December 28, 2009

क्रिकेट-करकट


भारत में जितनी चर्चा क्रिकेट की लोकप्रियता की होती है, उसका सहस्रांश भी उसके कारणों की समीक्षा पर खर्च नहीं होता. जैसे मान लिया गया है कि क्रिकेट हमारे खून में है. एक नामी-गिरामी संपादक जो सती प्रथा और क्रिकेट का एकसमान गुणगान करते थे, हाल ही में ‘क्रिकेट-क्रिकेट’ भजते दिवंगत हुए. लोग उनके क्रिकेट-बोध पर फिदा थे, वे खुद देश की सती प्रथा पर. भगवान यदि लापता नहीं है तो उनकी आत्मा को शांति बख्शे. श्रीमान जाते-जाते भी बता गए कि लोग सचिन तेंदुलकर की कामयाबी का राज नाहक उनकी मेहनत और कलाइयों की उस करामात में ढूंढते हैं, जो बल्ले को ऐसे घुमाती हैं कि गेंद सीधी मैदान बाहर सांस लेती है. उनकी माने तो यह सब सचिन के ब्राह्मण होने का प्रताप है. गोया दुनिया के जितने भी बल्लेबाज हैं, गैरी सोबर्स से लेकर डेनिस लिली तक, सबके सब ब्राह्मण की औरस-जात हों.

‘उनने’ भी जितने ‘कागद’ सचिन की महानता का गुणगान करने के लिए ‘कारे’ किए, उसका शतांश भी क्रिकेट की लोकप्रियता के कारणों की पड़ताल पर जाया नहीं किया. क्या वे नहीं जानते थे कि क्रिकेट कोरा खेल न होकर समाज पर पूंजीवादी बाजार का शिकंजा है! सस्ता मनोरंजन है, जिसे नकली देशभक्ति की थाली में सजाकर परोसा जाता है. एक मोहपाश है जो देश के करोड़ों लोगों को भरमाए रखता है! ऎसा खेल जो सीधे-सादे लोगों को इलीट होने का झूठा एहसास देता है. क्या वे नहीं जानते थे कि फिल्मों की भांति क्रिकेट ने भी देश को नकली नायक ही दिए हैं, जो खेलने के अलावा बाजार की मांग पर नाच-गा सकते हैं. बल्कि वे क्रिकेट में जाते ही इसलिए हैं कि बाजार की आंखों के चांद-तारे बन सकें. देशभक्ति उनके लिए, बाजार और विज्ञापन-जगत के लिए महज एक धंधा है.

यह बाजार और उसका स्वार्थ ही है जो अभिताभ बच्चन को सदी का महानायक और सचिन तेंदुलकर को महान बल्लेबाज लिखता है. ‘महान’ शब्द को कितना छोटा बना दिया है इन्होंने. अगर अभिताभ सदी के महानायक हैं, तब भगत सिंह क्या थे! महात्मा गांधी से उनका दर्जा क्यों नहीं छीन लेना चाहिए? यदि इन्हें महान मान जाए तो वैशाली की नगरवधु आम्रपाली को केवल ‘कुशल’ नृत्यांगना कहकर कैसे निपटा सकते हैं! उसे तो भारतीय इतिहास की महादेवी की पदवी मिल ही जानी चाहिए. नचनियों को नायक बनाकर पेश करना लुटेरी बाजारवादी सभ्यता में ही संभव है. इसलिए बाजार में सवाल नहीं उठाए जाते. बाजार चाहता भी यही है कि लोग विज्ञापन के तानपुरे पर केवल गर्दन हिलाएं. अर्थों की खोज की हिमाकत न करें. बात पर कान दें, ध्यान हरगिज न दें.

पिछले दिनों क्रिकेट टीम में छोटे शहरों के कई खिलाड़ी लिए गए. इस बात का बहुत शोर मचाया गया कि छोटे शहरों से भी क्रिकेट की प्रतिभाएं उभर रही हैं. इस सबके पीछे विज्ञापनदाता कंपनियों की सोची-समझी रणनीति थी. सब जानते हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां शहरों को निचोड़ चुकी हैं. रीयल ऐस्टेट और दूर संचार कंपनियां जो ऐसे मैचों के प्रमुख प्रायोजक की भूमिका निभाती हैं, सहस्राब्दि की शुरुआत से ही भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बाजार की संभावनाएं तलाश की रही थीं. उनके निशाने पर छोटे शहर और गांव थे. उनके सुरसामुखी विस्तार के लिए अकेले सचिन का शहरी और उम्रदराज चेहरा काफी नहीं था. इसलिए धोनी को लाया गया. रैना जैसे नए चेहरे लिए गए. टीम का कप्तान बनने के बाद धोनी के खेल में गिरावट आई थी. फिर भी बाजार ने संभाले रखा. किसी न किसी तरह उनके नायकत्व को बनाए रखा गया. इसलिए कि उसकी जितनी धोनी को थी, उतनी ही मीडिया को भी थी. उन कंपनियों को भी थी जो धोनी के ऊपर करोड़ों का दाव लगा चुकी थीं.

इस बात का दावा खूब बढ़-चढ़कर किया जाता है कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड क्रिकेट की दुनिया की सबसे धनी संस्था है. मगर यह सवाल कोई नहीं उठाता कि एक गरीब देश का क्रिकेट बोर्ड दुनिया का सबसे मालदार क्रिकेट बोर्ड कैसे बना. हमारा आधुनिकताबोध, समकालीनताबोध क्रिकेटबोध से ऐसा जुड़ा है, कि कोई अलग नहीं होना चाहता. यहां तक कि हम इससे बाहर झांकना तक नहीं चाहते. कितने लोग जानते हैं कि क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड एक प्राइवेट संस्था है; और जिसे हम भारतीय क्रिकेट टीम कहते हैं, वह दरअसल भारतीयों की टीम है! असल में वे ऎसे चेहरें हैं जिनकी विज्ञापन जगत को आवश्यकता है. फिर भी भारत-पाकिस्तान का मैच हो तो नकली देशभक्ति जुनून ऐसा उमड़ता है कि दंगों जैसे हालात पैदा हो जाते हैं. दर्शकों की भावुकता और उनके जुनून को भुनाने वाला मीडिया हमें यह कभी नहीं बताता कि क्यों अमेरिका में क्रिकेट नहीं खेला जाता. ओलंपिक में सबसे अधिक मेडल जीतने वाले चीन और जापान को क्रिकेट के नाम पर इतना परहेज क्यों है? आस्ट्रेलिया को छोड़कर वही देश इस खेल में आगे क्यों हैं, जिनकी अपनी समस्याएं बेशुमार हैं? क्या कारण है कि क्रिकेट का खेल पश्चिमी देशों में जहां यह जन्मा, वहां निरंतर कम होता जा रहा है. आस्ट्रेलिया, इंग्लेंड जैसे देशों में भी हमारे यहां से कम क्रिकेट खेली जाती है. जबकि एशिया महाद्वीप में बिना क्रिकेट के आप कल्पना भी नहीं कर सकते.

कारणों की पड़ताल के लिए थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा. सत्तर का दशक भारतीय अर्थव्यवस्था में परिवर्तन और नए औद्योगिक घरानों और कारखानों के उभार का भी दशक था. राजनीतिक उथल-पुथल के उस दौर में पूंजीवाद समाज और शासन पर अपनी पकड़ बनाता जा रहा था. तेजी से बढ़ते कारखानों को अपने नए उत्पादों के लिए आकर्षक चेहरे-मोहरे वाले मा॓डल्स की तलाश हमेशा रहती है. उससे पहले वे नायक फिल्मों और टेलीविजन से आते थे. किंतु शिक्षा के प्रसार के साथ देश का आम दर्शक-श्रोता भी जानने लगा था कि फिल्मी अभिनेताओं का नायकत्व झूठा है. सेलुलाइड की चमक-दमक नकली और अस्थायी है. सिवाय शारीरिक सौष्ठव के फिल्मी नायक-नायिकाओं की बहादुरी, उनकी कला-प्रवीणता, यहां तक कि उनकी आवाज भी उनकी अपनी नहीं है. बहादुरी के लिए उनके डुप्लीकेट्स हैं, जिनके नाम तक नहीं लिए जाते. गीतों के सुरीले बोल पार्श्व गायकों के गले से आते हैं. इसलिए उत्पादों की बढ़ती संख्या को बाजार में लोकप्रिय बनाने, उनके लिए बड़ा उपभोक्तावर्ग पैदा करने के लिए उन्हें ऐसे नायकों की जरूरत थी, जिनका नायकत्व असली-सा जान पड़े. जिनके माध्यम से वे दर्शकों के हुजूम को अपने विज्ञापन परोस सकें. ऐसे चेहरों की तलाश के लिए विज्ञापन जगत का ध्यान खेलों की ओर गया, जहां सारा का सारा दारोमदार खिलाड़ियों के कौशल पर निर्भर करता है. खेलों में भी क्रिकेट उन्हें सर्वाधिक अनुकूल लगा.

सवाल है कि क्रिकेट का कौन-सा गुण उसको लोकप्रिय बनाता है. जिससे दूसरे खेलों के दर्शक उसकी ओर खिंचे चले आते हैं? चार-पांच दशक पहले तक इस देश का सर्वाधिक लोकप्रिय खेल हाकी था. वही देशभक्ति और राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान था. उसके बरक्स क्रिकेट अंग्रेजों और उनके मुंह लगे सामंतों का खेल था. आजादी के बाद स्थिति बदली. विकास की ओर अग्रसर देश में मध्यवर्ग का तेजी से विकास हुआ, जो खुद को अंग्रेजियत के करीब रखने में गर्व का अनुभव करता था. इस मामले में बाजी क्रिकेट के हाथ थी, क्योंकि उसकी सारी की सारी शब्दावली, खिलाड़ियों की वेशभूषा, खासतौर पर टोपी अंग्रेजियत को उनके एकदम पास ले आती थी. दूसरे इस खेल में नफासत भी थी. आपको बस खड़े-खड़े बल्ला चलाना है. गेंद फेंकने, उठाकर लाने के लिए दूसरे खिलाड़ी हैं. एकदम सामंती अंदाज. खेल में हालांकि गेंदबाज की भी भूमिका होती है. मगर वह दोयम दर्जे की, जैसे परिवार में स्त्री. दूसरे हाकी खेलने के लिए जो दम-खम चाहिए वह शहरी परिवेश में सर्वसुलभ नहीं था. उसके अधिकांश खिलाड़ी ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते थे. क्रिकेट में शहरीयत के अलावा इतनी सहजता भी थी कि साधारण से साधारण व्यक्ति भी रनों और ओवरों का हिसाब लगा सकता है. यानी क्रिकेट इस देश के तेजी से उभरते हुए मध्यवर्ग को जो आधुनिकताबोध दे सकता है, वह हाकी नहीं दे सकती. हालांकि क्रिकेट की भांति उसमें भी मास अपील यानी दर्शकों को अपनी ओर खींचने का सामर्थ्य था. मगर कुछ तकनीकी कारण भी रहे, जिनके चलते हाकी विज्ञापन जगत के लिए बहुत उपयोगी नहीं थी.

हाकी और फुटबाल जैसे खेलों की पारियां अपेक्षाकृत कम समय तक चलती हैं. उनके खेल में अत्यधिक तेजी और निरंतरता होती है. दर्शक गेंद का पीछा करते खिलाड़ियों को केवल सांसें थामकर देख सकता है. वह खिलाड़ियों के कौशल से रोमांचित हो सकता है. मगर उस खेल का खुद हिस्सा बन जाने, टीका-टिप्पणी करने अवसर उसके पास नहीं होता. तेजी से चलते मैच के बीच विज्ञापनों की घुसपैठ भी आसान नहीं है. दूसरी ओर क्रिकेट में हर ओवर के बाद खिलाड़ी अपना स्थान बदलते हैं. बल्ला लगते ही गेंद मैदान के बाहर चली जाए तो खिलाड़ी को दौड़ना भी पड़ता है. इस अंतराल में दर्शक को खेल और खिलाड़ी के बारे में सोचने का अवसर मिल जाता है. वह अपने पसंदीदा खिलाड़ी की प्रशंसा या आलोचना कर सकता है. खुद को उस अवस्था में रखकर सोच सकता है. यही क्षण मीडिया और विज्ञापनदाताओं के काम के होते हैं. इस अंतराल का उपयोग वे दर्शक-श्रोता के मानस पर अपने उत्पाद की पकड़ जमाने के लिए करते हैं.

हाकी और फुटबाल जैसे तीव्र गति खेलों में जब तक गेंद और गोल के बीच दूरी हो, रोमांच बना ही रहता है. उसके बीच से दर्शकों को अपने उत्पाद तक खींच कर ले जाना आसान नहीं होता. जबकि क्रिकेट के खेल में रोमांच के अवसर बीच-बीच में आते ही रहते हैं, जिसका फायदा दर्शकों को खेल से जोड़े रखने के लिए बाखूबी किया जा सकता है. क्रिकेट की लोकप्रियता का एक और कारण यह है कि हाकी और फुटबाल जैसे खेलों में जहां खिलाड़ी का अपना दमखम ज्यादा चलता है, वहीं क्रिकेट संयोगों का खेल है. यह खिलाड़ी के कौशल के अतिरिक्त चांस पर भी निर्भर होता है. यहां मंजा हुआ खिलाड़ी पहली ही बा॓ल पर आउट हो सकता है, तो एकदम नया-नया आया खिलाड़ी पहले ही मैच को शतकीय पारी में बदल सकता है. थोड़ी कड़वी भाषा का इस्तेमाल करें तो क्रिकेट भी टेलीविजन पर खेले जा रहे अनेक जुओं में से एक है. संयोग और अवसर हालांकि दूसरे खेलों में भी चलते हैं, मगर क्रिकेट का पूरा खेल इसी पर निर्भर करता है, यही कारण है कि शाहरुख जैसे पेशेवर अभिनेता भी क्रिकेट की ओर आकर्षित होते हैं तथा लीग मैचों में अपनी टीम की पराजय के बावजूद मोटी कमाई कर जाते हैं. वस्तुत: इस देश में क्रिकेट और कुकरमुत्ते की तरह जगह-जगह उगते कथावाचक ऐसे माध्यम हैं, जो आदमी का मन भरमाए रखते हैं. उसे उसकी दुर्दशा के बारे में सोचने और उसके कारणों की तह में जाने नहीं देते. इनकी आड़ में राजनीतिक ढुलमुलापन, नेताओं का झूठ और भ्रष्टाचार, अधिकारियों का नाकारापन और आम आदमी का भाग्यवाद सब खप जाते हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

