग पर सदैव हावी रही. ‘रिपब्लिक’ में जिस आदर्शलोक का सपना वह देखता है और उसके लिए जिस राजनीतिक दर्शन की परिकल्पना करता है, वह सक्रिय राजनीति में हिस्सा न ले पाने से उत्पन्न कुंठा की उपज था.

प्लेटो को लगता था कि राजनीतिक पदों पर जिम्मेदारी का निर्वहन चुनौती-भरा काम होता है. महत्त्वपूर्ण कर्तव्यों के निष्पादन के लिए उपयुक्त व्यक्ति पर्याप्त संख्या में सर्वदा उपलब्ध हों, यह संभव भी नहीं होता. इसलिए किसी भी राज्य के सामने, जो नागरिक हितों को सर्वोपरि समझता है, बड़ी समस्या ईमानदार, दूरदृष्टा, साहसी और नीतिवान राजनीतिज्ञों के चयन की होती है. प्लेटो को विश्वास था कि शिक्षा के माध्यम से अच्छे राजनीतिज्ञ तैयार किए जा सकते हैं. उसने द्वारा ‘अकादमी’ की स्थापना इसी उद्देश्य के निमित्त की गई थी. पल-भर के लिए एकदम हाल के युग में लौटकर याद करने की कोशिश करें. कुशल-नीतिवान राजनीतिज्ञों की उपलब्धता की समस्या को लेकर ब्रिटिश की तत्कालीन प्रधानमंत्री मारर्गेट थैचर ने भी अपने एक बयान में कहा था कि उन्हें राजकर्म के कुशल संपादन के लिए केवल छह व्यक्तियों की आवश्यकता है, जो निपुण एवं नीतिवान हों. पर ऐसे लोग इतनी संख्या में कभी एक साथ नहीं मिल पाते.

यही समस्या प्लेटो के सामने भी थी. इसलिए उसने शिक्षा के माध्यम से भावी राजनीतिज्ञों की पीढ़ी तैयार करने पर जोर दिया था. ‘रिपब्लिक’ की रचना में प्लेटो के गुरु सुकरात के अलावा उसके और भी कई समकालीन एवं पूर्ववर्त्ती दार्शनिकों का योगदान था. उनमें पाइथागोरेस के अनुयायी, पेरामेनीडिस, डेमोक्रिटिस, हेराक्लाटस आदि प्रमुख थे. इनमें से प्लेटो पर सर्वाधिक प्रभाव, ईसा से पांच शताब्दी पहले जन्मे यूनानी दार्शनिक पेरामेनीडिस का पड़ा था. उसका मानना था कि ‘सत्य को अनतिंम तथा अपरिवर्तनीय होना चाहिए.’

पेरामेनीडिस शब्दों की ताकत पर भरोसा करता था. उसका विचार था कि यदि भाषा में अभिव्यक्ति-सामथ्र्य है तो उसके द्वारा हम जिस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, यानी लगातार विमर्श के माध्यम से जो ज्ञान में प्राप्त होता है, वह भी सच होना चाहिए. पेरामेनीडिस के दर्शन का स्रोत ‘दि नेचर’ शीर्षक से लिखी गई एक कविता है. कहा जाता है कि उस कविता में लगभग 3000 पद थे. उनमें से अधिकांश पद अब गायब हो चुके हैं. मूल भी कविता अनुपलब्ध है. उसका सिर्फ संदर्भ प्राप्त होता है. अपनी कविता में पेरामनीडिस ने कहा था कि आप उस वस्तु के बारे में नहीं जान सकते जिसका कोई अस्तित्व ही न हो. इसका अभिप्राय है कि मनुष्य का ज्ञान केवल अस्तित्वमान प्रत्ययों की व्याख्या-विश्लेषण तक संभव है. इस आधार पर पेरामेनीडिस को पहला तत्वविज्ञानी भी कहा जा सकता है, जो कालांतर में भौतिकवादी दर्शन की प्रेरणा बना.

पेरामेनीडिस के अलावा प्लेटो पर सर्वाधिक प्रभाव उससे कुछ ही वर्ष पहले जन्मे हेराक्लाट्स का पड़ा था. यूनानी दर्शन के पितामह थेल्स से प्रभावित हेराक्लाट्स जल को ही सृष्टि का मूलाधार मानता था. उसका मानना था कि सबकुछ गतिमान है. दो व्यक्ति यदि आगे पीछे जा रहे हैं तो पीछे मौजूद व्यक्ति कभी पहले को नहीं पकड़ पाएगा. इसलिए कि उनकी यात्र का भौतिक जगत के अलावा एक आयाम और भी है—वह है समय, जो सदैव गतिमान रहता है. जिस समय पीछे चल रहा व्यक्ति आगे वाले के बराबर पहुंचेगा, उस समय तक आगे वाला व्यक्ति समय के प्रवाह में कुछ और आगे निकल चुका होगा. हेराक्लाइटस की प्रसिद्ध उक्ति है—‘सबकुछ प्रवाहमान है.’ किवदंति है कि उसने यह नदी में खड़े होकर, उसके प्रवाह को देखते हुए कहा था. हेराक्लाइट्स के अनुसार—

यह विश्व, जो सभी के लिए एक समान है, इसमें जो कुछ है सभी सनातन है—वह न तो ईश्वर-निर्मित है, न ही मानव-निर्मित. जो कुछ आज है वह अखंड ज्योति के समान, परिवर्तनशीलता के बीच, हमेशा-हमेशा के लिए रहने वाला है.’

हेराक्लाइट्स के चिंतन में भौतिकवादी विचारधारा के बीजतत्व मौजूद हैं, जिन्होंने प्लेटो, अरस्तु समेत आने वाली पीढ़ी के अनेक दार्शनिकों को प्रभावित किया था. उसके बारे में यह बात भी चौंका सकती है कि वह युद्ध का समर्थक था. यहां तक कि न्याय की स्थापना के लिए भी वह युद्ध को अनिवार्य मानता था. युद्ध का जैसा दुराग्रही समर्थन हेराक्लाइट्स ने किया, वैसा शायद ही किसी और विचारक ने किया हो—

युद्ध आम--खास, राजाओं तथा राजाओं के राजा का जनक है. युद्ध ने ही कुछ को भगवान, कुछ को इंसान, कुछ को दास, कुछ को स्वामी बनाया है. हमें मालूम होना चाहिए कि युद्ध से हम सभी का नाता है. विरोध न्याय का जन्मदाता है, प्रत्येक वस्तु संघर्ष से ही जन्मती तथा उसी से अंत को प्राप्त होती है.’

हेराक्लाइट्स तथा पारमेनीडिस की विचारधारा के प्रभाव में कालांतर में जिस विचारधारा ने यूनानी बुद्धिजीवियों का दिल जीता, उसके अनुसार ठोस और दृश्यमान जगत को अस्थायी एवं क्षणभंगुर माना गया है. इस विचारधारा के अनुसार दृश्यमान जगत स्वयं में अवास्तविक और मायावी है, जैसा कि आगे चलकर भारतीय वेदांतियों की मान्यता रही.यह विचारधारा लोगों में यह विश्वास जगाने में कामयाब हुई कि मनुष्य का ज्ञान स्वतः प्रामाण्य है. चेतना जगत वास्तविक है. ज्ञान के रूप में यह जो ग्रहण करता है, जिन निष्कर्षों की सृष्टि करता है, वे चिरंतन एवं कालातीत होते हैं. प्लेटो ने इसी विचारधारा का उपयोग अपने राजनीतिक दर्शन के लिए किया था. लंबे विमर्श के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि आदर्श राज्य की स्थापना केवल समर्थन, सहयोग और परिवर्तनशील बने रहने से संभव नहीं है. इसे दृढ़, स्थायी, अपरिवर्तनीय राजनीतिक तंत्र के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है, जो सामाजिक परिवर्तनों को निरंतर नियंत्रित-निर्देशित करने में सक्षम हो.

उस समय तक राजनीति के इतने व्यवस्थित उपयोग के बारे में किसी ने नहीं सोचा था. अतः राजनीतिक दर्शन के लिहाज से यह एक अद्भुत और विकासगामी सोच था. इस विचार को नए आयाम देते हुए प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ की रचना की और एक आदर्श समाज का खाका तैयार किया. इस कार्य के पीछे उसके कवि-हृदय का भी उतना ही योगदान था, जितना कि दार्शनिक मस्तिष्क का. इसलिए अपने आदर्शराज्य में उसने कानून के हस्तक्षेप को न्यूनतम रखते हुए आत्मानुशासन पर ज्यादा जोर दिया है. इस ग्रंथ को कुछ विद्वान प्लेटो की कुंठा की उपज भी मानते हैं, जो एथेंस की राजनीति में सक्रिय भूमिका न निभा पाने के कारण जनमी थी. प्लेटो स्वयं दार्शनिक था. सुकरात, डेमोक्रिटिस, हेराक्लाइट्स, पेरामेनीडिस समेत पाइथागोरस के अन्य अनुयायी आदि जिनसे वह प्रभावित था, वे सब भी दार्शनिक थे. ‘रिपब्लिक’ को राजनीति के विभिन्न स्वरूपों का अनुभव था. उसने एथेंस में गणतंत्रीय शासन को कुलीनतंत्र की मनमानी में ढलते हुए देखा था. सायराकस के सम्राट डायोनिसियस प्रथम और द्वितीय की तानाशाही भी देखी थी. डायोनिसियस प्रथम अपने राज्य में विद्वानों और दार्शनिकों को रखता था. लेकिन उसकी मनमानी, सनकों और महत्त्वाकांक्षाओं पर रोक लगाने में वे सभी अक्षम थे. इस कारण राजशाही से भी उसका विश्वास उठ चुका था. इसलिए राज्य के मुखिया के रूप में वह ऐसे शासकों की कल्पना करता था, जो दूरदर्शी, वीर, साहसी, दृढ़-निश्चयी, बुद्धिमान और किसी भी प्रकार से प्रलोभन से मुक्त हों. उसके अनुसार ये गुण किसी दार्शनिक में ही संभव हैं. इसलिए उसने राज्य की बागडोर किसी दार्शनिक के हाथों में सौंपने की कल्पना की थी. ‘

रिपब्लिक’ में उसकी यही परिकल्पना विस्तार लेती दिखाई पड़ती है. ध्यातव्य है कि ‘रिपब्लिक’ उसके प्रौढ जीवन की रचना है, हालांकि उसका लेखन वर्षों तक चलता रहा. कुछ खंड उसने अपने उत्तरवर्ती जीवन में पूरे किए थे. जब उसको लगने लगा था कि ‘रिपब्लिक’ के सपने को यथार्थ में साकार कर पाना सहज नहीं है. तो भी उसका ‘शुभ’ की अनिवार्यता और आदर्शों से मोह भंग नहीं हुआ था. अतएव अपने अंतिम दिनों की कृति ‘लाज’ में वह उन व्यवस्थाओं की परिकल्पना करता है, जिनके द्वारा उस सपने को साकार किया जा सकता है. ‘रिपब्लिक’ की मुख्य स्थापना थी कि राज्य का मुखिया किसी दार्शनिक को होना चाहिए. वही चुनौतीपूर्ण स्थितियों में दृढ़ निश्चय लेकर राज्य का कल्याण कर सकता है. दार्शनिक सम्राट का प्रयोग प्लेटो से पहले भी यूनान के नगर-राज्यों में हो चुका था. बल्कि किसी नगर-राज्य के विकास के लिए आचारसंहिता तैयार करने का काम प्रायः दार्शनिक-विचारक ही करते आए थे. परंतु मार्क्स की भांति प्लेटो भी दुनिया को समझने नहीं, बदलने में विश्वास करता था. यही कारण है कि वह सहस्राब्दियों से दार्शनिक विचारकों को प्रभावित करने में सक्षम रहा है.

राजनीतिक दर्शन को समर्पित प्लेटो की महान रचना ‘रिपब्लिक’ न तो किसी विशिष्ट राजनीतिक दर्शन की स्थापना करती है, न ही किसी खास राजनीतिक विचारधारा का पक्ष लेती है. उसकी स्थापनाएं यूनान के किसी भी नगर-राज्य के बारे में सच हो सकती थीं. इसलिए कि वह किसी विशेष राजनीतिक प्रणाली पर जोर देने के बजाय समाज में आदर्शों की स्थापना पर जोर देता था. चूंकि आदर्श की स्थापना परोक्षतः न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना ही है, इसलिए इस ग्रंथ में वह न्याय को विभिन्न कोणों से परिभाषित करने का प्रयास करता है. न्याय की उसकी अवधारणा भी तत्संबंधी आधुनिक विचारधाराओं से भिन्न है. ‘जस्टिस’ के माध्यम से एक भयमुक्त, अपराधमुक्त, न्यायाधारित समाज की स्थापना का पक्ष लेने के बजाय वह नागरिकों में कर्तव्यबोध पैदा करने पर ज्यादा जोर देता है. उसकी निगाह में न्याय का अभिप्राय व्यक्ति और समाज के आचरण की स्वयंस्फूर्त पवित्रता से है. ‘न्याय’ हालांकि अपने आप में एक जटिल अवधारणा है. इसका संबंध व्यक्ति मात्र के सदाचरण तथा समाज में अनुशासन बनाए रखने से होता है.