December 22, 2009

हिंदी मीडिया: नाम-दाम का चोखा धंधा

मीडिया और हिंदी साहित्य


समाज में मीडिया की भूमिका संवादवहन की होती है. वह समाज के विभिन्न वर्गो, सत्ता-केंद्रों, व्यक्तियों एवं संस्थाओं के बीच पुल का कार्य करता है. इसके लिए एक ओर जहां वह सरकार और सत्ता-केंद्रों यथा धर्मसत्ता, राजसत्ता, अर्थसत्ता आदि की योजनाओं, कार्यक्रमों तथा उपलब्धियों को जनता के बीच ले जाता है.उनकी विशेषताओं, कमजोरियों और खामियों पर समालोचनात्मक विमर्श करता है, वहीं वह जनता की इच्छा-आकांक्षाओं, सपनों, उसकी अंदरूनी हलचलों और विभ्रमों को भी उसके दूसरे वर्गों एवं विभिन्न सत्ता-केंद्रों तक पहुंचाने का कार्य करता है. संवादवहन की इस प्रक्रिया में तथ्यों एवं घटनाओं के प्रस्तुतीकरण की ईमानदारी और निस्पृहता ही उसकी व्यावसायिक नैतिकता को रेखांकित करती है. लोकतांत्रिक समाजों में जनता चूंकि अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से स्वयंशासित होती है, इसलिए उनमें मीडिया का दायित्व और भी बढ़ जाता है. अतएव यह अन्यथा नहीं है कि लोकतंत्र मीडिया की उपादेयता एवं उसकी भूमिका आकलन करते हुए उसको अपने चौथे स्तंभ का सम्मान देता है.
यहां एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठ सकता है कि आखिर क्यों और किसके भरोसे मीडिया सत्ताकेंद्रों की गतिविधियों का आलोचनात्मक विमर्श रचने, यहां तक कि उनसे टकराने तथा उनके विरुद्ध जनमत पैदा करने का साहस कर पाता है. उत्तर एकदम स्पष्ट है—मीडिया और मीडियाकर को अपनी शक्तियां, अन्याय के प्रतिकार की पे्ररणा अपनी उस स्वयंस्फूर्त प्रतिबद्धता द्वारा प्राप्त होती हैं, जो उसकी ईमानदार मूल्यनिष्ठा और कर्तव्य-भावना की उपज होती है. यह अनुभूति कि उसके किसी निर्णय अथवा कार्य से व्यापक लोकहित संबद्ध है, उसे उस कार्य को पूरा करने की प्रेरणा और संबल प्रदान करती है. इसी नैतिक चेतना और विश्वास के भरोसे वह बड़ी से बड़ी सत्ता से दुश्मनी मोल लेने का साहस कर पाता है. कुशल नेतृत्व मिलने पर मीडिया समाज को वांछित परिवर्तनों की दिशा में ले जाने में सहायक होता है. इतिहास में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जब मीडिया की शक्ति एवं लोकमानस पर उसकी पकड़ को पहचानते हुए महान लोगों ने उसका उपयोग लोक-परिवर्तन के अहिंसक, प्रभावशाली और भरोसेमंद हथियार के रूप में किया है.
अब बात करते हैं साहित्य की. उसका शब्दार्थ है, सबका कल्याण. सः हितः. यानी ऐसी युक्ति ऐसा नियोजन, ऐसा माध्यम, ऐसी संप्रेरणा जिसके पीछे किसी एक वर्ग-जाति-धर्म-समाज-समूह-संप्रदाय-देश के बजाय समस्त विश्व-समाज के कल्याण की भावना सन्निहित हो. साहित्यकार के पास भरपूर कल्पनाशीलता और विश्वदृष्टि होती है. अपनी नैतिक चेतना से अभिप्रेत, कल्पनाशीलता के सहयोग से वह श्रेयस् के स्थायित्व एवं उसकी सार्वत्रिक व्याप्ति के लिए शब्दों तथा अभिव्यक्ति के अन्य माध्यमों द्वारा प्राणीमात्र के कल्याण का प्रयोजन रचता रहता है. संपूर्ण चराचर जगत के कल्याण यानी ‘सर्व भूत हिते रतः’ की सद्कामना ही साहित्यकार का अभीष्ठ होती है. सृजन के आनंदोत्सव के दौरान वह न तो ‘राजपाट की वांछा रखता है, न स्वर्ग, न ही मोक्ष आदि की. वह सच्चे मन से कामना करता है कि प्राणिमात्र के दुःखों और व्याधियों का अंत हो.1 सभी सुखी हों, सभी निर्भीक होकर मुक्त विचरण करें.2
‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना पर जोर देते हुए वह कामना करता है कि समस्त वसुधावासी परिवार की भांति, एक रहते हुए सदैव फलते-फूलते रहें. अभी तक केवल पृथ्वी पर जीवन की ज्ञात उपलब्धता है. यदि किसी अन्य ग्रह पर जीवन की संभाव्यता की भनक लगे, तो साहित्य तुरंत अपनी प्रार्थना में संशोधन करते हुए ‘बृह्मांड कुटुंबकम’ की भावना से युक्त कोई नई और प्रभावशाली प्रार्थना गढ़ लेगा. यहां आकर मीडिया और साहित्य की अंतर्संबद्धता एकदम स्पष्ट हो जाती है. मीडिया यानी वह उद्यम जो समाज के विभिन्न वर्गों, ध्रुवों, शक्ति-केंद्रों के बीच संप्रेषण का दायित्व वहन करे, उपेक्षित-उत्पीड़ित वर्गों के सपनों, आशा-आकांक्षाओं को सरकार और उसके प्रभावशाली वर्गों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाए तथा दोनों के बीच निर्भीक-निष्पक्ष और विश्वसनीय संवादसेतु का काम करे. ताकि लोग एक-दूसरे की इच्छा-आकांक्षाओं, सपनों और समस्याओं को जानें, समझें तथा मिल-जुलकर साथ-साथ प्रगतिपथ पर आगे बढ़ सकें. साहित्य वह जो लोक-कल्याण की भावना के साथ विभिन्न विचारधाराओं, जीवन-मूल्यों, सांस्कृतिक प्रतीकों-प्रतिमानों, कलाओं एवं लोकऐषणाओं के समन्वयीकरण, संरक्षण, संवर्धन, संप्रेषण आदि का दायित्व वहन करता हुआ, उनके बीच वैचारिक, सांस्कृतिक, सामाजिक संदेशों के आदान-प्रदान का माध्यम बने. ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम कल्याण’ की भावना से युक्त साहित्यकार ऐसी परिस्थितियों की रचना पर जोर देता है, जिनके बीच आम आदमी की भूख और उसके जीवन की जटिल जनसमस्याओं का हल खोजा जा सके.3
यहां स्पष्ट कर दें कि मीडिया का सामान्य अभिप्राय समाचारपत्र, पत्रिकाओं, टेलीविजन, रेडियो, इंटरनेट आदि से लिया जाता है. ये आधुनिक मीडिया के चर्चित और प्रभावशाली रूप हैं, जो सूचनाओं के संग्रहण एवं संप्रेषण का दायित्व बाखूबी निभाते हैं. लेकिन जिसे हम मीडिया यानी संवादवहन की युक्ति मानते आए हैं, उसकी हदें इससे कहीं अधिक व्यापक और समाज में विभिन्न रूपों में पैठी हुई हैं. पुराने जमाने के नौटंकी, स्वांग, नाटक सभा से लेकर बैनर, पोस्टर, पंपलेट्स, संभाषण, लोकगायन, विज्ञापन, सेमीनार, चित्रकला आदि मीडिया की प्रचलित परिभाषा से किंचित भिन्न होने के बावजूद उसी के विविध रूप हैं. आधुनिक मोबाइल फोन का प्रारंभिक उद्देश्य भले ही अलग-अलग स्थान पर मौजूद व्यक्तियों के बीच संवाद प्रक्रिया को आसान, बहुव्यापी और चलायमान बनाना हो, लेकिन उन्नत तकनीक, बाजार की जरूरतों तथा बढ़ती विज्ञापन-स्पर्धा ने उसे भी मीडिया के आधुनिक और शक्तिशाली विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है.
इसी प्रकार साहित्य भी लिखित शब्द, कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक इत्यादि नहीं है. ये महज विधाएं हैं जिनमें साहित्य अपने विभिन्न कलेवरों और रूपाकारों के साथ प्रकट होता है. साहित्य इनमें अंतनिर्हित वह तत्व है, जो पाठक-श्रोता-दृष्टा आदि के मन में नैतिक प्रेरणाओं और आत्मविश्वास का संचार करते हुए उनके विवेकीकरण में सहायक बनता है. उल्लेखनीय है कि सत्ता चाहे राजनीति की हो, पूंजी की या फिर धर्म की-वर्चस्व की भावना उसके चरित्र का अभिन्न हिस्सा होती है. चूंकि जागरूक और चैतन्य समाज ऐसी सत्ता को उखाड़ फेंकने का सामर्थ्य रखता है, इसी डर के कारण सत्ताएं अपनी वर्चस्वकारी प्रवृत्तियों को छिपाए रखने का भरपूर प्रयास करती हैं. उचित समय पर पर्दाफाश न किया जाए तो उनका दमनकारी रूप लगातार उग्र होता चला जाता है. साहित्य और मीडिया से अपेक्षा की जाती है कि वे परस्पर एकजुट होकर लोकजागरण का संधान करें. चूंकि धर्म की भांति बाजार भी समाज के विवेकीकरण से बचता है, इसलिए पूंजीवादी समाजों में मीडिया का स्वरूप इस तरह गढ़ा जाता है कि वह लोगों को ज्ञान-विज्ञान से समृद्ध करने, उनकी आलोचनात्मक प्रवृत्तियों को विस्तार देने के बजाय, मात्र सूचनाओं के आदान-प्रदान या मनोरंजन को अपना लक्ष्य माने रहता है.
साहित्य अपने पाठकों-श्रोताओं के विवेकीकरण पर जोर देता है. केवल सूचनात्मक ज्ञान से संतुष्ट न होकर वह सूचनाओं की पृष्ठभूमि में निहित तथ्यों के विश्लेषण पर भी समानरूप से विचार करता है. उदाहरण के रूप में दूरदर्शन तथा पत्र-पत्रिकाओं में आधुनिक स्त्री को अर्धनग्न और फैशनेबल रूप में दिखाया जाना पूंजीवादी शक्तियों के स्वार्थानुकूल है, इसलिए उनपर निर्भर मीडिया बगैर किसी शर्म / संकोच के वैसा करता है. साहित्यिक विमर्श का दायरा विस्तृत होता है. गांव-शहर की गरीब-विपन्न अपने अस्तित्व के लिए जूझती और लिंगभेद की मार सहती स्त्री भी उसके विमर्श के दायरे में होती है. इसलिए वह मीडिया की अपेक्षा अपेक्षा अधिक विश्वसनीय माना जाता है. साहित्य के साथ यह संभव है कि वह किसी खास वर्ग, समूह अथवा क्षेत्र की समस्याओं को केंद्र में रखकर रचा गया हो. मगर स्थानीयता साहित्य का तात्कालिक लक्षण भले हो, उसका आदर्श नहीं हो सकती. साहित्य को सामाजिक मान्यता तभी मिलती है, जब वह समाज के विभिन्न वर्गों में समन्वय और सद्भाव की बात करे. नैतिक मूल्यों से आबद्ध साहित्यकार केवल प्रचार अथवा सत्ताप्राप्ति की लालसा में ऐसा कोई कार्य नहीं कर सकता जो मानवादर्शों के विपरीत हो. अपनी व्याप्ति को व्यापक, स्थायी एवं संग्रहणीय बनाने के लिए साहित्य रसज्ञता का गुण रखता है. मनः रंजन की अनिवार्यता मीडिया के लिए भी है. लेकिन केवल लोकरुचि अथवा मनः रंजन से न तो साहित्य का काम सधता है, न मीडिया का. इसलिए अपनी उपस्थिति को सार्थक और जनसाधारण की पहुंच में बनाए रखने के लिए साहित्य जहां मीडिया से सहयोग की अपेक्षा रखता है, वहीं मीडिया अपनी प्रामाणिकता बनाए रखने के साहित्य को न केवल अपने साथ रखता है, बल्कि जरूरत पड़ने पर उसे नारे के रूप में उछालने से भी बाज नहीं आता.
अपनी पूंजी संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए मीडिया बार-बार सरकार और बाजार की शरण में जाने को बाध्य होता है. इसी से उसके दुरुपयोग होने तथा लक्ष्य से भटक जाने की संभावना बढ़ जाती है. पूंजीपति और सरकार मीडिया की मदद तो करते हैं, लेकिन वे यह भी चाहते हैं उनके उपकार का बदला चुकाते हुए मीडिया और साहित्यकार उनके हितों के अनुकूल कार्य करें. शक्तिशाली सत्ताएं प्रायः मनुष्य के विवेकीकरण से घबराती हैं. उनकी कोशिश होती है कि मनुष्य के सोच, उसके विचारों पर हमला किया जाए. इसके लिए उसके दिल-दिमाग का अनुकूलन करते हुए वे उसको अपने अनुसार सोचने के लिए बाध्य कर देते हैं. इसके लिए मीडिया का उपयोग इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने तथा सांस्कृतिक प्रतीकों की बाजारानुकूल व्याख्या द्वारा किया जाता है. मनुष्य के मुक्त सोच को बाधित करने के लिए ज्ञान को सूचना और सूचना के स्रोतों तक सीमित कर दिया जाता है. प्रभावित साहित्य भी होता है, मगर उसके बदलाव की गति अपेक्षाकृत काफी धीमी और अस्थायी प्रवृत्ति की होती है. इसलिए वह परिवर्तन के स्थायी और भरोसेमंद औजार के रूप में काम करता है.
स्मरणीय है कि हर परिवर्तन पहले विचार के रूप में जन्मता है, बाद में साहित्य के माध्यम से लोकचेतना का हिस्सा बनता है. मीडिया उसे जनांदोलन में ढाल देता है, जिनसे वास्तविक परिवर्तन की राह निकलती है. मीडिया का आदिरूप प्रिंट मीडिया यानी पत्रकारिता का है. वैश्विक पत्रकारिता का इतिहास लगभग 59 ईसवी पूर्व रोम से शुरू होता है. वहां का तत्कालीन सम्राट जूलियस सीजर चाहता था कि राज्य की प्रमुख सामाजिक एवं राजनीतिक घटनाओं की जानकारी उसके प्रजाजनों तक भी पहुंचे. कागज के आविष्कार से पहले समाचार-प्रेषण के लिए पत्थर या धातु की पट्टियों का उपयोग होता था. जरूरी समाचार उकेरकर वे नगर के मुख्य स्थलों पर जनसाधारण के अवलोकन के लिए रख दी जाती थीं. उनमें वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति, नागरिक-सभाओं की रिपोर्ट तथा सम्राट द्वारा लोकहित में लिए गए निर्णयों की सूचना होती थी.
उन दिनों ग्लेडिएटरों की लड़ाई संभ्रांत वर्ग के मनोरंजन का मुख्य माध्यम थी, इसलिए इन सूचनापट्टों पर उनका विवरण भी मजेदार भाषा में उकेर दिया जाता था. इस तरह विश्व के पहले समाचारपत्र Acta Diurna का जन्म हुआ, जिसका शाब्दिक अर्थ है- ‘दिन की घटनाएं’. चीन से आठवीं शताब्दी में हाथ के लिखे समाचारपत्र के प्रकाशन के प्रमाण मिलते हैं. मगर प्रिंट मीडिया के क्षेत्र में क्रांति का आगमन पंद्रहवी शताब्दी से हुआ. सुनार का काम करने वाले योहन गुटेनबर्ग ने छपाई मशीन का आविष्कार किया. फिर भी सोलहवीं शताब्दी के अंत तक समाचारपत्र हाथ से ही लिखे जाते रहे. 1605 में यूरोप के योहन कारोलूस नाम व्यवसायी ने सबसे पहले अपने धनवान ग्राहकों के लिए सूचनापत्र मशीन से छपवाया. Relation नाम का वह समाचारपत्र विश्व का पहला मुद्रित अखबार माना जाता है.
भारत में छपाई मशीन 1674 में ही आ चुकी थी, किंतु अखबार-प्रकाशन के लिए 102 वर्ष का लंबा इंतजार करना पड़ा. 1776 में विलेम बाल्ट नामक अंगे्रज ने ईस्ट इंडिया कंपनी के समाचारों को लोगों तक पहुंचाने के लिए अंगे्रजी में अखबार निकालना आरंभ किया. भारत का पहला समाचारपत्र जिसमें समाचारों की विविधता के साथ स्वतंत्र अभिव्यक्ति को भी महत्त्व दिया गया था, जेम्स ओगस्टस हिकी का ‘हिकी बंगाल गजट’ अथवा ‘बंगाल गजेटियर’ था. दो पन्नों के उस अखबार में ईस्ट इंडिया कंपनी की गतिविधियों और उसके वरिष्ठ अधिकारियों के जीवन पर लेख छपते थे. एक बार निर्भीक पत्रकारिता का परिचय देते हुए हिकी ने गवर्नर की पत्नी के दुराचरण पर लेख लिखा. उसके छपते ही कंपनी के अधिकारी नाराज हो गए. दंडस्वरूप हिकी को 500 रुपये का जुर्माना भरना पड़ा. मगर इससे उसकी पत्रकारीय निष्ठा पर कोई प्रभाव न पड़ा. कुछ दिन बाद हिकी ने गवर्नर और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की आलोचना से भरा लेख अपने अखबार में छाप दिया. इसपर कंपनी के अधिकारी उससे पूरी तरह खपा हो गए. हिकी को 5000 रुपये जुर्माने तथा एक साल की कैद की सजा मिली. अखबार बंद कर देना पड़ा.
भारत भाषाओं में प्रिंट मीडिया का उदय वर्षों की गुलामी के विरुद्ध भारतीय चेतना का शंखनाद था. हिंदी के पहले साप्ताहिक ‘उदंत मार्तंड’ का प्रकाशन 1826 में कलकत्ता की हवेली नंबर 37, आमड़तल्ला गली, कोलू टोला नामक स्थान से हुआ था. संपादक थे-जुगलकिशोर मुकुल. पहला अंक 30 मई, 1826 को बाजार में पहंुचा. इसके बाद तो वह प्रत्येक मंगलवार को पाठकों के दरवाजे पर दस्तक देने लगा. पत्र के प्रथम अंक से ही पत्रकारिता और हिंदी साहित्य के शाश्वत रिश्ते का संकेत मिलता है. अखबार के मुख्यपृष्ठ पर, शीर्षक के ठीक नीचे, उसके उद्देश्य को स्पष्ट करतीं, संस्कृत की पंक्तियां छपी होती थीं.4 पत्र के पहले ही अंक में पाठकों से अपील करते हुए कहा गया था—
‘‘यह ‘उदंत मार्तंड’ अब पहले-पहल हिंदुस्तानियों के हित के हेत जो आज तक किसी ने नहीं चलाया पर अंग्रेजी ओ पारसी ओ बंगाल में जो समाचार का कागज छपता है उनका सुख उन बोलियों के जानने और पढ़नेवालों को ही होता है. इससे सत्य समाचार हिंदुस्तानी लोग देख आप पढ़ ओ समझ लेयँ ओ पराई अपेक्षा न करें ओ अपने भाषे की उपज न छोड़े। इसलिए दयावान करुणा और गुणनि के निधान सब के कल्यान के विषय गवरनर जेनेरेल बहादुर की आयस से ऐसे साहस में चित्त लगाय के एक प्रकार से यह नया ठाट ठाटा…’’
संपादक की भरसक कोशिशों के बावजूद अखबार लंबा न खिंच सका. अंग्रेजी के समाचारपत्रों को सरकार की ओर से विशेष डाक-सुविधाएं प्राप्त थीं. प्रयासों के बावजूद उदंत मार्तंड को वे सुविधाएं प्राप्त न हो सकीं. 4 दिसंबर, 1827 के आखिरी अंक के साथ मात्र डेढ़ वर्ष की अवधि में उसे बंद कर देना पड़ा. अखबार समेटने की घोषणा काव्य-पंक्तियों5 द्वारा की गई थी. उदंत मार्तंड के असामयिक अवसान के पीछे उसके प्रकाशक-संपादक की आर्थिक कठिनाइयां थीं, मगर उनमें पत्रकारीय निष्ठा और संकल्प की कमी नहीं थी. इसलिए करीब 23 वर्ष बाद मुकुल जी की भावनाओं ने पुनः जोर मारा. फलस्वरूप उदंत मार्तंड के नए अवतार ‘सोमदत्त मार्तंड’ का जन्म हुआ.
हिंदी का पहला दैनिक होने का गौरव कोलकाता से ही श्यामसुंदर सेन के संपादन में प्रकाशित ‘समाचार सुधावर्षण’(1854) को प्राप्त है. उदंत मार्तंड की भांति यह भी गैरसाहित्यिक पत्र था. उन दिनों अखबार निकालना संपादक-प्रकाशकों के निजी जुनून का परिणाम था. कोई बड़ा उद्योगपति घराना, खासकर भारतीय भाषाओं के समाचारपत्रों से उस समय तक नहीं जुड़ा था. संसाधनों की कमी उनकी प्रमुख समस्या थी. लेकिन उनके संपादकों की निष्ठा असंद्धिग्ध थी. तत्कालीन पत्रकारिता का प्रमुख लक्ष्य था, समाज सुधार, भारतीय राष्ट्रीय चेतना का विकास तथा रूढ़ियों का बहिष्कार. इसके लिए वे अपने पाठकों को नए ज्ञान से समृद्ध कराना चाहते थे, जो अंग्रेजी भाषा के जरिए समाज में आ रहा था. इस बारे में कृष्णबिहारी मिश्र की टिप्पणी दृष्टव्य है—
‘हिंदी-पत्रकारिता के आदि उन्नायकों का आदर्श बड़ा था, किंतु साधन-शक्ति सीमित थी. वे नई सभ्यता के संपर्क में आ चुके थे और अपने देश तथा समाज के लोगों को नवीनता से संपृक्त करने की आकुल आकांक्षा रखते थे. उन्हें न तो सरकारी संरक्षण और प्रोत्साहन प्राप्त था और न तो हिंदी-समाज का सक्रिय सहयोग ही सुलभ था. प्रचार-प्रसार के साधन अविकसित थे. संपादक का दायित्व ही बहुत बड़ा था क्योंकि प्रकाशन-संबंधी सभी दायित्व उसी को वहन करना पड़ता था. हिंदी में अभी समाचारपत्रों के लिए स्वागत भूमि नहीं तैयार हुई थी. इसलिए इन्हें हर कदम पर प्रतिकूलता से जूझना पड़ता था और प्रगति के प्रत्येक अगले चरण पर अवरोध का मुकाबला करना पड़ता था. तथापि इनकी निष्ठा बड़ी बलवती थी. साधनों की न्यूनता से इनकी निष्ठा सदैव अप्रभावित रही…’5
प्रारंभिक दौर में जो साहित्यकार खड़ी बोली को साहित्यिक समृद्धि प्रदान करने के लिए आगे आए उनमें राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद, सदल मिश्र, सल्लूलाल, देवकीनंदन खत्री प्रमुख थे. उनके आगे प्रमुख समस्या थी कि भाषा का रूप तत्सम हो या आम बोलचाल वाला. राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद ने 1946 में जब ‘बनारस समाचार’ का प्रकाशन आरंभ किया तो उन्होंने संस्कृतनिष्ठ भाषा के इस्तेमाल पर जोर दिया. उसी समय देवकीनंदन खत्री आम बोलचाल की भाषा में लोकप्रसिद्ध रचनाएं दे रहे थे. दोनों के बीच की दूरी को पाटने का काम किया भारतेंदु हरिश्चंद्र ने. 1868 में उन्होंने ‘कविवचन सुधा’ नामक पत्रिका की शुरुआत की तो उसमें सरल खड़ी बोली को महत्त्व दिया. भाषा के इस समन्वयकारी रूप का सर्वत्र स्वागत हुआ. इस पत्रिका का पहला अंक 28 मार्च, 1874 को निकला था. कविताओं पर केंद्रित इस सोलह पृष्ठीय पत्रिका की आवृति आरंभ में मासिक थी, जिसे पाठकों की मांग पर पहले पाक्षिक और तदनंतर साप्ताहिक कर दिया गया. भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ही आगे चलकर हरिश्चंद्र मैग्जीन, बाला बोधिनी, हरिश्चंद्र चंद्रिका पत्रिकाएं निकालीं. उनसे प्रेरणा लेकर अन्य पत्रकारों-साहित्यकारों ने भी समाचारपत्र-पत्रिकाओं के संपादन-प्रकाशन का दायित्वभार संभाला. हिंदी के कुछ प्रमुख आरंभिक पत्र, पत्रिकाओं में हिंदी प्रदीप(बालकृष्ण भट्ट), आनंद कादंबिनी(चैधरी बद्रीनारायण प्रेमधन), ब्राह्मण(प्रतापनारायण मिश्र), भारत मित्र(रुद्रदत्त शर्मा), सरस्वती(महावीर प्रसाद द्विवेदी) आदि प्रमुख हैं. इसके बाद तो उनकी बाढ़-सी आ गई. काशी की नागरी प्रचारिणी सभा के प्रबंधन में- नागरी प्रचारिणी पत्रिका, विशाल भारत, चांद, मतवाला, इंदु, माधुरी, हंस, सरस्वती आदि पत्रिकाएं हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार का आधार बन गईं. यह सिलसिला लगातार आगे, देश के दूसरे हिस्सों में भी फैलता चला गया.
उस समय में भी साहित्य केवल साहित्यिक पत्रिकाओं तक सीमित नहीं था. बल्कि वह दूसरे विषयों पर केंद्रित समाचारपत्रों में भी प्रमुख-रूप से प्रकाशित होता था. दरअसल उन दिनों तक पत्रकार और साहित्यकार के बीच बड़ी विभाजन रेखा भी नहीं थी. भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे समर्पित लेखकों में यह पहचान करना कठिन था कि वे पत्रकार बड़े हैं या साहित्यकार. उस समय के प्रमुख साहित्यकार पत्रकारिता के माध्यम से ही साहित्य के क्षेत्र में आए और प्रतिष्ठित हुए थे. कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने पहले लेखन में नाम कमाया, फिर हिंदी पत्रकारिता जगत पर भी छाए रहे. हिंदी पत्रकारिता और साहित्य को एक-दूसरे का पूरक बनाने की उन्होंने जो मुहिम आरंभ की, उसी के फलस्वरूप तत्कालीन मीडिया भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान लोकजागरण की जनोन्मुखी भूमिका भली-भांति निभा सका. भारतीय संस्कृति और जीवनमूल्यों के पक्ष में लोकचेतना फैलाने के साथ-साथ उसने स्वाधीनता की भावना का सतत प्रचार-प्रसार कर, आंदोलन की आंच को प्रखर बनाए रखने का काम भी किया. जिसके फलस्वरूप माखनलाल चतुर्वेदी, गणेशशंकर विद्यार्थी, विष्णु पराड़कर जैसे समर्पित पत्रकार हिंदी जगत को मिल सके.
स्वतंत्र भारत में लोकतंत्रीय बयार के बीच मीडिया को अपने पांव पसारने का भरपूर अवसर मिला. नए-नए अखबार और पत्र-पत्रिकाओं की शुरुआत हुई. इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के वर्तमान रूप उन दिनों इतने प्रचलित नहीं थे. कुछ के तो आविष्कार ही भविष्य की गर्भनाल में छिपे थे. ले-देकर एक रेडियो हुआ करता था. वह भी अपने व्यावसायिक उपयोग की संभावनाएं तलाश रहा था. दूसरी ओर हिंदी साहित्य के पास वेद-वेदांगों, महाकाव्यों के अतिरिक्त बौद्ध, जैन एवं भक्ति-साहित्य की विपुल बौद्धिक-शास्त्रीय संपदा थी. हम कह सकते कि तत्कालीन भारतीय समाज और साहित्य का बौद्धिक चरित्र अपनी पांच हजार वर्ष से भी अधिक पुरानी संस्कृति, सभ्यता, सुदीर्घ दर्शन-परंपरा और लोकानुभवों से समृद्ध था, जिनकी उपेक्षा कर समाज में पहचान बना पाना असंभव था. जिसे आज ‘व्यावसायिक नैतिकता’ कहा जाता है, उसका उन दिनों तक जन्म ही नहीं हो पाया था. उत्पादन जनता की जरूरतों के लिए होता था. न कि उत्पादन के अनुसार बाजार और जरूरतों के निर्माण की प्रवृत्ति थी. दूरदर्शन आया तो उसे भी अपनी पहचान बनाने के लिए साहित्य का शरणागत बनना पड़ा. महाभारत, रामायण, वेताल पचीसी, बृहत्कथा/कथासरितसागर, पंचतंत्र, गोदान, रंगभूमि, भारत: एक खोज, चंद्रलेखा, तमस, सिंहासन बतीसी जैसी हिंदी की विशुद्ध साहित्यिक कृतियों पर धारावाहिक बने और चर्चित रहे. साहित्य का ऐसा ही दबदवा प्रिंट मीडिया के क्षेत्र पर भी बना रहा. चूंकि साहित्य और साहित्यकारों के सहयोग के अभाव में समाचारपत्र की गंभीरता और विश्वसनीयता दोनों ही संकट में पड़ जाते थे, इसलिए प्रायः सभी समाचारपत्रों ने साहित्य को प्रमुखता दी. फलस्वरूप धर्मवीर भारती, सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन अज्ञेय, धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, राजेंद्र माथुर, मनोहर श्याम जोशी जैसे लेखक सामने आए जो साहित्य और पत्रकारिता दोनों में समानरूप से प्रवीण थे. प्रकाशन-सुविधा बढ़ने पर निजी प्रयासों से भी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन आरंभ हुआ. साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं को छोड़ भी दिया जाए तो राजनीतिक और सामाजिक उद्देश्यों के लिए निकाले गए अखबारों में साहित्य अपनी भरपूर मौजूदगी बनाए रहा.
प्रारंभ में जब तक सरकारों पर स्वाधीनता संग्राम जैसे जनांदोलनों का प्रभाव था, तब तक सरकारें मीडिया के प्रोत्साहन, प्रेषण को अपने नैतिक धर्म की तरह निभाती रहीं. हालांकि उस दौर में सरकार तथा अन्य स्वार्थी वर्गाें ने मीडिया पर अपने प्रभुत्व का बेजा इस्तेमाल भी खूब किया. फिर भी उसका एक विश्वसनीय चरित्र बना रहा. पूंजीवादी दबावों के बीच सत्ताओं की नैतिक शक्तियां क्षीण होने से मीडिया, जो तब तक अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी हो चला था, खुशी-खुशी पूंजीवाद के चारणगान में जुट गया. अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूंर्ति के लिए मीडियाकरों को पूंजीवादी व्यवस्था के हाथों का खिलौना बनने से भी गुरेज नहीं था. लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करते हुए बड़े पूंजीपतियों ने स्वतंत्र मीडिया संस्थान खड़े कर लिए, जिनका उद्देश्य सिर्फ अपने व्यावसायिक हितों के लिए सरकार पर दबाव बनाना तथा बाजार को विस्तार देना था. चूंकि परंपरागत भारतीय सोच और मान्यताएं मिल-बांटकर खाने, भोग को नियंत्रित रखने और बचत को समान महत्त्व देती थीं, अधिकांश साहित्य इन्हीं के आधार पर रचा गया था. इसके अलावा साहित्य का जीवन के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण भी बाजार के किसी काम का न था, इसलिए नई मीडिया-नीति में साहित्य और साहित्यकार उत्तरोत्तर अप्रासंगिक होते चले गए. नवीं शताब्दी से आर्थिक उदारीकरण के दौर पूंजीपति घरानों को मिली छूट के बाद उत्पादन का आधार आदमी की जरूरत न रहकर मुनाफा कमाना हो गया.
अधिकतम मुनाफे के लिए विशालतम बाजार अपरिहार्य था. मनमाफिक विस्तार के लिए पूंजी-केंद्रित उद्यमों ने मीडिया को और ज्यादा सक्षम बनाने हेतु आधुनिक प्रौद्योगिकी का सहारा लिया, जो काफी महंगी थी. उतनी पूंजी सरकारों की ओर से भी आ सकती थी, मगर वे संसाधनों की कमी का बहाना बनाए रहीं. बड़े औद्योगिक घरानों का कब्जा हो जाने से मीडिया पर कारपोरेट संस्कृति का असर होने लगा. परिणामस्वरूप पत्रकारों के लिए नई आचारसहिंताएं गढ़ी जाने लगीं. मीडियाकरों में व्यावसायिक कौशल को महत्त्व दिया जाने लगा, जिसे बाजारवादी व्यवस्था के अनुचर विद्वान व्यावसायिक नैतिकता जैसा लोकलुभावन नाम देने लगे. बाजार की नब्ज पहचानना, सूचनाओं के भंडार को खंगालकर नए उपभोक्ताओं तक पहुंचना सफल मीडियाकर की अनिवार्य योग्यता मान लिया गया. बाजारवादी नैतिकता के अनुसार हर वह कार्य वरेण्य था, जिसमें अधिकतम लाभ की संभावना निहित हो. लाभ की अवधारणा परंपरागत प्रौद्योगिकी का भी अभिन्न हिस्सा थी. मगर नई अवधारणा ने लाभ को अधिकतम मुद्रार्जन के लक्ष्य तक सीमित कर दिया था, जबकि अपने परंपरागत अर्थों में लाभ का प्रत्यय उत्पाद के संपूर्ण सामाजिक-आर्थिक और नैतिक मूल्यों से जन्मता था. लाभवृद्धि की रफ्तार को बनाए रखने के लिए मीडिया ने साहित्य के साथ अपनी सालोंसाल पुरानी जुगलबंदी को किनारे कर, खुद को सूचनाओं के आदान-प्रदान तक सीमित कर दिया. उल्लेखनीय है कि साहित्य सोच का परिष्कार करता है, मीडिया रुचि का. सोच अमूत्र्तन अवस्था है, उसका व्यावसायिक लाभ संभव नहीं. इसलिए पूंजीपति की ध्यान मीडिया की ओर होता है, क्योंकि बाजार के विस्तार की संभावनाएं कहीं न कहीं रुचि के परिष्कार पर भी निर्भर होती हैं.
यह कहना भी अनुचित होगा कि साहित्य बाजार के दुष्प्रभावों से स्वयं को बचाने में सर्वथा सफल रहा. बड़े-बड़े समाचारपत्रों ने जो पूंजीपति घरानों से निकलते थे, अपने समय के प्रसिद्ध साहित्यकारों को नौकरियां दीं तथा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में उन्हें अपने हितों के विरुद्ध जाने से रोका. साहित्य-संवर्धन और साहित्यकारों के सम्मान के बहाने इस वर्ग ने बड़े-बड़े पुरस्कार घोषित किए. उनका उद्देश्य साहित्यकारों के सोच और कर्म को अपने अनुरूप ढालना था. लोगों के दिमागों में तरह-तरह से यह बिठाया जाने लगा कि साहित्य और अन्य कलाएं राज्य और पूंजी के ही संरक्षण में सुरक्षित रह सकते हैं. बावजूद इसके वर्चस्वकारी स्वार्थी शक्तियां साहित्य को पूरी तरह कब्जाने में नाकाम रहीं. क्योंकि साहित्यकारों के एक वर्ग को खरीद लेना, कुछ सुविधापरस्त साहित्यकारों की लेखनी की धार कुंद कर देना तो बाजार के लिए संभव था, मगर वह साहित्यकार बनाने का काम नहीं कर सकता था. जनाक्रोश को स्वर देने वाली साहित्यिक प्रतिभाएं प्रायः विसंगतियों और विषमताओं के बीच विकसित होती हैं. इसलिए तमाम पूंजीवादी प्रतिबंधों और आयोजनों के बीच साहित्यिक प्रतिभाएं जन्मती रहीं. उन्हीं के दम पर किंचित परिवर्तनों के बावजूद साहित्य आज भी अपनी स्वतंत्र उपस्थति बनाए हुए है.
साहित्यकारों का एक वर्ग हमेशा ही पूंजी और प्रौद्योगिकी के अंतहीन विस्तार को मानवीय अस्मिता पर संकट के रूप में देखता है. हिंदी साहित्य और मीडिया के वर्तमान संबंधों के विरुद्ध उठ रही बहसें दरअसल इसी वर्ग के जीवट और संघर्ष चेतना की प्रतीति हैं. साहित्य और आधुनिक मीडिया में एक अंतर यह भी है कि साहित्य मानवीय विवेकीकरण के प्रति निरंतर प्रयासरत रहता है. जबकि पूंजीवाद प्रेरित मीडिया की व्यावसायिक नीति लोगों को अनुगामी बनाने की होती हैं. स्थितियों की मूल्यवादी विवेचना की ओर उसका कोई रुझान नहीं होता. वह ज्ञान को सूचनाओं तक समेट देने का प्रयास करता है. यही कारण है कि आधुनिक मीडिया जिनमें हिंदी मीडिया भी सम्मिलित है, के अधिकांश आयोजन अपने दर्शकों, पाठकों के समक्ष सूचनाएं परोसने तक सीमित हैं. विमर्श के नाम पर वह तंत्र-मंत्र, खेल और सिनेमा जगत जैसी उन घटनाओं को लेता है, जो किसी न किसी रूप में बाजार को विस्तार देने के ही टोटके हैं. काले धन के बूते फल-फूल रहा आधुनिक मीडिया इतना बोल्ड हो चुका है कि वह किसी दायित्व-भावना को अपने सिर नहीं लेता. वह खुद को केवल मनोरंजन उद्योग के नाम से परचाना चाहता है. ताकि किसी भी प्रकार की उम्मीद न रखी जाए. लेकिन बात जब सुविधाओं एवं अधिकारों की आती है तो संविधान का हवाला देते हुए वह खुद को लोकतंत्र का संरक्षक घोषित करने लगता है. तथा इस बहाने सरकार से अधिकाधिक सुविधाओं की अपेक्षा रखता है.
सुप्रसिद्ध कन्नड साहित्यकार वेणुगोपाल ने अपने आलेख ‘प्रेमचंद और समकालीन राजनीति’7 में एक आपातकाल की एक घटना का जिक्र किया है. यह आधुनिक मीडिया के चरित्र का खुलासा करने को पर्याप्त है-
‘‘बात तब की है, जब राजकपूर की ‘बा॓बी’ फिल्म का हल्ला था. दिनमान में उन्हीं दिनों एक रपट छपी थी. एक विदेशी विचारक ने यह फिल्म देखी तो हाल से निकलने पर कहा—
‘ए फेंटास्टिक पा॓लिटिकल फिल्म.’ उनके भारतीय यजमान और दूसरे सुनने वाले हैरान-परेशान-कि बा॓बी और पा॓लिटिकल फिल्म! सोचा गया कि शायद विदेशी होने के कारण फिल्म उनकी समझ में नहीं आई होगी, तब उन्हें कहा गया— ‘यह फिल्म तो नई उम्र के एक छोकरे और छोकरी की इश्किया दास्तां है. इसमें पा॓लिटिकल क्या है?’ तो विदेशी विचारक मुस्कराकर बोले- ‘इससे बढ़कर पा॓लिटिकल और क्या होगा कि जिस उम्र में पूरी दुनिया के छोकरे-छोकरियां ‘यूथ पा॓वर और ‘स्टूडेंट पा॓वर’ के नाम से हड़कंप मचाए हुए हैं, उस उम्र में इस फिल्म के हीरो-हीरोइन सिर्फ ‘कमरे में बंद होकर चाबी खो देने में लगे हैं. इससे ज्यादा खतरनाक पा॓लिटिक्स और क्या होगी!’’

भटकाव का शिकार हिंदी का आधुनिक प्रिंट मीडिया तो भाषा के मूल स्वरूप से ही खिलवाड़ कर रहा है. तथाकथित राष्ट्रीय अखबारों में हिंदी के स्थान पर ‘हिंग्लिश’ का जिस प्रकार धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है, वह चिंता की बात है. गंभीर साहित्य टेलीविजन और अखबार दोनों से गायब होता जा रहा है. धुन के पक्के लोग इसकी भरपाई इंटरनेट के माध्यम से करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन वहां ‘संपादक’ नामक अनचाहे जीव की अनुपस्थिति साहित्यिक गुणवत्ता का सबसे बड़ा संकट बनी हुई है, हालांकि वह दिन दूर नहीं जब इंटरनेट पर गंभीर और पठनीय साहित्य का भरपूर जमावड़ा होगा, और वह पूरे समाज में वैचारिक हलचल पैदा करने में सक्षम होगा. अभी तो भाषा के साथ खिलवाड़ और सांस्कृतिक अपसरण पर साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों की चुप्पी, हालात को लगातार खतरनाक बनाती जा रही है. ऐसे में सुधी साहित्यकारों और पत्रकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे एकजुट होकर लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ के अनियंत्रित व्यावसायिकीकरण के विरुद्ध जनमत बनाने का हर संभव प्रयास करें. बस हमें याद रखना होगा कि मीडिया और साहित्य दोनों अन्योन्याश्रित हैं, उनके बीच अटूट-सी सहसंबद्धता है, उनके वर्तमान संबंध भले ही अस्पष्ट और दुविधामय नजर आते हों.
ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका :

1. न त्वहं कामये राज्यं, न स्वर्गं ना पुनर्भवम्।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्।।
2. सर्वेऽिप सुखिनः भवंतु, सर्वें संतु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद दुःखमाप्युात।।
3. ऐसा चाहौं राज मैं जहां मिलै सबन को अन्न !
छोटे बड़ों सब सम बसै रविदास रहे प्रसन्न !! – संत रविदास.
4. दिवा कांत कांति विनाध्वांदमंतं न चाप्नोति तद्वज्जागत्यज्ञ लोकः। समाचार सेवामृते ज्ञत्वमाप्तां न शक्नोति तस्मात्करोनीति यत्रं।। डा॓. सी. जयशंकर बाबु के आलेख ‘हिंदी पत्रकारिता के उद्भव की पृष्ठभूमि’ से उद्धृत.
5. वही.
6. आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तंड उदंत। अस्ताचल को जात है, दिनकर दिन अंत।। – वही
7- ‘गूंज’, संपादक अकिंचन, सितंबर-अक्टूबर, 2008

August 22, 2009

प्रागैतिहासिक भारत में व्यापार एवं शिल्पकार-संगठन

इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि सभ्यता के लंबे विकास-क्रम में व्यापार निरंतर तरक्की करता जा रहा था. लोगों की आवश्यकताएं भी बढ़ रही थीं. इसलिए यह संभव नहीं रह गया था कि एक ही स्थान पर मनुष्य की जरूरत की समस्त वस्तुओं का उत्पादन संभव हो सके. कच्चे माल एवं दक्ष शिल्पकारों की उपलब्धता के अतिरिक्त बाजार भी एक बड़ा कारण था, जिससे लोगों ने संगठित व्यापार की आवश्यकता को समझा. आगे चलकर यही संगठन राज्य के विकास की धुरी बनकर उभरे. प्रकारांतर में इसी वर्ग ने बड़े व्यापारी समूहों को जन्म दिया था. लेकिन ये संगठन उन अर्थों में व्यावसायिक एवं स्पर्धी नहीं थे, जिस प्रकार हम आजकल के व्यापारिक समूहों को देखते हैं. वे दरअसल शिल्पियों और कलाकारों के अन्योन्याश्रित व्यावसायिक समूह थे, जिनके पीछे संसाधनों के सम्मिलित प्रयोग द्वारा परस्पर कल्याण की भावना निहित थी. बाजार से जुड़ने की कवायद के पीछे शिल्पियों और कारीगरों की अपने शिल्प-कौशल एवं व्यापार को देश-देशांतर तक फैलाने की महत्त्वाकांक्षा भी थी. व्यापारी वर्ग के ऐसे प्रयासों को राज्य का पूरा समर्थन प्राप्त होता था. समाज में भी उनका महत्त्व बढ़ता जा रहा था.
उत्तरोत्तर व्यापार-वृद्धि ने लोगों की जरूरतों को विस्तार किया था. साथ में बढ़ती जा रही थी व्यापारी वर्ग की संख्या भी. इस कारण व्यापारिक यात्राओं में भी निरंतर वृद्धि हो रही थी. उन दिनों कच्चे रास्तों एवं यातायात के साधनों की अत्यल्पता के चलते यात्रा कर पाना आसान नहीं था. ऊपर से चोर-डकैतों का भय भी बना रहता था. हालांकि राज्य का दायित्व था कि वह व्यापारियों समेत अपने सभी नागरिकों की सुरक्षा की पक्की व्यवस्था करे. आततायियों को दंड देकर यातायात को सुगम बनाए. राजा की ओर से इस तरह के प्रयास भी होते थे, किंतु प्रत्येक राजा की सीमाएं भी थीं. किसी भी राजा को अपने व्यापारियों की सुरक्षा के लिए उनमें से प्रत्येक को सुरक्षा दे पाना संभव ही नहीं था. निश्चित रूप से इसके पीछे कुछ भौतिक कारण भी थे. अतएव संकट के समय साथ देने के लिए लोग अपने साथियों, सहधर्मियों के साथ निकल पड़ते थे. ग्राहकों को उनकी पसंद के अनुसार विभिन्न गुणवत्ता का माल एक ही समय में उपलब्ध कराने तथा अधिक लाभ के लिए थोक में सस्ती खरीदारी करने के लिए अपेक्षाकृत अधिक पूंजी की आवश्यकता पड़ती थी. इसलिए कुछ ऐसे भी संगठन बने जो केवल पूंजी का ही व्यापार करते थे, जिनका कार्य व्यापारियों को ब्याज पर ऋण प्रदान करना था. उस समय बोध हुआ कि पूंजी का प्रबंधन भी एक विशिष्ट कला है. इसलिए व्यापार की सफलता के लिए पूंजी के व्यवहार एवं प्रबंधन की महत्ता बढ़ती चली गई.
कालांतर में पूंजी का प्रबंध करने के लिए भी स्वतंत्र संगठन बने जो उस समय की अर्थव्यवस्था का खास हिस्सा थे. चूंकि व्यवसाय में धन लगाने वाला कोई भी व्यापारी, निश्चित मुनाफे के साथ अपने धन की वापसी चाहता था. वह इस बात की गारंटी भी चाहता था कि उसके द्वारा लगाया जाने वाला धन पूरी तरह सुरक्षित है तथा धोखादड़ी की संभावना न्यूनतम है. निवेशकों में यह विश्वास जगाए रखने के लिए आवश्यक था कि व्यापार के नियम सुस्पष्ट एवं सामाजिक रूप से मान्य हों. इसके लिए लिखित आचार संहिता बनाने का कार्य भी उत्तर वैदिक काल में शुरू हो चुुका था. विष्णुगुप्त चाणक्य, याज्ञवल्क्य, शुक्राचार्य आदि ने अर्थशास्त्र की नीतिगत व्याख्या के लिए ग्रंथों की रचना की, जिनमें चाणक्य रचित ‘अर्थशास्त्र’ इस विषय की प्रतिनिधि रचना है. इन पुस्तकों में उस समय के व्यापार तथा राजनीति के संबंधों की गहन विवेचना की गई है. इनके द्वारा यह संकेत मिलता है कि भारत में सहयोगाधारित आर्थिक गतिविधियों की शुरुआत वैदिककाल में ही हो चुकी थी, महाकाव्यकाल में उनका विस्तार हुआ. उत्तरवैदिक काल तथा वौद्ध काल में वे देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ बन चुकी थीं. समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी. हालांकि उनका स्वरूप देशकाल के अनुसार परिवर्तनशील था. लेकिन उन सभी का प्रमुख लक्ष्य था अपने समूह के आर्थिक विकास के लिए संगठित कार्य करना. उत्तरोत्तर सुगम होते यातायात वस्तुओं की लगातार बढ़ती मांग ने उन्हें और अधिक मजबूत और ज्यादा महत्त्वपूर्ण एवं प्रासंगिक बनाया था. उपर्युक्त आधार पर कहा जा सकता है कि—
‘सहकारिता का उद्भव उस समय की घटना है, जब व्यापार के साथ-साथ वस्तुओं की मांग में भी निरंतर वृद्धि हो रही थी, जिस समय उद्योग-स्वामियों तथा उनके प्रबंधकों के व्यवहार एवं कार्यकलापों पंर निवेशकों, उपभोक्ताओं तथा आम जनता द्वारा नजर रखने की प्रविधि का विकास हो चुका था. लोक परिवीक्षण एवं अवलोकन की घटनाओं ने उद्यमों के सांगठनिक स्वरूप को मजबूत एवं कार्यक्षम बनाने का काम भी किया था. हालांकि इससे उत्पादन लागत में भी वृद्धि हुई थी. क्योंकि सांगठनिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए प्रशासन संबंधी खर्चों की अतिरिक्त रूप से आवश्यकता थी. इससे लोगों में सहकार के प्रति आग्रहशीलता का विकास हुआ, तथापि सहकारिता को बढ़ावा देने वाले केवल यही कारण नहीं थे. इनके अतिरिक्त संपत्ति, संविदा कानून जैसे कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण कारक थे, जिन्होंने सहकारिता के विकास के लिए उसके प्रवर्तक एवं उन्नायक का कार्य किया था.’1
वेदों-उपनिषदों से लेकर स्मृतियों, पुराणों आदि ग्रंथों में सामूहिक उद्यमों की चर्चाएं हमारे पूर्वज जिस तरह से करते आए हैं, इससे भी साफ होता है कि वे अर्थव्यवस्था के इस कल्याणकारी स्वरूप से न केवल भली-भांति परिचित, बल्कि इसके पोषक-प्रशंसक भी थे. इसीलिए अर्थव्यवस्था की विकासगति को बनाए रखने के लिए उन्होंने ऐसे उपक्रमों का मुक्तकंठ से समर्थन किया था, जिनमें समाज के लगभग सभी सदस्यों की सहभागिता सुनिश्चित करने की व्यवस्था थी. सहकार के रूप में यह एक आदर्श-लोकोपकारी व्यवस्था थी, जिसमें समाज का कोई भी सदस्य अपने अल्पतम संसाधनों के साथ हिस्सेदारी कर, उससे निश्चित लाभ प्राप्त कर सकता था. चूंकि निवेशक किसी भी वर्ग, जाति अथवा संप्रदाय का हो सकता था, इसलिए नियम यह था कि समाज के संपूर्ण विकास के लिए उसके समस्त वर्गों का यथासंभव सहयोग प्राप्त किया जाए.

सभ्यता का आदिकालीन दौर

प्राचीन भारतीय सभ्यता जिसे कुछ लोग वैदिक सभ्यता और कुछ विद्वान सिंधु घाटी की सभ्यता भी कहते हैं, अत्यंत उर्वरा धरती पर विकसित हुई थी. उसका कालखंड विस्तृत, लगभग छह हजार वर्षों का है. वह विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक और अनेक अर्थों में उनकी अपेक्षा अधिक विकसित भी थी. उस सभ्यता के अवशेष मेरहगढ़, मोआन-जो-दारो, हड़प्पा आदि अनेक स्थानों पर बिखरे पड़े हैं. उन स्थानों के उत्खनन से जो अवशेष प्राप्त हुए हैं, उनके आधार पर उस सभ्यता के बारे में सटीक कल्पना कर पाना संभव है. सिंधु नदी की उर्वरा भूमि पर पल्लवित हुई वह सभ्यता कई मायनों में अनूठी थी. वहां घर-आंगन चौड़े तथा जलनिकासी की उन्नत व्यवस्था थी. सड़कें पक्की और सीधी जाती थीं. सार्वजनिक स्नानगृह भी उस सभ्यता की प्रमुख विशेषता थे. संभवत वह पहली नागरी सभ्यता थी, जिसमें स्वच्छता और आवागमन के प्रबंधों पर इतना अधिक जोर दिया गया था. क्षेत्रफल की दृष्टि से देखा जाए तो उसका परिक्षेत्र समकालीन किसी भी सभ्यता के विस्तार के अधिक था.
सिंधु घाटी की सभ्यता के विकास के लिए जिम्मेदार आर्यगण प्राचीन वैदिक समाज से ही संबंधित थे, जो घुम्मकड़ प्रवृत्ति का था. एक स्थान से दूसरे स्थान तक भटकने रहने के कारण आर्य सैनिकों का अधिकांश समय युद्ध और उसकी तैयारियों में ही निकल जाता था. इससे वे जरूरत लायक अनाज का उत्पादन करने में सफल नहीं हो पाते थे. उसके लिए उन्हें युद्धों का सहारा लेना पड़ता था. युद्ध से बचे समय का उपयोग शिल्पकला के विकास के लिए किया जाता था. शिल्पकर्म के माध्यम से युद्ध के दौरान घायल-अशक्त सैनिकों का पुनर्वास भी संभव था. इस कारण शिल्पकला की उपयोगिता भी थी. परिणामस्वरूप दक्ष शिल्पकारों का समाज में सम्मान भी था. जिसके आधार पर शिल्पकला का विकास होता चला गया. भविष्य में अतिरिक्त रूप से उत्पादित माल के विपणन के लिए नए बाजारों की जरूरत महसूस की गई, उसी ने प्रकारांतर में संगठित व्यापार को बढ़ावा दिया. किरन कुमार थपल्याल के अनुसार—
‘वर्णाश्रम व्यवस्था के अंतर्गत श्रम-विभाजन की नीति ने भी संगठित व्यापार को आवश्यक बनाने, उसको विस्तृत करने का कार्य किया. तत्कालीन समय में वैश्यों के रोजगार के तीन प्रमुख साधन अर्थात कृषि, पशुधन एवं वाणिज्य के आधर पर आगे चलकर व्यापार की अनेक धाराओं का विकास हुआ.2
भारतीय सभ्यता के विकास के दौर को हम निम्नलिखित आधार पर वर्गीकृत कर सकते हैं: क्रमांक प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएं कालखंड
1 सभ्यता का आदिकालीन दौर                       6500 ई.पू. से 700 ई.पू. तक

क. सभ्यता के प्रारंभिक अवशेषः मेहरगढ, मोहनजोहदड़ो आदि 6500 ई.पू. से 3300 ई.पू तक

ख. सिंधु घाटी की सभ्यता                             3300 ई.पू. से 1900 ई.पू. तक

ग. गंगा घाटी और तराई की सभ्यता             1900 ई.पू. से 700 ई.पू. तक

2 जैन एवं बौद्ध धर्म का अभ्युदय                 700 ई.पू. से 320 ई.पू तक

3 मौर्य साम्राज्य का उद्भव एवं विकास         320 ईपू. से 185 ई.पू. तक

4 मौर्य काल के बाद का भारत                     200 ई.पू. से 1300 ई पश्चात तक

क. गुप्त साम्राज्य, भारत का स्वर्णकाल       200 ई.पू. से 550 ई. पश्चात तक

ख. हर्षबर्धन एवं राजपूत महाराजाओं का काल600 ई प. से 1100 ईसा प. तक

हड़प्पा, मोय-जो-दाड़ो तथा मेहरगढ़ की जैसी भारतीय प्रायद्वीप की प्राचीनतम सभ्यताओं के पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर यह अनुमान आसानी से लगाया जाता है कि तत्कालीन समाज कृषि-कर्म से परिचित था. उसमें शिल्पकर्म का भी पर्याप्त विकास हो चुका था. हड़प्पाकाल के लोग तो दूर-देशों के साथ अपने व्यापारिक संबंध भी बनाए हुए थे. अरब सागर के रास्ते से उनके काफिले मेसोपोटामिया, इजिप्ट, चीन आदि देशों तक निरंतर आते-जाते थे. उन काफिलों को आंतरिक स्पर्धा तथा किसी भी तनाव की स्थिति से बचाए रखने के लिए आवश्यक नियम बनाए गए थे.
भारतीय प्रायद्वीप में पनपी सभ्यताओं में मेहरगढ़ की सभ्यता के अवशेष उसके सर्वाधिक पुरातन होने के संकेत देते हैं. विद्वानों के अनुसार मेहरगढ़ सभ्यता, पाकिस्तान स्थिति आधुनिक क्योटा के निकट पनपी थी, जो करीब 6500 वर्ष पुरानी है. इस सभ्यता के अवशेष दर्शाते हैं कि मेहरगढ़ के प्राचीनतम वासियों को मिट्टी के बर्तन बनाने तथा उनको भट्टी में पकाने की कला में पारंगत हो चुके थे, तथा उनकी कलाकृतियों की मांग बाहर के बाजारों में भी बनी हुई थी. परिष्कृत सभ्यता के स्वामी सिंधु-सभ्यता के निवासी, धार्मिक दृष्टि से ईश्वर पर भरोसा करने वाले थे.
व्यापारिक दृष्टिकोण से भी वे किसी से पीछे नहीं थे. उनके व्यापारिक काफिले सूदूर रोम और ईरान तक की यात्रा करते रहते थे. भारतीय ग्रंथों में भी उसका उल्लेख मिलता है. यह इस भ्रम का भी उन्मूलन करती है कि भारतीय केवल आध्यात्मिक चिंतन में ही प्रवीण थे, दुनियादारी की बाकी बातों की तरफ उनका रुझान ही नहीं था. वस्तुतः श्रेणी के माध्यम से समूह के आर्थिक विकास तथा उसके द्वारा सामाजिक कल्याण की जो विशद् परिकल्पना की गई थी, वह भारतीय मनीषियों की मेधा की विलक्षणता और उसकी व्यापकता को दर्शाती है. आज भी अनेक अर्थशास्त्री सहयोग और सामूहिक समर्पण की प्रतीक उस व्यवस्था के प्रशंसक हैं. ऋग्वेद जिसको विश्व की किसी भी भाषा की प्राचीनतम कृति होने का गौरव प्राप्त है, में पणि का उल्लेख मिलता है. जिसके अंतर्गत व्यापारीगण परस्पर समझौता करते थे, ताकि कारवां के रूप में संगठित होकर दूर-दराज के प्रदेशों तक व्यापार किया जा सके. कठिन रास्तों तथा विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों के कारण संगठन बनाकर चलना उस समय के व्यापारियों की विवशता थी. हालांकि कुछ विद्वान वैदिक युग में श्रेणी अथवा पणि जैसे किसी संगठन की उपस्थिति का समर्थन नहीं करते. दूसरी ओर कुछ विद्वानों का मानना है कि वैदिक काल के दौरान सहयोगाधारित संगठनों की उपस्थिति सामान्य थी. तात्कालिक अर्थव्यवस्था में उनका बहुत बड़ा योगदान था. इस संबंध में जो भी प्रमाण प्राप्त हुए हैं, उनकी विश्वसनीयता किसी भी प्रकार के संदेह से परे है. तांबे की मुहरें, ताम्रपत्र, प्रस्तर कलाकृतियां, लिखित ग्रंथ इत्यादि अनेक ऐसे प्रमाण हैं, जो प्राचीन सहयोगाधारित उद्यमों की प्रामाणिकता को दर्शाते हैं. यह भी निर्विवाद तथ्य है कि प्राचीन भारतवासी सहअस्तित्व एवं साहचर्य की महत्ता को पहचान चुके थे, अतएव परस्पर सहयोग एवं समर्थन के आधार पर नीतियां बनाना, उन दिनों की दिनचर्या में सम्मिलित हो चुका था. प्रकारांतर में उन्हीं के आधार पर सहकार के नियम बनाए गए. सहकारिता की आधुनिक अवधारणा प्राचीन सिद्धांतों से बहुत मेल खाती है. वैदेत्तर काल के साहित्यिक ग्रंथों, पुरातात्विक अवशेषों में पणि अथवा श्रेणी के रूप में सहयोगाधारित व्यापारिक संगठन होने का उल्लेख तो है, लेकिन उनके बारे और अधिक विवरण, उनकी कार्यपद्धति एवं पहुंच को लेकर अधिक साक्ष्य मौजूद नहीं हंै. इसे देखते हुए कुछ विद्वानों ने उस युग में सहयोगाधारित संगठनों की मौजूदगी पर ही संदेह प्रकट किया है. उनके अनुसार पूग अथवा पणि जैसे वैदिक वांङमय में आए शब्द गिल्ड के पर्याय नहीं हैं, न श्रेष्ठि अथवा श्रेणी-प्रमुख तथा गिल्ड के अध्यक्ष के पद को परस्पर समानार्थी मानना उचित होगा. हालांकि वैदिक समाज में शिल्पकलाओं की उन्नति पर किसी को भी संदेह नहीं है. इसलिए यह अपेक्षा की जा सकती है कि शिल्पकलाओं का उतना विकास बिना उपयुक्त बाजार के संभव ही न था. इस तर्क से भी सहयोगाधारित व्यापार संगठनों की मौजूदगी एवं उनकी उपयोगिता स्पष्ट हो जाती है.

सिंधू घाटी की सभ्यता

मेहरगढ़ की सभ्यता के अवसान के लगभग ढाई हजार वर्ष पश्चात सिंधू घाटी के तट पर एक और सभ्यता का विकास हुआ, जो अपेक्षाकृत अधिक आधुनिक एवं समृद्धिशाली थी. सिंधु थाटी के तटवर्ती क्षेत्र में विकसित होने के कारण यह सभ्यता भारतीय इतिहास में सिंधु घाटी की सभ्यता के नाम से जानी जाती है. इस सभ्यता के अवशेष मोआन-जो-दारो तथा हड़प्पा नामक स्थानों पर पाए जाते हैं. ईसा पूर्व 3300 वर्ष से लेकर 1900 ईसा पूर्व, करीब चैदह सौ वर्ष तक विकासमान रही यह सभ्यता अपनी समकालीन रोम तथा मेसापोटामिया सभ्यताओं से कहीं अधिक विस्तृत एवं समृद्ध थी. उन्नत जल निकासी, बेहतर नगर नियोजन, लेन-देन के समय माप-तौल के एक जैसे मानकों का प्रयोग, मुद्रा आधारित विनिमय इस सभ्यता की विशेषताएं थीं. इनके अतिरिक्त हड़प्पा और मोआन-जो-दारो के निवासी शिल्पकला एवं व्यापार के मामले में भी अपने समकालीनों से कहीं आगे थे. वे जल-थल दोनों ही रास्तों से व्यापार करते थे. संगठित व्यापार की कला से वे परिचित थे.
सिंधु घाटी के आसपास की जमीन अत्यंत उपजाऊ एवं प्राकृतिक रूप से समृद्ध थी, जिसका प्रभाव वहां के निवासियों की जीवनशैली पर पड़ना स्वाभाविक था. लोगों में विलासिता की वस्तुओं की खपत थी, जिसने व्यापार की संभावनाओं का सघन विस्तार दिया था. दुकानदार अपनी वस्तुओं को लेकर एक स्थान पर जमा हो जाते थे. पूरा सिंधु-प्रदेश हालांकि किसी एक राजा के स्वामित्व में नहीं था, बावजूद इसके वहां के निवासियों, व्यापारियों के बीच एक ही मुद्रा का चलन था और उसकी स्वीकार्यता सिंधु घाटी की सभ्यता की विशिष्टता थी, जिसका तब तक बाकी सभ्यताओं में प्रसार नहीं हो पाया था. प्रदेश हालांकि छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था, तथापि विभिन्न राज्यों के नागरिकों के बीच संबंध सौहार्दपूर्ण थे. पुरातात्विक शोधों से यह भी सिद्ध हो चुका है कि सिंधू घाटी की सभ्यता उन्नत नागरिक सभ्यता थी. नगर नियोजन में समानता दर्शाती है कि वहां के निवासियों के बीच आपसी तालमेल का स्तर ऊंचा था. राज्यों के बीच झगड़े बहुत कम होते थे. नगरों में विभिन्न प्रकार के उद्योंगों एवं शिल्पकलाओं के लिए स्थान निश्चित थे. मापतौल के लिए विभिन्न स्थानों पर एक जैसे बाटों का प्रयोग होता था. नागरीकरण के कारण उत्तरोत्तर बढ़ती मांग, एक जैसी मापतौल व्यवस्था, एक ही मुद्रा का उपयोग तथा उद्यमियों एवं कारीगरों के लिए सघन बस्तियों का निर्माण, ये सभी परिस्थितियां व्यापार के पक्ष में थीं, उद्योगों के एक ही स्थान पर केंद्रीयकरण के कारण उनके बीच तालमेल एवं उनपर नियंत्रण रखना सुविधाजनक था. इन सब स्थितियों का लाभ व्यापारियों ने खूब उठाया और उनके व्यापारिक काफिले अपने माल के साथ दूर-देश की यात्राओं पर निकलने लगे—

‘ऊपर वर्णित स्थितियां ही प्रदेश के व्यापारिक विकास में सहायक बनीं. परिक्षेत्र में अपेक्षाकृत शांति ने व्यापार को सुरक्षित एवं लाभकारी बनाने में मदद की थी, परिणामतः नए बाजारों का विकास संभव हुआ. ध्यातव्य है कि विभिन्न राज्यों के बीच माप-तौल की एक समान पद्धति, विनिमय के लिए एक समान मुद्रा का प्रयोग उस समय तक केवल सिंधू घाटी की सभ्यता की विशिष्टता थीं, जिसके कारण व्यापारियों की एक-दूसरे समाजों, राज्यों में स्वीकार्यता बढ़ी, व्यापारिक लागत में कमी आई. उद्योगों एवं व्यवसायों के एक ही स्थान पर केंद्रीयकरण ने विभिन्न वर्गों के बीच आपसी तालमेल को बढ़ाने का कार्य किया था. इससे योग्य कर्मचारियों की भर्ती एवं उनका प्रशिक्षण आसान हुआ, जो उत्पादकता में वृद्धि के लिए आवश्यक था. ये सभी कारण उस परिक्षेत्र में जहां उद्योगों के विकास में सहायक बने, वहीं इन्होंने लंबे रास्तों पर सुरक्षित यात्रा करने, बड़े पैमाने पर उत्पादन करने तथा कर्मचारियों के प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था करने के लिए, उद्यमियों एवं व्यापारियों को परस्पर सहयोग का मार्ग भी प्रशस्त किया.’3
हड़प्पा एवं मोआन-जो-दारो के टीलों की खुदाई से प्राप्त मुहरों पर उत्कीर्णित लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है. किंतु इन स्थानों की खुदाई से प्राप्त उस सभ्यता के अवशेष उस सभ्यता की अद्वितीयता एवं समृद्धिशीलता की घोषणा करते रहे हैं. प्राप्त पुरातात्विक साम्रगी में मृदा भांड, धातु की मुहरें, औजार, मूर्तियां इत्यादि सम्मिलित हैं. इनके अलावा सार्वजनिक स्नानगृह, सड़कों, पक्की नालियों, मकानों आदि से युक्त एक समृद्ध बस्ती के अवशेष के भी प्राप्त हुए हैं, जो उनके सुव्यवस्थित नगर-नियोजन के बारे में जानकारी देते हैं. प्राप्त मुहरों तथा नगर-नियोजन की उन्नत व्यवस्था को देखते हुए यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि वह एक समृद्ध सभ्यता थी. उत्खनन से प्राप्त मुहरें किसी व्यक्ति या समूह की आर्थिक समृद्धि का प्रतीक रही होंगी. बावजूद इसके यह दावा करना जल्दबाजी होगी कि उन दिनों तक समाज में सहकारिता अथवा साहचर्य का विचार अपनी पकड़ बना चुका था. न यह बात विश्वास के साथ नहीं कही जा सकती कि उस समय तक समाज में उत्पादक श्रेणियों का विकास हो चुका था, किंतु यह निविर्वाद रूप से कहा जा सकता है कि धीरे-धीरे ही सही, व्यावसायिकरण की ओर तेजी से बढ़ता हुआ वह समाज, अपने अनुभवों से सामूहिक नियंत्रण के प्रति आग्रहशील होता जा रहा था.
वस्तुतः अकेले व्यक्ति को अपनी सीमाओं का बोध भी सामूहिकीकरण का उत्पे्ररक रहा है. मनुष्य की निरंतर बढ़ती आवश्यकताओं तथा विभिन्न शिल्पकलाओं के उद्भव के बीच सिंधु घाटी के लोग अपनी कलाओं के साथ समूहबद्ध होते जा रहे थे. व्यापारियों, शिल्पियों को अब नए बाजारों की तलाश थी, जहां पर वे अपने शिल्पकर्म की अधिक से अधिक कीमत वसूल कर सकें. नए बाजारों तक आने-जाने तथा रास्ते के खतरों से निपटने के लिए व्यापारियों ने समूहबद्ध होकर यात्रा करना प्रारंभ किया, जो आगे चलकर सामूहिक उद्यमिता का रूप लेता चला गया. सभ्यता का वह पहला चरण था, जिसके आधार पर भाविष्य में साहचर्य आंदोलन की लंबी और टिकाऊ भूमिका गढ़ी जानी थी.
ध्यान देने की बात यह कि सभ्यता का वह नया रूप मनीषियों ने नहीं गढ़ा था, बल्कि उसकी रचना अपने शिल्प-कौशल के दम पर लोगों के दिलों पर छा जाने वाले शिल्पकारों, मेहनतकशों, व्यापारियों ने गढ़ी थी. संभव है कि प्रारंभ में उन्हें अपने राज्य का विरोध भी सहना पड़ा हो. लेकिन आगे चलकर जब उनका व्यवसाय अधिक मुनाफादेय होता चला गया और उसके दम पर उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति बेहद मजबूत कर ली, तो राज्य न केवल उनका समर्थन करने लगे, बल्कि मामूली कर के बाद उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उठाने को तैयार हो गए. संभवतः यही प्रतिक्रिया धार्मिक नेताओं की भी रही. परंपरा और शुचिता के नाम पर विदेश यात्रा को निषिद्ध करते आए पंडितजन, उस व्यपार में अपना हित देखकर उसके न केवल समर्थक बने, बल्कि तरह-तरह से स्वयं को उनका गुणग्राहक जताने लगे थे.

गंगा-जमुनी सभ्यता

सिंधु घाटी की सभ्यता का पराभव कैसे हुआ, इस बारे में कोई ठोस जानकारी प्राप्त न होने के कारण विद्वानों के बीच मतभेद बने हुए हैं. अधिकांश विद्वान नदी में आई बाढ़ को उसका कारण मानते हैं. लेकिन उस सभ्यता के पराभव के दौर में लगभग उसी के समान एक और सभ्यता गंगा और यमुना के तटवर्ती प्रदेशों में पनप रही थी. गंगा और यमुना के दोआबे के बीच का स्थान प्राकृतिक रूप से काफी समृद्ध, हरा-भरा एवं धन-धान्य से परिपूर्ण था. मीठे पानी के लगभग अंतहीन स्रोतों से परिपूर्ण इस सभ्यता का उद्भवकाल ईसा पूर्व 1900 से लेकर ईसा पूर्व 1500 तक है.
प्राकृतिक रूप से साधन-संपन्न होने के कारण गंगा-यमुनी सभ्यता का विकास बहुत तेजी से हुआ. उद्योग-धंधों एवं शिल्पकलाओं की उन्नति ने इसे बहुत शीघ्र अपनी समकालीन सभ्यताओं में विशिष्ट बना दिया था. हालांकि इस बात के लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि इस सभ्यता के निवासी आरंभिक काल से ही श्रेणी या सहव्यापार के विचार से परिचित थे. प्राचीन गोतम धर्मसूत्र का हवाला देते हुए विक्रमादित्य खन्ना लिखते हैं कि भारतीयों को 1000 ईसापूर्व से 800 ईसापूर्व के बीच सहयोगाधारित व्यावसायिक संगठनों के बारे में ज्ञान था. महाभारत तथा बृहदारण्यक उपनिषद के हवाले से डाॅ. रमेशचंद्र मजुमदार ने भी दर्शाया है कि भारत में ऋग्वेद के समय में ही पणि का अस्तित्व था. उनका लिखते हैं कि लगभग 1500 ईसा पूर्व के आसपास इस सभ्यता के निवासियों को संगठित व्यापार की कला का बोध हो चुका था. इस तथ्य के समर्थन में तो पर्याप्त लिखित प्रमाण मौजूद हैं कि ईसा पूर्व 1000 से ईसा पूर्व 800 तक भारतवासियों को पणि एवं श्रेणी का ज्ञान था. वे अपने उद्योग-धंधों पर नियंत्रण एवं योजनाओं के निर्माण के लिए संगठनशक्ति का भली-भांति उपयोग करने लगे थे.