रिपब्लिक’ के पहले खंड में प्लेटो ने सुकरात को अपने साथियों के साथ ‘न्याय’ की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा करते हुए दर्शाया है. उस चर्चा के माध्यम से ‘न्याय’ की चार परिभाषाएं हमें प्राप्त होती हैं. मगर उनमें से एक भी परिभाषा ऐसी नहीं है, जिसे सर्वमान्य सर्वकालिक सत्य माना जा सके. स्वयं प्लेटो के अनुसार न्याय व्यक्ति-सापेक्ष, स्थिति-सापेक्ष होता है. अतः उसकी उपयोगिता विशिष्ट संदर्भों तक सीमित होती है. चर्चा के भागीदारों में से एक केफलस के अनुसार न्याय का आशय, ‘सच बोलना तथा दूसरों से लिए उधार को समय पर लौटाना है.’

यह अवधारणा व्यक्ति की सत्यनिष्ठा तथा सामाजिक परंपरा, जो आपसी व्यवहार को बनाए रखने के लिए अत्यावश्यक है, पर जोर देती है. पर न्याय क्या सिर्फ सच बोलने और समय पर उधार चुकाने तक सीमित है? उससे परे कुछ नहीं? सुकरात प्रतिवाद करता है—‘यह सही है कि न्याय शुभ का प्रतीक है. व्यक्ति ने किसी से उधार लिया है तो उसे समय पर चुकाना उसका दायित्व है. किंतु यह प्रत्येक अवस्था में उतना ही सम्मानेय हो, जरूरी नहीं है. वह तर्क देता है—

मान लीजिए मेरा एक दोस्त अपनी अच्छी मनःस्थिति में अपना कोई हथियार मेरे पास सुरक्षित रख देता है. उस हथियार को वह उस समय मांगने आता है, जब वह संतुलित मनःस्थिति में नहीं है. तो क्या मुझे उसके हथियार को तत्क्षण वापस कर देना चाहिए? कोई इस बात से सहमत नहीं होगा कि ऐसी स्थिति में जब मेरे प्रिय मित्र का मानसिक संतुलन डांवाडोल है, मुझे उसके हथियार को लौटा देना चाहिए. स्पष्ट है कि दोस्त को उसी समय हथियार न लौटाने के लिए मुझे कोई बहाना भी बनाना पड़ सकता है. यानी ऐसी अवस्था में न केवल उधार चुकाना अनैतिक हो सकता है, बल्कि सच बोल पाना भी संभव नहीं है.’

इससे सुकरात और उसके साथी इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि सिर्फ समय पर उधार चुकाने को न्याय का पर्याय नहीं माना जा सकता. दूसरे शब्दों में समय पर उधार चुकाना न्याय का द्योतक तो हो सकता है, लेकिन न्याय की सर्वांगता का प्रतीक वह हरगिज नहीं बन सकता. केफलस का बेटा पोलीमाक्र्स चर्चा को विस्तार देते हुए न्याय को नए ढंग से परिभाषित करने का प्रयास करता है. उसके अनुसार—

न्याय का आशय मित्रों के साथ सहृयतापूर्ण तथा दुश्मनों के प्रति क्रूरतापूर्ण व्यवहार करना है.’

परंतु मित्रों के चयन में भी व्यक्ति का स्वार्थभाव झलकता है. इसलिए वह उन्हीं लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करेगा, जो उसकी स्वार्थसिद्धि के काम आते हैं या आने वाले हैं. इस तरह तो पूरा समाज ही स्वार्थभावना से संचालित होगा. फिर व्यक्ति का स्वार्थ भी हमेशा एक जैसा नहीं रहता. कोई वस्तु एक समय में उसके लिए सुखकारी हो सकती है तथा अगले ही क्षण दुखदायी. ऐसा हो तो, सुकरात तर्क देता है—‘न्याय अन्याय को बढ़ावा दे सकता है. पोलीमाक्र्स सुकरात के तर्क से सहमत है कि न्याय जो सर्वत्र-सार्वकालिक शुभ की कामना करता है, वह किसी के लिए हानिकारक हो ही नहीं सकता. सुकरात साइमनडिस के इस तर्क से सहमति जताता है कि, ‘न्याय प्रत्येक व्यक्ति को वह सबकुछ देता है, तो उसके लिए लाभकारी है.’

रिपब्लिक’ के पहले खंड में ‘न्याय’ की अवधारणा को लेकर सभी अपने-अपने तर्क प्रस्तुत करते हैं. वहां न्याय को लेकर सबसे चैंकाने वाली परिभाषा थ्रमाइचस की ओर से आती है. वह जोर देकर कहता था कि, ‘न्याय बलशाली के हित के सिवाय और कुछ नहीं है.’ सुकरात को यह भी मंजूर नहीं. वह तर्क करता है—

हमारे बीच पोलीडमस मौजूद है, हम सब जानते हैं कि यह पहलवान है. यह हम सबसे अधिक बलशाली है. अपने शरीर की ताकत को बनाए रखने के लिए यह मांस का नियमित सेवन करता है. तो क्या यह समझना चाहिए कि मांस का सेवन करना हम सभी के लिए, जो शारीरिक रूप से बहुत दुर्बल हैं, उतना ही स्वास्थ्यकारी है, जितना वह पोलीडमस के लिए है? क्या यह हमारे लिए भी उतना ही पोषक सिद्ध होगा, जितना इसके लिए?’

सुकरात की आपत्ति पर थ्रमाइचस अपने तर्क के समर्थन में प्रजातांत्रिक, कुलीनतंत्र और तानाशाही सरकारों का उदाहरण देता हुआ कहता है कि सरकार के ये सभी रूप आम हैं—‘विभिन्न प्रकार की सरकारें यथा लोकतांत्रिक, कुलीनतंत्र और तानाशाही अपनी-अपनी विचारधारा को ध्यान में रखकर कानून बनाती हैं, जिन्हें वे सिर्फ अपने हितों को ध्यान में रखकर विरचित करती हैं. ऐसे कानून भला उस जनता के लिए कैसे न्यायकारी हो सकते हैं, जिसपर उन्हें शासन करना है? यदि कोई व्यक्ति उन कानूनों का अतिक्रमण करेगा, विरोध का साहस दिखाएगा तो वे उसको कानून का द्रोही मानकर दंडित करेंगे. यही वह बात है जो मैं समझाना चाहता हूं कि सभी राज्यों के न्याय के अपने सिद्धांत और व्याख्याएं होती हैं, जिनका झुकाव सरकार के हितों की ओर होता है, जो स्वाभाविक रूप से राज्य में सर्वाधिक शक्तिशाली होती है. इसलिए मेरी यह बात सच है कि न्याय हमेशा शक्तिशाली का हित देखता है.’

सुकरात विनम्रतापूर्वक थ्रमाइचस के इस तर्क को नकार देता है. वह अपने प्रतिवादी को समझाता है कि डाक्टर की दवा स्वयं डाक्टर के लिए नहीं, बल्कि मरीज के लिए हितकारी होती है. सारथी का हुनर उसके किसी काम का नहीं होता, वह अपेक्षाकृत सवार के लिए हितकारी होता है. इसलिए राज्य जो कानून बनाता है, वे भी उसके लिए तथा उसकी जनता के लिए समानरूप से हितकारी होने चाहिए. इसलिए ‘न्याय शक्तिशाली के लिए हितकारी होता है—इस परिभाषा में दोष है.

रिपब्लिक’ में आगे भी न्याय की अवधारणा पर चर्चा होती है, परंतु किसी एक परिभाषा पर सहमति नहीं बन पाती, सिवाय इस मान्यता के कि न्याय को सर्वत्र-सार्वकालिक शुभ होना चाहिए. परंतु थ्रमाइचस के तर्कों से एक बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि सरकार चाहे जिस तरह की हो, वह सिर्फ अपना स्वार्थ देखती है. लोकतांत्रिक सरकारें ऐसे नियम बनाती हैं, जो लोकतंत्र को पुष्ट करने वाले हों. राजशाही ऐसे कानून बनाने पर जोर देती है, जिनके द्वारा उसकी आने वाली पीढ़ियों के लिए सत्ता सुरक्षित रहे. पूंजीवादी सरकारें उन कानूनों को अपनाती हैं, जिससे समाज में उपभोक्तावाद पनपे, जो अंततः व्यापारियों के लिए खुलकर लाभ कमाने का अवसर प्रदान करता है. उन सभी के लिए न्याय वही है, जो उनके अपने हितों के फलने-फूलने का अवसर देता है. परंतु सरकार चाहे जिस प्रकार हो, वह कानून भले अपने हितों को केंद्र में रखकर बनाए, मगर उसका दावा यही होता है कि वे पूरे राज्य के हितों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं. उनमें जनता के हितों का पूरा ध्यान रखा गया है. अतः राज्य के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह उन कानूनों का पालन करे. उल्लंघन करने वाले को दंडित करने का प्रावधान भी उन कानूनों में होता है.

चूंकि सत्ता ताकत का प्रतीक होती है, इसलिए उसके द्वारा बनाए गए कानून प्रायः ताकतवर का ही समर्थन करते हैं. अतएव वे समाज के दुर्बल वर्गों के लिए हानिकर होते हैं. न्याय को लेकर लंबी परिचर्चा एवं वाद-प्रतिवाद के बावजूद हम पाते हैं कि ‘रिपब्लिक’ का पहला खंड अनिर्णय की स्थिति में समाप्त हो जाता है. थ्रमाइचस यह कहकर रोषपूर्ण तरीके से चर्चा से बाहर हो जाता इस बहस से किसी परिणाम तक पहुंचना असंभव है. चर्चा का सूत्रधार और प्रमुख वार्ताकार सुकरात समस्या पर अगले दिन नए सिरे से विचार करने का निश्चय कर घर की राह लेता है. न्याय की सर्वमान्य परिभाषा की खोज की ओर बढ़ रहा पाठक अचानक निराशा से भर जाता है. लगता है कि पुस्तक के माध्यम से प्लेटो का लक्ष्य ‘न्याय’ को परिभाषित करना था ही नहीं. वास्तव में वह विभिन्न प्रकार की राजनीतिक प्रणालियों को अपनी समीक्षा के दायरे मे लाना चाहता था. उसका ध्येय यह दर्शाना था कि शीर्षस्थ शक्तियों के लिए केवल अपने हित सर्वोपरि होते हैं. यह कार्य वे व्यापक लोकहित का नाम लेते हुए करती हैं. इससे नुकसान उन्हें उठाना पड़ता है जो शक्तिहीन और विपन्न है

बहस के दौरान सुकरात न्याय को सार्वकालिक-सर्वहितकारी बताकर उसको नैतिक उठान तो देता है, परंतु वह यह संकेत भी करता है कि शासन की प्रचलित प्रणालियों में से कोई भी ‘न्याय’ की स्थापना करने में समर्थ नहीं है. यानी सत्ता के नैतिक स्वरूप की खोज ‘रिपब्लिक’ का उद्देश्य है, मगर अंत तक वह लक्ष्य ही बना रहता है. इससे एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि सत्ताकेंद्र पर विराजमान व्यक्तियों के हितों में कोई तालमेल नहीं होता है. वे सिर्फ अपने स्वार्थ पर एकमत होते हैं. इसलिए सदैव यही प्रयास करते हैं कि अपनी सत्ता को अक्षुण्ण रखते हुए अपने हितों को कैसे साधा जाए? और किस प्रकार उन्हें प्रकार जल्दी से जल्दी तथा अधिकतम सीमा तक पूरा किया जा सकता है?

पुस्तक का अगला खंड छोड़ी गई चर्चा को नए पात्रों के साथ विस्तार देता है. सुकरात के माध्यम से प्लेटो न्याय की पुरानी अवधारणा को पुनः दोहराता है, जिसके अनुसार न्याय का उद्देश्य सार्वकालिक-सार्वत्रिक शुभ और सर्वश्रेष्ठ न्यायिक-राजनीतिक शासन की स्थापना करना है. तुलनात्मक रूप से न्याय को वह दो प्रकार से देखता है. उसका पहला चेहरा वह है जो राज्य की कार्यप्रणाली के जरिए सामने आता है. जिसके द्वारा निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए कोई राज्य अपने कर्तव्यों के निष्पादन के बहाने, विभिन्न संस्थाओं का गठन तथा उनका नियमिन करता है. न्याय का दूसरा चेहरा वह है जो उसके नागरिकों के आचरण में दिखाई पड़ता है. प्लेटो की मान्यता थी कि व्यक्ति की अपेक्षा बड़े तंत्र, जैसे राज्य के व्यवहार में न्याय की पहचान अपेक्षाकृत आसानी से की जा सकती है. लेकिन यदि प्रत्येक नागरिक न्याय की ओर से उदासीन हो जाए तो राज्य के न्याय का कोई अर्थ नहीं रह जाता. ऐसे में उसे मनमानी करने का अवसर मिल जाता है. इसलिए व्यक्तिमात्र का कर्तव्य है कि वह समाज को उस रूप में व्यवस्थित करने के बारे में सोचे जिस, प्रकार वह स्वयं को व्यवस्थित करना चाहता है. किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश न रहे

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वह स्पष्ट कर देना चाहता है कि मनुष्य न्याय को एक गुण के रूप में देखना चाहता है जो व्यक्ति के व्यवहार में भी उसी प्रकार मौजूद हो, जैसे कि वह समाज में है. जबकि समाज सदैव दो से बड़ा होता है. इसलिए वहां न्याय की मौजूदगी उसी अनुपात में अधिक होनी चाहिए. प्लेटो का यह तर्क बड़ा ही अजीब है. तो भी इस बात में कोई संदेह नहीं कि वह राजनीतिक सत्ता को अधिक न्यायोन्मुखी, उदार, कर्तव्यपरायण और दायित्व-भावना से युक्त देखना चाहता था. उसका राजनीतिक-दर्शन ही इस सिद्धांत पर टिका है कि अपने समाज और राज्य के लिए ‘मैं क्या कर सकता हूं?’ उसके प्रति मेरा ‘कर्तव्य और जिम्मेदारियां क्या हों?’