महाकाव्य युग में सहयोगाधरित आर्थिक संगठन

भारतीय समाज एवं संस्कृति की लगभग आधी से अधिक परंपराएं किसी न किसी प्रकार से रामायण एवं महाभारत से उद्भूत हैं. रामायण में राम की कथा है, किंतु परोक्षरूप में यह ग्रंथ आर्यों की भारत के मूल निवासियों पर विजय की गाथा है. राम-रावण युद्ध मुख्यतः दो विरोधी संस्कृतियों का संघर्ष था. वर्चस्व की उस लड़ाई में अपेक्षाकृति अधिक विकसित आर्य संस्कृति भारत की प्राचीन द्राविड़ संस्कृति को अपदस्थ कर स्वयं केंद्र पर विराजमान हो जाती है. महाभारत में पांडवों एवं कौरवांे के भीषण युद्ध की कहानी, विशुद्ध राजनीतिक संघर्ष था. दोनों ग्रंथों में वर्णित घटनाक्रमों के बीच भी लगभग एक हजार तक का अंतराल संभव है. अधिकांश विद्वान इस बात से सहमत हैं कि महाकाव्यों में वर्णित घटनाक्रम का समय तीन हजार ईसापूर्व से लेकर आठ सौ ईसा पूर्व तक फैला हुआ है.
वैदिक युग से रामायण एवं महाभारतकाल तक आते-आते भारतीय जनसमाज में काफी परिवर्तन हो चुके थे. लोगों की जीवनशैली और मान्यताओं तक में बदलाव आया था. समाज पर राजनीति का असर बढ़ा था. उत्तरवैदिक काल में ही ब्राह्मणों का सामाजिक कार्यकलापों एवं राजनीति पर बढ़ा हुआ असर साफ दिखने लगा था. महाकाव्यकाल में वर्णव्यवस्था और भी जटिल होकर उभरी थी. वर्गीय स्वार्थों के कारण उन्होंने राजा को इस धरा पर ईश्वर का उत्तराधिकारी घोषित किया था. परिणामतः राज्याधिपति का जनजीवन पर हस्तक्षेप और उसकी महत्त्वाकांक्षाओं में वृद्धि हुई थी. वैदिक युग में राजा का आशय जहां कबीले के मुखिया से था, वहीं महाकाव्यों में राजा को पूरी धरती का स्वामी और पालक, भूपति तक स्वीकार किया था. जिससे सारी शक्तियां एक व्यक्ति के हाथों में सिमटती जा रही थीं. छोटे-छोटे राज्य बडॆ़ राज्यों में मिलते जा रहे थे. उनमें आपसी प्रतिद्विंद्वता एवं युद्ध होते रहते थे. किसी राज्य के क्षेत्रफल में बड़े होने में कोई बुराई नहीं थी. बुराई थी उसकी कुल शक्तियों के किसी एक व्यक्ति के हाथों में सिमट जाने में. इससे संसाधनों के केंद्रीकरण को भी इससे बढ़ावा मिला था. एक ओर जहां कर्मकांडों में लगातार वृद्धि हो रही थी. वहीं दूसरी ओर लोगों का भौतिकता के प्रति आग्रह भी बढ़ा था.
अपने आप में यह एक विसंगति थी, जिसके पीछे ठोस कारण थे. दरअसल समाज का वह वर्ग जो धर्म और अध्यात्म के नाम पर लोगों को प्रकटतः त्याग एवं संयम का उपदेश देता था, उसका अपना जीवन भोग एवं लिप्साओं से भरा हुआ था. उसकी कथनी और करनी बिलकुल अलग-अलग थीं. लोग यह जानने लगे थे कि कर्मकांडों की संरचना उन्हें भरमाए रखने, प्रमुख सामाजिक समस्याओं से उनका ध्यान हटाने के लिए की गई है. इस कारण धर्म एवं नैतिकता से भी उसका मोहभंग हुआ था. इस सबका परिणाम यह हुआ कि समाज के बड़े वर्ग को भौतिक सुख-सुविधाएं भाने लगी थीं. लोकायत दर्शन का उद्भव इसी युग की घटना है. डाॅ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे विद्वान ने भी महाकाव्यकाल पर भौतिकवाद के प्रभाव को स्वीकार किया है—
‘रामायण और महाभारत में वर्णित घटनाएं अधिकतर उस वैदिककाल की हैं, जबकि प्राचीन आर्य बड़ी संख्या में गंगा की उपात्यका में आकर बसे थे. कुछ लोग दिल्ली के आसपास, पांचाल लोग कन्नौज के समीप, कौशल लोग अवध् के समीप और काशी लोग बनारस में-किंतु ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, जो यह सिद्ध कर सके कि इन महाकाव्यों की रचना ईसा से छठी शताब्दी से पूर्व हुई हो. स्वयं वेदमंत्रों के क्रमबद्धता में आने का काल भी वही है, जिस समय आर्य लोग गंगा की उपात्यका में फैल रहे थे…रामायण में उन युद्धों का वर्णन है, जो आर्य लोगों एवं यहां के मूल निवासियों के मध्य हुए, जिन्होंने आर्य संस्कृति को अपना लिया. महाभारत उस समय का ग्रंथ है जब वैदिक ऋचाएं अपनी मौलिक शक्ति एवं अर्थ खो चुकी थीं और कर्मकांड प्रधान धर्म सर्वसाधारण को अधिक आकृष्ट करता था. जन्मपरक जाति को प्रधानता दी जाने लगी थी. इसलिए इन महाकाव्यों की रचना का समय ईसापूर्व छठी शताब्दी के लगभग कहीं रख सकते हैं. यद्यपि उनके अंदर ईसा के 200 वर्ष पश्चात तक परिवर्तन होते रहे और उस समय के महाकाव्य अपने अंतिम अर्थात वर्तमान रूप में आ गए.4
ध्यातव्य है कि महाकाव्यों में वर्णित घटनाओं का समय और उनका रचनाकाल दो अलग-अलग बाते हैं. रामायण एवं महाभारत की घटनाओं का समय निर्धारित है. लेकिन उनका लेखन किसी एक समय की घटना नहीं है. बल्कि वह विस्तृत कालखंड में फैला हुआ है. इन दोनों ही ग्रंथों को अपना वर्तमान स्वरूप प्राप्त करने में शताब्दियां लगी थीं. इसमें भी सचाई है कि इन दोनों पुस्तकों की रचना सामान्य कथानक के रूप में की गई थी. बाद में वर्णाश्रम धर्म की स्थापना के लिए उनमें अनेक घटनाएं-प्रसंग प्रक्षेपित किए गए. चूंकि उनका कथानक भारतीय पंरपरा एवं संस्कृति की अनेक मान्यताओं को प्रतिष्ठित करने का काम करता था, कुछ नई परंपराओं की स्थापना के साथ भारत की वर्णाश्रम धर्म की स्थापना भी करता था, इसी कारण का उसका गुणगान युगातीत महागाथा के रूप किया गया, उन्हें बार-बार सुनने-सुनाने का आग्रह किया जाने लगा. लोगों के मनोरंजन की भूख एवं उनकी अशिक्षा का लाभ वर्णाश्रम धर्म के समर्थकों-प्रचारकों को यह मिला कि इन ग्रंथों में वर्णित नायकों का देवताओं में शुमार होने लगा और प्रतिनायक भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के खलनायक मान लिए गए. देवताओं का नाम रटने से पुण्य और खलनायकों की स्मृति को भी पाप का भागी बना दिया गया. मानवी मेधा के ऐसे दुरुपयोग के उदाहरण अकेले भारत में ही नहीं हुआ, अपितु दुनिया-भर के यथास्थितिवादी धर्म और परंपरा के नाम पर ऐसा मखौल करते रहते हैं. वर्णाश्रम व्यवस्था के संकेत वेदों में भी हैं, किंतु महाकाव्यकाल में यह और भी परवान चढ़ती गई.
वैदिककाल में अर्थव्यवस्था का प्रमुख स्रोत पशुपालन था. किंतु महाकाव्यकाल तक आते-आते अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान बढ़ता चला गया, जिसके फलस्वरूप लोगों ने एक ही स्थान पर टिककर रहना सीखा. परिणामतः जीवन में स्थायित्व बढ़ा. इससे व्यापारिक गतिविधियों को भी संवरने का अवसर मिला. पशुपालक अर्थव्यवस्था में लोग सामान्यतः पशुओं का ही लेन-देन करते थे. उनकी बाकी आवश्यकताएं प्रकृति के साथ सहगमन करते समय स्वाभाविक रूप से पूरी हो जाती थीं. एक ही स्थान पर जमकर रहने से लोगों की आवश्यकताओं में इजाफा भी हुआ था. कृषि के लिए नए औजारों की जरूरत ने लुहार, बढ़ई जैसे शिल्पकारों को बढ़ावा देने का काम किया. सभ्यता के विकासक्रम में मोची, जुलाहे, रंगरेज जैसे दस्तकारों की मांग में भी वृद्धि हुई. कालांतर में व्यापारिक गतिविधियों का प्रसार और भी नए-नए क्षेत्रों तक होता चला गया. उत्पादन की प्रारंभिक अवस्था एकरैखिक थी. स्थानीय शिल्पकार अपने समाज के लोगों की आवश्यकताओं के अनुसार उत्पादन करते थे, जो उन तक सीधे पहुंचा दिया था.
कालांतर में कृषक वर्ग और शिल्पकारों के अलावा समाज में एक और वर्ग का उद्भव हुआ जो स्वयं उत्पादन से नहीं जुड़ा था. उसका कार्य उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच सेतु बनाने का था. उपभोक्ताओं की तलाश तथा उस तक माल पहुंचाने के लिए इस वर्ग ने शिल्पकारों के साथ मिलकर कई अनोखे प्रयास किए, चूंकि यह कार्य राज्य की समृद्धि से भी जुड़ा था अतः उसको स्थानीय शासन का समर्थन भी प्राप्त था. राज्यों के विस्तार से आवागमन सुरक्षित हुआ था, इससे आपसी व्यवहार एवं लेन-देन का परिक्षेत्र भी विकसित हुआ था. पहले जो व्यापार किसी एक क्षेत्र तक सीमित था, वह दूर-दराज के स्थानों तक फैलने लगा था. व्यापारियों के संगठन भी बनने लगे, जिनका सांगठनिक स्वरूप तथा व्यापार का क्षेत्र भिन्न-भिन्न था. इसी दौर में व्यापार के नए क्षेत्रों का पता लगाने का कार्य भी चलता रहा. राज्यों के समर्थन एवं उनके सहयोग के बिना भी सहयोगाधारित ये संगठन समाज में अपना स्थान बनाते जा रहे थे.
वैदिककाल की तरह महाकाव्यकाल में भी मनीषी वर्ग ज्ञान के अन्वेषण एवं परंपराओं की सुरक्षा में जुटा हुआ था. इस वर्ग का समाज में अभी भी सम्मान था. श्रेष्ठ विचारों को प्रत्येक शा से आने दो, आवश्यकता से अधिक धन का संचय पाप है, मनुष्य का धर्म संकटकाल में अपने पड़ोसी की मदद करना है, कामनारहित होकर कर्म करते जाना—ऐसी सद्कामनाएं वेदों और वेदोत्तर साहित्य में जगह-जगह बिखरी पड़ी हैं. ये सद्भावनाएँ केवल भारतीय धर्मग्रंथों में ही विद्यमान रही हों, ऐसा नहीं है. बल्कि हरेक परिवेश, प्रत्येक काल और हर धर्म में इन सद्विचारों की कमोवेश मौजूदगी रही है. हालाँकि शास्त्रों में जो सैद्धांतिक अवधारणा के रूप में मौजूद है, वही ज्यों का त्यों लोकप्रचलित भी हो, यह सदा नहीं होता और यह भी सत्य है कि चलन से बाहर होने पर सत्य की प्रामाणिकता संदिग्ध नहीं हो जाती. मूल्यपरकता प्रत्येक युग में सम्मानित रही है.
नैतिकता को प्रत्येक युग में मानवजीवन का अभीष्ट माना गया है. वेद से लेकर महाभारत काल तक आते-आते हालांकि समाज में काफी परिवर्तन आया था. साथ ही मनुष्य का अपने सिद्धांतों से विचलन भी हुआ था. धर्म और राजनीति, जो पहले नैतिकता को प्रश्रय देने, उसे और ऊंचा उठाने के लिए जाने जाते थे, वे अनुसरण और लिप्सा के जनक बन चुके थे. लेकिन समाज के एक हिस्से पर यदि जड़ता व्याप्त थी, यदि वहां पर लोग यथास्थितिवाद के पोषक-प्रवर्त्तक बनकर हरेक परिवर्तन को रोके रखना चाहते थे, तो व्यवहार एवं संगठन के स्तर पर समाज में ऐसा भी बहुत कुछ घट रहा था, जो रचनात्मक था और उम्मीद जगाता था. इसके संकेत कारीगरों, शिल्पकारों तथा छोट-छोटे व्यापारियों के उन संगठनों के द्वारा मिल रहे थे, जो अपने व्यापार के माध्यम से समाज को न केवल समृद्धि की ओर ले जा रहे थे, बल्कि भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं को देश की सीमाओं से बाहर तक फैला रहे थे. वे संगठन सामूहिक लाभ के लिए गठित किए जाते थे. किंतु उनकी सफलता इसमें थी कि जनसामान्य भी उन्हें अपने लिए लाभकारी समझें. इसलिए आम जनजीवन पर उनका प्रभाव भी होता था. उत्पादक और व्यापारिक संगठनों की उपस्थिति को शास्त्रीय मान्यता देने के लिए विशः की संकल्पना की गई थी. यह माना गया था कि अकेले ‘ब्रह्म’ और ‘क्षत्र’ से कार्य नहीं चल सकता. ब्रह्म अर्थात ब्राह्मण, धार्मिक नेतृत्वकर्ता, जो समाज में शिक्षण एवं कर्मकांड की जिम्मेदारी संभालता था. क्षत्र यानी क्षत्री, जिसके ऊपर समाज की आततायियों से सुरक्षा का दायित्व था. और ये विशः क्या थे? विशः के संबंध में बृहदारण्यक उपनिषद में उल्लिखित है कि—
‘न तो ब्रह्म द्वारा समस्त कार्यों की सिद्धि संभव है, न अकेला क्षत्र इस दायित्व को उठा सकता है. इसलिए विशः की उत्पत्ति की गई, जो गणों के रूप में संगठित होकर अपने-अपने दायित्व का निर्वाह करते हैं.’5
स्पष्ट है कि उत्तरवैदिक काल में समाज में आर्थिक गतिविधियां महत्त्वपूर्ण हो चुकी थीं. अब केवल कृषि और पशुपालन द्वारा काम चलना संभव नहीं रहा था. उपनिषदों में विशः को मिले महत्त्व का उल्लेख शंकराचार्य ने भी किया है. विशः की उत्पत्ति के संबंध में उन्होंने लिखा है कि—
‘धनार्जन न तो क्षत्रिय द्वारा संभव है, न ब्राह्मण का ही यह कर्तव्य कि वह वित्त उपार्जन पर ध्यान दे. तब? तब देवों ने वित्त के उपार्जन तथा तत्संबंधी अन्य कार्यों को साधने हेतु ‘विश’ को उत्पन्न किया. विशः गण का ही पर्याय हैं, क्योंकि ये संहत (संगठन बनाकर) वित्त-उपार्जन में समर्थ होते हैं, अकेले-अकेले नहीं. इसलिए इनमें गणों की सत्ता निहित होती है.6
प्रारंभ में प्रायः सभी व्यापारिक समूह लगभग एक ही जैसे थे. एक व्यापारिक समूह कई प्रकार के व्यवसाय एक साथ कर सकता था. विकास की प्रारंभिक स्थिति में यह कार्य सरल था और संभव भी. लेकिन जैसे-जैसे व्यापार बढ़ता गया, किसी अकेले समूह द्वारा सभी क्षेत्रों में दक्षता बनाए रखना, अपने ग्राहकों को संतुष्ट रख पाना, असंभव होने लगा था. व्यापारिक सफलता के लिए किसी एक क्षेत्र में पूर्णतः दक्षता प्राप्त कर लेना आवश्यक मान लिया गया. आचार्य चाणक्य, बृहश्पति, शुक्राचार्य आदि मनीषियों ने अर्थशास्त्रीय नियमों की संरचना कर व्यापारिक समूहों को संहिताबद्ध करने का कार्य किया, जिससे उन्हें सामाजिक मान्यता भी मिलने लगी. समूहों द्वारा किए जा रहे कार्य के आधार पर उनका वर्गीकरण भी किया जाने लगा. संगठनों के कार्य तथा उनकी पहुंच के आधार पर उनका नामकरण होने लगा.
भारत के प्राचीन आर्थिक संगठनों की विशेषताओं और उनकी महत्ता को व्यक्त करने के लिए उन्हें कई नामों से पुकारा जाता है. उन सब में श्रेणी बहुप्रचलित एवं बहुस्वीकार्य नाम है. प्राचीन भारत में दायित्वों का विभाजन वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार होता रहा है. लेकिन ‘श्रेणी’ इस मायने में किंचित भिन्न थी. दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि ‘श्रेणी’ की संज्ञा प्राप्त आर्थिक समूह सामान्य हितों के लिए बहुमान्य वर्णाश्रम व्यवस्था की उपेक्षा तक कर सकते थे— आर्थिक संगठन के रूप में ‘श्रेणी’ की तुलना मध्यकालीन यूरोपीय देशों में कार्यरत उसके समानधर्मा आर्थिक संगठन ‘गिल्ड’ से की जा सकती है. दोनों में किंचित समानताएं भी हैं. जैसे दोनों ही का गठन सामूहिक कल्याण की भावना के साथ किया जाता था. दोनों ही के लिए अपने समूह के आर्थिक हित महत्त्वपूर्ण होते थे. सामूहिक नियंत्रण की व्यवस्था भी दोनों में लगभग एक जैसी ही थी. दोनों प्रकार के संगठनों में अनुशासन एवं व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सर्वसम्मति से नियम बनाए गए थे, जिनका पालन पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी के साथ किया जाता था. बावजूद इसके गिल्ड की अपेक्षा श्रेणी का स्तर कहीं अधिक व्यापक एवं वैविध्यपूर्ण था. एक और मुख्य अंतर इन दोनों में यह है कि यूरोपीय देशों में गिल्ड की प्राचीनतम मौजूदगी के संकेत पूर्वमध्यकाल में 1100 वीं शताब्दी में मिलते हैं, जबकि भारत में सहयोगाधारित आर्थिक संगठनों के संकेत वैदिक वांङमय में भी मिलते हैं. सहकारी समिति/संस्थाओं के समानधर्मा संगठन श्रेणी का इतिहास भी कम से कम ईसा से भी छह सौ वर्ष पुराना है. श्रेणी का कार्यव्यापार भी विस्तृत था. हालांकि श्रेणी से यह अपेक्षित था कि वह किसी एक व्यवसाय में रहकर अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करे. तथापि यह उसकी अनिवार्यता नहीं बन पाई थी. प्रख्यात विद्वान रमेशचंद्र मजुमदार अपनी पुस्तक Corporate Life In Ancient India में बुनकरों की एक ऐसी श्रेणी का उल्लेख करते हैं, जो व्यापार के सिलसिले में एक नगर से दूसरे नगर की सतत यात्रा करती रहती थी और जिसके कुछ सदस्य धनुर्विद्या, ज्योतिष, मल्लयुद्ध तथा धार्मिक प्रचार-प्रसार का दायित्व भी संभालते थे. उन्हीं के हवाले से विक्रमादित्य खन्ना लिखते हैं—
‘श्रेणी के लिए किसी एक व्यवसाय से जुड़े रहना आवश्यक नहीं था. उसके सदस्य अपनी क्षमता एवं रुचि के अनुसार विभिन्न कार्यों (धनुर्विद्या, ज्योतिष, मल्लयुद्ध आदि) को अपना सकते थे…यही नहीं राजनीतिक गतिविधियों तथा नागरिक सुविधाएं प्रदान करने के लिए भी श्रेणी की मदद ली जाती थी.’7
उल्लेखनीय है कि उस युग में सामाजिकता की भावना बहुत प्रगाढ़ थी. इसके कारण भी थे. उस समय समूचा समाज अन्योन्याश्रित था. शनैः-शनैः पतनशील वर्ण-व्यवस्था जातिवादी स्वरूप ग्रहण करती जा रही थी. इस कारण समाज के बीच ऊंच-नीच का भेद और आर्थिक आधार पर स्तरीकरण भी था. ऊंच-नीच की भावना ने समाज में आंतरिक संघर्षों को जन्म दिया था. बावजूद इसके अधिकांश लोग यह समझ चुके थे कि एक सीमा के बाद शासित वर्ग की नजरों में वे सभी बराबर हैं…कि वह उन लोगों को जाति-वर्ग के मसलों में भटकाए रखकर सत्ता का असली आनंद उठाता है…कि ग्राम्यः जीवन की अभावमयी स्थितियों का सामना उन सभी को कमोवेश बराबर, साथ-साथ सहन करना पड़ता है. उच्च वर्ग को महज यह तसल्ली रहती थी कि वह वह सत्ता वर्ग के अपेक्षाकृत अधिक निकट है, कि उसको शासकवर्ग का करीबी होने का सम्मान प्राप्त है. जबकि स्तरीकरण के निचले स्तर पर शारीरिक एवं मानसिक शोषण के शिकार लोगों की मनःस्थिति विद्रोहात्मक होती है. इस विद्रोह को दबाए रखने, आक्रोश के शमन के लिए समाज में संगठन और सहयोग पर जोर दिया जाता था. इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए डाॅ. सत्यकेतु विद्यालंकार लिखते हैं—
‘उत्तर वैदिक युग में ही विभिन्न शिल्पियों का अनुसरण करने वाले, सर्वसाधारण जनता के व्यक्ति, अपने संगठन बनाकर आर्थिक उत्पादन में तत्पर हो गए थे. यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि शिल्पियों के लिए पूर्णतः स्वच्छंद होकर कार्य कर सकना संभव नही था. परस्पर संगठित होकर ही वे अपने कार्य को सुचारू रूप में संपादित कर सकते थे.’7
समाज की सत्ता उसकी प्रत्येक इकाई से विनिर्मित थी. यद्यपि समाज का चातुवण्र्य विभाजन जिसकी शुरुआत वैदिक काल में ही हो चुकी थी, निरंतर मजबूत हुआ था, अथर्ववेद में इस बात के पर्याप्त संकेत मिलते हैं कि उस काल तक ब्राह्मणों का लालच बढ़ चुका था. निहित स्वार्थों के लिए वे कर्मकांड को केंद्र में रखकर सत्ता पर नियंत्रण बनाए हुए थे. वर्णाश्रम व्यवस्था का लाभ समाज के शीर्षस्थ वर्गों के हाथों तक सिमटता जा रहा था. दार्शनिक चिंतन, क्षुद्र बहसों और तंत्र-मंत्र संबंधी पोंगा-पंथी अवधारणाओं तक सीमित हो चुका था. परंपराओं और सामाजिक नियमों की स्वार्थानुकूल व्याख्या की जा रही थी. अपने लक्ष्य में उन्हें सफलता भी मिल रही थी. उन्हीं की प्रेरणास्वरूप समाज में शासक वर्ग का उदय हो रहा था, जिससे अधिकार एवं संसाधन सीमित हाथों में कैद होते जा रहे थे. प्रकट में तो सब यही स्वीकार करते थे कि समाज को गतिमान बनाए रखने के लिए उसके सभी वर्गों का पूरा सहयोग, प्रयासों में उन सभी की समान और सक्रिय साझेदारी आवश्यक है—किसी बड़ी मशीन के छोटे-छोटे पुर्जों की भांति, जिनके बिना वह कार्य करने में अक्षम सिद्ध होती है. परंतु उनके सभी आचरण स्वार्थ-भावना से प्रेरित तथा कहीं-कहीं तो नैतिकता को लांक्षित करने वाले थे.
परिणामस्वरूप समाज का एक वर्ग इन कर्मकांडों और छिछली धार्मिक व्याख्याओं के चंगुल में फंसकर और अधिक रूढ़िवादी और वौद्धिकरूप से जड़ बनता जा रहा था, वहीं दूसरा वर्ग उनकी असलियत को पहचानकर उनसे या तो दूर भाग रहा था, अथवा धार्मिक विवादों से परे रहकर व्यापार और उद्यमशीलता के माध्यम से अपने विकास के प्रति समर्पित था. स्पष्ट है कि उनमें एक बड़ा वर्ग शिल्पियों और कारीगरों का था. अपने अनूठे श्रम-कौशल एवं श्रम-भावना के कारण यह वर्ग समाज में निरंतर प्रतिष्ठा भी पा रहा था. ऐसे में जब इस वर्ग द्वारा संगठन बनाकर बड़े स्तर पर व्यापार प्रारंभ किया गया तो समाज में उसको स्वतंत्र पहचान मिलना अवश्यंभावी था ही.
महाकाव्यों यानी महाभारत और रामायण दोनों में भी व्यावसायिक संगठनों/निगमों की सार्थक उपस्थिति का उल्लेख मिलता है. राम अपने वनवास की अवधि पूरी होने के पश्चात जब अयोध्या लौटते हैं तो उनके स्वागत के लिए अन्य प्रजाजनों के साथ श्रेणि-प्रमुख भी मौजूद रहते हैं. महाभारत के शांतिपर्व मंे श्रेणि-प्रमुखों का उल्लेख करते हुए राजा को सावधान रहने के लिए कहा गया है कि वह उन्हें शत्रुओं द्वारा भेदनीति से बचाए रखे. महाभारत में वनपर्व की एक और लोकप्रचलित कथा बताती है कि गंधर्वों से पराजित दुर्योधन यह सोचकर खिन्न है कि हस्तिनापुर लौटने पर श्रेणि-प्रमुख उसको अवश्य ही उलाहना देंगे. उस समय क्या वह उनका प्रतिकार कर पाने में सफल होगा. यदि नहीं कर सका तो प्रजा पर उनका कैसा प्रभाव पड़ेगा. यह हमें तत्कालीन राजसत्ता पर व्यापार संघों के प्रभाव एवं उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा से परिचित कराता है.

जैन एवं बौद्ध धर्म का उद्भव

भारतीय इतिहास के संदर्भ में सातवीं शताब्दी का कालखंड अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. बिना इस शताब्दी के उल्लेख न तो भारत की धार्मिक, आध्यामिक तथा तात्विक चेतना के उद्भव की व्याख्या संभव है, न ही भौतिक एवं राजनीतिक समृद्धि का इतिहास लिखा जा सकता है. इसी शताब्दी में भारत के दो प्रमुख धर्मों, जैन एवं बौद्ध का उदय हुआ था. हालांकि इन दोनों ही धर्मों का उद्भव प्राचीन परंपरागत वैदिक धर्म में कर्मकांड के बढ़ते अतिरेक एवं समाज पर एक ही वर्ग के बढ़ते वर्चस्व के प्रतिक्रियास्वरूप हुआ था, किंतु बहुत शीघ्र दोनों धर्म समाज पर अपनी पकड़ बनाने में कामयाब हो गए. दोनों की स्थापना जीवन के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण के साथ हुई थी. इसलिए इनमें जीवन और समाज को लेकर एक सकारात्मक दृष्टि थी. विशेषकर बौद्धधर्म तो व्यावहारिकता के स्तर पर इतना लचीला था कि इसके आलोचकों ने इसे भौतिकतावादी धर्म ही कह डाला. स्थिति चाहे जो भी हो, दोनों धर्म समाज और जीवन को लेकर आमजन की मान्यताओं के एकदम करीब थे. उपभोग को लेकर भी बौद्धधर्म में वैसे निषेध नहीं थे, जैसे कि उसके पूर्ववर्ती वैदिक धर्म में. इसलिए शिल्पकारों तथा व्यापारकर्म के सहारे जीविका चलाने वाली जातियां बौद्धधर्म की ओर आकर्षित होती चली गईं.
बौद्ध एवं जैन दोनों ही धर्मों में जातिप्रथा या वर्णव्यवस्था को कोई स्थान प्राप्त नहीं था. इसलिए इन धर्मों की ओर वे लोग भी आकर्षित हुए जो परंपरागत हिंदू धर्म में जातीय स्तरीकरण या वर्णविभाजन के कारण स्वयं को उत्पीड़ित-उपेक्षित अनुभव करते आ रहे थे. इससे विभिन्न क्षेत्र नई प्रतिभाओं के आगमन के लिए खुल गए. मनुष्य ने लोहे का उपयोग करना सीखा, निर्माण एवं उद्योगों के विकास के लिए नवीनतम मशीनों एवं उपकरणों की खोज हुई. आवागमन सुगम हुआ, फलस्वरूप नागरीकरण को गति मिली. व्यापारिक विनिमय को सरल बनाने के लिए धातु के सिक्कों का चलन हुआ, जिससे व्यापार के नए क्षेत्रों का उदय हुआ. उद्योगों के साथ कृषिक्षेत्र पर भी लोहे के आविष्कार का प्रभाव पड़ा. हल में लोहे की फाल के उपयोग ने कृषिकर्म को आसान बना दिया. इससे कृषिजोतों का विस्तार हुआ, उपज बढ़ी और समृद्धि को नए आयाम मिले.
व्यावसायिक प्रगति के चलते किसी एक व्यक्ति के लिए पूरे व्यवसाय पर नियंत्रण रखना कठिन होने लगा था. मुख्य उद्योग एवं व्यवसाय हालांकि अभी भी नगरों एवं कस्बों तक सिमटे हुए थे, किंतु उनपर उनपर सामूहिक नियंत्रण की प्रवृत्ति बढ़ने लगी थी. एक और विशिष्ट प्रगति इस दौर में देखने को मिली वह थी, उद्योगों, व्यवसायों में लाभ-हानि के परिकलन के लिए दक्ष लेखाकारों की भर्ती एवं लेखा-बही का उपयोग. दक्ष लेखाकारों के उपयोग से लाभ-हानि की परिगणना आसान थी, इससे उद्योगों में पूंजी का वर्चस्व बढ़ने लगा. इससे पहले तक उत्पादक स्वयं ही विपणन की जिम्मेदारी संभालता था, वही उद्यम का स्वामी भी होता था. लेकिन लेखा-बही के प्रयोग ने केवल पूंजी के दम पर उद्यम-स्वामी बनने का रास्ता आसान कर दिया था. इससे जहां व्यापार को व्यवस्थित करना आसान हुआ, वहीं शोषण को भी बढ़ावा मिला क्योंकि समाज का एक वर्ग वर्णव्यवस्था के बंधनों के कारण शिक्षा से दूर रखा गया था. बाद में लिखित परंपरा का हवाला देते हुए इस वर्ग को दबाए रखने के लिए नए कानून बनाए जाने लगे. जिसके आधार पर पुराणों की रचना हुई. और पुराणों को प्रामाण्य बनाए रखने के लिए वेद, महाकाव्य सहित सभी प्राचीन ग्रंथों में संशोधन किए जाने लगे.
प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था तथा राजनीति को जानने के लिए कौटिल्य कृत ‘अर्थशास्त्र’ को एक मानक ग्रंथ की मान्यता मिली हुई है. ईसा से चार सौ वर्ष पुरानी इस रचना में उस समय के समाज तथा आर्थिक-राजनीतिक सरंचनाओं के बारे में प्रामाणिक जानकारी हमें प्राप्त होती है. अर्थशास्त्र में नगरों को बसाने की आदर्श योजना का जो विवरण प्राप्त होता है उसमें गणों तथा श्रेणी के सदस्य शिल्पकारों को बसाने के लिए एक स्थान आरक्षित किए जाने की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है. श्रेणियां राज्य को करों का भुगतान करती थीं, जो राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था. श्रेणियों के राज्य पर प्रभाव का अनुमान इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि बौद्धकाल में राजदरबार में एक नए पद ‘भंडागारिका’ का सृजन किया गया था, जिस पद पर श्रेणी के मामलों के विशेषज्ञ को नियुक्त किया जाता था. भंडागारिका का दायित्व श्रेणियों के बीच होने वाले विवादों का निपटान करना था. उन दिनों कुल अठारह प्रकार की श्रेणियां होने का उल्लेख भी आचार्य चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में किया है, जो उस समय के जनजीवन में श्रेणियों के महत्त्व तथा उनकी व्यापक पहुंच की ओर इशारा करता है. कुछ श्रेणियों की आंतरिक व्यवस्था आधुनिक सहकारी समितियों के समान थी. उन्हें ‘समुत्तचरः’ कहा जाता था. ये श्रेणियां न केवल उद्योगों और व्यवसाय की देखरेख तथा नियंत्रण करने का काम करती थीं, बल्कि जनकल्याण के मामलों में उनका दखल था. जनता एवं स्थानीय प्रशासन पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए वे जनसरोकारों से युक्त कार्यक्रमों को वरीयता देती थीं. आवश्यकता पड़ने पर ये श्रेणियां राज्य को आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराती थीं. कई बार राज्य भी अपने उत्तरदायित्वों के निर्वहन के लिए श्रेणियों की मदद लेता था. तत्कालीन ग्रंथों में इस प्रकार के उल्लेख कई स्थानों पर आए हैं.
ईसा से पांचवी शताब्दी पहले के गं्रथ गौतम धर्मसूत्र के अनुसार—
‘किसानों, व्यापारियों, साहूकारों, शिल्पकारों, तकनीकी विशेषज्ञों यहां तक कि पशु चराने वाले गड़हरियों की भी अपनी अलग श्रेणी थी, जिनके माध्यम से वह अपने वर्ग के हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कानून बना सकते थे. उनके वर्ग के कल्याण से संबंधित किसी प्रकार की समस्या अथवा प्रस्तावित योजना को लेकर सम्राट अथवा राज्य के प्रतिनिधि उन्हीं श्रेणियों से विचार-विमर्श करते थे.’8
एक जातक कथा के अनुसार बौद्धकाल में कम से कम अठारह प्रकार की श्रेणियां कार्यरत थीं. यह भी उल्लेखनीय है कि बौद्धधर्म को राजधर्म के रूप में अपनाए जाने के बावजूद जातिप्रथा का पूरी तरह से लोप नहीं हो पाया था. एक अन्य जातक कथा में उल्लेख किया गया है कि परिवार का बड़ा पुत्र प्रायः अपने पिता के शिल्प को अपना लेता था, जिससे तकनीकी रूप से दक्ष शिल्पकारों की समस्या का समाधान हो जाता था. श्रेणियों को सम्मान और प्रतिष्ठा की दृष्टि से देखा जाता था. इसलिए लोगों में अपनी पहचान कायम करने के लिए अपने नाम के साथ अपनी श्रेणी या व्यवसाय का नाम जोड़ लेने का चलन था.
श्रेणी के व्यवसाय को पैत्रिकता अथवा परंपरा के नाम पर अपनाए जाने की प्रथा भारत की श्रेणियों को शेष विश्व की श्रेणियों से अलग सिद्ध करती थी. यह विशेषता दुनिया के किसी ओर गिल्ड सिस्टम में देखने को नहीं मिलती. भारत के प्राचीन ग्रंथों में श्रेणियों की पहुंच, उनकी प्रकृति तथा विशेषताओं के बारे में जगह-जगह उल्लेख किया गया है. कहीं पर उनसे राजा को सावधान रहने का उल्लेख है तो कई स्थानों पर राजा को यह निर्देश भी दिया गया है कि वह श्रेणियों की पहुंच का लाभ उठाकर, राज्य के हित में उनके विकास के लिए सभी जरूरी उपाय करे. महाभारत में एक स्थान पर उल्लेख किया गया है कि राजा श्रेणी-प्रमुखों पर नजर रखे और उनमें शत्रुओं द्वारा भेदनीति का उपयोग न करने दे.9 इसी प्रकार एक अन्यंत्र स्थल पर श्रेणी-प्रमुखों के उपजाप अर्थात भेदनीतिपूर्ण षड्यंत्रों से अपने अमात्यों की रक्षा के सभी जरूरी उपाय करने का उपदेश दिया है.10 स्पष्ट है कि समाज में श्रेणियों की भूमिका इतनी बढ़ चुकी थी कि किसी भी स्तर पर उनकी उपेक्षा कर पाना संभव नहीं था.
‘व्यापारिक संगठनों/श्रेणियों के गठन की शुरुआत बौद्धकाल के प्रारंभिक वर्षों में ही हो चुकी थी. उस समय की स्थापत्य कला तथा अन्य ऐतिहासिक दस्तावेज में इस बात के पर्याप्त संकेत मौजूद हैं कि उन दिनों के नगरों में विभिन्न प्रकार के व्यापारियों को उनके व्यवसाय के आधर पर अलग-अलग बसाने की प्रथा थी. कच्चेमाल की उपलब्धता के आधार पर विभिन्न शिल्पकारों के पृथक गांव बसाए जाते थे. किसी भी क्षेत्र में श्रेणी अथवा गिल्ड की स्थापना के लिए तीन प्रमुख विशेषताओं पर ध्यान देना आवश्यक था. पहला कच्चेमाल की उपलब्धता के अनुसार उद्योगों का विकेंद्रीकरण, दूसरा ज्ञान तथा तकनीकी कौशल का परंपरा के आधार पर पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण तथा तीसरा श्रेणी के स्वामी अथवा मुख्य संगठक ‘जेट्टका’ की विचारदृष्टि, जिसके आधार पर श्रेणी की कार्यशैली तय होती थी. मौर्यकाल में श्रेणियों को व्यापक समर्थन मिलने से उनकी लोकप्रियता निरंतर बढ़ती जा रही थी. श्रेणियों की लोकप्रियता का दूसरा बड़ा कारण स्पर्धा की भावना थी. प्रयोगों द्वारा यह देखा गया था कि आर्थिक दृष्टि से भी अकेले व्यक्ति की कार्यक्षमता की अपेक्षा समूह के साथ उसकी कार्यक्षमता अधिक प्रभावी और लाभदायक होती है. इस प्रकार सहकार को बढ़ावा मिला. जिसके अनुसार किसी सदस्य को जब भी आवश्यकता हो, वह दूसरों की मदद ले सकता था.11
किसी भी श्रेणी में ज्येष्ठक अथवा श्रेष्ठिन् का पद बड़ा ही महत्त्वपूर्ण होता था. जातक कथाओं में कम्मारजेट्ठक, मालाकारजेट्ठक आदि शब्द बहुतायत प्रयुक्त हुए हैं. जिनसे इनकी सत्ता स्पष्ट हो जाती है. किसी एक जेट्ठक के अधीन शिल्पियों की संख्या निर्धारित नहीं थी. समुद्द वणिज जातक में नर्तकियों के एक गांव का उल्लेख है जिसमें उनके एक हजार परिवार निवास करते थे. जातक के अनुसार गांव में दो जेट्ठक थे, उनमें से प्रत्येक के अधीन पांच सौ नर्तक परिवार थे. श्रेणी की परिकल्पना से लेकर उसकी कार्यपद्धति तय करने तक का काम श्रेष्ठिन् अथवा जेट्ठक का ही होता था. कई स्थान पर उसे स्वामी के संबोधन का भी रिवाज रहा है. उसका कार्य भंडार के हिसाब-किताब से लेकर लेखा-बही की देखभाल करने तक विस्तृत था. भंडार की देखभाल करने वाले के कारण उसे ‘भंडारी’ अथवा ‘भंडारक’ भी कहा जाता था. प्रत्येक श्रेणी के व्यवसाय, कार्यक्षमता, सदस्यों की संख्या तथा पूंजी के आदान-प्रदान से संबंधित सभी आवश्यक सूचनाएं, परंपराएं और रीति-रिवाज यहां तक कि उसका इतिहास भी साफतौर पर उल्लिखित किया जाता था. साफ है कि समाज में जेट्ठकों अथवा श्रेष्ठ्नि की व्यापक प्रतिष्ठा थी. राजदरबार में उनका सम्मान था. सूचिजातक में लिखा है कि—
‘एक सौ कम्मारों का जेट्ठक राजदरबार में बहुत सम्मानित था. वह बहुत समृद्ध एवं ऐश्वर्यशाली भी था. अन्यत्र एक जातक में यह लिखा है कि एक राजा ने कम्मारजेट्ठक को अपने पास बुलाया, और उसको सुवर्ण की एक प्रतिमा बनाने का कार्य दिया.12
उपर्युक्त उद्धणों से साफ है कि  प्रागैतिहासिक भारत में व्यवसायी समूह उसी प्रकार संगठित थे, जैसे कि यूरोपीय व्यापारी गिल्ड के रूप में. लेकिन भारतीय समूह का आचरण अपने समकालीन गिल्डों की अपेक्षा कहीं अधिक लोकतांत्रिक था.
© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका :

1.  Thus, one would expect the corporate form’s development to be more likely when the demand for production and trade is increasing and when methodologies for monitoring the behavior of owners and managers by creditors and by other owners are present. Such situations enhance the value of organizational forms and also help to contain their costs, such as their agency and creditor information costs. Of course, there are other factors that are also important to the development of the corporate form (e.g., property and contract law). Dr. Vikramaditya Khanna in The Economic History of the Corporate Form in Ancient India.

2. ’…that division of labour under the varna system may have been conducive to the emergence of guild organization. Agriculture, animal husbandry and trade, the three occupations of the Vaisyas, in course of time developed as separate groups.- Thaplyal, Kiran Kumar in Guilds in Ancient India.
3.  The relative peace in the region makes travel safer for traders and opens up new markets for trade. The uniformity of weights and measures, uncommon at that time in world history, benefits trade by reducing the transactions costs of engaging in trade. The localization of craft and industry to certain parts of the city might enhance group cohesion, make training of new recruits/employees somewhat easier, and increase productivity. In light of all these factors, trade was active, substantial and growing which suggests the demand for collective efforts – to protect traders traveling long distances, to engage in larger scale production and so forth – was large and probably rising. This often enhances the demand for organizational forms.- Dr. Vikramaditya Khanna.
4. भारतीय दर्शन- डा॓. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, राजकमल प्रकाशन, हिंदी अनुवाद: नंदकिशोर गोभिल, प्रष्ठ-219.
5. स नैव व्यंभवत्, स विशमसृजत, यान्येतानि देवजातानि गणशः आख्यान्ते. – बृहदारण्यक-1/4/12
6.  क्षात्रसृष्टोऽपि स नैव व्यभवत् कर्मणे ब्रह्म तथा न व्यभवत् वित्तोपार्जयितुरभावात्। स विशमसृजत् कर्मसाधनवित्तोपार्जनाय। कः पुनरसौ विट? यान्येतानि देवजातानि ….गणशः गणं गणं आख्यान्यन्ते कथ्यन्ते गणप्राया हि विशः। प्रायेन संहता हि वित्तोपार्जनसमर्थाः नैकैकशः. – शंकराचार्य.
7. …a sreni need not be dedicated to a single profession and members could practice different trades – indeed, there is an example of a silk weaving sreni where some members practiced. other professions as well (e.g., archery, astrology)…Moreover, the sreni was used in municipal and political activity as well as economic activity. – Vikramaditya Khanna.
8.  The Gautama Dharmasutra (c. 5th century BC) states that “cultivators, traders, herdsmen, moneylenders, and artisans have authority to lay down rules for their respective classes and the king was to consult their representatives while dealing with matters relating to them.- By Manikant Shah & D.P. Agrawal in Sreni (Guilds): a Unique Social Innovation of Ancient India.
9.   अग्निदैर्ग़दैश्चैव प्रतिरूपककारकैः।
श्रेणिमुख्योपाजापेन वीरुधश्छेदनेन चः।। महा. शांतिपर्व-158/52.
10.  श्रेणिमुख्योपजापेषु वल्लभानुनयेषु च।
अमात्यान् परिरक्षेत भेदसंघातयोरपि।। महा. शांतिपर्व-104/64.
11.  The ancient sources frequently refer to the system of guilds which began in the early Buddhist period and continued through the Mauryan period. ….Topography aided their development, in as much as particular areas of a city were generally inhabited by all tradesmen of a certain craft. Tradesmen’s villages were also known, where one particular craft was centred, largely due to the easy availability of raw material. The three chief requisites necessary for the rise of a guild system were in existence. Firstly, the localization of occupation was possible, secondly the hereditary character of professions was recognized, and lastly the idea of a guild leader or jetthaka was a widely accepted one. The extension of trade in the Mauryan period must have helped considerably in developing and stabilizing the guilds, which at first were an intermediate step between a tribe and a caste. In later years they were dominated by strict rules, which resulted in some of them gradually becoming castes. Another early incentive to forming guilds must have been competition. Economically it was better to work in a body than to work individually, as a corporation would provide added social status, and when necessary, assistance could be sought from other members.- Thapar, Romila. Asoka and the Decline of the Mauryas, Delhi: Oxford. P. 73.
12.  डा॓. सत्यकेतु विद्यालंकार, प्राचीन भारत की शासन-संस्थाएं तथा राजनीतिक विचार, पृष्ठ-264.

August 15, 2009

बहुजन राजनीति और अस्मिता

करीब ढाई साल पहले उत्तरप्रदेश में बसपा की जीत ने दलितों समेत कई लोगों को यह भ्रम बनाए रखने का अवसर दिया था कि ब्राह्मणों तथा अन्य सवर्णों को मायावती का नेतृत्व स्वीकार है. वे मान चुके थे कि करीब सवा सौ साल पहले उत्पीड़ित समुदाय के सम्मान एवं समानता के लिए जो आंदोलन ज्योतिबा फुले ने प्रारंभ किया था, जिसे बाद में डा॓. आंबेडकर, पेरियार जैसे महामानवों ने आगे बढ़ाने तथा कामयाबी तक पहुंचाने कार्य किया; और कांशीराम ने जिसे राजनीतिक शक्ति रूप में बदलने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी, वह मुलायम की हार तथा मायावती की एकक्षत्र विजय के साथ अपनी कामयाबी के शिखर तक जा पहुंचा है. दलित-ब्राह्मण गठजोड़ द्वारा सत्ता में मिली हिस्सेदारी से ब्राह्मण भी इस बात से प्रसन्न हो रहे थे कि येन-केन-प्रकारेण सत्ता की चाबी उन्हीं के हाथों में है. उनके लिए निर्णायक स्थिति में बने रहना, अपने सम्मान को बचाए रखना ही आपदधर्म है, जिसकी रक्षा उनके पूर्वज विश्वामित्र ने व्याध के घर मांस खाकर भी की थी. कुछ लोग मुलायम सिंह और उनके यादववाद की हार को मायावती के निजी पराक्रम की जीत मानकर प्रसन्न थे. जबकि कुछ इसे नए युग की शुरुआत के रूप में देख रहे थे. कुछ अनमन्यस्क भाव से परिवर्तनों के साक्षी बने थे.
कम ही सही परंतु कुछ लोग ऐसे भी थे, जो जानते थे कि दलित-ब्राह्मण राजनीति वास्तव में एक अतिअवसरवादी गठजोड़ है. एक ऐसी बेमेल खिचड़ी है, जिसके घटकों को कुछ दिन बाद ही अलग-अलग दिखने लगना है. उनके निहित स्वार्थ उन्हें लंबे समय तक एक रहने ही नहीं देंगे. वे लोग इसे दलित राजनीति के भटकाव और परिवर्तनकारी शक्तियों के एक वर्ग के पराभव के रूप में देख रहे थे. वे समझते थे कि इस जीत में दलितों के हाथ लगना कम, खिसकना कहीं ज्यादा है. वह इसलिए कि बसपा की राजनीति सामाजिक न्याय की राह में एक लंबे और प्रतिबद्ध आंदोलन का सुफल रही थी. ऐसे लोगों का विश्वास था कि दलित-ब्राह्मण गठजोड़ अस्वाभाविक है, जो प्रकारांतर में उत्पीड़ितों, वंचितों के स्वाभिमान के लिए चलाए जा रहे अभियान के लिए वाटरलू सिद्ध होगा. ब्राह्मणों के कंधे पर सवार होकर मायावती की ताजपोशी अंततः दलितों को ही भारी पड़ने वाली है. यह मानकर वे दुःखी और भीतर ही भीतर आहत हो रहे थे.
यह बात अलग है कि उनकी पीड़ा के बारे में जानने-सुनने की किसी को न तो फुर्सत थी, न अवसर. मीडिया तो षड्यंत्रकारी ढंग से उस जीत को युगपरिवर्तनकारी घटना के रूप में बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा था. दलित मतों के सहारे केवल कुर्सी की राजनीति करने वाली मायावती अपनी जीत पर गद्गद थीं. लगभग दलितों जितने ही जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे अतिपिछड़े वर्ग की अपेक्षा ब्राह्मणों को दलितों का स्वभाविक सहयोगी मानने वाले चंद्रभान प्रसाद जैसे बसपा के सलाहकार और तथाकथित दलित चिंतक भी अपने विचारों को साकार होते देख प्रसन्न थे. गठजोड़ के स्थायित्व को मन में भले ही हजार शंकाएं सही, मगर उस समय वे अपनी खुशी में जरा-भी कमी आने देने या संभलने के लिए तैयार नहीं थे. अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि लंबे संघर्ष में तपकर राजनीति में अपना स्थान सुरक्षित करने वाली मायावती को इन बातों का अंदेशा ही न हो. हां चुप्पी साधे रहना उनकी तात्कालिक विवशता, या फिर सत्ता के लिए किए गए समझौते का परिणाम अवश्य हो सकती है. वे जरूर समझती होंगी कि किसी ब्राह्मण के लिए दलितों के साथ राजनीतिक गठबंधन में आना जितना आसान है, उसका अपने ब्राह्मणत्व से मुक्त होना उतना ही कठिन है. शपथग्रहण के दिन मुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष मायावती के बजाए पीछे बैठे सतीशचंद्र मिश्र के पांव छूने वाले ब्राह्मण विधायकों ने साफ कर दिया था कि वे अब भी ब्राह्मणत्व की मर्यादा में हैं. दलित मायावती के नेतृत्व को स्वीकारना न तो उनका कायाकल्प था, न इस बात का प्रतीक कि उनका ब्राह्मणत्व नख-दंत विहीन हो चुका है. मायावती यदि राजनीतिक सत्ता पर काबिज होकर दलित सम्मान की रक्षा करना चाहती हैं, तो उनका लक्ष्य भी राजनीति के जरिए अपने वर्गीय हितों को पूरा करना है. उसी को अब तक साधते आए हैं, वही आगे साधते रहेंगे. यह उन्हांेने पिछले लोकसभा चुनावों में दिखा भी दिया, जब ब्राह्मण मतों का बड़ा हिस्सा कांग्रेस की ओर खिसकता हुआ नजर आया.
ध्यातव्य है कि बसपा के बैनर तले जीतकर आए अधिकांश विधायक राजनीति के लिए अपेक्षाकृत नए और अनजाने चेहरे हैं. जिनके लिए दूसरी किसी पार्टी से टिकट पर जीतकर आना कठिन था. बसपा के प्रतिबद्ध दलित वोटों के सहारे उन्होंने चुनाव की वैतरिणी पार की है. इसके अलावा उन्हें मुलायम सिंह यादव से खिन्न अतिपिछड़े वर्ग का भी वोट भी मिला, जिससे जीत उनकी झोली में आ गिरी. विधान सभा चुनावों से पहले समाज की अतिपिछड़ी जातियां मुलायम सिंह यादव के साथ थीं. समाजवादी पार्टी से उनके मोहभंग के भी पर्याप्त कारण रहे. स्मरणीय है कि 2005 में अतिपिछड़े वर्ग को लुभाने के लिए मुलायम सिंह यादव ने कुछ अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची में सम्मिलित करने का नाटक किया था. जिसके अंतर्गत प्रदेश में इन जातियों के लिए अनुसूचित जाति के प्रमाणपत्र भी बनने लगे थे. हालांकि इसके पीछे भी उनकी चाल थी, जिसके द्वारा वे इन जातियों को अन्य पिछड़ा वर्ग से निकालकर ओबीसी के सताइस प्रतिशत आरक्षण को यादव जैसी पिछड़े वर्ग की मजबूत जातियों के लिए छोड़ देना चाहते थे. दूसरी तरफ अनुसूचित जातियों की संख्या बढ़ाकर वे अपनी राजनीतिक प्रतिद्विंद्वी मायावती को अपनी ताकत का एहसास कराना चाहते थे. वे यह भी जानते थे कि किसी जाति को अनुसूचित जाति वर्ग में सम्मिलित करना राज्य सरकार के अधिकार-क्षेत्र से बाहर है. मुलायम सिंह यादव के निर्णय को अदालत में चुनौती मिलनी ही थी. उस समय अपने निर्णय के पक्ष में केंद्र सरकार और अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखने के बजाय राज्य सरकार ने जिस तरह से लापरवाही दिखाई यह प्रभावित अतिपिछड़ी जातियों से छिपा नहीं था. जैसा कि अंदेशा था अदालत ने राज्य सरकार के निर्णय पर रोक लगा दी थी. अब मुलायम अतिपिछड़ी जातियों को दुबारा अपनी ओर खींचने के लिए मायावती सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने इन जातियों के उत्थान के लिए किए गए कार्य के ऊपर पानी फेर दिया है. उनकी बातों पर अतिपिछड़ावर्ग कितना विश्वास करता है, यह तो आनेवाला समय ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि आने वाले चुनावों में मायावती को यदि सत्ता बनाए रखने के लिऐ उन्हें अपने ‘स्वाभाविक साथियों’के मन में झांककर यह पता लगाना होगा कि क्या उनका सचमुच कायाकल्प हो चुका है! गत लोकसभा चुनावों के परिणाम उनका आवश्यक दिशा-निर्देश कर सकते हैं.
जहां तक अपना मानना है उससे पहले मुलायम सिंह यादव को सत्ता में लाने में मुसलमान, यादव, ठाकुर और अतिपिछड़ेवर्ग का हाथ रहा था. लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्होंने अतिपिछड़ेवर्गों की उपेक्षा की. चुनावों को करीब जानकर आरक्षण के नाटक के बहाने उन्हें एक बार फिर बरगलाने का प्रयास किया, लेकिन तब तक यह वर्ग उनकी चुनावी चाल को समझ चुका था. मुलायम सिंह यादव से मोहभंग के पश्चात यही अतिपिछड़ा वर्ग चुनावों में मायावती के समर्थन में उतरा था. मायावती की सख्त प्रशासक की छवि और समाजवादी पार्टी के जंगलराज ने भी बसपा की ओर मतदाताओं को मोड़ा था. यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतों का स्वाभाविक अंतरण था. इसका लाभ ब्राह्मणों ने उठाया, जो पिछले कई वर्षों से राजनीतिक उपेक्षा का दंश झेलते आ रहे थे. अभिप्राय है कि सर्वजन राजनीति के नाम पर मायावती ने जो चमत्कार किया दलित और ब्राह्मण मतों के गठजोड़ का यह करिश्मा कांग्रेस आजादी के बाद से ही करती आ रही थी. अंतर सिर्फ यह रहा कि कांग्रेस का अध्यक्ष प्रायः नेहरू-गांधी परिवार का सदस्य रहा है, जबकि मायावती दलित हैं. किंतु राजनीति के लिए इस प्रकार की अवसरवादी घटनाएं असामान्य नहीं हैं.
ध्यातव्य है कि कांग्रेस के प्रदेश में पतन के बाद से ही लगभग दो दशकों से ब्राह्मणों को अपनी उपेक्षा खल रही थी. दूसरे उत्तरप्रदेश के पिछड़े वर्गों में उभरती राजनीतिक चेतना ने भाजपा समेत सभी दलों को अपनी राजनीति को पिछड़ा वर्ग पर केंद्रित कर दिया था. भाजपा स्वयं पिछड़े मुख्यमंत्री को आगे करके चुनाव लड़ रही थी. इन चुनावों में ब्राह्मणों की समझदारी यह रही कि उन्होंने उसी पार्टी को चुना, जिसमें समाजवादी पार्टी का विकल्प बनने की संभावना सर्वाधिक थी. यह अवसर देखकर राजनीति के समीकरण बिठाने की कला है, जिसमें मायावती ने अपनी परिपक्वता का परिचय दिया था. उत्साह में आकर इसको सोशल इंजीनियरिंग भी कहा सकता है. लेकिन यह मान लेना कि इस घटना से भारतीय समाज की जातिवादी संरचना कमजोर हुई या होगी अथवा यह कहना कि जातिवादी राजनीति का दौर समाप्त हो चुका है, जल्दबाजी होगी. अंत में इतना कहना ही काफी है कि मायावती की पिछली जीत केवल बहुजन राजनीति की जीत थी. इसको सर्वजन राजनीति कहना, एक छल-जैसा है. लोकसभा चुनावों में यह सच सामने आ चुका है. मायावती अगर अब भी न संभली जो आने वाले विधानसभा चुनावों में उन्हें और भी मात खानी पड़ सकती है. हालांकि वे इस बात पर प्रसन्न हो सकती हैं कि गत लोकसभा चुनावों में बसपा के मत-प्रतिशत में अपेक्षाकृत वृद्धि हुई थी. मगर वह वृद्धि मतदाताओं का भाजपा से मोहभंग होने का भी परिणाम थी. दूसरे वोट प्रतिशत बढ़ना सीट-संख्या बढ़ना नहीं होता.
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है बसपा की तथाकथित सोशल इंजीनियरिंग मायावती द्वारा अपनी ही प्रतिबद्धताओं के साथ खिलवाड़ है. इसके लिए उन्हें उन नारों को भी बदलना पड़ा था, जिनके सहारे वह अब तक की सीढ़ियां चढ़कर आई थीं. हालांकि वे नारे विभेदकारी राजनीति के परिचायक थे. और समाज की जातीय विभाजन की घिनौनी राजनीति को बढ़ावा देने वाले थे. मगर इस बात से भी कोई इंकार नहीं किया जा सकता कि उन नारों के पीछे समाज के बड़े वर्ग का आक्रोश भी झलकता था जो सहस्राब्दियों से जातीय उत्पीड़न का दंश सहते आए थे.
चूंकि वापस लौटना एकाएक संभव नहीं है, इसलिए मायावती अब दलित नेताओं की मूर्तियां लगवाकर दलित राजनीति और उसके बहाने सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहती हैं. इसके लिए राज्य में भारी भरकम धनराशि खर्च करके पार्क बनवाए जा रहे हैं. जिनमें डाॅ. आंबेडकर, पेरियार, महात्मा बुद्ध, कांशीराम आदि की मूर्तियां लगवाई जा रही हैं. लेकिन क्या कोई मूर्ति बिना बौद्धिक आंदोलन अथवा उसके समर्थन के समाज को परिवर्तन की हद तक प्रभावित कर सकती है? उस आंदोलन को पुनर्जीवन प्रदान कर सकती हैं, जिसको उन्होंने अपनी सर्वजन राजनीति अथवा तथाकथित सोशल इंजीनियरिंग द्वारा शक्तिहीन कर दिया है. प्रदेश की जनता महंगाई, बिजली और सूखे की समस्या से त्रस्त है. इनसे जूझने के लिए केंद्र सरकार से संसाधनों की मांग करना और प्रदेश के अपने संसाधनों को मूर्तियों और पार्कों के नवीकरण पर खर्च कर देना, किस परिवर्तनकारी आंदोलन का प्रतीक है. खबर यह भी है कि मायावती महान नेताओं की बगल में अपनी मूर्तियां भी टिकवा रही हैं. क्या इससे लोग उन्हें ज्योतिबा फुले या डा॓. आंबेडर के समकक्ष मानने लग जाएंगे? कहीं उनके मन में डर तो नहीं कि अपनी सर्व सत्तावादी राजनीति के चलते उन्होंने दलित आंदोलन, विशेषकर दलित चेतना को इतना धूमिल कर दिया है कि उसको वापस अपनी स्थिति में आने में वर्षों लग सकते हैं. इतना कि मायावती का अपना जीवनकाल भी कम पड़ सकता है. उस अवस्था में आने वाली पीढ़ियां उन्हें मूर्तियों के बहाने याद रखेगी. क्या उन्हें पता नहीं कि गांधी जी के विचारों की हत्या करने वाले ही राजघाट जाकर उनकी समाधि पर फूल चढ़ाते हैं. कि मूर्तियों के प्रति अंधश्रद्धा समय आने टोटम में बदल जाती है. जिसका मनमाना अर्थ निकाला जा सकता है. और शताब्दियों पहले विलक्षण भारतीय मनीषा का तंत्र-मंत्र, जादू-टोने और कर्मकांडों में सिमट जाना भी समाज का विचारों से कट जाने का दुष्परिणाम था. इसलिए आने वाले वर्षों में एक चुनौती मायावती के सामने यह भी होगी कि प्रदेश की जनता को समस्याओं से मुक्ति दिलाने के साथ-साथ, अपने स्वाभाविक सहयोगियों की तलाश द्वारा वे किस प्रकार अपनी प्रतिबद्धताओं की रक्षा कर पाती हैं. वे संभवतः यह तो समझ चुकी हैं कि उनकी सोशल इंजीनियरिंग आने वाले वर्षों में कारगर नहीं होने वाली है. लेकिन जिस रास्ते पर चलकर वह दलित चेतना में जान डालने का प्रयास कर रही हैं, वह भी अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा उद्यम है. यह याद रखना भी जरूरी है कि मूर्तियां सिर्फ श्रद्धालु समाज गढ़ सकती हैं, विवेकवान समाज की स्थापना तो विचारों और उनके निरंतर परिवर्धन-परिष्करण द्वारा ही संभव है. लेकिन मायावती जिस रास्ते पर बढ़ रही हैं, उस ओर तो यह संभावना नजर नहीं आती.
ओमप्रकाश कश्यप

August 9, 2009

प्राचीन भारत में गणतंत्र

लोकतंत्र राजनीति का आधुनिक सिद्धांत है. यह, हालांकि राजनीतिक व्यवस्था को तय करनेवाली एक प्रणाली है, जो नागरिकों को अपनी अधिकार चेतना से समृद्ध करने, उनमें आवश्यक नागरिकताबोध पैदा करने का काम करती है. इसके द्वारा सत्ता पर जनता का अंकुश बना रहता है. व्यवस्था से असंतुष्ट जनता समय आने पर उसे बदलने में सक्षम सिद्ध होती है. लोकतंत्र में सत्ता धर्म, जाति, संप्रदाय, पूंजी आदि के बल पर प्राप्त करना संभव नहीं है. इसलिए इसे सर्वाधिक कल्याणकारी राजनीतिक प्रणाली भी माना जाता है. हालांकि लोकतांत्रिक समाजों में पूंजीपति वर्ग प्रकटतः नागरिकों के अधिकारों का पक्ष लेते दिखाई पड़ते हैं. बावजूद इसके जरूरी नहीं है कि यह सदैव उनकी सदिच्छा से ही प्रेरित हो. कई बार नागरिक अधिकारों की पक्षधरता के पीछे उनकी मंशा एक स्वतंत्र, अनियंत्रित, उपभोक्तावादी समाज को बढ़ावा देने की भी होती है. लोकतंत्र यदि नैतिकता से आवृत न हो तो पूंजीवाद की भांति वह भी व्यक्तिवाद को बढ़ावा देने वाला सिद्ध होता है. व्यवहार में अपनी जनोन्मुखता सिद्ध करने के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं कराधान के रूप में धनी व्यक्ति से अधिक राशि वसूल करती हैं. इस दावे के साथ कि उसके द्वारा जनसामान्य को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं का क्रियान्वन किया जाएगा.

वेदों में इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं, जो यह दर्शाते हैं कि तत्कालीन समाज बहुमत का सम्मान करता था. आश्रम-व्यवस्था ज्ञानाधारित समाज के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध थी, उसके लिए निर्णयों में पारदर्शिता होना आवश्यक था. उपनिषदों में छात्र गुरु के समक्ष मुक्त विमर्श करते हैं. ईसा पूर्व सातवीं शताब्दी में भारतीय गणतंत्र और भी मजबूत हुए थे और गणतांत्रिक राज्यों की स्थापना आम हो चुकी थी. यह मान लिया गया था कि समाज का बहुआयामी और सर्वतोन्मुखी विकास तभी संभव है जब योजनाओं के निर्माण एवं उनके कार्यान्वन में अधिकाधिक लोगों की सहमति एवं भागीदारी संभव हो. वौद्ध एवं जैनधर्म चूंकि समाज के जाति आधारित विभाजन का निषेध करते थे, अतएव उनके प्रभाव के चलते समाज में समानता आधारित तंत्र की स्थापना का काम सरल एवं व्यावहारिक था. किंतु यह मान लेना अनुचित होगा कि ब्राह्मण धर्म एकदम दम तोड़ चुका था. वस्तुतः वौद्ध धर्म की सफलता का एक कारण यह भी था कि उसने राजसत्ता के सहारे धार्मिक विजय का सपना देखा था. मौर्य कालीन चंद्रगुप्त से लेकर सम्राट अशोक आदि अनेक भारतीयता के प्रतीक हिंदु सम्राट वौद्धधर्म को मानने वाले थे. बल्कि अशोक ने तो वौद्धधर्म को राजधर्म घोषित करते हुए उसके प्रचार-प्रसार में अपने पुत्र एवं पुत्री को भी लगा दिया था. राजधर्म घोषित होने जाने के बाद बौद्धधर्म के विरोधी शिथिल जरूर पड़े, पूरी तरह शांत नहीं थे. परंपरागत ब्राह्मणधर्म की समर्थक प्रवृत्तियां अनुकूल अवसर की प्रतीक्षा में थीं. पुराणों और स्मृतियों की रचना द्वारा जनमानस को फुसलाने तथा बरगलाने की कोशिशें भी की जा रही थीं.