इसे कर्तव्यबोध कहें अथवा नागरिकबोध, प्लेटो के मन में वह यूनानवासियों, विशेषकर वहां के अभिजात्यवर्ग के चारित्रिक पतन की प्रतिक्रियास्वरूप उपजा था. परोक्ष रूप में समाज को बेहतर बनाने की चिंता ही ‘रिपब्लिक’ का प्रतिपाद्य विषय है, जो कभी ‘न्याय’ की अवधारणा और कभी ‘आदर्श राज्य’ की परिकल्पना के रूप में सामने आती है. उसकी निगाह में आदर्श राज्य की स्थापना उस समय तक असंभव है, जब तक वहां के नागरिक और शीर्षस्थ वर्ग के लोग ‘शुभत्व’ से भली-भांति परिचित न हों. ‘शुभत्व’ की संकल्पना सुकरात की देन थी, जिसको पाने की लालसा प्लेटो के पूरे साहित्य की कसौटी है.

प्लेटो को पढ़ते हुए मार्क्स की याद आना स्वाभाविक है. दोनों ही भौतिकवादी थे. दोनों का ही मानना था कि कोई मनुष्य अपने आप में पूर्ण नहीं है. मानवमात्र की यही अपूर्णता समाज की आवश्यकता की जननी है. लेकिन एक सीमा के बाद मनुष्य और समाज के रिश्ते जटिल होने लगते हैं. उन्हें नियंत्रित करना अकेले समाज के लिए संभव नहीं होता. ऐसे में राज्य की अहमियत बढ़ जाती है. मनुष्य की अनेक आवश्यकताएं होती हैं. उनमें भोजन, वस्त्र, आवास आदि ऐसी आवश्यकताएं हैं, जिन्हें उसकी मूलभूत आवश्यकताएं माना जाता है. इनके बगैर जीवन असंभव है

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कुछ आवश्यकताएं विकास की देन होती हैं—जैसे सड़क, औजार, मशीनें, बिजली के उपकरण, यातायात के साधन इत्यादि. प्रत्येक मनुष्य कामना करता है कि उसके जीवन में दूसरों का हस्तक्षेप न हो. सुरक्षा का पक्का भरोसा हो. यह काम मनुष्य आपस में एक-दूसरे के साथ सहयोग करते हुए भी कर सकता है. अक्सर करता भी है. सहकारिता आंदोलन इसी का सुपरिणाम है, जहां राज्य के हस्तक्षेप अथवा उसकी नीतियों से स्वतंत्र रहकर भी व्यक्ति-समूह अपना विकास कर सकते हैं. परंतु सहकार के लिए जैसे विवेक और समूह के हित में अपने हितों के किंचित त्याग और सामान्यीकरण की आवश्यकता पड़ती है, वह हर समाज और हर समूह में संभव नहीं हो पाता. व्यक्ति के भीतर मौजूद स्वार्थलोलुपताएं सहकारी प्रयासों के लिए घातक होती हैं.

व्यक्ति की स्वार्थलोलुपता दूसरों के लिए घातक सिद्ध न हो, इसके लिए राज्य की आवश्यकता पड़ती है. लेकिन मनमानी करना तो राज्य में भी संभव नहीं होता. वहां भी व्यक्ति को दूसरे के हितों का ध्यान रखकर चलना पड़ता है. हितों के सामान्यीकरण की प्रक्रिया ही व्यक्ति को परस्पर करीब लाने का काम करती है. यही उनको एक स्थान पर टिककर रहने और समाज की स्थापना करने के लिए प्रेरित करती और अंततः राज्य की आवश्यकता को जन्म देती है.

क्रमश:…..

© ओमप्रकाश कश्यप

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साम्यवाद : द्वैत से अद्वैत की यात्रा

मनुष्यता के इतिहास में उनीसवीं शताब्दी का बड़ा महत्त्व है. यह वह कालखंड है जब मार्क्स ने वर्ग-संघर्ष के नारे के साथ सर्वहारा क्रांति का आवाह्न किया था. ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ के माध्यम से दिए गए इस नारे की सीमाएं अथवा कमजोरियां 23वें वर्ष में ‘पेरिस कम्यून’ के प्रयोग की असफलता के साथ सामने आ गईं. मार्क्स के विचारों पर आधारित वह पहली समाजवादी क्रांति थी. अपने विचारों की प्रारंभिक असफलता से निराश होने के बजाय मार्क्स ने वर्ग-संघर्ष की सैद्धांतिकी में सुधार हेतु स्वयं को नए सिरे से इतिहास, दर्शन, समाजविज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीतिक दर्शन आदि के अध्ययन को समर्पित कर दिया. वह फ्रांस छोड़कर इंग्लेंड चला आया जहां अपेक्षाकृत शांति थी. साथ में बौद्धिकरूप से खुला माहौल भी. करीब 15 वर्ष के गहन अध्ययन-मनन के फलस्वरूप ‘पूंजी’ का पहला खंड सामने आया. इस युग प्रवर्त्तक ग्रंथ में पूंजी के शोषणकारी चरित्र तथा उसकी बहुआयामी पैठ को पहली बार समग्रता के साथ इतिहास, दर्शन एवं अर्थनीति के संदर्भ में उजागर किया गया था. सर्वहारा क्रांति का समर्थक मार्क्स इस नतीजे पर पहुंचा था कि पूंजीवादी अधिनायकवाद का उत्तर श्रम-अधिनायकवाद से नहीं दिया जा सकता. श्रम-अधिनायकत्व की संभावनाओं को कम करने के लिए उसने वर्गहीन समाज की संकल्पना की थी. लिखा था कि समाजवादी क्रांति का लक्ष्य बुर्जुआ वर्ग को अपदस्थ कर उत्पादन के साधनों पर कब्जा कर लेने से पूरा नहीं हो जाता. वास्तविक चुनौती उस एकाधिकारवादी भावना को समाप्त करने की है, जो वर्ग-विभाजन की संभावना को जन्म देती तथा प्रकारांतर में उसे मजबूत एवं स्वीकार्य बनाती है. ‘थीसिस आन फायरबाख’ में उसने लिखा था—

विद्वानों ने इस सृष्टि की अनेक प्रकार से व्याख्या की है. वास्तविक चुनौती तो इसको बदलने की है.’ 1

दुनिया को बदलने की कामना के साथ मार्क्स ने वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत प्रस्तुत किया. इसकी प्रेरणा उसको हीगेल के दार्शनिक सिद्धांत ‘द्वंद्ववाद’ से मिली थी. हीगेल के ‘शुभ’ एवं ‘अशुभ’ के द्वंद्व को उसने सर्वहारा और पूंजीपति के द्वंद्व के रूप में देखा था. उल्लेखनीय है कि हीगेल से बहुत पहले शंकराचार्य ने जीवन की व्याख्या के लिए आत्मा और परमात्मा के द्वैत का विचार प्रस्तुत किया था. कार्य-कारण संबंधों की व्याख्या करते हुए उन्होंने सृष्टि की रचना में माया की अतार्किक-अवैज्ञानिक परिकल्पना की थी. उनसे पहले सांख्य दर्शन में भी सृष्टि-रचना को प्रकृति एवं पुरुष के संपर्क द्वारा समझाने की कोशिश की गई. सांख्याचार्य के अनुसार प्रकृति प्रमुख कार्यकारी शक्ति है. वही पुरुष को कार्य के उकसाती है.2

तुलनात्मकरूप से देखा जाए तो माया की अपेक्षा प्रकृति की परिकल्पना अधिक यथार्थवादी है. वेदांताचार्य के अनुसार माया कार्य-कारण की प्रेरक शक्ति है. वहीं द्वैत की जन्मदाता है. इसके मूल में अज्ञान है. जैसे ही आत्मा अपने मूल-स्वरूप अर्थात परमात्मा को पहचानने लगती है, उसका मायारूपी संसार से मोहभंग हो जाता है. आत्मा और परमात्मा के द्वैत के समापन की अवस्था को वेदांत में ‘मोक्ष’ कहा गया. उसके अनुसार मोक्ष चिरंतन ठहराव और परमशांति की ऐसी कल्पनातीत अवस्था है, जिसमें मानवात्मा के समस्त विक्षोभ शांत हो जाते हैं. मन से माया का आवरण हट जाता है और मनुष्य परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने लगता है. वेदांत दर्शन में आत्मतत्व स्वयं क्रियात्मक नहीं हैं. माया के संपर्क में आने के उपरांत उत्पन्न विक्षोभ उसे क्रियाधर्मी बनने को उकसाता है. इसके विपरीत हीगेल का ‘द्वंद्ववाद’ विपरीत गुणसंपन्न शक्तियों की नैसर्गिक क्रियाशीलता तथा उनके बीच सतत द्वंद्व की परिणति है. द्वंद्वात्मकता की प्रतीति सृष्टि में अनेक स्तर पर भिन्न रूपों में, विभिन्न प्रकार से द्रष्टिगत होती है. द्वंद्व के कारणों को हीगेल ने आभासी माना है. हीगेल के अनुसार यह सृष्टि परमसत्ता का विस्तार है. उसमें आभासी विपरीतात्मकता मानवेंद्रियों की सीमा की देन है.

सृष्टि व्यापार को द्वंद्वात्मकता के सिद्धांत से समझाने वाले हीगेल ने द्वैत को ‘शुभ’ और ‘अशुभ’ के रूप में देखा था. उसका मानना था कि सृष्टि में प्रत्येक विचार का प्रतिविचार मौजूद है. सफेद के साथ स्याह, अच्छे के साथ बुरा, पुण्य के साथ पाप, उत्तर के विरुद्ध दक्षिण आदि परस्पर विपरीतार्थी एवं समानधर्मा सत्ताओं से दुनिया भरी पड़ी है. साधारण द्रष्टिबोध उन्हें अलग, एक-दूसरे से स्वतंत्र तथा परस्पर विरोधी मानता है. हीगेल के लिए इस विपरीतार्थ के अलग मायने थे. वह द्वैत की सत्ता को स्वीकारता है, लेकिन उसका कारण वस्तुगत न होकर मानवेंद्रियों की सीमा है. दूसरों से अलग वह ‘शुभ’ को ‘अशुभ’ का पूरक, उनके द्वैत को अस्थायी मानता था, जिसको मनुष्य अपने ज्ञान के माध्यम से चुनौती दे सकता था. परमसत्ता के बारे में स्पिनोजा से सहमत हीगेल का मानना था कि वह परमशुभ है. उसका विस्तार अनंत है. मानवेंद्रियों का सामथ्र्य नहीं कि उसकी विलक्षणता और विराटपन का साक्षात कर सकें. शंकर इसे माया के आवरण के रूप में देखते हैं. उसको देखते हुए हीगेल का विचार अधिक तार्किक प्रतीत होता है. हीगेल के अनुसार मनुष्य की विवशता है कि वह सत्य को केवल टुकड़ों में देख पाता है. मसलन आंखें त्रिविमीय संसार की केवल दो विमाओं को देख पाती हैं. जबकि दृश्यमान जगत की समस्त वस्तुएं त्रिविमीय संसार का हिस्सा हैं. प्रसंगवश बता दें कि चैथी विमा के रूप में ‘समय’ को मान्यता बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशक में उस समय मिली, जब आइंस्टाइन ने अपने आपेक्षिकता के सिद्धांत की व्याख्या करते हुए समय को चौथा आयाम माना. दर्शन के क्षेत्र में चैथी विमा की परिकल्पना बहुत पहले लगभग ढाई हजार वर्ष पहले की जा चुकी थी. उसकी ओर स्पष्ट संकेत अठारहवीं शताब्दी के दार्शनिक डेविड ह्यूम ने किया. समय को पहली बार महत्त्व देते हुए ह्यूम ने कहा था कि कोई भी व्यक्ति एक ही नदी में दो बार पांव नहीं रख सकता. जब तक हम नदी के प्रवाह में दूसरी बार पैर रखते हैं, उसका जल कहीं आगे बढ़ चुका होता है. उस समय दार्शनिकों ने डेविड ह्यूम को संदेहवादी कहकर उसकी खिल्ली उड़ाई गई थी. बाद में जब यही बात आइंस्टाइन ने वैज्ञानिक प्रमाण देते हुए कही, तब जाकर समय को चैथी विमा के रूप में मान्यता मिल सकी. आज अनिश्चितता अथवा संदेह के सिद्धांत को वैज्ञानिक मान्यता मिल चुकी है. ‘थ्योरी आ॓फ अनसर्टेनिटी’ आधुनिक परमाणु विज्ञान का अत्यंत महत्त्वपूर्ण अनुसंधान है, जिससे सृष्टि के रहस्यों को समझने में मदद मिल सकती है. विज्ञान की इस संशयवादी धारा ने दर्शन और विज्ञान के बीच की दूरी को पाटने का काम किया है.

ऐंद्रियक अनुभवों की सीमा की ओर संकेत करते हुए हीगेल का कहना था कि ‘सांत’ इंद्रियों द्वारा ‘अनंत’ को पूरी तरह समझा ही नहीं जा सकता. अपने बोध के लिए मनुष्य को जिन इंद्रियों पर भरोसा करना पड़ता है, वे पूरा सच कभी देख ही नहीं पातीं. मसलन आंखें दीवार पर लगी तस्वीर का एक समय में केवल एक ही पृष्ठ देख पाती हैं. तस्वीर के अगले-पिछले हिस्सों को, एक ही समय में देख पाना उनके लिए कदापि संभव नहीं है. यह कार्य मस्तिष्क को करना पड़ता है. इसलिए दीवार पर टंगी तस्वीर का हमारा आकलन सिर्फ वह नहीं होता जो हमारी आंखें तात्कालिक रूप से देख रही होती हैं. तस्वीर को पूरा देखने के लिए हमें अपनी स्थिति में बदलाव करना होता है. मगर स्थिति में परिवर्तन के साथ हम दूसरे समय में चले जाते हैं. पहला पक्ष तत्क्षण हमसे ओझल हो जाता है. पूरी छवि की परिकल्पना के लिए हमें अपने मस्तिष्क और अनुभव की मदद लेनी ही पड़ती है. आशय है कि किसी वस्तु अथवा विचार की अवधारणा के पीछे हमारे अनुभवों, स्मृतिबोध तथा मस्तिष्क का योगदान होता है.

यदि मनुष्य की इंद्रिया सांत हैं, उनकी सीमा है, तब तो वह अनंत को कदापि नहीं जान पाएगा. उस अवस्था में तो उसको अनंत सत्ता को जानने-समझने की कोशिश छोड़ ही देनी चाहिए. हीगेल के विचारों को पढ़ते हुए ऐसा निष्कर्ष सहसा दिमाग से टकराने लगता है. लेकिन अगर यहीं तक सीमित होता तो हीगेल का दर्शन द्वंद्ववाद से आगे बढ़ ही नहीं पाता. वह संशयवादी ही बना रहता. जबकि द्वंद्व उसके दर्शन का प्रस्थान बिंदू है, लक्ष्य नहीं. प्रारंभिक स्थापना से आगे बढ़कर वह कहता है कि ठीक है, मानवेंद्रियों की सीमाएं हैं. उसकी इंद्रियां उसको किसी वस्तु को समग्रता से एक ही पल में देखने का अवसर ही नहीं देतीं. इसके बावजूद उसके पास एक चीज है, जो उसके ऐंद्रियक अनुभवों की सीमा को पाटने में सहायक है. वह है उसका मस्तिष्क. मानव मस्तिष्क ही है जो एक ही क्षण में किसी तस्वीर को पूरा न देख पाने के बावजूद उसका यथार्थबोध कराने में सक्षम होता है. इसलिए जो मनुष्य अपने सांत ऐंद्रियक साधनों से अनंत को समझना चाहता है, उसे निरंतर अपना बौद्धिक परिष्कार करते रहना चाहिए. इसके लिए वह अनुभव के साथ निरंतर अध्ययन-मनन पर जोर देता है. कोई हताश न हो, इसलिए वह द्वंद्ववाद की आगे व्याख्या भी करता है. वह समझाता है कि ‘अच्छे’ और ‘बुरे’, ‘काले’ और ‘सफेद’, ‘गुण-अवगुण’ का भेद आभासी है.

असल में वह हमारी अज्ञानता और अधूरे ज्ञान की देन है. सही मायने में हमारी सीमाओं का प्रतीक. परोक्षरूप में वह भी द्वैत की महत्ता को स्वीकारता है. परंतु मानता है कि बोध के विकासक्रम में द्वैत-भाव तिरोहित होने लगता है. मनुष्य समझने लगता है कि ‘काला’ और ‘सफेद’ रंग एक-दूसरे के विपरीतधर्मा न होकर परस्पर भिन्न स्थितियां हैं. जो वस्तु काली दिखती है, वह अपने ऊपर पड़ी प्रकाश किरणों को पूरी तरह सोख लेती है. दूसरे शब्दों में उसका गुण है अपने ऊपर पड़ने वाली समस्त प्रकाश किरणों को अवशोषित कर लेना. जबकि सफेद रंग वाली वस्तु का गुण है, प्रकाश किरणों को ज्यों का त्यों परावर्तित कर देना. दोनों के अपने-अपने गुण हैं. उनमें विरोधाभास हो सकता है, परंतु विपरीत गुणसंपन्न होने के बावजूद दोनों में कहीं टकराव नहीं है. बल्कि वे एक-दूसरे के पूरक का कार्य करती हैं. साधारण मनुष्य इस अंतर को समझ नहीं पाता, इसलिए वह सफेद और काले को एक-दूसरे का विपरीतधर्मा मान लेता है. हीगेल के तर्कों के आगे हमारी आंखों के आगे पड़ी द्वैत की चदरिया लगातार झीनी पड़ती हुई अंत में गायब-सी हो जाती है. यही ‘सांत’ के ‘अनंत’ तक पहुंचने की यात्रा है.

अच्छे’ और ‘बुरे’, गुण-अवगुण’ के विपरीतार्थ को नकारता हुआ वह कहता है कि ‘अच्छा’, ‘बुरे’ का विलोम न होकर भिन्न स्थिति है. यह वह प्रत्यय है जो समाज के एक वर्ग द्वारा थोप दिया जाता है. समाज बदलने पर वह बदल भी सकता है. हीगेल की दृष्टि में ‘बुरा’ वह है जिसमें उन गुणों का, जिन्हें हम अच्छाई का प्रतीक मानते हैं, अभाव है. ये गुण या स्थापनाएं व्यक्ति की न होकर उस समाज की होती हैं, जिसमें वह जन्मा है. इसी प्रकार तस्वीर या कमरे में पड़ी मेज की वह व्याख्या करता है कि जो दिख रहा है, वह तस्वीर वास्तविक नहीं है. वह मात्र द्विविमीय छवि है. आंखें अपनी खूबी तथा मस्तिष्क की मदद से उसको त्रिविमीय छवि में बदल रही हैं. छवि की सीमा है कि वह केवल स्थिति एवं क्षण-विशेष में ही सत्य हो सकती है. मेज को पूरा समझने के लिए हमें उसके दूसरे पहलुओं को भी जोड़ना पड़ता है. इसलिए अलग-अलग समय में मस्तिष्क पर पड़ने वाले मेज के बिंबों को एक-दूसरे का विरोधी नहीं माना जा सकता, बल्कि वे एक-दूसरे के पूरक हैं. जैन दर्शन इसे स्याद्वाद के सिद्धांत द्वारा अभिव्यक्त करता है. चार अंधों और हाथी के रूपक द्वारा वह समझाता है कि हाथी को पहचानने में जुटे चार अंधों के अनुभव परस्पर भिन्न होंगे. उनमें जो व्यक्ति हाथी की सूंड की ओर होगा वह उसकी उपमा बेल से देगा, कानांे को छूकर हाथी को पहचानने में जुटे अंधे की निगाह में हाथी का आकार सूप के समान होगा. इसी प्रकार पेट और पैर का स्पर्श करने वाले अंधों के निष्कर्ष भी एक-दूसरे से अलग होंगे. व्यक्तिगत निष्कर्ष में वे चारों सही हैं, परंतु उनमें से एक भी सत्य का पूर्णानुमान लगाने में असमर्थ है. सामान्य व्यक्ति के प्रकरण में भी उसकी ऐंद्रियिक सीमा सत्य की पूर्णानुभूति कराने में अक्षम होती है. तर्कों के माध्यम से हीगेल स्पष्ट करता है संसार में दिखने वाली सभी विरोधी स्थितियां एक-दूसरे की पूरक हैं. यहां हम हीगेल को स्पिनोजा के करीब पाते हैं. अंतर सिर्फ इतना है कि स्पिनोजा ‘सर्वेश्वरवाद’ को सीधे-सीधे एक झटके में छू लेता है. हीगेल वहां तक पहुंचने के लिए अनेक तर्कों, स्थितियों का सहारा लेता है. स्पिनोजा पर अतिरेकी आस्था का दबाव है. हीगेल बौद्धिकता के मुक्ताकाश में सत्य को समझने की चेष्ठा करता है. कह सकते हैं कि स्पिनोजा जो लक्ष्य निर्धारित करता है, हीगेल उसको स्वीकार करता है, लेकिन पूरी तर्कबुद्धि के साथ. एक-एक के लिए समर्थन जुटाते हुए. वह एक ओर तो मनुष्य को उसकी सीमाओं का एहसास कराता है, दूसरी ओर उसे यह विश्वास भी दिलाता है कि निरंतर अभ्यास, अध्ययन-चिंतन से वह अपनी दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त कर सकता है.

मार्क्स हीगेल से द्वंद्ववाद की विचारधारा उधार लेता है. लेकिन उसका उपयोग केवल साधन तक सीमित रखता है. वह द्वंद्ववाद से प्रभावित है. पूंजीवादी समाज में जन्मे मार्क्स को सर्वहारा और बुर्जुआ ही अपने चारों ओर दिखाई पड़ते हैं. अपने परिवेश के प्रति वह इतना सम्मोहित है कि उससे इतर अतींद्रिय दुनिया की परिकल्पनाएं उसको जम ही नहीं पातीं. आरंभ में समाज में वांछित परिवर्तन के लिए वह दोनों वर्गों के संघर्ष की अनिवार्यता पर जोर देता है. शुभ और अशुभ के शाश्वत संघर्ष की भांति, ताकि परमशुभ की सर्वकल्याणक, सर्वत्र शुभदायक स्थिति को प्राप्त किया जा सके. वह साम्यवाद का सपना रचता है, जिसमें सुख पर किसी का भी एकाधिकार न हो. बल्कि अधिकतम व्यक्ति अधिकतम सुख का भोग कर सकें. यह सपना उसकी आंखों में 1845 में ही जन्म ले चुका था. साम्यवाद की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उसने ‘दि जर्मन आइडियोला॓जी’ में लिखा है—

हमारे लिए साम्यवाद किसी प्रस्तावित राज्य के गठन का ऐसा मसला नहीं है जिससे अपने आदर्श लक्ष्य की प्राति हेतु वह नागरिकों से सहयोग एवं समन्वय बनाए रखने की अपेक्षा करे. इसके बजाय साम्यवाद को ऐसा जमीनी आंदोलन कहना उचित होगा जो वर्तमान राज्य को विखंडित कर देगा. नए राज्य की शर्त उसके होने में न होकर उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता में निहित होगी.’3

वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि समाज में असमानता का कारण केवल आर्थिक विषमता नहीं है. अकेले पूंजी के रहने या न रहने से वर्गीय विषमताओं को मिटा पाना असंभव होगा. उसके पीछे धर्म, राजनीति, समाज आदि कारक भी सम्मिलित हैं, जो वर्गभेदकारी स्थितियों को जन्म देने के साथ-साथ नागरिकों को विभेदकारी तंत्र से अनुकूलन की प्रेरणा देते हैं. इन्हीं की मदद से शिखरस्थ शक्तियां उत्पादन केंद्रों पर अधिकार जमाए रहती हैं. स्थायी परिवर्तन वर्गभेद को जन्म देने वाली स्थितियों के उन्मूलन बगैर संभव नहीं. आमूल परिवर्तन के लिए उस मानसिकता में भी संशोधन करना पड़ेगा जो विभेदकारी वातावरण से अनकूलन करना सिखाती है. स्थितियों को उनकी समग्रता में देखने का यह गुण मार्क्स ने अपने गुरु हीगेल से लिया था. अन्य शब्दों में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद वह दरवाजा है जिसको वह अपने जीवनकाल में ही पार कर चुका था. भौतिकवादी मार्क्स आत्मा, परमात्मा और माया जैसी अमूत्र्त धारणाओं के फेर में नहीं पड़ता. हीगेल की पुस्तक ‘फिलास्फी आ॓फ राइट’ की आलोचना करते हुए वह धर्म को जनसाधारण के लिए अफीम बताता है. ‘थीसिस आ॓न फायरबाख’, ‘क्रिटीक आन फिलास्फी आ॓फ राइट’ ऐसी ही पुस्तकें हैं, जिनमें उसके धर्म-संबंधी विचारों की आलोचना की झलक है. एक अन्य पुस्तक में उसने हीगेल के शिष्य और अपने मित्र बूनो बायर की आलोचना की थी. लेकिन पेरिस क्रांति की असफलता के बाद उसको अपने चिंतन के अधूरेपन की अनुभूति होती है. उसको लगता है कि ‘सर्वहारा’ और ‘पूंजीपति’ की विपरीतधर्मिता ‘काले’ और ‘सफेद’, ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ की द्वैत जितनी ही आभासी है. आमूल परिवर्तन के अभाव में ही सर्वहारा राज्य के सर्वहारा अधिनायकवादी राष्ट्र में बदलते देर नहीं लगती.