भारतीय दर्शन परंपरा की दृष्टि से वह युग कई मायने में अविस्मरणीय है. इस युग को भारतीय चेतना के नवोन्मेष का स्वर्णकाल भी कहा जाता रहा है. क्योंकि इस युग में तर्क एवं विज्ञानाधारित दर्शन को स्वीकार्यता मिलने लगी थी. बौद्धधर्म की ओर से चुनौती पेश होने पर प्राचीन वैदिक धर्म को भी आत्मावलोकन के लिए विवश होना पड़ा था, जिसके फलस्वरूप न्याय, वैशेषिक, चार्वाक जैसे भौतिकतावादी एवं तर्काधारित दर्शनों का उदय हुआ. विभिन्न मतावलंबियों के बीच शास्त्रार्थ, गोष्ठियों, परिचर्चा कार्यक्रमों ने भारतीय समाज को बौद्धिकता के ढांचे में ढालने का कार्य किया. जैन और बौद्ध धर्म ने अपने तात्विक एवं गूढ़ दार्शनिक विमर्श के माध्यम से पूरे समाज में संवाद और विमर्श की उस धारा को पुनर्जागरित करने का काम किया था, जो वैदिककाल के पश्चात रास्ता भटक चुकी थी. नए दार्शनिक विमर्श का पूरा आग्रह धर्म को अज्ञानता से मुक्त कर, उसे अधिकाधिक मानवीय स्वरूप प्रदान करने के प्रति था. इससे उसकी जनसामान्य के बीच स्वीकार्यता में बृद्धि हुई थी.

वौद्धिक आंदोलनों का प्रभाव तत्कालीन राजनीति पर पड़ना स्वाभाविक ही था. परिणामस्वरूप राजनीति को और अधिक लौकिक तथा मानवीय बनाने के प्रयास किए जाने लगे थे. परंतु इस कार्य में सफलता तभी संभव थी, जब निर्णय के स्तर पर ज्यादा से ज्यादा लोगों की सहभागिता हो. इसलिए शासन-प्रशासन के स्तर पर अधिकतम लोगों की हिस्सेदारी की जरूरत महसूस की जाने लगी. लिच्छवी और वैशाली जैसे गणतांत्रिक राज्यों का उदय इसी समय में हुआ. पालि, संस्कृत, ब्राह्मी लिपि में उपलब्ध साहित्य में ऐसे बहुसमर्थित राज्य के बारे अनेक संदर्भ मौजूद हैं. जनतांत्रिक पहचान वाले गण तथा संघ जैसे स्वतंत्र शब्द भारत में आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पहले ही प्रयोग होने लगे थे. महाभारत के शांतिपर्व में राज्यकार्य के निष्पादन के लिए बहुत से प्रजाजनों की भागीदारी का उल्लेख मिलता है, जो उस समय समाज में गणतंत्र के प्रति बढ़ते आकर्षण का संकेत देता है—

‘गणप्रमुख का सम्मान किया जाना चाहिए, इसलिए कि दुनियादारी के बहुत से कार्यों के लिए शेष समूह उसी के ऊपर निर्भर करता है. गुप्तचर विभाग और लोकपरिषद की कार्रवाहियों को आवश्यक गोपनीयता बनाए रखने का कार्य भी उसके ऊपर छोड़ देना चाहिए, क्योंकि यह बहुत अनुचित होगा कि पूरा संघ या कि समूह के सभी सदस्य उन रहस्यों के बारे में जान पाएं. संघ-प्रमुखों को चाहिए कि आवश्यक गोपनीयता की रक्षा करते हुए सदस्यों के सुख-समृद्धि के लिए सभी के साथ मिलकर, दायित्व भावना के साथ कार्य करें, अन्यथा समूह का धन-वैभव नष्ट होते देर नहीं लगेगी.1

सिकंदर के भारत अभियान को इतिहास में रूप में प्रस्तुत करने वाले डायडोरस सिक्युलस तथा का॓रसीयस रुफस ने भारत के सोमबस्ती नामक स्थान का उल्लेख करते हुए लिखा है कि वहां पर शासन की ‘गणतांत्रिक प्रणाली थी, न कि राजशाही.’2 ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के दौरान गणतंत्र भारत में लोक प्रचलित शासन प्रणाली थी. डायडोरस सिक्युलस ने अपने ग्रंथ में भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में अनेक गणतंत्रों की मौजूदगी का उल्लेख किया है. एक अन्य स्थान पर वह लिखता है कि—

‘अधिकांश नगरों (राज्यों) ने गणतांत्रिक शासन-व्यवस्था को अपना लिया था; और उसको बहुत वर्ष बीच चुके थे, यद्यपि कुछ राज्यों में भारत पर सिकंदर के आक्रमण के समय भी राजशाही कायम थी.3

ईसा पूर्व छठी शताब्दी तक भारत में गणतांत्रिक राज्यों का चलन आम हो चुका था. हालांकि ये राज्य राजशाही द्वारा नियंत्रित राज्यों की अपेक्षा आकार में छोटे थे. किंतु उनके वैभव एवं समृद्धि के कारण बड़े राज्य भी उनकी ओर सम्मान की दृष्टि से देखते थे. उन राज्यों में कृषि व्यवस्था उन्नत थी. प्रायः सभी राज्य उपजाऊ, शस्यश्यामला भूमि पर विकसित हुए थे. व्यापार एवं उद्योग-धंधों के मामले में वे आत्मनिर्भर थे. बौद्धधर्म ने समाज को उन बंधनों से मुक्त करने का काम किया था, जो वर्णव्यवस्था के कारण सामाजिक ऊंच-नीच का पर्याय बने हुए थे. प्रश्न किया जा सकता है साम्राज्यवादी व्यवस्था के दौर में जब बड़े राज्य छोटे राज्यों पर अपनी गिद्धदृष्टि जमाए रखते थे, अपेक्षाकृत छोटे गणतांत्रिक राज्य अपनी स्वतंत्रता एवं समृद्धि को कैसे सुरक्षित रख पाते थे?

उल्लेखनीय है कि कथित छोटे गणतांत्रिक राज्य सुख-समृद्धि के मामले में देश के बाकी राज्यों से कहीं आगे थे. वहां के नागरिकों को अपनी रुचि एवं कार्यक्षमता के अनुसार अपना व्यवसाय चुनने की आजादी थी. जिससे वहां का समाज अपेक्षाकृत अधिक खुला था. उसमें तनाव भी न्यूनतम थे. परिणामतः समाज की ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग संभव था. यही नहीं गणतांत्रिक राज्यों के पास बड़ी युद्धक सेना भी होती थी. किसी एक राज्य पर आए संकट के समय बाकी राज्य भी उसकी मदद के लिए तत्पर रहते थे. धन की कमी न होने के कारण जरूरत पड़ने पर भाड़े के सैनिकों की सेना खड़ा कर लेना भी असंभव न था. डायडोरस सिक्युलस ने साबरकी या सामबस्ती नामक एक गणतांत्रिक राज्य का उल्लेख किया है, जहां के नागरिक मुक्त और आत्मनिर्भर थे तथा जिसकी सेना में साठ हजार पैदल सैनिक, छह हजार घुड़सवार तथा छह सौ रथवान होते थे. वी. एस. अग्रवाल और ए. के. मजुमदार के हवाले से डाॅ. स्टीव मुलबर्गर लिखते हैं कि—

‘प्राचीन भारत में जनतांत्रिक ‘कार्यकलापों का स्वतंत्र रूप से संचालन करने वाले समूहों और उनकी विशेषताओं को अभिव्यक्त करने के लिए एक सुदीर्घ शब्दावली थी. निश्चित रूप से उसमें बहुत से शब्द ऐसे थे जो वीरता का गुणगान करते समय प्रयुक्त किए जाते थे, किंतु उनमें से अधिकांश का प्रयोग शांतिकाल में तथा आर्थिक समूहों और उनकी गतिविधियों की व्याख्या के लिए प्रयुक्त किया जाता था. जैसे कि किसी संगठन को उसके कार्य के आधर पर गण अथवा संघ का नाम दिया जा सकता था. उससे कम महत्त्वपूर्ण, केवल आर्थिक मामलों से जुड़े संगठनों को श्रेणि, पूग, व्रात, गण आदि नामों से पुकारा जाता था. इन संगठनों की प्रमुख विशेषता थी, इनके लक्ष्यों की एकता. छठी शताब्दी तक इन स्वशासित संगठनों-समितियों का चलन आम हो चला था. इनके सभी निर्णय आमसहमति के आधर पर लिए जाते थे. दूसरा वर्ग सर्वसम्मति अथवा आमसहमति के आधर पर शासन की जिम्मेदारी संभालता था. आधुनिक शब्दावली में इन संगठनों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त शब्द ‘गणतंत्र’ ही हो सकता है.’4

गणतांत्रिक भारत में संपन्नता और समृद्धि समाज के बहुसंख्यक वर्ग तक फैली हुई थी. हालांकि आर्थिक स्तर में विभिन्न समुदायों, व्यवसायकर्मियों के बीच भारी अंतर तब भी था. बावजूद इसके समाज में जागरूकता एवं अवसरों की समानता अधिक थी. इसी कारण छोटे-छोटे उद्यमियों/व्यापारियों ने अपने संगठन खडे़ कर लिए थे, जिनके माध्यम से वे संगठित व्यापार के लाभों में हिस्सेदारी की संभावना बढ़ाते थे. इस बात का प्रमाण उस समय के साहित्य तथा अन्य पुरातात्विक साक्ष्यों में उपलब्ध है. वैशाली और कौशांबी जैसे संपन्न राज्य और कुशावती जैसी संपन्न नगरी का वर्णन जातक कथाओं तथा पालि साहित्य में अनेक स्थान पर हुआ है. ये सभी राज्य गणतांत्रिक प्रणाली द्वारा शासित थे. जे. पी. शर्मा की पुस्तक ‘प्राचीन भारत में गणतंत्र’ के माध्यम से मुलबर्गर महोदय लिखते हैं कि—

‘छह सौ ईस्वी पूर्व से दो सौ ईस्वी बाद तक, भारत पर जिन दिनों बौद्ध धर्म की पकड़ थी, जनतंत्र आधारित राजनीति यहां बहुत लोकप्रचलित एवं बलवती थी. उस समय भारत में नागरीकरण की प्रक्रिया बहुत तीव्रता से चल रही थी. पालि साहित्य में उस समय की समृद्ध नगरी वैशाली का विवरण मिलता है. उसमें उपलब्ध विवरण के अनुसार वहां 7707 बहुमंजिला इमारतें, 7707 अट्टालिकाएं, 7707 ही उपवन तथा कमलसरोवर शोभायमान थे. इनके अतिरिक्त वहां पर लोगों का एक कार्यकारी संघ भी था, जिसपर वहां की शासन-व्यवस्था का अनुशासन चलता था. आम्रपाली जैसी अनिंद्ध सुंदरी, अद्वितीय नर्तकी थी, जिसकी सुंदरता और कला के चर्चे दूर-दूर तक फैले हुए थे. आम्रपाली न केवल वैशाली की समृद्धि का प्रतीक थी, बल्कि वहां का गौरव भी थी. वैशाली के अतिरिक्त कपिलवस्तु तथा कुशावती जैसे नगरों का विवरण भी बौद्ध साहित्य में ससम्मान उपलब्ध है, जो व्यापार, कला एवं संस्कृति के महान केंद्र थे. पांच सौ से हजार गाड़ियों तक के काफिले उन नगरों से व्यापार के सिलसिले में गुजरते रहते थे, जिसके कारण वहां पर किसी आधुनिक शहर जैसी भीड़-भाड़ तथा शोरगुल मचा रहता था. आवश्यकता पड़ने पर ये काफिले जहां भी पड़ाव डालते तो महीनों तक एक ही स्थान पर जमे रहते. चैमासे में तो यह अक्सर होता था. इन काफिलों के साथ-साथ धार्मिक संवाद, सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रचार-प्रसार का काम भी चलता रहता था.’5

ऐसा प्रतीत होता है कि 7707 की संख्या उन दिनों मानक अथवा शुभ मानी जाती थी. क्योंकि एक अन्य प्रसिद्ध जातककथा के अनुसार लिच्छवी गणराज्य की राजधानी वैशाली में 7707 राजा, 7707 राजदूत, 7707 सेनापति तथा 7707 खजांची मौजूद थे, जो किसी भी मसले पर निष्पक्ष और निर्भीक होकर अपना मत प्रस्तुत करते थे.6 यह विवरण प्रतीकात्मक भी हो सकता है. यह जनमानस के गणतांत्रिक सोच एवं समानताबोध का परिणाम था. सामूहिक आर्थिक कार्यक्रम, नागरिक प्रशासन में अधिकतम की सहभागिता तथा समान आधिकारिता के कारण यह संभव भी था. अपने प्रबल नागरिकताबोध के कारण लिच्छवियों को आलोचकों के व्यंग्य का सामना भी करना पड़ा था. ललितविस्तार जो कि एक व्यंग्य-प्रधान कृति है, में यह कहकर कटाक्ष किया गया है कि वैशाली में राजाओं की भरमार है, वहां हर कोई सोचता है—

‘मैं राजा हूं…मैं राजा हूं.’ और इस प्रकार वहां व्यक्ति के पद, आयु, अनुभव, मान-सम्मान को भुला दिया जाता है.’7

पाणिनी की अष्ठाध्यायी में जनपद शब्द का उल्लेख अनेक स्थानों पर किया गया है, जिनकी शासनव्यवस्था जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथों में रहती थी. एक और जातक कथा में पांच सौ लिच्छिवी राजाओं का उल्लेख किया गया है. यह विवरण भी प्रतीकात्मक अथवा अतिश्योक्तिपूर्ण हो सकता है. दरअसल इस तरह के आख्यान तत्कालीन राजनीति में तेजी से बढ़ते आर्थिक समूहों का परिणाम थे. आर्थिक रूप से समृद्ध समूह अपना स्वतंत्र राजनीतिक गठबंधन बना लेता था. आंतरिक प्रशासन के लिए वे सब स्वतंत्र समूह के रूप में काम करते थे, किंतु बाह्यः हमले के समय उनकी संगठित शक्ति दुश्मन का मुकाबला करने के काम आती थी. नए गणतंत्रों की स्थापना का कार्य भारत के किसी एक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं था. बल्कि उसका असर पूरे देश में स्थान-स्थान पर नजर आ रहा था. पाणिनी साहित्य के अध्येता वी. एस. अग्रवाल के अनुसार— ‘उस समय देश-भर में नए-नए गणतंत्र स्थापित करने की जैसे होड़ मची हुई थी. विशेषकर उत्तर-पश्चिमी सीमा पर स्थित वाहीक देशों में नए गणतंत्रों की स्थापना का कार्य तो अपनी चरमस्थिति को प्राप्त कर चुका था, जहां केवल सौ परिवारों वाले गोष्ठ, स्वयं को एक स्वतंत्र गणतंत्र के रूप में स्थापित कर रहे थे.’8

वस्तुतः उस समय भारत में छोटे-छोटे गणतंत्रों के रूप में स्वतंत्र आर्थिक समूहों के उदय हो रहा था. वे आर्थिक समूह इतने शक्तिशाली थे कि जिस क्षेत्र में होते, वहां कि राजनीतिक सत्ता पर अपना अधिकार स्थापित कर लेते थे. हालांकि राजशाही की अपेक्षा वह एक मुक्त समाज था, जहां राजनीतिक निर्णय परस्पर सहमति और सम्मान के आधार पर लिए जाते थे. एक श्रेष्ठी वर्ग उस समाज में पनप रहा था, जिसके आर्थिक संबंध दूर-दराज के क्षेत्रों से बने थे. उन राज्यों के पास अपनी सेना थी और संकट का सामना वे सभी मिलकर पूरी ताकत और एकजुटता के साथ करते थे. वहां के श्रेष्ठीगण आवश्यकता के समय बड़े सम्राटों को ऋण देकर, समाजकल्याण के कार्यों के लिए मुक्त हस्त से दान लुटाकर समाज पर अपना प्रभुत्व जमाए रखते थे. उनकी एकता और समाज पर उनके प्रभाव के कारण बड़े-बड़े सम्राट उनपर हमला करने से बचते थे. धन-संपत्ति का बाहुल्य कई बार सामाजिक बुराइयों का कारण भी बन जाता है, इस दोष से वे भी अछूते नहीं थे. उन्हें न केवल अपनी आर्थिक समृद्धि का गुमान था, बल्कि उनमें दिखावे की प्रवृत्ति भी जोर पकड़ती जा रही थी. अपनी अकूत धन-संपदा को खर्च करने के लिए वहां के नवधनाढ्य वर्ग के बीच निरर्थक स्पर्धाएं अक्सर चलती रहती थीं. आम्रपाली जैसी नगरवधुओं का चलन तात्कालिक समाज में निरंतर बढ़ते उपभोक्तावादी कुसंस्कारों की ओर संकेत करता है. उन नगरवधुओं को राज्य का समर्थन और सरंक्षण प्राप्त था. नगरवधुओं के ठिकाने राज्य की कमाई के बहुत बड़े स्रोत थे, इससे समाज के बुद्धिजीवी वर्ग में उन गणतंत्रों के भविष्य को लेकर चिंता व्यापने लगी थी. वे अपने नागरिकों को समय-समय पर सावधान भी करते रहते थे. हालांकि मद और मदिरा में तेजी से डूबता जा रहा नवधनाढ्य वर्ग उसकी शायद की परवाह करता था. महात्मा गौतम बुद्ध स्वयं गणतांत्रिक राज्यों के उद्भव के पक्ष में थे.

बौद्ध साहित्य के अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ महापरिनिर्वाण सुत्तंत की एक कथा बहुत चर्चित है, जिसके अनुसार मगध-सम्राट अजातशत्रु वैशाली के सुख-समृद्धि से ईष्र्या करते हैं तथा उसे किसी भी तरह से अपने राज्य में मिलाना चाहते हैं. सम्राट की ओर से महामात्य वर्षकार लिच्छिवी गणराज्यों पर हमला करने से पहले परामर्श के लिए महात्मा बुद्ध के पास जाते हैं. यह जानने के लिए कि विजय के लिए यह युद्ध क्या उपयुक्त रहेगा? युद्ध हुआ तो विजयश्री किसका वरण करेगी. महामात्य वर्षकार विद्वान एवं कूटनीति थे. महात्मा बुद्ध आश्रम पहुंचे अतिथि का स्वागत करते हैं. किंतु आचार्य वर्षकार को खुलकर जवाब देने के बजाय वे अपने शिष्य आनंद के साथ एक रूपक की रचना करते हैं—

मगध-सम्राट अजातशत्रु की वैशाली तथा अन्य वज्जिऩ गणतंत्रों के धन-वैभव पर निगाह गढ़ी थी. वह उनपर बलात् अधिकार जमाना चाहता था. आक्रमण से पहले इस बारे में परामर्श करने के लिए उसने अपने महामात्य आचार्य वर्षकार को महात्मा बुद्ध के पास उनका आशीर्वाद लेने के लिए भेजा. आचार्य वर्षकार संशय में थे. वे गौतम बुद्ध के समक्ष उपस्थित हुए. उस समय महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों के साथ थे. आचार्य वर्षकार ने वैशाली पर आक्रमण को लेकर सम्राट अजातशत्रु की इच्छा से महात्मा को अवगत कराया—

‘क्या उन्हें इस युद्ध में विजयश्री प्राप्त होगी?’ आचार्य वर्षकार ने प्रश्न किया.

आचार्य के प्रश्न का उत्तर देने के बजाय महात्मा बुद्ध ने शिष्य आनंद से सवाल किया—

‘तुमने सुना आनंद? आज भी वज्ज़िन गणसमूहों की बैठक पूरे उत्साह के साथ और निरंतर होती हैं? उनमें सभी गण स्वेच्छा और खुशी से हिस्सा लेते हैं?’

‘जी हां, मैंने भी यही सुना है!’ आनंद ने उत्तर दिया. तब महात्मा बुद्ध बोले, मानो आशीर्वाद दे रहे हों—

‘तो सुनो आनंद! जब तक वज्ज़िन गणतंत्र इसी प्रकार संगठित बने रहेंगे…जब तक वे अपने महत्त्वपूर्ण निर्णय लगातार मिलजुलकर, आपसी सहमति से लेते रहेंगे, तब तक आनंद उनके वैभव में कमी नहीं आएगी. वे निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर रहेंगे…सुख और समृद्धि प्राप्त करेंगे.’ गणतंत्र के समर्थन में महात्मा बुद्ध यहीं नहीं रुक जाते. आनंद द्वारा किए गए प्रश्नों के उत्तर में वे उसे और उसके माध्यम से आचार्य वर्षकार को भिन्न-भिन्न तर्कों से संतुष्ट करने का प्रयास करते हैं—

‘इसलिए सुनो आनंद! वज्ज़िनगण जब तक सुसंगत ढंग से साथ-साथ उठते-बैठते, बातचीत करते रहेंगे, जब तक वे अपने महत्त्वपूर्ण निर्णय प्रेमपूर्वक मिल-जुलकर, बिना किसी ईर्ष्या-द्वेष के लेते रहेंगे…जब तक वे पूर्वस्थापित विधान का विरोध करने से बाज आएंगे…और पूर्वस्थापित सामंजस्यपूर्ण मान्यताओं-नियमों का निषेध करने के स्थान पर उनका विनयपूर्ण अनुसरण करते रहेंगे…जब तक वे वज्ज़िन गणतंत्रों द्वारा पूर्व स्थापित आदर्शों का पालन करते रहेंगे और दिए गए वचन का सम्मान करेंगे, उसपर डटे रहेंगे…तथा अपने वुजुर्गों और सनातन मर्यादाओं का अनुसरण करेंगे…जब तक वे अपने विचारों पर दृढ़ बने रहेंगे तथा अपने कर्तव्य के प्रति सचेत रहेंगे…और जब तक वे अपनी स्त्रियों का सम्मान करेंगे…उनके समूह की किसी महिला या बच्ची के साथ बलात् छेड़छाड़ नहीं होगी…जब तक वे अपने तीर्थस्थलों तथा पवित्र ग्रंथों में आस्था बनाए रखेंगे तथा उनका, चाहे वे नगर अथवा देश के किसी भी हिस्से में क्यों न हों, सम्मान करेंगे, सभी संस्कारों का विधि अनुसार निर्वाह करेंगे, साथ ही उसमें किसी प्रकार की जड़ता आने से बचाए रखेंगे…जब तक वे समाज में मौजूद गरीबों, वंचितों और उत्पीड़ितों के अधिकारों की सुरक्षा का खयाल रखेंगे…उनके लिए यथासंभव सहयोग करते रहेंगे, जिससे वे सुखी रह सकें, उनका इतना ध्यान रखेंगे कि उनके जैसे निर्धन-निर्बल, समाज के उत्पीड़ित लोग दूर-दूर से आकर उनके राज्य में सुखपूर्वक शरण पाते रहें, तब तक, हां तब तक आनंद! वज्ज़िनगणों के सुख और वैभव पर कोई आंच नहीं आ सकती…वे अजेय रहेंगे, उन्हें कोई नहीं हरा सकता, वे सुख और समृद्धि की ओर निरंतर अग्रसर रहेंगे.’

इसके बाद महात्मा बुद्ध ने आचार्य वर्षकार को संबोधित कर कहना शुरू किया—

‘महात्मन्! जिन दिनों मैं वैशाली के एक मंदिर में ठहरा हुआ था, उन्हीं दिनों मैंने वज्ज़िनगणों के जनकल्याणकारी नियमों का अध्ययन किया था. मुझे पूरा विश्वास है कि जब तक वे अपने बनाए विधान को अच्छी तरह समझते रहेंगे…जब तक वे इन अपने नियमों का मन-वचन कर्म से अनुसरण करते रहेंगे…अपनी परंपरा एवं कानूनों का अर्थ समझकर उनका पालन करते रहेंगे…तब तक मुझे पूरा विश्वास है कि वे उनको कोई परास्त नहीं कर सकता. तब तक उनका सुख और समृद्धि इसी तरह बने रहेंगे.’ महात्मा बुद्ध के वचनों से प्रभावित होकर आचार्य वर्षकार कुछ देर तक विचार मग्न रहे. फिर बोले,

‘मैं समझ गया देव! ऐसे वज्झिनगणों को सीधे युद्ध में, बिना कूटनीति या उनके संगठन को भंग मगध कभी नहीं हरा पाएगा.’

आत्मनिर्भर एवं आत्मनिर्णय का संस्कार. वज्जिन गणतंत्र के इन्हीं सदगुणों ने महात्मा बुद्ध को प्रभावित किया था. यही गणतांत्रिकता गिल्ड की सफलता का कारण थी. हम पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं गिल्ड अथवा श्रेणि प्राचीन भारत में समान उद्योग और/या व्यवसाय में लगे कारीगरों, शिल्पकारों, छोटे उद्यमियों तथा व्यापारियों के स्वैच्छिक संगठन थे, जिनका गठन आपसी हितों की सुरक्षा और सामूहिक कल्याण की भावना के साथ किया जाता था. प्रायः छोटे उद्यमी, कारीगर अथवा शिल्पकार स्वयं को स्पर्धा में बनाए रखने के लिए श्रेणि के रूप में संगठित होते थे. इससे उन्हें एक प्रकार की व्यावसायिक सुरक्षा की अनुभूति भी होती थी. परंपरागत भारतीय समाज जाति और वर्ग के आधार पर विभाजित था. लेकिन श्रेणियों में कार्यविभाजन का आधार आमतौर पर व्यक्तिगत दक्षता ही थी.

हम यह भी कह सकते हैं कि श्रेणियां एक प्रकार से प्राचीनकाल से चली आ रही वर्णव्यवस्था के प्रति जनसमाज का सकारात्मक विद्रोह का परिणाम थीं. चूंकि बौद्धधर्म जाति एवं वर्ण के आधार पर समाज के विभाजन का विरोध करता था, अतएव उसके प्रभाव के चलते श्रेणियों को अपने विकास का भरपूर अवसर प्राप्त हुआ. ये श्रेणियां अपने समय के तकनीकी कौशल, ज्ञान, अनुभव तथा औद्योगिक संसाधनों को सहेजने तथा स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चेमाल के दोहन का कार्य भी करती थीं. आवश्यकता पड़ने पर श्रेणि मजदूर संगठन का काम भी कर सकती थी. उनके सदस्य अपने उद्यम के अकेले स्वामी तथा मुख्यकर्ता होते थे, व्यावसायिक नैतिकता के आधार पर वे एक-दूसरे के साथ व्यवहार करते थे तथा उनमें आंतरिक लोकतंत्र था. बावजूद इसके अधिकांश गिल्ड तत्कालीन मुख्य शासन-व्यवस्था अर्थात राजशाही के ही समर्थक थे. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि सामाजिक मुद्दे पर किसी भी प्रकार के टकराव से बचते हुए वे स्वयं को केवल आर्थिक कार्यक्रमों तक समेटे रखना चाहते हों. क्योंकि वर्ण-विभाजन के अनुसार राज्य करना क्षत्रिय वर्ग का कार्य था. जबकि श्रेणियों के रूप में संगठित होने वाले व्यक्ति अधिकांशतः वैश्य एवं कामगार जातियों से आए हुए लोग थे. भारत में श्रेणि का प्रारंभ कब हुआ, इस बारे में कदाचित मतभेद हैं. कुछ विद्वानों का मानना है कि वैदिक समाज मुख्यतः पशुपालक समाज था, जो शनै-शनै कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा था. उद्योग-धंधे विकास की प्रारंभिक अवस्था में थे और उनका इतना विकास नहीं हुआ था कि उनमें लगे लोग अपने स्वतंत्र संगठन बना सकें. इस विचारधारा के समर्थक विद्वानों का विश्वास है कि श्रेणि आधारित अर्थव्यवस्था कालांतर में विकसित हुई. इसके विपरीत कुछ विद्वानों को भरोसा है कि वैदिक सभ्यता इतनी विकसित हो चुकी थी कि वहां पर श्रेणियों का गठन होने लगा था. इस मत के समर्थकों में से एक किरन कुमार थपलियाल का मानना है कि वैदिक सभ्यता में भारत में शिल्पकारों तथा व्यापारियों के संगठन बनने लगे थे तथा उनका वैदिक भारत की अर्थव्यवस्था की समृद्धि में बहुत बड़ा योगदान था. ये संगठन आंतरिक लोकतंत्र की भावना से समृद्ध थे.

थपलियाल के अनुसार वैदिक सभ्यता के जो भी साहित्यिक और ऐतिहासिक स्रोत आज उपलब्ध हैं, उनमें इस तथ्य का समर्थन करते पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं, जिनके अनुसार उस समय भी भारत के व्यावसायिक और औद्योगिक संगठन सुदूर देशों के साथ व्यापारिक संबंध बनाए हुए थे. कुछ विद्वान मोहान-जो-दारो तथा हड़प्पा की सभ्यता को वैदिक सभ्यता ही मानते हैं. हालांकि वे कोई स्पष्ट साक्ष्य देने में नाकाम रहे हैं. लेकिन यदि वैदिक सभ्यता तथा मोहान-जो-दारो सभ्यता का कार्यकाल एक ही है तो यह भी सत्य है कि मोहन-जो-दारो के लोगों के व्यापारिक रिश्ते चीन, मेसोपोटामियां, रोम आदि सुदूर देशों के साथ थे.

गणपति शब्द का प्रयोग वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर हुआ है, जिसका एक अर्थ गण अर्थात नागरिक भी है. इस तरह गणपति यानी नागरिकों द्वारा परस्पर सहमति के आधार पर चुने गए प्रशासक से है. भारतीय परंपरा में गणपति को सभी देवताओं में अग्रणी, सर्वप्रथम पूज्य माना गया है. इस बात की प्रबल संभावना है कि इस शब्द की व्युत्पत्ति गणतांत्रिक राज्य में हुई हो. बाद में जब समाज में पांडित्य के नाम पर पोंगापन अपना असर जमाने लगा तब गणपति का अर्थ भी रूढ़ होकर हाथी की सूंड वाला प्राणी हो गया. लेकिन गणेश को देवता के रूप में मिलने वाला सम्मान, तथा उसे समृद्धि का प्रतीक मानना आज भी इस बात का द्योतक है कि गणपति का अभिप्राय आर्थिक समूह का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति से ही था. व्यापार के सिलसिले में चलने वाले काफिलों में गणपति की स्थिति उनके संरक्षक के रूप में मान्य थी. जिसे पूरी श्रद्धा एवं सम्मान के साथ देखा जाता था.

भारतीय समाज के पिछड़ेपन के मुख्य कारणों में से एक इसकी जाति-व्यवस्था है, जिसने शताब्दियों से समाज के एक बड़े वर्ग को मौलिक अधिकारों से वंचित करने का कार्य किया है. इसी ने देश को पराधीनता की और ढकेला, परिणामतः शताब्दियों तक पराये लोग हमारे भाग्यविधाता बने रहे. इस समाज को पहली बार एकसूत्र में पिरोने में कामयाबी महात्मा गांधी ने हासिल की थी. स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारत की जनता ने अपनी संगठित ताकत को पहचान. परिणाम यह हुआ कि हर वर्ग हर जाति का आदमी अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध के लिए खड़ा हो गया. देश ने संभवतः पहली बार एक राष्ट्र के रूप में स्वयं को अनुभव किया. आजादी मिली तो यह भी अनुभव किया जाने लगा कि समरस समाज सुदृढ़ राज्य की जरूरत है. इसलिए राष्ट्र की मजबूती के लिए धर्म, जाति एवं आर्थिक आधार जितने भी भेदभाव हैं, उन सभी को मिटाकर एक समानता पर आधारित समाज की स्थापना की जाएगी. लोकतांत्रिक व्यवस्था सोचे गए लक्ष्य के लिए वरदान सिद्ध हो सकती थी. इसलिए स्वाधीनता प्राप्ति के उपरांत देश में जाति एवं धर्म आधारित विभाजन को गैरजरूरी मानते हुए समरस समाज की स्थापना पर जोर दिया गया. गणतंत्र प्राचीन भारत में भी जाति-वर्ग के आधारित समाजों की कमी को पाटने की कोशिश करता रहा था, आजादी के बाद भी वह समाज को एकसूत्र में पिरोने के लिए भरसक प्रयासरत है, आवश्यकता गणतांत्रिक संस्थाओं को और अधिक सशक्त करने, तथा लोगों को इस बारे में जागरूक बनाने की है.

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका

1. The gana leaders should be respected as the worldly affairs (of the ganas) depend to a great extent upon them…the spy (department) and the secrecy of counsel (should be left) to the chiefs, for it is not fit that the entire body of the gana should hear those secret matters. The chiefs of gana should carry out together, in secret, works leading to the prosperity of the gana , otherwise the wealth of the gana decays and it meets with danger. Mahabharata 12.107, trans. – by R.C. Majumdar, Corporate Life, 251 as quoted by by Steve Muhlberger in Democracy in Ancient India.

2. …the form of government was democratic and not regal. – Q. Curtius Rufus, History of Alexander the Great 9.8, Classical Accounts, p. 151; Diodorus Siculus, Bibliotheca Historica 17.104, Classical Accounts, p. 180.

3. At last, however, after many years had gone, most of the cities adopted the democratic form of government, though some retained the kingly until the invasion of the country by Alexander. – Diodorus Siculus 2.39, Classical Accounts, p. 236.

4. There was a complex vocabulary to describe the different types of groups that ran their own affairs. Some of these were obviously warrior bands; others more peaceful groups with economic goals; some religious brotherhoods. Such an organization, of whatever type, could be designated, almost indifferently, as a gana or a sangha; and similar though less important bodies were labeled with the terms sreni, puga, or vrata. Gana and sangha, the most important of these terms, originally meant “multitude.” By the sixth century B.C., these words meant both a self-governing multitude, in which decisions were made by the members working in common, and the style of government characteristic of such groups. In the case of the strongest of such groups, which acted as sovereign governments, the words are best translated as “republic.” by Steve Muhlberger, Democracy in Ancient India.

5. ‘Republican polities were most common and vigorous in the Buddhist period, 600 B.C.-A.D. 200. At this time, India was in the throes of urbanization. The Pali Canon gives a picturesque description of the city of Vesali in the fifth century B.C. as possessing 7707 storied buildings, 7707 pinnacled buildings, 7707 parks and lotus ponds, and a multitude of people, including the famous courtesan Ambapali, whose beauty and artistic achievements contributed mightily to the city’s prosperity and reputation. The cities of Kapilavatthu and Kusavati were likewise full of traffic and noise. Moving between these cities were great trading caravans of 500 or 1000 carts — figures that convey no precise measurement, but give a true feeling of scale: caravans that stopped for more than four months in a single place, as they often did because of the rainy season, were described as villages. Religion, too, was taking to the road.’ – by Steve Muhlberger, Democracy in Ancient India.

6. Furthermore, power in some republics was vested in a large number of individuals. In a well-known Jataka tale we are told that in the Licchavi capital of Vesali, there were 7707 kings (rajas), 7707 viceroys, 7707 generals, and 7707 treasurers.- Jataka 149, trans. in The Jataka, or Stories of the Buddha’s Former Births, ed. E.B. Cowell, tr. by Various Hands, 6 vols. (1895; reprint, London, 1957).

7. The Lalitavistara, in an obvious satirical jab, depicts Vesali as being full of Licchavi rajans, each one thinking, ‘I am king, I am king,” and thus a place where piety, age and rank were ignored.’ – Khanna.

8. .…there was “a craze for constituting new republics” which “had reached its climax in the Vahika country and north-west India where clans constituting of as many as one hundred families only organized themselves as Ganas.” By V.S. Agrawala, India as Known to Panini: A study of the cultural material in the Ashatadhyayi as quoted by Steve Muhlberger.

August 3, 2009

प्राचीन भारत की आर्थिक संस्थाएं

सच होने के बावजूद यह तथ्य बहुत-से लोगों को चौंका सकता है कि प्राचीन भारत औद्योगिक विकास के मामले में शेष विश्व के बहुत से देशों से कहीं अधिक आगे था. रामायण और महाभारत काल से पहले ही भारतीय व्यापारिक संगठन न केवल दूर-देशों तक व्यापार करते थे, बल्कि वे आर्थिकरूप से इतने मजबूत एवं सामाजिक रूप से इतने सक्षम संगठित और शक्तिशाली थे कि उनकी उपेक्षा कर पाना तत्कालीन राज्याध्यक्षों के लिए भी असंभव था. रामायण के एक उल्लेख के अनुसार राम जब चौदह वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या वापस लौटते हैं तो उनके स्वागत के लिए आए प्रजाजनों में श्रेणि प्रमुख भी होते हैं. प्राचीन ग्रंथों में इस तथ्य का भी अनेक स्थानों उल्लेख हुआ है कि उन दिनों व्यक्तिगत स्वामित्व वाली निजी और पारिवारिक व्यवसायों के अतिरिक्त तत्कालीन भारत में कई प्रकार के औद्योगिक एवं व्यावसायिक संगठन चालू अवस्था में थे, जिनका व्यापार दूरदराज के अनेक देशों तक विस्तृत था. उनके काफिले समुद्री एवं मैदानी रास्तों से होकर अरब और यूनान के अनेक देशों से निरंतर संपर्क बनाए रहते थे. उनके पास अपने अपने कानून होते थे. संकट से निपटने के लिए उन्हें अपनी सेनाएं रखने का भी अधिकार था. सम्राट के दरबार में उनका सम्मान था. महत्त्वपूर्ण अवसरों पर सम्राट श्रेणि-प्रमुख से परामर्श लिया करता था. उन संगठनों को उनके व्यापार-क्षेत्रा एवं कार्यशैली के आधार पर अनेक नामों से पुकारा जाता था. गण, पूग, पाणि, व्रात्य, संघ, निगम अथवा नैगम, श्रेणि जैसे कई नाम थे, जिनमें श्रेणि सर्वाधिक प्रचलित संज्ञा थी. ये सभी परस्पर सहयोगाधारित संगठन थे, जिन्हें उनकी कार्यशैली एवं व्यापार के आधार पर अलग-अलग नामों से पुकारा जाता था.
भारतीय धर्मशास्त्रों में प्राचीन समाज की आर्थिकी का भी विश्लेषण किया गया है. उनमें उल्लिखित है कि हाथ से काम करने वाले शिल्पकार, व्यवसाय चलाने वाली जातियां व्यवस्थित थीं. सामूहिक हितों के लिए संगठित व्यापार को अपनाकर उन्होंने अपनी सूझबूझ का परिचय दिया था. इसी कारण वे आर्थिक एवं सामाजिक रूप से काफी समृद्ध भी थीं. आचार्य पांडुरंग वामन काणे ने उस समय के विभिन्न व्यावसायिक संगठनों की विशेषताओं का अलग-अलग वर्णन किया है. कात्यायन ने श्रेणि, पूग, गण, व्रात, निगम तथा संघ आदि को वर्ग अथवा समूह माना है.1 लेकिन आचार्य काणे उनकी इस व्याख्या से सहमत नहीं थे. उनके अनुसार ये सभी शब्द पुराने हैं. यहां तक कि वैदिक साहित्य में भी ये प्रयुक्त हुए हैं. यद्यपि वहां उनका सामान्य अर्थ दल अथवा वर्ग ही है.2 इसी प्रकार कौषीतकिब्राह्मण उपनिषद् में पूग को रुद्र की उपमा दी गई है.3 आपस्तंब धर्मसूत्र में संघ को पारिभाषित करते हुए उसकी कार्यविधि और भविष्य को देखने हुए, अन्य संगठनों के संदर्भ में उसके अंतर को समझा जा सकता है.4
पाणिनीकाल तक संघ, व्रात, गण, पूग, निगम आदि नामों के विशिष्ट अर्थ ध्वनित होने लगे थे. उन्होंने श्रेणि के पर्यायवाची अथवा विभिन्न रूप माने जाने वाले उपर्युक्त नामों की व्युत्पत्ति आदि की विस्तृत चर्चा की है. इस तथ्य का उल्लेख हम पहले ही कर चुके हैं कि श्रेणियों की पहुंच केवल आर्थिक कार्यकलापों तक ही सीमित नहीं थीं, बल्कि उनकी व्याप्ति धार्मिक, राजनीति और सामाजिक सभी क्षेत्रों में थी. इसलिए कार्यक्षेत्र को देखते हुए उन्हें विभिन्न संबोधनों से पुकारा जाना भी स्वाभाविक ही था. दूसरी ओर यह भी सच है कि पूग, व्रात्य, निगम, श्रेणि इत्यादि विभिन्न नामों से पुकारे जाने के बावजूद सहयोगाधारित संगठनों के बीच उनके कार्यकलापों अथवा श्रेणिधर्म के आधार पर कोई स्पष्ट सीमारेखा नहीं थी. दूसरे शब्दों में ये नाम विशिष्ट परिस्थितियों में कार्यशैली एवं कार्यक्षेत्र के अनुसार अपनाए तो जाते थे, परंतु उनके बीच स्पष्ट कार्य-विभाजन का अभाव था. संगठन के विभिन्न नामों के कारण उनके बीच अनौपचारिक-से भेद एवं उनसे ध्वनित होने प्रचलित अर्थ को आगे के अनुच्छेदों में स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है—

व्रात्य
यह नाम प्राचीन काल से ही संघ अथवा वैकल्पिक सरकार के रूप में प्रचलित रहा है. इसमें आंतरिक लोकतंत्र की भावना प्रधान होती थी. पाणिनी ने अपने महाभाष्य में ऐसे लोगों को व्रात्य माना है, जिनका कोई विशिष्ट व्यवसाय नहीं था, जो अपने तात्कालिक हितों के लिए किसी भी प्रकार का व्यवसाय अपना सकते थे. दूसरे शब्दों में उन्हें कई व्यवसायों का कार्यसाधक ज्ञान होता था. और समय तथा उपयोगिता के अनुसार वे अपना कोई भी व्यवसाय चुन सकते थे. व्रात्य प्रायः अपने शारीरिक बल से ही अपनी जीविका चलाते थे. वे विविध जातियों से आए हुए दक्ष शिल्पकार थे और अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए आपस में संगठित होकर रहना आवश्यक मानते थे.
कात्यायन ने व्रात्यों को विचित्र अस्त्रधारी सैनिकों का झुंड माना है. इससे कुछ विभिन्न विक्रमादित्य खन्ना ने किरन कुमार थपल्याल एवं मजुमदार के हवाले से एक ही परिक्षेत्र में रहने वाले, आर्थिक हितों के लिए प्रयासरत, समूह को व्रात्य एवं पूग की संज्ञा दी है. उनके अनुसार—
‘व्रात्य एवं पूग एक ही नगर अथवा गांव के निवासियों के सामान्यतः एक ही व्यवसाय में लगे, समान आर्थिक हितों के लिए गठित समूह थे.’5
स्पष्ट है कि व्रात्य समानधर्मा लोग थे, जिनको एकाधिक व्यवसायों की जानकारी होती थी. अपने परंपरागत उद्यम में अनुकूल अवसर न देख वे सहयोगी संगठन के गठन की ओर उन्मुख होते थे. उनके संगठन अधिक लोकतांत्रिक और उदार होते थे.

पूग
आचार्य काणे ने अपने वृहद् ग्रंथ ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ में उल्लेख किया है कि व्रात्य की भांति पूग भी विभिन्न जातियों से आए हुए लोग थे. वे आवश्यकता पड़ने पर मिस्त्री से लेकर श्रमिक तक, कुछ भी काम कर सकते थे. कशिका के अनुसार वे धनलोलुप और कामी थे, जिनका कोई स्थिर व्यवसाय नहीं था. कात्यायन ने पूग को व्यापारियों का समुदाय स्वीकार किया है. कौटिल्य ने भी अपने अर्थशास्त्र में एक स्थान पर सैनिकों एवं श्रमिकों में अंतर दर्शाया गया है. उनके अनुसार सौराष्ट्र एवं कांबोज राज्य के सैनिकों की श्रेणियां अलग-अलग वर्गों में विभाजित थीं. उनमें से कुछ आयुध के सहारे अपनी आजीविका चलाने वाली थीं, तो कुछ की आजीविका का माध्यम कृषि था—
पूग एक स्थान की विभिन्न जातियों एवं विभिन्न व्यवसाय वाले लोगों का समुदाय है और श्रेणि विभिन्न जातियों के लोगों का समुदाय है—जैसे हेलाबुकों, तांबूलिकों, कुविंदों (जुलाहों) एवं चर्मकारों की श्रेणियां. चाहमान विग्रहराज के प्रस्तरलेख में हेलाबुकों को प्रत्येक घोड़े के लिए एक द्रम्म देने का वृत्तांत मिलता है.’6
पूग संभवतः ऐसे व्यक्तियों का संगठन होता था, जिनका पैत्रिक व्यवसाय युद्ध अथवा सेवाकर्म था; अर्थात ऐसे लोग जो वर्ण-विभाजन की दृष्टि से वाणिज्यकर्म के लिए अधिकृत नहीं थे. कृषक एवं सैनिक जातियों के लोग अपने व्यवसाय से हताश होकर, परिवर्तन अथवा अपेक्षाकृत अधिक आर्थिक लाभ के लिए संगठन का निर्माण करते थे. इस बात की भी पर्याप्त संभावना है कि वाणिज्यिक अनुभव की कमी तथा शिल्पकलाओं के ज्ञान के अभाव में शूद्रवर्ग एवं सेना से निकाले गए लोगों के संगठन को पूग माना गया हो. ऐसे लोग युद्धक अथवा गैरव्यावसायिक श्रेणियों के गठन को प्राथमिकता देते थे. इस तरह पूग एवं व्रात्य कहे जाने वाले संगठनों में सैद्धांतिक दृष्टि से कोई खास अंतर नहीं था.

संघ
संघ को सामान्यतः विशिष्ट लोगों के संगठन का पर्याय माना गया है. प्राचीन भारत में गणतांत्रिक सत्ता के ध्रुवों को संघ के नाम से पुकारने की परंपरा रही है. संघों के सदस्यों का चयन बहुमत के आधार पर किया जाता था. तथापि वह सीमित गणतंत्र था. उनके सदस्य प्रायः वर्णव्यवस्था में ऊपर के क्रम पर आने वाली जातियों से संबद्ध होते थे, जो अपने आर्थिक, राजनीतिक एवं धार्मिक हितों की प्राप्ति हेतु संगठन का निर्माण करते थे. लगभग यही आशय गण का भी रहा है. प्रारंभ में इन दोनों के बीच कोई सैद्धांतिक विभाजन था भी नहीं. प्रकारांतर में गण और संघ में भेद अवश्य किया जाने लगा था. लेकिन गण को एकवचन के रूप में भी स्वीकारा जाता रहा है, जबकि संघ की संज्ञा विवेकवान लोगों के समूह के लिए सुरक्षित रही है, जो अपने निर्णय सिद्धांततः आमसहमति के आधार पर लेते हों. विशेषकर बौद्धधर्म के अभ्युध्य के पश्चात ब्राह्मणों ने स्वयं को उनसे अलग दिखाने के लिए, उनके संगठनों को संघ कहना प्रारंभ कर दिया था. मनु ने संघ का प्रयोग संगठित समाज के लिए किया है. जबकि कात्यायन के अनुसार संघ बौद्धों तथा जैनों का समाज है. डा॓. रमेशचंद्र मजुमदार एवं डा॓. किरन कुमार थपल्याल, दोनों ने इसी मत की संस्तुति की है. इन दोनों के हवाले से विक्रमादित्य खन्ना लिखते हैं कि—
‘संघ का संबोधन सामान्यतः राजनीतिक संगठनों के लिए था. यद्यपि कभी-कभी उसका इस शब्द का प्रयोग शैक्षिक एवं धर्मिक गतिविधियों के विकास को समर्पित संगठनों, विशेषकर बौद्ध भिक्षुओं के दल, के लिए भी कर लिया जाता था.’7
इस वर्गीकरण से संघ की आर्थिक विशेषताओं का कोई बोध नहीं होता. यह भी हो सकता है कि बौद्धों के धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक हितों के लिए गठित समूहों को संघ की संज्ञा दी जाती हो. लेकिन लोकपंरपरा में व्यापारियों के समूहों को भी संघ कहने का चलन था.

गण
प्राचीन भारतीय वांङमय में गण शब्द का उल्लेख अनेकार्थी है. गण का सामान्य अभिप्राय सुसंस्कृत नागरिक से भी है. गांवों एवं नगरों में सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए, समाज के जिन विशिष्ट व्यक्तियों को यह जिम्मेदारी सौंपी जाती थी, उन्हें ‘गण’ कहा जाता था. कई बार धार्मिक एवं राजनीतिक उद्देश्यों के लिए मनोनीत व्यक्ति भी ‘गण’ की संज्ञा से विभूषित कर दिए जाते थे. कालांतर में इस संज्ञा का उपयोग आर्थिक उद्देश्यों के गठित संगठनों के लिए भी किया जाने लगा. वसिष्ठ धर्मसूत्र में ‘गण’ का उल्लेख संगठित समाज के रूप में किया गया है. कुछ इसी प्रकार का अर्थ मनु ने भी बताया है; यानी पूरा समाज गण अथवा गणसमूह है. कात्यायन ने वर्ण-विभाजन को आधार बनाकर इसे और भी विशेषीकृत करते हुए, ब्राह्मणों के संगठन को गण की संज्ञा दी है. मिताक्षरा के अनुसार गण व्यापारियों के समूह थे, जिनका प्रमुख व्यवसाय हेलाबूक अर्थात घोड़े का व्यवसाय करना था. विक्रमादित्य खन्ना ने गण को धार्मिक एवं राजनीतिक संगठन मानते हुए उसको संघ के समक्ष रखा है. डाॅ. मजुमदार का संदर्भ देते हुए वे लिखते हैं कि—
‘प्रारंभ में गण का अभिप्राय व्यापारियों के समूह से था, मगर कालांतर में उन्हें राजनीतिक एवं धार्मिक संगठन के रूप में भी मान्यता मिलने लगी.’8
सामान्य नागरिकताबोध की प्रस्तुति के लिए भी गण का उपयोग आम नागरिकों के लिए मान्य रहा है. गणतंत्र उसी शब्द की व्युत्पत्ति है. यही अर्थ सहस्राब्दियों तक विद्वानों को मान्य रहा है. लेकिन यह भी सत्य है कि समय के साथ संज्ञाएं एवं उनके संदर्भ बदलते रहते हैं. कई बार स्वार्थी लोग भी शब्दों को उनके मूल संदर्भों से काटकर मनमानी व्याख्याएं करते रहते हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि गण का उपयोग प्रारंभ में नागरिक और नागरिक-समूहों के लिए सुरक्षित था. बाद में यही संज्ञा व्यापारी-समूहों को भी दी जाने लगी. लेकिन कालांतर में, बौद्ध धर्म के उद्भव के बाद ब्राह्मणों ने उनके संगठनों को संघ तथा अपने समूहों को गण कहना आरंभ कर दिया था.

नैगम अथवा निगम
नैगम अथवा निगम शब्द का अंग्रेजी पर्याय Corporation है, जिसका आशय एक ऐसे जिम्मेदार संगठन से है, जिसका गठन विशिष्ट सेवाओं की देखभाल तथा उन्हें सुचारू बनाए रखने के लिए किया जाता है. नागरिक सेवाओं में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक आदि सभी सेवाएं सम्मिलित हैं. श्रेणि तथा पूग की भांति नैगम भी व्यावसायिक संगठन होते थे. नैगम को परिभाषित करने का कार्य कात्यायन द्वारा किया गया. उनके अनुसार नैगम का आशय एक ही नगर के नागरिकों के समूह से है. वैदिक साहित्य में श्रेणि, पूग अथवा नैगम जैसे शब्द अनेक स्थानों पर आए हैं, जहां उनका सामान्य अर्थ दल अथवा संगठन से ही है. हालांकि किरन कुमार थपल्याल की राय इससे कुछ भिन्न है. उनके अनुसार निगम अथवा नैगम का कार्यक्षेत्र विस्तृत होता था, यहां तक कि नगरीय सीमाओं से परे भी. नैगम के सापेक्ष श्रेणि एक छोटी इकाई थी और एक नैगम कई श्रेणियों पर अनुशासन कर सकता था. नैगम को हम आंग्ल शब्द फेडरेशन का पर्याय भी मान सकते हैं. उनके अनुसार—
‘निगम को प्रायः गिल्ड अथवा नगर के समतुल्य माना जाता है. यह श्रेणि की अपेक्षा बड़े होते थे. गुप्तकाल के आसपास निगम का किसी एक परिक्षेत्र में कार्यरत श्रेणियों पर नियंत्रण होता था.’9
मित्र मिश्र ने ‘वीरमित्रोदय’ में नैगम को परिभाषित करते हुए कहा है कि, पौर वणिकों को नैगम कहते हैं.10 वैधानिक दृष्टि से नैगम आधुनिक जायंट स्टा॓क कंपनी के अनुरूप होते थे. डा॓. सत्यकेतु विद्यालंकार के विचार भी दृष्टव्य हैं—
‘जायंट स्टा॓क कंपनी के ढंग से संगठित होकर व्यापारी लोग अपने जो समूह बनाते थे, उनकी संज्ञा ‘संभ्भूय समुत्थान’ थी. पर शिल्पियों की श्रेणियों के समान व्यापारियों के समूह भी विद्यमान थे, जिन्हें ‘निगम’ कहा जाता था….जिस प्रकार शिल्पी लोग श्रेणि में संगठित होकर अपने साथ संबंध रखने वाले विषयों पर कानून बनाते थे और शिल्प को नियंत्रित करते थे, उसी प्रकार निगम में संगठित व्यापारी अपने व्यापार के संबंध में व्यवस्था करते थे. क्योंकि पुरों में प्रधानतया व्यापारियों का ही निवास होता है, और वहां वे प्रमुख स्थान रखते थे, अतः स्वाभाविक रूप से पौर संस्था का विकास निगम को आधर बनाकर ही हुआ.11
बौद्ध साहित्य में जनपद एवं नैगम को परस्पर पर्यायवाची के रूप में प्रयुक्त किया गया है.12 निगम के प्रधान या मुखिया को ‘श्रेष्ठी’ कहा जाता था. ‘महाबग्ग’ के अनुसार एक बार राजगृह के श्रेष्ठी के महारोग से व्यथित व्यापारियों ने जब उसका उपचार राजवैद्य से कराने का विचार किया तो वे उसकी अनुमति के लिए सम्राट बिंबसार के दरबार में पहुंचे. वहां जाकर उन्होंने प्रार्थना की कि—
‘हे देव! इस श्रेष्ठी ने आपके और निगम के प्रति बहुत उपकार किया है.’13
स्पष्ट है कि निगम के रूप में संगठित वणिकों को ही ‘नैगम’ कहा जाता था. ये व्यापारिक संगठन अधिकार-संपन्न होते थे, जो क्षेत्रीय श्रेणियों पर अनुशासन बनाए रखकर विकास के लिए बहुआयामी स्तर पर काम करते थे. प्रायः एक ही परिक्षेत्र में रहने वाले व्यापारी, शिल्पकार, श्रेणि-प्रमुख अपने परिक्षेत्र से बाहर व्यापार के प्रसार के लिए संगठित होते थे. छोटी-छोटी श्रेणियां भी, अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा एवं व्यावसायिक स्पर्धा में बने रहने के लिए, निगम के रूप में एकजुट हो जाती थीं. विक्रमादित्य खन्ना के हवाले से निगम को और गहराई से समझा जा सकता है—
‘आमतौर पर व्यापारियों, दस्तकारों एवं तकनीकी कार्यों में दक्ष व्यक्तियों, यहां तक कि युद्धकला में निपुण सैनिकों के संगठन को निगम अथवा श्रेणि के रूप में पहचाना जाता था…इनमें से श्रेणि, निगम तथा पणि (अथवा पण) अपने समाज के विकास के लिए आर्थिक गतिविधियों में अधिक लिप्त रहते थे.’14
याज्ञवल्क्य स्मृति में निगम को पाषंड एवं श्रेणि के समानांतर रखा गया है. याज्ञवल्क्य के अनुसार पाषंड धार्मिक संप्रदायों के संगठन थे. याज्ञवल्क्य के अनुसार—
‘श्रेणि-नैगम-पाषंड और गण के संगठन की एक ही विधि है.’15
इस विश्लेषण के आधार पर निगम को आधुनिक यूरोपीय गिल्ड अथवा विभिन्न श्रेणियों की फेडरेशन के रूप में दर्ज किया जा सकता है.

पण
पण को मुद्रा का पर्याय माना गया है. पण अथवा पणि का आशय भी सामान्यतः ऐसे संगठनों से था, जो धनार्जन के लिए व्यापार को अपनाते थे. जिनका लक्ष्य अपने सदस्यों के आर्थिक विकास के लिए कार्य करना था. विक्रमादित्य खन्ना ने पणि को श्रेणि एवं नैगम के समकक्ष रखते हुए ऐसा समूह माना है जिसका उद्देश्य अपने सदस्यों का आर्थिक उत्थान था. उनके अनुसार—
‘पणि (अथवा पणि) को सामान्यतः सौदागरों, शिल्पकारों के ऐसे समूह के रूप में जाना जाता है, जो अपने माल की बिक्री के लिए, काफिलों के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान तक निरंतर सफर करते रहते थे.’16
दूसरे शब्दों में पणि व्यापारियों के काफिले थे, जो अपने व्यापार के सिलसिले में देश-देशांतर की यात्रा करते रहते थे. तकनीकी रूप में उनमें तथा श्रेणि के अन्य रूपों में बहुत अंतर नहीं था. उनकी पहचान अक्सर एक-दूसरे में घुलमिल जाती है.