मार्क्स द्वंद्वात्मक भौतिकवाद से अपने चिंतन की शुरुआत करता है, लेकिन वह उससे उतना ही काम लेता है, जितना कोई भौतिक विज्ञानी गणित के पूर्वस्थापित सूत्र से, मिस्त्री अपने औजार से. सर्वहारा वर्ग द्वारा सत्ता पर अधिकार कर लेने के बाद आंदोलन का दूसरा लेकिन अतिमहत्त्वपूर्ण चरण आरंभ हो जाता है, साम्यवाद के सिद्धांतों के अनुरूप राज्य को ढालने का. उसमें वह वर्गहीन समाज की स्थापना के लक्ष्य को सामने रखता है. वह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करता है, जिसमें लोग पारस्परिक कल्याण भावना के आधार पर एक-दूसरे से जुड़े हों. उसकी व्याख्या में साम्यवाद केवल राजनीतिक व्यवस्था तक ही सीमित नहीं रह जाता. साम्यवादी दर्शन को उठान देता हुआ मार्क्स , उसे अपने गुरु हीगेल के ‘परमशुभ’ का पर्याय बना देता है. उसके अनुसार साम्यवाद ऐसी अवस्था है, जहां समाज के सभी प्रकार के द्वैतों का शमन हो जाता है. समस्त द्वंद्वों का समाधान हो जाता है. सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-मनोभौतिक समरसता का वातावरण बनने लगता है. असंतुलन एवं असमानता की भावना कमजोर पड़ जाती है. कह सकते हैं कि साम्यवाद के रूप में वह ऐसे दर्शन की परिकल्पना करता है जहां नियंत्रणकारी समूहों की आवश्यकता ही न हो. मनुष्य जीवन और समाज के उच्चादर्शों से स्वतः अनुशासित हों. धर्म, संस्कृति जैसे परंपरागत मूल्यों के बजाय लोग उत्पादन, समान उपभोग और सहजीवन के वैज्ञानिक नियमों से एक-दूसरे से आबद्ध हों. समाज अपनी आंतरिक नैतिकता, समानता के सिद्धांत एवं लोकतंत्र द्वारा मर्यादित रहे . ऐसे राज्य में सरकार की उपस्थिति महज इसलिए जरूरी हो, ताकि वह शेष विश्व को उसकी भावनाओं और संकल्पों से परचा सके. हीगेल के दर्शन में परमशुभ एक लक्ष्य है. चूंकि वर्गहीन समाज की स्थापना का लक्ष्य भी अपने आप में काफी जटिल और लंबी प्रक्रिया है, इसलिए साम्यवाद को समर्पित संस्थाओं को इसके लिए सतत प्रयासरत रहना होता है.

यहां एक स्वाभाविक प्रश्न उभरता है कि यदि साम्यवाद इतनी ही उत्कृष्ट व्यवस्था है तो यह विश्व में इतनी सिमटी हुई क्यों है? बीसवीं शताब्दी के मध्याह्न में विश्व के लगभग आधे देशों में प्रभाव रखने वाला साम्यवाद शताब्दी के अंत तक मात्र पांच देशों का खेवनहार बनकर रह गया, आखिर क्यों? सोवियत संघ जैसी व्यवस्था का पतन हुआ. अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए चीन पूंजीवाद के साथ समझौतावादी रुख अपनाए हुए है. आखिर क्या कारण है कि साम्यवाद जैसी आदर्शोन्मुखी प्रणाली अपनी प्रतिबद्ध सैद्धांतिकी के बावजूद बिखराव का शिकार होने से स्वयं को बचाने में असमर्थ रही? इसके बरक्स पूंजीवाद जिसकी अपनी कोई सैद्धांतिकी नहीं है, आज दुनिया के बड़े-बड़े देशों का भाग्यविधाता बना हुआ है. आखिर क्यों? मुझे लगता है कि साम्यवाद की अतिआदर्शोन्मुखी दार्शनिक प्रतिबद्धता ही उसकी असफलता का कारण है, बड़ा कारण. इसकी तह में जाने के लिए हमें एक बार फिर मार्क्स की शरण में लेनी होगी. कार्ल मार्क्स का कुल जीवनदर्शन दो हिस्सों में बंटा है. द्वंद्वात्मक भौतिकवाद. जिसमें वह सर्वहारा और पूंजीपति के बीच संघर्ष को अनिवार्य मानता है. दूसरा वर्गहीन समाज की स्थापना का साम्यवादी लक्ष्य. जो उसका दूसरा और महत्त्वपूर्ण चरण है. इतना कि उसके अभाव में पहले चरण की सफलता के असफलता में बदलते देर नहीं लगती. यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो पहली अवधारणा में जबरदस्त राजनीतिक अपील है, जो व्यवस्था से उत्पीड़ित बहुसंख्यक वर्ग को सामूहिक कल्याण की भावना के अनुसार संगठित करने का सामर्थ्य रखती है. यह अपील बहुत कुछ परंपरागत सामंतवादी राजनीति से मिलती-जुलती है. जिसमें युद्ध एवं हिंसा के रास्ते सत्ता हथिया ली जाती थी. अंतर केवल इतना है कि सामंतवाद में प्रायः उग्र राष्ट्रवाद और बाद में तलवार की ताकत के दम पर ही उसको कायम रखा जाता था. अंतर सिर्फ इतना है कि राजशाही में युद्ध किसी एक व्यक्ति की साम्राज्यवादी लिप्साओं द्वारा आम प्रजा पर थोप दिए जाते थे, साम्यवाद में वे सर्वहारा वर्ग द्वारा, जो मार्क्स के अनुसार वास्तविक उत्पादक शक्ति है, परिवर्तन की कामना के साथ तय होते हैं. दोनों अवस्थाओं में हिंसा अपरिहार्य है. इसलिए हम देखते हैं कि जिन देशों में साम्यवादी क्रांति हुई वहां जनाक्रोश का लाभ उठाने के लिए ऐसे नेता उभरकर सामने आए जो सैन्य संचालन में निपुण थे. रूस, चीन, क्यूबा, वियतनाम, आदि इसके उदाहरण हैं. जर्मनी में हिटलर ने जब निरंकुश तानाशाही कायम की तो उसका नारा भी समाजवादी होने का था. भारत आदि देशों में जहां नेतृत्व की बागडोर गैर सैनिक नेताओं के हाथों में थी, वहां साम्यवाद केंद्रीय व्यवस्था का हिस्सा कभी न बन सका. जिन देशों में सैन्य कार्रवाही अथवा सैन्य नेताओं के प्रभाव से साम्यवाद आया, वहां जनता और सामरिक शक्तियां साथ-साथ थीं. लेकिन सैन्य नेतृत्व की अपनी कमजोरी होती है. साम्यवादी अनुशासन में स्वयं को ढालने के लिए बाहरी के साथ आंतरिक अनुशासन भी अपेक्षित था. सामरिक बल पर सत्तारूढ़ हुए सर्वहारा संगठन जनता पर बाहरी अनुशासन तो थोप सकते थे, आंतरिक अनुशासन के लिए उनमें न तो आवश्यक नैतिक बल था, न ही वैसा अभ्यास. इसलिए कि यह राजनीति से अधिक सामाजिक कृत्य था, जिसका उनको अभ्यास न था. तलवार की धार और बाहरी अनुशासन के बल पर साम्यवादी शक्तियां जब तक बनी रह सकती थीं, रहीं. बाद में उनको बढ़ते जनाक्रोश की मदद से अपदस्थ कर दिया गया.

पूंजीवाद साम्यवाद के मुकाबले बहुत लचीली व्यवस्था है. वह उपभोक्ता-अधिकार, मानवाधिकार, लैंगिक समानता, जातीय भेदभाव के उन्मूलन, मुक्त व्यापार, लोकतंत्र आदि लोकलुभावन नारों के बूते जनता का अपने प्रति अनुकूलन कर लेती है. साम्यवाद आधुनिकता का दावा करते हुए धर्म का विरोध करता था. लेकिन पूंजीवाद धर्म का उपयोग भी अपने पक्ष में माहौल बनाए रखने के लिए करता है. साम्यवाद के प्रचार में लगी शक्तियों की कमजोरी है कि जनता पर अपना प्रभाव बनाए रखने वे उन्हीं रास्तों का अनुसरण करती हैं, जिनपर चलकर धर्म मानवीय विवेक की उपेक्षा का वातावरण बनाता है. शायद इसी कारण अल्पचेतनशील समाजों वे आरोपित धर्म को अपनाने के बजाय परंपरागत धर्म की शरण में जाना उचित समझते हैं. ऐसा नहीं है कि साम्यवादी विचारक इस कमजोरी से अनभिज्ञ हों. अंतोनियो ग्राम्शी ने इसलिए सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से मुक्ति का नारा भी साथ-साथ दिया था. उसने सर्वहारा वर्ग से अपील की थी कि वे अपने बीच से बुद्धिजीवी पैदा करें. ताकि उसके अनुरूप राजनीतिक नेतृत्व तैयार हो सके. भारत जैसे देशों में साम्यवाद की असफलता का कारण यह रहा है कि यहां राजनीति में वे लोग आए जो संसद में घुसपैठ के लिए गलियारों की तलाश में थे. साम्यवाद के दार्शनिक पक्ष को समझे-समझाए बिना केवल व्यावहारिक पक्ष की राजनीति को बढ़ावा दिया गया. उन समस्याओं को केंद्र में रखकर आंदोलन चलाए गए, जिनका जनता के वास्तविक विकास से कोई सीधा संबंध न था. उन्होंने सामाज के न तो मूल ढांचे में छेड़छाड़ की जरूरत महसूस की, न आमूल परिवर्तन के लिए वांछित प्रयास किए. वैचारिक निष्ठा के अभाव तथा लोकप्रिय राजनीति से लगाव के कारण वे हताशा की लड़ाई लड़ते रहे हैं.

अंत में एक प्रश्न कि क्या साम्यवाद का कोई भविष्य है. तो मैं बेहिचक बिना कोई पल गंवाए कहूंगा कि है. राजनीतिक सामंतवाद की तरह पूंजीवादी सामंतवादी निरंकुशता नहीं चल सकती. इसलिए एक न एक दिन साम्यवाद को अपनाना ही होगा. शोषणकारी शक्तियों में साम्यवाद का आज भी कितना भय है, वह एक उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है. मार्क्स ने ‘बुर्जुआ’ शब्द का उपयोग अनेक स्थान पर किया है. इस शब्द से उसका आशय उन लोगों से था जिन्होंने तीव्र मशीनीकरण का लाभ उठाकर, पूंजीगत निवेश-विनिवेश के माध्यम से अकूत पूंजी जमा की है. उसका उपयोग अब वे श्रमिक शोषण को बनाए रखने के लिए नए-नए रूप में कर रहे हैं. लेकिन आधुनिक शब्दकोशों में इस शब्द का अर्थ देख लीजिए, वह ‘मध्यवर्ग’ अथवा ‘शिक्षित मध्यवर्ग’ ही मिलेगा, जिसका मार्क्स की अवधारणा से कोई संबंध नहीं है.

अब यह सर्वहारा वर्ग के ऊपर है कि कब पूंजीवादी प्रलोभनों से बाहर निकलकर आमूल परिवर्तन का आवाह्न करता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. the philosophers have only interpreted the world, the point is to change it” - Karl Marx in Theses on Feuerbach, 1845.

2. कार्याणि प्रकृतिजेगुणे कर्माणि सर्वशः।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।

3. Communism is for us not a state of affairs which is to be established, an ideal to which reality will have to adjust itself. We call communism the real movement which abolishes the present state of things. The conditions of this movement result from the premises now in existence.” —Karl Marx in The German Ideology, 1845.

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समाजवादी चिंतन की पृष्ठभूमि

प्लेटो का समाजार्थिक दर्शन 

रिपब्लिक’ में प्लेटो ने अपने राजनीतिक दर्शन के मूलभूत तत्वों की रूपरेखा प्रस्तुत की थी. गंभीर चिंतन के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि समाज के गठन का उद्देश्य अयाचित और किसी कल्याण-भाव से प्रेरित नहीं है. यह सीधे-सीधे व्यक्ति के स्वार्थ से जुड़ा है. चूंकि अकेले मनुष्य के लिए जीवन की अनेक दुश्वारियां थीं, इसलिए उसने समूह में रहना सीखा. समूह को स्थायित्व प्रदान करने, उसमें शांति-व्यवस्था बनाए रखने, विकास और सुखानंद के लिए उसने कुछ नियमों का विन्यास किया. कालांतर में ये नियम सभ्यता का प्रतीक बनकर जटिल सामाजिक संबंधों में ढलते चले गए. आज से करीब पांच हजार वर्ष पहले मनुष्य व्यापार में तरक्की कर चुका था. उसने नौकाओं और भारी जलयानों की सहायता से लंबी समुद्री यात्राएं करना सीख लिया था. दुर्गम स्थानों की यात्रा के लिए वह पशुओं की मदद लेता था. रास्ते में हिंस्र पशुओं और दस्युओं का खतरा था. उनसे निपटने के लिए उसने भाड़े के सैनिक रखने आरंभ किए. सैन्यबल और धन-संपदा दोनों ही ताकत का प्रतीक थीं,

व्यक्ति के पास जब इनका प्राचुर्य हआ तो उसकी महत्त्वाकांक्षाएं अंगड़ाई लेने लगीं. प्रारंभ में जिन स्थानों से उसको वाणिज्यिक लाभ पहुंचता था, उन स्थानों पर सीधे अथवा अपने सहयोगियों की सहायता से अपने उपनिवेश कायम करने लगा. प्रारंभ में जो राज्य बने उनका क्षेत्रफल बहुत कम, नगर-विशेष की सीमा तक होता था. निश्चितरूप से तत्कालीन नगर-राज्य की स्थापना एक स्वतंत्र एवं आत्मनिर्भर आर्थिक-राजनीतिक इकाई के रूप में की गई होगी. शीघ्र ही मनुष्य को लगने लगा था कि विकास की निरंतरता के लिए संबंधों का विस्तार अत्यावश्यक है. ऐसी कार्यकारी संस्थाओं की आवश्यकता है जिनके द्वारा संबंधों को मर्यादित और नियंत्रित किया जा सके. इससे नए राजनीतिक दर्शन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी. आदिम मानवीय जिज्ञासा केवल जीवन और प्रकृति के रहस्यों के अन्वेषण तक सीमित थी, जिसके कारण दर्शनों का विस्तार हुआ. बहुत शीघ्र मनुष्य को लगने लगा कि केवल पराभौतिक सत्ता की खोज से काम चलने वाला नहीं है. जीवन को अधिक सुविधासंपन्न बनाने तथा प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए प्रकृति को समझना भी अनिवार्य है. इसलिए बुद्धिजीवियों का ध्यान इहलौकिक सत्यों के अन्वेषण की ओर गया, जिससे ज्ञान-विज्ञान की खोज के नए रास्तों का विकास हुआ.

ईसा से 426 वर्ष पहले जन्मे यूनानी दार्शनिक वैज्ञानिक डेमोक्रिटिस ने लोकभ्रांतियों का खंडन करते हुए घोषणा की कि चंद्रमा पर दिखने वाली छाया वस्तुतः उसकी सतह पर बने ऊबड़-खाबड पठार हैं. उसने नीहारिकाओं का रहस्योद्घाटन करते हुए बताया कि रात में आसमान में नजर आने वाली दूधिया नदी, वास्तव में तारों का प्रकाश है, जो अरबों की संख्या में विराट अंतरिक्ष में फैले हुए हैं. हालांकि लोकमानस सूर्य, चंद्र आदि ग्रह-नक्षत्रों की भावनात्मक कहानियां आगे भी गढ़ता रहा, तो भी डेमोक्रिटिस के लेखन से आने वाले विचारकों को एक नई दिशा मिली. लोगों को लगा कि विश्वसमाज और उसकी उत्पत्ति की तह में जाने का एक तरीका यह भी हो सकता है, जो दूसरे की अपेक्षा कहीं अधिक वस्तुनिष्ठ और तर्कसम्मत है. इससे आगे चलकर विज्ञान के विकास को नई दिशा मिली. देखा जाए तो वह समय दुनिया की सभी बड़ी सभ्यताओं भारत, यूनान, मिश्र, चीन में वैचारिक क्रांति के उद्घोष का था, जिसमें महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, सुकरात, कन्फ्यूशियस, अजित केशकंबलि आदि का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने अपने मौलिक चिंतन से प्रचलित धर्म-दर्शन की जड़ता और उसके पोंगापंथी सोच पर तीखा प्रहार किया.

लगभग यही वह दौर था जब व्यवस्थित राजनीतिक दर्शन पर विचार किया गया, जो धार्मिक आग्रहों से पूरी तरह स्वतंत्र था. यह नया चिंतन विज्ञानवादी सोच के साथ-साथ उभर रहा था. राज्य की उत्तरोत्तर बढ़ती महत्ता को पहचानकर डेमोक्रिटिस ने ही सपना देखा था कि कोई तो होगा जो राज्य के मामलों को दूसरे सभी मामलों पर तजरीह देगा. कुछ इस तरह कि सबकुछ संतुलित-सा लगे. जो न तो वास्तविकता से बहुत परे, विवादपूर्ण हो, न ही किसी सार्वजनिक शुभ से इतर विषयों पर जोर देता हो. उसकी निगाह में राज्य का प्रबंधन किसी भी अन्य कार्य से अधिक महत्त्वपूर्ण और श्लाघनीय कर्म था. उसके अनुसार ऐसे राज्य के लिए जिसको सही ढंग से व्यवहृत किया जा रहा हैµ

विकास का सर्वोत्तम रास्ता है कि सबकुछ इसी(राज्य)पर निर्भर हो. यदि राज्य की सुरक्षा हुई तो बाकी सब सुरक्षित रहेगा; और यदि राज्य को नष्ट किया गया तो शेष सभी नष्ट हो जाएगा.’

डेमोक्रिटिस का यही सोच आगे चलकर प्लेटो, अरस्तु आदि के राजनीतिक चिंतन की प्रेरणा बना. पश्चिमी समाज में सुकरात की स्थिति एक धार्मिक आचार्य के तुल्य है.उसने हालांकि स्वयं कुछ नहीं लिखा था, लेकिन एक मसीहा की भांति उसका गहरा प्रभाव पूरे यूरोपीय चिंतन पर बना हुआ है. सुकरात के बारे में दुनिया जो भी जानती है, वह प्लेटो सहित सुकरात के अन्य शिष्यों, समकालीनों के माध्यम से ही. तो भी यह सुकरात के सोच का अनूठापन ही था कि उसको प्लेटो जैसे विचारकों ने अपना गुरु माना. धर्म-दर्शन के क्षेत्र में जिस आदर्शवाद का पक्ष सुकरात लेता था, प्लेटो ने उसी के माध्यम से अपने राजनीतिक दर्शन की परिकल्पना की. यही कारण है कि प्लेटो का राजनीतिक दर्शन धार्मिक टच लिए हुए है. सुकरात का उल्लेख उसने तेजस्वी विद्वान व्यक्ति के रूप में किया है, जो ‘शुभ’ को पहचानने तथा उसका अनुसरण करने की आवश्यकता पर जोर देता है. वह ईश्वर की परंपरागत अवधारणा से भिन्न, यद्यपि उसकी कुछ समानताएं लिए हुए है. प्लेटो एथेंस की राजनीतिक उथल-पुथल का साक्षी रहा था. सुकरात से करीब 40 वर्ष छोटे प्लेटो ने एथेंस और स्पार्टा के बीच तीस वर्ष तक चलने वाले युद्ध को अपनी आंखों से देखा था. वह 429 ईस्वी पूर्व की एथेंस की प्लेग का भी साक्षी रहा था, जिसमें उसके महान योद्धा और राजनीतिज्ञ पेरीक्लीस समेत अनेक बहादुर सैनिकों को जान गंवानी पड़ी थी. 401 ईस्वी पूर्व में एथेंस की हार के बाद वहां के सम्राट को अपदस्थ कर विजयी स्पार्टा ने वहां तीस सदस्यीय संसद की स्थापना की थी. उसके बाद कुछ समय तक सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहा, मगर उसके बाद एथेंस में भ्रष्टाचार और तानाशाही का बोलबाला हो गया. इस तरह प्लेटो ने राजशाही और कुलीनतंत्र दोनों का अनुभव था. गणतंत्र के नाम पर गठित परिषद के सदस्य निजी अहं के शिकार होकर मनमानी करने लगे. परिषद कुलीनतंत्र की हठधर्मी का माध्यम बन चुकी है. इन दोनों राजनीतिक प्रणालियों से निराश प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में दार्शनिक सम्राट की अनिवार्यता पर जोर दिया था. वह स्वयं एक अभिजात परिवार से था, एथेंस के सम्राट से उसका संबंध था, इस कारण वह स्वयं को एथेंस की राजनीति का उत्तराधिकारी भी मानता था. उसको सक्रिय राजनीति में योगदान देने का अवसर तो कभी न मिल सका, तो भी राजनीति उसके दिलो-दिमाग पर सदैव हावी रही. ‘रिपब्लिक’ में जिस आदर्शलोक का सपना वह देखता है और उसके लिए जिस राजनीतिक दर्शन की परिकल्पना करता है, वह सक्रिय राजनीति में हिस्सा न ले पाने से उत्पन्न कुंठा की उपज था.

प्लेटो को लगता था कि राजनीतिक पदों पर जिम्मेदारी का निर्वहन चुनौती-भरा काम होता है. महत्त्वपूर्ण कर्तव्यों के निष्पादन के लिए उपयुक्त व्यक्ति पर्याप्त संख्या में सर्वदा उपलब्ध हों, यह संभव भी नहीं होता. इसलिए किसी भी राज्य के सामने, जो नागरिक हितों को सर्वोपरि समझता है, बड़ी समस्या ईमानदार, दूरदृष्टा, साहसी और नीतिवान राजनीतिज्ञों के चयन की होती है. प्लेटो को विश्वास था कि शिक्षा के माध्यम से अच्छे राजनीतिज्ञ तैयार किए जा सकते हैं. उसने द्वारा ‘अकादमी’ की स्थापना इसी उद्देश्य के निमित्त की गई थी. पल-भर के लिए एकदम हाल के युग में लौटकर याद करने की कोशिश करें. कुशल-नीतिवान राजनीतिज्ञों की उपलब्धता की समस्या को लेकर ब्रिटिश की तत्कालीन प्रधानमंत्री मारर्गेट थैचर ने भी अपने एक बयान में कहा था कि उन्हें राजकर्म के कुशल संपादन के लिए केवल छह व्यक्तियों की आवश्यकता है, जो निपुण एवं नीतिवान हों. पर ऐसे लोग इतनी संख्या में कभी एक साथ नहीं मिल पाते. यही समस्या प्लेटो के सामने भी थी. इसलिए उसने शिक्षा के माध्यम से भावी राजनीतिज्ञों की पीढ़ी तैयार करने पर जोर दिया था. ‘रिपब्लिक’ की रचना में प्लेटो के गुरु सुकरात के अलावा उसके और भी कई समकालीन एवं पूर्ववत्र्ती दार्शनिकों का योगदान था. उनमें पाइथागोरेस के अनुयायी, पेरामेनीडिस, डेमोक्रिटिस, हेराक्लाटस आदि प्रमुख थे. इनमें से प्लेटो पर सर्वाधिक प्रभाव, ईसा से पांच शताब्दी पहले जन्मे यूनानी दार्शनिक पेरामेनीडिस का पड़ा था. उसका मानना था कि ‘सत्य को अनतिंम तथा अपरिवर्तनीय होना चाहिए.’ पेरामेनीडिस शब्दों की ताकत पर भरोसा करता था. उसका विचार था कि यदि भाषा में अभिव्यक्ति-सामथ्र्य है तो उसके द्वारा हम जिस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, यानी लगातार विमर्श के माध्यम से जो ज्ञान हमें प्राप्त होता है, वह भी सच होना चाहिए. पेरामेनीडिस के दर्शन का स्रोत ‘दि नेचर’ शीर्षक से लिखी गई एक कविता है. कहा जाता है कि उस कविता में लगभग 3000 पद थे. उनमें से अधिकांश पद अब गायब हो चुके हैं. मूल भी कविता अनुपलब्ध है. उसका सिर्फ संदर्भ प्राप्त होता है. अपनी कविता में पेरामनीडिस ने कहा था कि आप उस वस्तु के बारे में नहीं जान सकते जिसका कोई अस्तित्व ही न हो. इसका अभिप्राय है कि मनुष्य का ज्ञान केवल अस्तित्वमान प्रत्ययों की व्याख्या-विश्लेषण तक संभव है. इस आधार पर पेरामेनीडिस को पहला तत्वविज्ञानी भी कहा जा सकता है, जो कालांतर में भौतिकवादी दर्शन की प्रेरणा बना.

पेरामेनीडिस के अलावा प्लेटो पर सर्वाधिक प्रभाव उससे कुछ ही वर्ष पहले जन्मे हेराक्लाट्स का पड़ा था. यूनानी दर्शन के पितामह थेल्स से प्रभावित हेराक्लाट्स जल को ही सृष्टि का मूलाधार मानता था. उसका मानना था कि सबकुछ गतिमान है. दो व्यक्ति यदि आगे पीछे जा रहे हैं तो पीछे मौजूद व्यक्ति कभी पहले को नहीं पकड़ पाएगा. इसलिए कि उनकी यात्रा का भौतिक जगत के अलावा एक आयाम और भी हैवह है समय, जो सदैव गतिमान रहता है. जिस समय पीछे चल रहा व्यक्ति आगे वाले के बराबर पहुंचेगा, उस समय तक आगे वाला व्यक्ति समय के प्रवाह में कुछ और आगे निकल चुका होगा. हेराक्लाइटस की प्रसिद्ध उक्ति हैµ‘सबकुछ प्रवाहमान है.’ किवदंति है कि उसने यह नदी में खड़े होकर, उसके प्रवाह को देखते हुए कहा था. हेराक्लाइट्स के अनुसार

यह विश्व, जो सभी के लिए एक समान है, इसमें जो कुछ है सभी सनातन हैवह न तो ईश्वर-निर्मित है, न ही मानव-निर्मित. जो कुछ आज है वह अखंड ज्योति के समान, परिवर्तनशीलता के बीच, हमेशा-हमेशा के लिए रहने वाला है.’

हेराक्लाइट्स के चिंतन में भौतिकवादी विचारधारा के बीजतत्व मौजूद हैं, जिन्होंने प्लेटो, अरस्तु समेत आने वाली पीढ़ी के अनेक दार्शनिकों को प्रभावित किया था. उसके बारे में यह बात भी चैंका सकती है कि वह युद्ध का समर्थक था. यहां तक कि न्याय की स्थापना के लिए भी वह युद्ध को अनिवार्य मानता था. युद्ध का जैसा दुराग्रही समर्थन हेराक्लाइट्स ने किया, वैसा शायद ही किसी और विचारक ने किया हो

युद्ध आम--खास, राजाओं तथा राजाओं के राजा का जनक है. युद्ध ने ही कुछ को भगवान, कुछ को इंसान, कुछ को दास, कुछ को स्वामी बनाया है. हमें मालूम होना चाहिए कि युद्ध से हम सभी का नाता है. विरोध न्याय का जन्मदाता है, प्रत्येक वस्तु संघर्ष से ही जन्मती तथा उसी से अंत को प्राप्त होती है.

हेराक्लाइट्स तथा पारमेनीडिस की विचारधारा के प्रभाव में कालांतर में जिस विचारधारा ने यूनानी बुद्धिजीवियों का दिल जीता, उसके अनुसार ठोस और दृश्यमान जगत को अस्थायी एवं क्षणभंगुर माना गया है. इस विचारधारा के अनुसार दृश्यमान जगत स्वयं में अवास्तविक और मायावी है, जैसा कि आगे चलकर भारतीय वेदांतियों की मान्यता रही.यह विचारधारा लोगों में यह विश्वास जगाने में कामयाब हुई कि मनुष्य का ज्ञान स्वतः प्रामाण्य है. चेतना जगत वास्तविक है. ज्ञान के रूप में यह जो ग्रहण करता है, जिन निष्कर्षों की सृष्टि करता है, वे चिरंतन एवं कालातीत होते हैं. प्लेटो ने इसी विचारधारा का उपयोग अपने राजनीतिक दर्शन के लिए किया था. लंबे विमर्श के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि आदर्श राज्य की स्थापना केवल समर्थन, सहयोग और परिवर्तनशील बने रहने से संभव नहीं है. इसे दृढ़, स्थायी, अपरिवर्तनीय राजनीतिक तंत्र के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है, जो सामाजिक परिवर्तनों को निरंतर नियंत्रित-निर्देशित करने में सक्षम हो. उस समय तक राजनीति के इतने व्यवस्थित उपयोग के बारे में किसी ने नहीं सोचा था. अतः राजनीतिक दर्शन के लिहाज से यह एक अद्भुत और विकासगामी सोच था. इस विचार को नए आयाम देते हुए प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ की रचना की और एक आदर्श समाज का खाका तैयार किया. इस कार्य के पीछे उसके कवि-हृदय का भी उतना ही योगदान था, जितना कि दार्शनिक मस्तिष्क का. इसलिए अपने आदर्शराज्य में उसने कानून के हस्तक्षेप को न्यूनतम रखते हुए आत्मानुशासन पर ज्यादा जोर दिया है. इस ग्रंथ को कुछ विद्वान प्लेटो की कुंठा की उपज भी मानते हैं, जो एथेंस की राजनीति में सक्रिय भूमिका न निभा पाने के कारण जनमी थी. प्लेटो स्वयं दार्शनिक था. सुकरात, डेमोक्रिटिस, हेराक्लाइट्स, पेरामेनीडिस समेत पाइथागोरस के अन्य अनुयायी आदि जिनसे वह प्रभावित था, वे सब भी दार्शनिक थे. ‘रिपब्लिक’ को राजनीति के विभिन्न स्वरूपों का अनुभव था. उसने एथेंस में गणतंत्रीय शासन को कुलीनतंत्र की मनमानी में ढलते हुए देखा था. सायराकस के सम्राट डायोनिसियस प्रथम और द्वितीय की तानाशाही भी देखी थी. डायोनिसियस प्रथम अपने राज्य में विद्वानों और दार्शनिकों को रखता था. लेकिन उसकी मनमानी, सनकों और महत्त्वाकांक्षाओं पर रोक लगाने में वे सभी अक्षम थे. इस कारण राजशाही से भी उसका विश्वास उठ चुका था. इसलिए राज्य के मुखिया के रूप में वह ऐसे शासकों की कल्पना करता था, जो दूरदर्शी, वीर, साहसी, दृढ़-निश्चयी, बुद्धिमान और किसी भी प्रकार से प्रलोभन से मुक्त हों. उसके अनुसार ये गुण किसी दार्शनिक में ही संभव हैं. इसलिए उसने राज्य की बागडोर किसी दार्शनिक के हाथों में सौंपने की कल्पना की थी. ‘रिपब्लिक’ में उसकी यही परिकल्पना विस्तार लेती दिखाई पड़ती है. ध्यातव्य है कि ‘रिपब्लिक’ उसके प्रौढ जीवन की रचना है, हालांकि उसका लेखन वर्षों तक चलता रहा. कुछ खंड उसने अपने उत्तरवर्ती जीवन में पूरे किए थे. जब उसको लगने लगा था कि ‘रिपब्लिक’ के सपने को यथार्थ में साकार कर पाना सहज नहीं है. तो भी उसका ‘शुभ’ की अनिवार्यता और आदर्शों से मोह भंग नहीं हुआ था. अतएव अपने अंतिम दिनों की कृति ‘लाॅज’ में वह उन व्यवस्थाओं की परिकल्पना करता है, जिनके द्वारा उस सपने को साकार किया जा सकता है. ‘रिपब्लिक’ की मुख्य स्थापना थी कि राज्य का मुखिया किसी दार्शनिक को होना चाहिए. वही चुनौतीपूर्ण स्थितियों में दृढ़ निश्चय लेकर राज्य का कल्याण कर सकता है. दार्शनिक सम्राट का प्रयोग प्लेटो से पहले भी यूनान के नगर-राज्यों में हो चुका था. बल्कि किसी नगर-राज्य के विकास के लिए आचारसंहिता तैयार करने का काम प्रायः दार्शनिक-विचारक ही करते आए थे. परंतु माक्र्स की भांति प्लेटो भी दुनिया को समझने नहीं, बदलने में विश्वास करता था. यही कारण है कि वह सहस्राब्दियों से दार्शनिक विचारकों को प्रभावित करने में सक्षम रहा है.

राजनीतिक दर्शन को समर्पित प्लेटो की महान रचना ‘रिपब्लिक’ न तो किसी विशिष्ट राजनीतिक दर्शन की स्थापना करती है, न ही किसी खास राजनीतिक विचारधारा का पक्ष लेती है. उसकी स्थापनाएं यूनान के किसी भी नगर-राज्य के बारे में सच हो सकती थीं. इसलिए कि वह किसी विशेष राजनीतिक प्रणाली पर जोर देने के बजाय समाज में आदर्शों की स्थापना पर जोर देता था. चूंकि आदर्श की स्थापना परोक्षतः न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना ही है, इसलिए इस ग्रंथ में वह न्याय को विभिन्न कोणों से परिभाषित करने का प्रयास करता है. न्याय की उसकी अवधारणा भी तत्संबंधी आधुनिक विचारधाराओं से भिन्न है. ‘जस्टिस’ के माध्यम से एक भयमुक्त, अपराधमुक्त, न्यायाधारित समाज की स्थापना का पक्ष लेने के बजाय वह नागरिकों में कर्तव्यबोध पैदा करने पर ज्यादा जोर देता है. उसकी निगाह में न्याय का अभिप्राय व्यक्ति और समाज के आचरण की स्वयंस्फूर्त पवित्रता से है. ‘न्याय’ हालांकि अपने आप में एक जटिल अवधारणा है. इसका संबंध व्यक्ति मात्र के सदाचरण तथा समाज में अनुशासन बनाए रखने से होता है. ‘रिपब्लिक’ के पहले खंड में प्लेटो ने सुकरात को अपने साथियों के साथ ‘न्याय’ की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा करते हुए दर्शाया है. उस चर्चा के माध्यम से ‘न्याय’ की चार परिभाषाएं हमें प्राप्त होती हैं. मगर उनमें से एक भी परिभाषा ऐसी नहीं है, जिसे सर्वमान्य सर्वकालिक सत्य माना जा सके. स्वयं प्लेटो के अनुसार न्याय व्यक्ति-सापेक्ष, स्थिति-सापेक्ष होता है. अतः उसकी उपयोगिता विशिष्ट संदर्भों तक सीमित होती है. चर्चा के भागीदारों में से एक केफलस के अनुसार न्याय का आशय, ‘सच बोलना तथा दूसरों से लिए उधार को समय पर लौटाना है.’ यह अवधारणा व्यक्ति की सत्यनिष्ठा तथा सामाजिक परंपरा, जो आपसी व्यवहार को बनाए रखने के लिए अत्यावश्यक है, पर जोर देती है. पर न्याय क्या सिर्फ सच बोलने और समय पर उधार चुकाने तक सीमित है? उससे परे कुछ नहीं? सुकरात प्रतिवाद करता है‘यह सही है कि न्याय शुभ का प्रतीक है. व्यक्ति ने किसी से उधार लिया है तो उसे समय पर चुकाना उसका दायित्व है. किंतु यह प्रत्येक अवस्था में उतना ही सम्मानेय हो, जरूरी नहीं है. वह तर्क देता है

मान लीजिए मेरा एक दोस्त अपनी अच्छी मनःस्थिति में अपना कोई हथियार मेरे पास सुरक्षित रख देता है. उस हथियार को वह उस समय मांगने आता है, जब वह संतुलित मनःस्थिति में नहीं है. तो क्या मुझे उसके हथियार को तत्क्षण वापस कर देना चाहिए? कोई इस बात से सहमत नहीं होगा कि ऐसी स्थिति में जब मेरे प्रिय मित्र का मानसिक संतुलन डांवाडोल है, मुझे उसके हथियार को लौटा देना चाहिए. स्पष्ट है कि दोस्त को उसी समय हथियार न लौटाने के लिए मुझे कोई बहाना भी बनाना पड़ सकता है. यानी ऐसी अवस्था में न केवल उधार चुकाना अनैतिक हो सकता है, बल्कि सच बोल पाना भी संभव नहीं है.’

इससे सुकरात और उसके साथी इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि सिर्फ समय पर उधार चुकाने को न्याय का पर्याय नहीं माना जा सकता. दूसरे शब्दों में समय पर उधार चुकाना न्याय का द्योतक तो हो सकता है, लेकिन न्याय की सर्वांगता का प्रतीक वह हरगिज नहीं बन सकता. केफलस का बेटा पोलीमार्क्स चर्चा को विस्तार देते हुए न्याय को नए ढंग से परिभाषित करने का प्रयास करता है. उसके अनुसार

न्याय का आशय मित्रों के साथ सहृयतापूर्ण तथा दुश्मनों के प्रति क्रूरतापूर्ण व्यवहार करना है.’

परंतु मित्रों के चयन में भी व्यक्ति का स्वार्थभाव झलकता है. इसलिए वह उन्हीं लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करेगा, जो उसकी स्वार्थसिद्धि के काम आते हैं या आने वाले हैं. इस तरह तो पूरा समाज ही स्वार्थभावना से संचालित होगा. फिर व्यक्ति का स्वार्थ भी हमेशा एक जैसा नहीं रहता. कोई वस्तु एक समय में उसके लिए सुखकारी हो सकती है तथा अगले ही क्षण दुखदायी. ऐसा हो तो, सुकरात तर्क देता है‘न्याय अन्याय को बढ़ावा दे सकता है. पोलीमार्क्स सुकरात के तर्क से सहमत है कि न्याय जो सर्वत्र-सार्वकालिक शुभ की कामना करता है, वह किसी के लिए हानिकारक हो ही नहीं सकता. सुकरात साइमनडिस के इस तर्क से सहमति जताता है कि, ‘न्याय प्रत्येक व्यक्ति को वह सबकुछ देता है, तो उसके लिए लाभकारी है.’

रिपब्लिक’ के पहले खंड में ‘न्याय’ की अवधारणा को लेकर सभी अपने-अपने तर्क प्रस्तुत करते हैं. वहां न्याय को लेकर सबसे चैंकाने वाली परिभाषा थ्रमाइचस की ओर से आती है. वह जोर देकर कहता था कि, ‘न्याय बलशाली के हित के सिवाय और कुछ नहीं है.’ सुकरात को यह भी मंजूर नहीं. वह तर्क करता है

हमारे बीच पोलीडमस मौजूद है, हम सब जानते हैं कि यह पहलवान है. यह हम सबसे अधिक बलशाली है. अपने शरीर की ताकत को बनाए रखने के लिए यह मांस का नियमित सेवन करता है. तो क्या यह समझना चाहिए कि मांस का सेवन करना हम सभी के लिए, जो शारीरिक रूप से बहुत दुर्बल हैं, उतना ही स्वास्थ्यकारी है, जितना वह पोलीडमस के लिए है? क्या यह हमारे लिए भी उतना ही पोषक सिद्ध होगा, जितना इसके लिए?’

सुकरात की आपत्ति पर थ्रमाइचस अपने तर्क के समर्थन में प्रजातांत्रिक, कुलीनतंत्र और तानाशाही सरकारों का उदाहरण देता हुआ कहता है कि सरकार के ये सभी रूप आम हैं‘विभिन्न प्रकार की सरकारें यथा लोकतांत्रिक, कुलीनतंत्र और तानाशाही अपनी-अपनी विचारधारा को ध्यान में रखकर कानून बनाती हैं, जिन्हें वे सिर्फ अपने हितों को ध्यान में रखकर विरचित करती हंै. ऐसे कानून भला उस जनता के लिए कैसे न्यायकारी हो सकते हैं, जिसपर उन्हें शासन करना है? यदि कोई व्यक्ति उन कानूनों का अतिक्रमण करेगा, विरोध का साहस दिखाएगा तो वे उसको कानून का द्रोही मानकर दंडित करेंगे. यही वह बात है जो मैं समझाना चाहता हूं कि सभी राज्यों के न्याय के अपने सिद्धांत और व्याख्याएं होती हैं, जिनका झुकाव सरकार के हितों की ओर होता है, जो स्वाभाविक रूप से राज्य में सर्वाधिक शक्तिशाली होती है. इसलिए मेरी यह बात सच है कि न्याय हमेशा शक्तिशाली का हित देखता है.’

सुकरात विनम्रतापूर्वक थ्रमाइचस के इस तर्क को नकार देता है. वह अपने प्रतिवादी को समझाता है कि डा॓क्टर की दवा स्वयं डा॓क्टर के लिए नहीं, बल्कि मरीज के लिए हितकारी होती है. सारथी का हुनर उसके किसी काम का नहीं होता, वह अपेक्षाकृत सवार के लिए हितकारी होता है. इसलिए राज्य जो कानून बनाता है, वे भी उसके लिए तथा उसकी जनता के लिए समानरूप से हितकारी होने चाहिए. इसलिए ‘न्याय शक्तिशाली के लिए हितकारी होता हैइस परिभाषा में दोष है.

रिपब्लिक’ में आगे भी न्याय की अवधारणा पर चर्चा होती है, परंतु किसी एक परिभाषा पर सहमति नहीं बन पाती, सिवाय इस मान्यता के कि न्याय को सर्वत्र-सार्वकालिक शुभ होना चाहिए. परंतु थ्रमाइचस के तर्कों से एक बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि सरकार चाहे जिस तरह की हो, वह सिर्फ अपना स्वार्थ देखती है. लोकतांत्रिक सरकारें ऐसे नियम बनाती हैं, जो लोकतंत्र को पुष्ट करने वाले हों. राजशाही ऐसे कानून बनाने पर जोर देती है, जिनके द्वारा उसकी आने वाली पीढ़ियों के लिए सत्ता सुरक्षित रहे. पूंजीवादी सरकारें उन कानूनों को अपनाती हैं, जिससे समाज में उपभोक्तावाद पनपे, जो अंततः व्यापारियों के लिए खुलकर लाभ कमाने का अवसर प्रदान करता है. उन सभी के लिए न्याय वही है, जो उनके अपने हितों के फलने-फूलने का अवसर देता है. परंतु सरकार चाहे जिस प्रकार हो, वह कानून भले अपने हितों को केंद्र में रखकर बनाए, मगर उसका दावा यही होता है कि वे पूरे राज्य के हितों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं. उनमें जनता के हितों का पूरा ध्यान रखा गया है. अतः राज्य के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह उन कानूनों का पालन करे. उल्लंघन करने वाले को दंडित करने का प्रावधान भी उन कानूनों में होता है. चूंकि सत्ता ताकत का प्रतीक होती है, इसलिए उसके द्वारा बनाए गए कानून प्रायः ताकतवर का ही समर्थन करते हैं. अतएव वे समाज के दुर्बल वर्गों के लिए हानिकर होते हैं. न्याय को लेकर लंबी परिचर्चा एवं वाद-प्रतिवाद के बावजूद हम पाते हैं कि ‘रिपब्लिक’ का पहला खंड अनिर्णय की स्थिति में समाप्त हो जाता है. थ्रमाइचस यह कहकर रोषपूर्ण तरीके से चर्चा से बाहर हो जाता इस बहस से किसी परिणाम तक पहुंचना असंभव है.

चर्चा का सूत्रधार और प्रमुख वार्ताकार सुकरात समस्या पर अगले दिन नए सिरे से विचार करने का निश्चय कर घर की राह लेता है. न्याय की सर्वमान्य परिभाषा की खोज की ओर बढ़ रहा पाठक अचानक निराशा से भर जाता है. लगता है कि पुस्तक के माध्यम से प्लेटो का लक्ष्य ‘न्याय’ को परिभाषित करना था ही नहीं. वास्तव में वह विभिन्न प्रकार की राजनीतिक प्रणालियों को अपनी समीक्षा के दायरे मे लाना चाहता था. उसका ध्येय यह दर्शाना था कि शीर्षस्थ शक्तियों के लिए केवल अपने हित सर्वोपरि होते हैं. यह कार्य वे व्यापक लोकहित का नाम लेते हुए करती हैं. इससे नुकसान उन्हें उठाना पड़ता है जो शक्तिहीन और विपन्न हैं. बहस के दौरान सुकरात न्याय को सार्वकालिक-सर्वहितकारी बताकर उसको नैतिक उठान तो देता है, परंतु वह यह संकेत भी करता है कि शासन की प्रचलित प्रणालियों में से कोई भी ‘न्याय’ की स्थापना करने में समर्थ नहीं है. यानी सत्ता के नैतिक स्वरूप की खोज ‘रिपब्लिक’ का उद्देश्य है, मगर अंत तक वह लक्ष्य ही बना रहता है. इससे एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि सत्ताकेंद्र पर विराजमान व्यक्तियों के हितों में कोई तालमेल नहीं होता है. वे सिर्फ अपने स्वार्थ पर एकमत होते हैं. इसलिए सदैव यही प्रयास करते हैं कि अपनी सत्ता को अक्षुण्ण रखते हुए अपने हितों को कैसे साधा जाए? और किस प्रकार उन्हें प्रकार जल्दी से जल्दी तथा अधिकतम सीमा तक पूरा किया जा सकता है?

पुस्तक का अगला खंड छोड़ी गई चर्चा को नए पात्रों के साथ विस्तार देता है. सुकरात के माध्यम से प्लेटो न्याय की पुरानी अवधारणा को पुनः दोहराता है, जिसके अनुसार न्याय का उद्देश्य सार्वकालिक-सार्वत्रिक शुभ और सर्वश्रेष्ठ न्यायिक-राजनीतिक शासन की स्थापना करना है. तुलनात्मक रूप से न्याय को वह दो प्रकार से देखता है. उसका पहला चेहरा वह है जो राज्य की कार्यप्रणाली के जरिए सामने आता है. जिसके द्वारा निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए कोई राज्य अपने कर्तव्यों के निष्पादन के बहाने, विभिन्न संस्थाओं का गठन तथा उनका नियमिन करता है. न्याय का दूसरा चेहरा वह है जो उसके नागरिकों के आचरण में दिखाई पड़ता है.

प्लेटो की मान्यता थी कि व्यक्ति की अपेक्षा बड़े तंत्र, जैसे राज्य के व्यवहार में न्याय की पहचान अपेक्षाकृत आसानी से की जा सकती है. लेकिन यदि प्रत्येक नागरिक न्याय की ओर से उदासीन हो जाए तो राज्य के न्याय का कोई अर्थ नहीं रह जाता. ऐसे में उसे मनमानी करने का अवसर मिल जाता है. इसलिए व्यक्तिमात्र का कर्तव्य है कि वह समाज को उस रूप में व्यवस्थित करने के बारे में सोचे जिस, प्रकार वह स्वयं को व्यवस्थित करना चाहता है. किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश न रहे. वह स्पष्ट कर देना चाहता है कि मनुष्य न्याय को एक गुण के रूप में देखना चाहता है जो व्यक्ति के व्यवहार में भी उसी प्रकार मौजूद हो, जैसे कि वह समाज में है. जबकि समाज सदैव दो से बड़ा होता है. इसलिए वहां न्याय की मौजूदगी उसी अनुपात में अधिक होनी चाहिए. प्लेटो का यह तर्क बड़ा ही अजीब है. तो भी इस बात में कोई संदेह नहीं कि वह राजनीतिक सत्ता को अधिक न्यायोन्मुखी, उदार, कर्तव्यपरायण और दायित्व-भावना से युक्त देखना चाहता था. उसका राजनीतिक-दर्शन ही इस सिद्धांत पर टिका है कि अपने समाज और राज्य के लिए ‘मैं क्या कर सकता हूं?’ उसके प्रति मेरा ‘कर्तव्य और जिम्मेदारियां क्या हों?’

वस्तुतः इसे कर्तव्यबोध कहें अथवा नागरिकबोध, प्लेटो के मन में वह यूनानवासियों, विशेषकर वहां के अभिजात्यवर्ग के चारित्रिक पतन की प्रतिक्रियास्वरूप उपजा था. परोक्ष रूप में समाज को बेहतर बनाने की चिंता ही ‘रिपब्लिक’ का प्रतिपाद्य विषय है, जो कभी ‘न्याय’ की अवधारणा और कभी ‘आदर्श राज्य’ की परिकल्पना के रूप में सामने आती है. उसकी निगाह में आदर्श राज्य की स्थापना उस समय तक असंभव है, जब तक वहां के नागरिक और शीर्षस्थ वर्ग के लोग ‘शुभत्व’ से भली-भांति परिचित न हों. ‘शुभत्व’ की संकल्पना सुकरात की देन थी, जिसको पाने की लालसा प्लेटो के पूरे साहित्य की कसौटी है.

प्लेटो को पढ़ते हुए मार्क्स की याद आना स्वाभाविक है. दोनों ही भौतिकवादी थे. दोनों का ही मानना था कि कोई मनुष्य अपने आप में पूर्ण नहीं है. मानवमात्र की यही अपूर्णता समाज की आवश्यकता की जननी है. लेकिन एक सीमा के बाद मनुष्य और समाज के रिश्ते जटिल होने लगते हैं. उन्हें नियंत्रित करना अकेले समाज के लिए संभव नहीं होता. ऐसे में राज्य की अहमियत बढ़ जाती है. मनुष्य की अनेक आवश्यकताएं होती हैं. उनमें भोजन, वस्त्र, आवास आदि ऐसी आवश्यकताएं हैं, जिन्हें उसकी मूलभूत आवश्यकताएं माना जाता है. इनके बगैर जीवन असंभव है. कुछ आवश्यकताएं विकास की देन होती हैंजैसे सड़क, औजार, मशीनें, बिजली के उपकरण, यातायात के साधन इत्यादि.

प्रत्येक मनुष्य कामना करता है कि उसके जीवन में दूसरों का हस्तक्षेप न हो. सुरक्षा का पक्का भरोसा हो. यह काम मनुष्य आपस में एक-दूसरे के साथ सहयोग करते हुए भी कर सकता है. अक्सर करता भी है. सहकारिता आंदोलन इसी का सुपरिणाम है, जहां राज्य के हस्तक्षेप अथवा उसकी नीतियों से स्वतंत्र रहकर भी व्यक्ति-समूह अपना विकास कर सकते हैं. परंतु सहकार के लिए जैसे विवेक और समूह के हित में अपने हितों के किंचित त्याग और सामान्यीकरण की आवश्यकता पड़ती है, वह हर समाज और हर समूह में संभव नहीं हो पाता. व्यक्ति के भीतर मौजूद स्वार्थलोलुपताएं सहकारी प्रयासों के लिए घातक होती हैं. व्यक्ति की स्वार्थलोलुपता दूसरों के लिए घातक सिद्ध न हो, इसके लिए राज्य की आवश्यकता पड़ती है. लेकिन मनमानी करना तो राज्य में भी संभव नहीं होता. वहां भी व्यक्ति को दूसरे के हितों का ध्यान रखकर चलना पड़ता है. हितों के सामान्यीकरण की प्रक्रिया ही व्यक्ति को परस्पर करीब लाने का काम करती है. यही उनको एक स्थान पर टिककर रहने और समाज की स्थापना करने के लिए प्रेरित करती और अंततः राज्य की आवश्यकता को जन्म देती है.

क्रमशः

© ओमप्रकाश कश्यप

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