श्रेणि
भारत में सहयोगाधारित व्यापारिक आर्थिक संगठनों के लिए श्रेणि शब्द का उपयोग ईसा से भी आठ सौ वर्ष पहले से होता आ रहा है परस्पर सहयोगाधारित संगठनों के लिए यह शब्द इतना प्रचलित रहा है कि उन्हें व्यवस्थित करने और वैधानिकता का दर्जा दिलानेवाले नियमों को भी श्रेणिधर्म कहा जाता थासंगठित व्यापार एवं उत्पादन के क्षेत्र में कार्य करने वाले संगठनों के लिए यह संबोधन 1000 ईस्वी; अर्थात मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना तक लोगों की जुबान पर चढ़ा रहा. इन संगठनों के लिए यद्यपि पूग, नैगम, व्रात्य, पाणि, गण आदि संज्ञाएं भी प्राचीनकाल से चली आ रही थीं, विद्वानों ने उनके बीच के सैद्धांतिक अंतर स्पष्ट करने का प्रयास भी किया है, तथापि ऐसे संगठनों के श्रेणि शब्द का प्रचलन ही सर्वाधिक रहा. आज भी इसे गिल्ड के पर्याय के रूप में जाना जाता है. ध्यातव्य है कि गिल्ड श्रेणि के समानधर्मा यूरोपीय संगठन हैं. तथापि भारतीय प्रायद्वीप में श्रेणि शब्द का उपयोग व्यापक संदर्भ लिए हुए था. लगभग सभी प्रकार के व्यापारिक, उद्यमी और राजनीतिक संगठनों, नागरिक सेवा प्रदान करने वाले निकायों को श्रेणि के नाम से पहचाना जाता था.
जहां तक प्राचीन संदर्भों की बात है, विष्णुधर्मसूत्र में श्रेणि का उल्लेख संगठित समाज के लिए किया गया है, जबकि मिताक्षरा ने श्रेणि को पान के पत्तों के व्यापारियों का समुदाय माना गया है.17 याज्ञवल्क्य ने श्रेणि को विभिन्न जातियों के लोगों का संगठन माना है, जो किसी समान आर्थिक-व्यापारिक उद्देश्य के लिए संगठित होते हैं. जो भी हो इतना सत्य है कि श्रेणि व्यापारियों के संगठित समूह थे, जिनकी अपनी पहचान थी. विद्वानों द्वारा उसके बारे में अलग-अलग व्याख्या, उनके अनुभव और भौगोलिक परिस्थितियों के कारण भी संभव है.
उल्लेखनीय है कि व्यापारिक संगठनों को अलग-अलग नाम का दिया जाना किंचित मतवैभिन्न्य तथा सुविधा की दृष्टि से था. किसी भी व्यक्ति अथवा समूह को अपने हितों की सुरक्षा के अनुसार किसी भी प्रकार के व्यवसाय को अपनाने की छूट थी. हालांकि कई स्थान पर इस नियम में व्यवधान भी थे. व्यवस्था के लिहाज से श्रेणियों को उनके लिए तय व्यवसाय में काम करने की अनुमति प्राप्त थी. ’याज्ञवल्क्य (2/30) ने ऐसे कुलों जातियों, श्रेणियों एवं गणों को दंडित करने को कहा है, जो अपने आचार-व्यवहार से च्युत होते हैं.’18 नारद स्मृति में भी श्रेणि, नैगम, पूग एवं गण का जिक्र करते हुए उनके परंपरानुरूप कार्यों की व्याख्या की गई है. 
इन संगठनों के व्यवसाय के अनुसार उनकी संरचना एवं सामाजिक प्रस्थिति में भी अंतर था. याज्ञवल्क्य ने लिखा है कि पूगों एवं श्रेणियों को अपने झगड़ों का अन्वेषण करने, उन्हें सुलझाने का पूरा अधिकार है. उन्होंने पूग को श्रेणि से उच्चतम स्थिति में माना है. मिताक्षरा ने भी याज्ञवल्क्य का समर्थन करते हुए श्रेणि और पूग के बीच पूग की उच्चतम स्थिति को ही मान्यता दी है. मिताक्षरा के अनुसार—
‘पूग एक स्थान की विभिन्न जातियों एवं विभिन्न व्यवसाय वाले लोगों का समुदाय है और श्रेणि विभिन्न जातियों के लोगों का समुदाय है—जैसे हेलाबुकों, तांबूलिकों, कुविंदों (जुलाहों) एवं चर्मकारों की श्रेणियां. चाहमान विग्रहराज के प्रस्तरलेख में ‘हेड़ाविकों को प्रत्येक घोड़े के एक द्रम्म देने का वृत्तांत मिलता है. नासिक अभिलेख संख्या 15 में लिखा है कि अभीर राजा ईश्वरसेन के शासनकाल में 1000 कार्षापण कुम्हारों के समुदाय (श्रेणि) में, 500 कार्षापण तेलियों की श्रेणि में, 2000 कार्षापण पानी देनेवालों की श्रेणि (उदक-यंत्र-श्रेणि) में स्थिर संपत्ति के रूप में जमा किए गए, जिससे कि उनके ब्याज से रोगी भिक्षुओं की दवा की जा सके. नासिक के नौवें एवं बारहवें शिलालेखों में जुलाहों की श्रेणि का भी उल्लेख है. हुविष्क के शासनकाल के मथुरा के ब्राह्मशिलावालों एवं कांस्यकारों (ताम्र एवं कांसा बनानेवालों) की श्रेणियों में धन जमा करने की चर्चा हुई है. स्कंदगुप्त के इंदौर ताम्रपत्र में तैलियों की एक श्रेणि का उल्लेख है. इन सब बातों से स्पष्ट है कि ईसा के आसपास की शताब्दियों में कुछ जातियों, यथा लकड़हारों, तेलियों, तमोलियों, जुलाहों आदि के समुदाय इस प्रकार की संगठित एवं व्यवस्थित थे कि लोग उनमें निःसंकोच सहस्रों रुपये इस विचार के साथ जमा करते थे कि उनसे ब्याज-रूप में दान के लिए धन मिलता रहेगा.’19
स्पष्ट है कि प्राचीन भारत में श्रेणियां न केवल संगठित व्यापार का माध्यम बनी हुई थीं, बल्कि वे आधुनिक वित्तीय संगठनों की तरह व्यवहार भी करती थीं. लोग अपना व्यक्तिगत धन भी मुनाफे या लाभ की इच्छा के साथ उनके पास जमा कर सकते थे. उस समय के शासकों को भी श्रेणियों की वित्तीय क्षमताओं पर पूरा विश्वास था. यहां तक कि राज्य के दायित्वों को पूरा करने के लिए भी श्रेणियों में धन निवेश किया जाता था. मथुरा से प्राप्त दूसरी शताब्दी के एक दस्तावेज में बुनकरों की दो श्रेणियों में से प्रत्येक के पास चांदी के 550 सिक्के जमा करने का उल्लेख मिलता है, ताकि उससे प्राप्त ब्याज से ब्राह्मणों तथा गरीबों को भोजन कराया जा सके. ब्याज की दर बहुत उपयुक्त बहुत कुछ वर्तमान दरों के अनुकूल थी. प्रोफेसर किरण कुमार थपल्याल के अनुसार नासिक अभिलेख में जुलाहों को दो हजार कार्षापण एक रुपया सैकड़ा प्रतिमाह ब्याज की दर से प्रदान किए गए थे, ताकि उस धन से भिक्षुओं के लिए भोजन, वस्त्र आदि का प्रबंध किया जा सकें. इसी प्रकार एक अन्य दस्तावेज में भिक्षुओं को जलपान कराने के लिए एक हजार कार्षापण 0.75 रुपया प्रतिमाह के ब्याज पर जुलाहों की एक और श्रेणि को दिए जाने का भी उल्लेख है. इसी प्रकार गुप्त सम्राट स्कंदगुप्त के एक लेख में इंद्रपुर निवासिनी तेलियों की श्रेणि को कुछ धन उधार के रूप में देने का उल्लेख हुआ है, ताकि उससे मिलने वाले ब्याज से सूर्य मंदिर के दीपों के लिए तेल का खर्च निकलता रहे. इन उद्धरणों से सिद्ध होता है, कि उस समय के बड़े राज्य भी अपनी समाज-कल्याण संबंधी योजनाओं को पूरा करने के लिए भी श्रेणियों की वित्तीय स्थिति और साख का लाभ उठाने का प्रयास करते रहते थे—
‘ये श्रेणियां बैंक का कार्य करती थीं, और इनको इतना टिकाऊ एवं चिरस्थायी माना जाता था कि स्वयं राजा या राजपुरुष भी इनके पास अक्षयनिधि (न लौटाया जाने वाला धन) रखा करते थे. धन को जमा करने की बात को निगम-सभा के सम्मुख भी सुनाया जाता था.20
सामूहिक सहमति और सर्वकल्याण की भावना के आधार पर गठित उन व्यापारिक संगठनों को व्यापक अधिकार प्राप्त थे. किंतु यह आधिकारिता तभी तक मान्य थी, जब तक कि समूह अपने और राज्य के हित में कल्याण के कार्यक्रमों का संपादन करें. उन्हें किसी प्रकार का राष्ट्रविरोधी अथवा जनविरोधी कार्य करने की अनुमति नहीं थी. राजा को ऐसे समूहों पर नियंत्रण करने का शास्त्रोक्त अधिकार प्राप्त था. कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में इन अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या की है. वैसे भी आर्थिक उपलब्धियों को नीति, मर्यादा एवं सामाजिक शुचिता द्वारा नियंत्रित एवं मर्यादित करने की परंपरा भारतीय समाज में आदिकाल से ही रही है, जिसे प्रायः सभी धर्मग्रंथों में सम्मानित स्थान प्राप्त हुआ है. भारतीय परंपरा में अर्थनीति विषयक एक सिद्धांत है, उसके अनुसार—
‘जिस मनुष्य का आर्थिक जीवन शुद्ध है—वह स्वयं भी शुद्ध है.21
इसका सीधा-सा आशय है कि नैतिक पवित्रता के लिए व्यक्ति को अपने आर्थिक जीवन की पवित्रता का ध्यान रखना अत्यावश्यक है. बिना आर्थिक जीवन में पवित्रता लाए सामाजिक जीवन में शुद्धता संभव नहीं है. परोक्ष रूप में यह सिद्धांत जहां मानव जीवन में अर्थ की महत्ता को स्वीकार करता है, वहीं उसकी प्राप्ति के मार्ग को भी मर्यादित करता हुआ चलता है. आर्थिक जीवन में पवित्रता और नैतिक मर्यादाओं पर जोर, ये भावनाएं भारतीय समाज में मौजूद तत्कालीन लोकोन्मुखी व्यवस्थाओं की ओर संकेत करती हैं. साफ है कि उन दिनों भारतीय समाज में सहकारिता भले ही उस रूप में मौजूद न रही हो, जैसा कि हम आज उसको देखते हैं, मगर वह सिद्धांत और भावनात्मक रूप भारतीय चिंतन परंपरा सहकारिता की भावना के बहुत निकट है. यहाँ ध्यान रखना होगा कि प्राचीन समाज में जनसाधारण शैक्षिक रूप में भले ही बहुत अधिक उन्नत न हों—बड़े-बड़े शास्त्रों का अध्ययन-मनन करने में भी वे भले ही असमर्थ रहते हों, किंतु मानव सभ्यता के प्रत्येक कालखंड व्यावहारिक ज्ञान की उनमें प्रचुरता ही रही है. सभ्यता के प्रारंभिक दौर में भी भारतीय समाज में लगभग वे सभी व्यवस्थाएँ मौजूद थीं, जिन्हें समाज कल्याण की अनिवार्यता माना जाता है. जहाँ तक सहकारी समूहों की व्याप्ति की बात है, प्रोफेसर आर.सी. मजूमदार ने 27 प्रकार की समितियों का उल्लेख अपनी पुस्तक ‘प्राचीन भारत में सहकारी जीवन’ Cooperative Life in Ancient India) में किया है. एक अन्य स्थान पर कात्यायन ने लिखा है कि समितियाँ कई प्रकार की होती थीं और उन्हें कई नामों से पुकारा जाता था. डा॓. सत्यकेतु विद्यालंकार ने अपनी पुस्तक प्राचीन भारत की शासन-संस्थाएं एवं राजनीतिक विचार में बौद्ध ग्रंथों के हवाले से लिखा है कि उन दिनों अठारह प्रकार की श्रेणियां थीं. इसी प्रकार कौटिल्य ने भी अर्थशास्त्र में अठारह प्रकार के व्यापार समूहों का उल्लेख किया है, जिनका उस समय के समाज एवं शासन पर व्यापक प्रभाव था.
© ओमप्रकाश कश्यप
opkaashyap@gmail.com

संदर्भानुक्रमणिका
1. गणाः पाषंडपूगाश्च व्राताश्च श्रेणयस्तथा. समूहस्थाश्च ये चान्ये वर्गाख्यास्ते. – बृहस्पतिः. स्मृतिचंद्रिका (व्यवहार) में उद्धृत कात्यायन-वचन. धर्मशास्त्र का इतिहास, खंड एक, पा. वा. काणे से उद्धृत.
2. हंसा इव श्रैणिशो यतंते यदाक्षिषुर्दिधयमंमश्वा, ऋग्वेद 1.163.10.
3. पूगौ वै रुद्रः. तदेनं स्वेन पूगेन समर्धयति. कौषी. ब्राह्मण, 16.7.
4. तस्मादु ह वै बह्मचारिसंघं चरंतं न प्रत्याचक्षीतापि हैतेष्टेबंविधा एवं व्रतः स्यादिति हि ब्राह्मणम्.
5. The puga and vrata to entities with members that often had economic motivations, but were also residents of an entire town or village devoted to a profession.- Vikramaditya Khanna, in The Economic History of The Corporate Form in Ancient India.
6. ऐपिग्रैफिया इंडिका, जिल्द 2, पृ. 124. आचार्य काणे के ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ से उद्धृत.
7. The samgha is generally viewed as referring to political organizations though it might sometimes be used to refer to educational and religious ones (e.g., groups of Buddhist monks).- Vikramaditya Khanna.
8. More generally, the gana and samgha appear to refer to political and religious entities…at The gana may initially have referred only to business people, but later it more often refers to political and religious bodies.- Vikramaditya Khanna.
9. …the nigama was often considered similar to a guild or city and larger than the sreni). -round the time of the Gupta Empire the nigama may have had control over sreni in a region.- Vikramaditya Khanna.
10. नैगमाः पौरवणिजाः. वीरमित्रोदय, प्रष्ठ—120.
11. डा॓. सत्यकेतु विद्यालंकार: प्राचीन भारत की शासन-संस्थाएं एवं राजनीतिक विचार, पृष्ठ-273.
12. सब्बे नैगम जानपदे. Jatak vol. 1, Page – 149 तथा नैगमा च एव जानपदा च ते भवं राजा आमन्तयत्तम. दीर्घ निकाय परिच्छेद-दो.
13. बहुउपकार देवस्य च नेगमस्य च. महाबग्ग- 7/1/16
14. Nigama and sreni refer most often to economic organizations of merchants, crafts people and artisans, and perhaps even para-military entities…Of these the sreni, nigama and pani are the ones most frequently engaged in economic activities.- Vikramaditya Khanna.
15. श्रेणि नैगम पाषंड गणानामप्ययं विधिः. याज्ञ.
16. Finally, the pani is often interpreted as representing a group of merchants traveling in a caravan to trade their wares.- Vikramaditya Khanna.
17. धर्मशास्त्र का इतिहास: आचार्य पांडुरंग वामन काणे, खंड प्रथम, पृष्ठ – 124. 18. वही, पृष्ठ – 124.
19. वही, पृष्ठ – 124.
20. डा॓. सत्यकेतु विद्यालंकार: प्राचीन भारत की शासन-संस्थाएं एवं राजनीतिक विचार, पृष्ठ-273.
21. यो अर्थशुचि स सुचिः.

July 26, 2009

उपन्यास की प्रासंगिकता और सरोकार

सर विद्याधर सूरज नायपाल की प्रतिष्ठा विदेशों में चाहे जिसके लिए हो परंतु भारत में उनकी चर्चा प्रायः उनके विवादित बयानों के कारण ही होती है. शायद इसलिए कि अपने साहित्य के माध्यम से वे आम पाठक के मन में वैसा स्थान नहीं बना पाए हैं जो किसी नोबल पुरस्कार प्राप्तकर्ता साहित्यकार के लिए अपेक्षित रहता है अथवा जिसकी वह उम्मीद बांधे रखता है. न ही उनकी किसी ऐसी कृति के बारे में सुनने को मिला है जिसने पुस्तक बाजार में बिक्री के कीर्तिमान कायम कर साहित्य के गंभीर पाठकों का ध्यान अपनी और आकर्षित किया हो. यह भी हो सकता कि उनके नाम पर होने वाले विवादों में उनका अपना योगदान जरा भी न हो और जिसकी की पर्याप्त संभावना है; मीडिया ही उनकी बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता रहा हो. किंतु मीडिया को मसाला तो वही उपल्ब्ध कराते होंगे. या उनकी रहस्यमय चुप्पी मीडिया के दुस्साहस को बढावा देने का काम करती होगी. स्वयं उनके लेखन में भी विद्वानों ने साम्राज्यवाद के पक्षधर तत्वों की खोज की थी. और अपना मीडिया भले ही अपनी जनपक्षधरता का चाहे जितना वास्ता दे, वह असल में है तो पूंजीवाद की जारज संतान ही.

एक बार उन्होंने विनोबा भावे को लेकर अभद्र टिप्पणी की थी और उन्हें गांधी जी का भौंडा नकलची तक कह दिया था. हमारे इस आलेख का विषय भी उनकी एक फतवेबाजी ही है. उन्होंने एक बार कहा था कि उपन्यास अपना समय पूरा कर चुका है. केवल गैरऔपन्यासिक लेखन ही आज के यथार्थ को पकड़ सकता है. जो लेखक केवल कथासाहित्य लिखने में ही अपना समय बिताते हैं; वे एक दिन अपनी सामग्री को झुठलाते हुए नजर आएंगे. सर विदिया के बयान पर आगे चर्चा करने से पहले हम बता दें कि उपन्यास के अंत की घोषणा करने वाली साहित्य-जगत में यह पहली या अकेली फतवेबाजी नहीं है. विदेश को लें तो वहां उपन्यास की मौत का ऐलान सबसे पहले टी. एस. इलियट ने सन 1940 में किया था. लेकिन हुआ क्या? योरोप में ही एक के बाद एक इतने कालजयी उपन्यास सामने आए कि कुछ अर्से बाद ही इलियट साहब की घोषणा की निस्सारता सामने आने लगी थी. हिंदी में शायद सुधीश पचैरी कुछ साल पहले कविता के अंत की भविष्यवाणी के रूप में ऐसी ही बचकानी घोषणा की थी. उनकी फतवेबाजी भी कभी की टांय-टांय फिस्स हो चुकी है. इधर राजेन्द्र यादव आजकल कहने लगे हैं कि बड़े उपन्यासों का जमाना अब नहीं रहा. इस भागमभाग भरे समय में लोगों के पास इतना समय कहां कि वे भारी-भरकम उपन्यासों के लिए समय निकाल सकें. इन्हीं राजेन्द्र यादव ने कभी कहा था कि उपन्यास जनता का महाकाव्य होता है. जिन चरित्रों को महाकाव्यों में जगह नहीं मिल पाती उन्हें उपन्यास बड़े सम्मान के साथ संजोए रखता है. उनकी इस बात में पूरा दम भी था. हावर्ड फा॓स्ट का ‘आदि विद्रोही’, पर्ल बक का सुप्रसिद्ध चीनी उपन्यास ‘दि गुड अर्थ’, प्रेमचंद का ‘गोदान’, गौर्की का ‘मां’, रेणु का ‘मैला आंचल’, पन्नालाल पटेल का ‘जीवनः एक नाटक’, संजीव का बिहार के महान लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के जीवन पर लिखा गया उपन्यास जैसे उपन्यासों की लंबी शृंखला है; जिन्हें राजेन्द्र यादव जी के उपर्युक्त कथन के समर्थन में रखा जा सकता है. इन सबके बावजूद बड़े उपन्यासों को लेकर राजेन्द्र जी हताशा की वजह क्या हो सकती है यह तो वही जानें. हालांकि हिंदी में ही उपन्यासों के भविष्य को लेकर सवाल करने वाले वे अकेले नहीं हैं. इसी बात को लघुकथा लेखक कुछ अलग ढंग से उठाकर लघुकथा के पक्ष में तर्क गढ़ते रहे हैं.

सच यही है कि उपन्यास न कभी मरा था, ना उस तरह का कोई खतरा उसके सामने रहा है. गोपाल राय ने अपने जनसत्ता में छपे एक लेख में गार्जियन द्वारा कराए गए एक सर्वे का उल्लेख किया है जिसके अनुसार ‘विगत पचास वर्षों में उपन्यास की स्थिति और भी मजबूत हुई है. एक अन्य सूचना के अनुसार इंग्लैंड के 48 पाठक समूहों के बीच कई हफ्तों तक चली बहस का निष्कर्ष यह था कि विगत सौ वर्षों में प्रकाशित कालजयी उपन्यासों की सूची में निकट अतीत में प्रकाशित उपन्यास अधिक हैं. यही नहीं उपन्यास की लोकप्रियता जानने के बीते साठ सालों के नोबल पुरस्कारों की सूची को भी देखा जा सकता है.’ इसके बावजूद कभी बाजार का डर दिखाकर तो कभी समय की कमी के बहाने उपन्यास और बड़ी साहित्यिक रचनाओं पर संकट की घोषणा करना निठल्लों का षगल बन चुका है.

बहरहाल जिस साल राजेन्द्र यादव ने यह वक्तव्य दिया उसी वर्ष अमरकांत का ‘इन्हीं हथियारों से’, उससे थोड़ा पहले गिरिराज किषोर का ‘पहला गिरमिटिया’, चंद्रकिशोर जायसवाल के ‘चिरंजीव’ और पलटनिया, इनके थोड़े अर्से के बाद दूधनाथ सिंह का ‘आखिरी कलाम’ जैसे खासे सेहतमंद और चर्चित उपन्यास केवल हिंदी में आ चुके थे. मैत्रेयी पुष्पा का ‘अल्मा कबूतरी’ और कमलेष्वर का ‘कितने पाकिस्तान’ भी दुबले-पतले उपन्यास नहीं माने जा सकते. इस नाकुछ कलमकार का उपन्यास ढाई कदम भी चार सौ से अधिक पृष्ठों का था. गैर हिदी क्षेत्र के उपन्यासों में लें तो तकषी नारायण पिल्लै का ‘रस्सी’, गोपीनाथ मोहंती का ‘माटी-मटाल’, शिवाजी सावंत के दो उपन्यास ‘मृत्युंजय’ और ‘छावा’ पर्याप्त स्थूलकाय और सुचर्चित कृतियां हैं. जिनके नए-नए संस्करण आज भी निकलते रहते हैं. बिल्कुल नई रचना को ले तो भगवान दास मोरवाल का ‘बावल तेरे देश में’ और ‘रेत’छपे और दोनों ही खूब चर्चित भी रहे. यदि बाजार के लिहाज से देखें तो प्रकाशक खुले मन से स्वीकारते हैं कि उपन्यास की बिक्री, साहित्य की किसी भी अन्य विधा से अधिक होती है. खरीदते समय पाठक प्रायः उपन्यासकार और उपन्यास की विषयवस्तु को देखता है, उसके आकार को नहीं. और यदि किसी उपन्यास को खरीदने से खुद को रोके रखता है तो उसका कारण उपन्यास के मूल्य का उसकी पहंुच से बाहर होना होता है. सच तो यह है कि अच्छे उपन्यासों की मांग बाजार में हमेषा बनी रहती है. अब यदि दृष्टि-दुर्बलता के कारण राजेन्द्र यादव भारी-भरकम उपन्यास नहीं पढ़ पाते हैं अथवा रुचि की कमी, समय के अभाव या अन्य किसी कारण से सर विदिया उपन्यास-पाठन से परहेज रखते हैं, या उनका आनंद नहीं ले पाते तो यह उनकी या व्यक्ति विषेश की समस्या हो सकती है. इसे लेकर फतवेबाजी पर उतर आना अपनी स्थिति और मीडिया की ताकत का अनुचित इस्तेमाल करना है, जिससे बचा जाना चाहिए.

यह बताने की आवष्यकता तो नहीं ही है कि उपन्यास किसी भी समाज के अंतर्बाह्यः जगत का प्रामाणिक लेखा होता है. यह सच को उस रूप में प्रस्तुत करता है जिसमें प्रायः हम देख नहीं पाते अथवा समाज का शिखरस्थ वर्ग निहित स्वार्थ के कारण जिसे छिपाए रखना चाहता है. बीते समय में उपन्यास की लोकप्रियता का कारण ही यह रहा है कि पाठक इसमें न केवल अपने अनुभवों की झलक पा सकता है बल्कि अपने पात्रों के साथ उठ-बैठ और बतिया सकने तक का स्पेस उसके पास होता है. जिसके माध्यम से वह अपने परिचित-अपरिचित समाजों की विषेशताओं को पहचान सकता है. अतः उपन्यास के पक्ष में दिया गया यह बयान बिल्कुल सच लगता है कि वह काल्पनिक पात्रों के सहारे लिखा जाने वाला वास्तविक इतिहास होता है. उसमें वे पात्र भी स्थान पा लेते हैं जिन्हें इतिहास प्रायः दृष्टि-ओझल कर देता है अथवा जो इतिहास के तंग खांचे में फिट नहीं बैठ पाते अथवा जिन्हें संस्थान-विरोधी बताकर हाशिये से बाहर रखने की कोशिषें की जाती हैं. समाज के वास्तविक नायकांे को इतिहास-बहिष्कृत करने का खेल चंूकि सत्ता की केंद्रिकता से जुड़ा है; जिसका चरित्र प्रायः अपरिवर्तनषील होता है. अतः इतिहास के दायरे से वास्तविक नायकों को पीछे ढकेलने की प्रक्रिया, प्रकारांतर में थोडे़-बहुत बदलावों के बावजूद हरेक समाज में अनवरत रूप से चलती रहती है. जिसको स्वर देने के कारण उपन्यास और साहित्य की शेष विधाएं सदैव अपनी प्रासंगिकता बनाए रखती हैं. हालांकि इसी दौर में उन्हें अपने परिमार्जन और परिवर्तन की प्रक्रियाओं से भी गुजरना पड़ता है. जिसके द्वारा वे अभिव्यक्ति के युगानुकूल माध्यमों से स्वयं को समृद्ध करने का काम करती हैं.

इस तरह देखा जाए तो जीवन-जगत की वास्तविकता को परचाने के लिए उपन्यास से सशक्त दूसरा कोई माध्यम नहीं है. सच यह भी है कि उपन्यास का जन्म औद्योगिकरण के बाद की घटना है. मषीनों के आगमन के बाद छपाई कला में सुधार किया गया जिससे उन पुस्तकों को पढ़ना और लिखना संभव हुआ; जिन्हें परंपरागत श्रुति प्रथा के अंतर्गत पढ़ना और कंठस्थ करना संभव नहीं था. परिणामतः बड़ी औपन्यासिक कृतियां रची गईं….एक और बात जिसने उपन्यास लेखन को बढ़ावा दिया, वह है शिक्षा का तीव्र विस्तार. पश्चिम में सोलहवीं शताब्दी औद्योगिकरण की तीव्र गति के कारण शिक्षा की दर में तेजी से इजाफा हुआ. वैज्ञानिक षोधों के द्वारा सभ्यता और संस्कृति में तो बदलाव आए ही, समाज के बौद्धिक स्तर में भी अपेक्षानुरूप सुधार हुआ. जिससे तार्किकता बढ़ी. लोगों को प्रतीकात्मक ढंग से बात कहने का सलीका भी आया. इन सभी ने मिलकर उपन्यास को जन्म दिया. और जिस उम्मीद के साथ उपन्यास को साहित्य की केंद्रीय विधा के रूप में सामने लाया गया उसे उपन्यास ने, साहित्य की अन्य किसी भी विधा के समान, पूरी गंभीरता के साथ पूरा किया. दासप्रथा के विरुद्ध लिखे गए कनाडियन उपन्यास ‘टाम काका की कुटिया’ ने अपने समय में न केवल बाइबल के बाद दूसरे नंबर पर बिक्री का गौरव हासिल किया था, बल्कि दासप्रथा के विरोध में माहौल बनाने में भी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. हावर्ड फा॓स्ट के कालजयी उपन्यास ‘आदि विद्रोही’ के महत्त्व को नकार पाना भी मुष्किल है. यह विलासी और आतंककारी सत्ता के विरुद्ध उत्पीड़ितजन के सार्थक विरोध का सवार्धिक प्रामाणिक दस्तावेज है. जो यह दर्शाता है कि सत्ता का स्वरूप चाहे जितना दमनकारी और ताकतवर क्यो न हो, संगठित विरोध के माध्यम से उसे निस्तेज किया जा सकता है. एकदम हाल की बात लें तो नाटकीयता के अतिरेक तथा कथानक में भटकाव के बावजूद ‘कितने पाकिस्तान’ ने सांप्रदायिकता से जूझने के साथ-साथ हिंदी-जगत में व्याप्त पाठकीय जड़ता को तोड़ने में जो कमाल हासिल किया था, उसे यूं ही नजरंदाज नहीं किया जा सकता. बताते हैं कि बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश के सुदूर अंचलों में इस उपन्यास की छायाप्रतियां खूब बेची गईं. प्रकाशन के करीब दो साल में ही इसके पांच-छह संस्करण आ चुके थे. यह घटना इकीसवीं शताब्दी की दहलीज पर बिल्कुल हाल ही में घटित हुई है. उसके बाद यानी पिछले चार-पांच सालों में बाजारवाद के नाम पर ऐसा कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ा है कि उपन्यास के अस्तित्व का रोना रोया जाए. फिर वर्तमान में सामाजिक परिवर्तनों का जो रूप हम देख रहे हैं; उपन्यास का जन्म भी लगभग वैसे ही परिवेश में हुआ है. हालांकि बाजार तब इतना संगठित और वाचाल नहीं था.

अब जरा यह भी देख लिया जाए कि वे कौन लोग हैं जो उपन्यास के अंत की कल्पना कर रहे हैं और उनकी मंषा क्या है? सच यह भी है कि जबसे उपन्यास का जन्म हुआ तब से, इन तीन-चार शताब्दियों में दुनिया बहुत आगे आ चुकी है. संचार माध्यमों तीव्र विकास ने लोगों की जीवनषैली को आमूल बदलने में सफलता प्राप्त की है. जीवन-गति में तेजी आई है. ऐसे में ज्ञानविज्ञान के जो माध्यम सामाजिक संरचना एवं मानव-मन के अंतःप्रदेशों की कारगर यात्रा के लिए जाने जाते हैं, मनुष्य और समाज के संबंधों और उनके अंतद्वंद्वों को स्वर देते रहे हैं, उनका महत्त्व अपेक्षाकृत घटा है. इसके बावजूद ऐसा कोई कारण मुझे नजर नहीं आता जो उपन्यास के अंत का सूचक जान पड़े. अतः सर विदिया का यह बयान सीधे-सीधे बाजार से अनुप्रेरित और उसी के हक में दिया गया विशुद्ध व्यावसासिक वक्तव्य लगता है. कुछ इस प्रकार का वक्तव्य जैसा कि हमारे फिल्मी अभिनेता अपनी नई फिल्म को चर्चा में लाने के लिए उसके बाजार में आने से पहले अकसर देते रहते हैं.

शिक्षा, संस्कृति और कला के उपादानों का प्रयोग अपनी छवि निर्माण के लिए करना कोई आज की बात नहीं है. शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य विवेकीकरण को गति प्रदान करना है; जो ज्ञान की सामान्य स्थिति से ऊपर उठने की कला है. ताकि व्यक्ति अपने आस-पास की घटनाओं पर प्रबुद्धता पूर्ण निर्णय ले सके. यह स्थिति उन लोगों/संस्थाओं के भी प्रतिकूल जाती है जिनके हितों को विवेकीकरण की प्रकिया से चोट पहुंचती है. अतः शीर्षस्थ शक्तियां किसी न किसी माध्यम से विवेकीकरण की प्रक्रिया को अवरुद्ध करने का कार्य करती रहती हैं. इस कार्य को वे इतनी चतुराई और सच कहें तो धूर्तता के साथ करती हैं, कि इससे उनकी लोकलुभावन छवि को कोई ठेस नहीं पहुंच पाती. स्वार्थी व्यवस्था के पक्ष में तर्क जुटाने के वे प्रायः समर्थक बुद्धिजीवियों को अपने साथ रखती हैं. प्रचारतंत्र या तो उनके प्रभामंडल में आ जाता है अन्यथा वे उसपर किसी न किसी प्रकार कब्जा जमा लेती हैं. कभी-कभी गुलाम मीडिया के माध्यम से केंद्रीय मनीषी के रूप में गैरप्रतिभाशाली बुद्धिजीवी भी थोप भी दिए जाते हैं. चूंकि ऐसे लोगों का कोई वैचारिक आधार नहीं होता, अतः ये सत्ताधीश वर्ग के लिए सबसे कभी चुनौती नहीं बन पाते. सत्ता से जुड़ने तथा सत्ताधीशों के करीब रहने का लालच और उनसे लाभ कमाने की छिछली प्रवृति भी, स्वार्थी कलमकारों को उससे जोड़े रखती है. अपनी आश्रयदाता शक्तियों के हितसाधन के लिए ये बुद्धिजीवी समय-समय पर फतवेबाजी करके जनता को भरमाते रहते हैं. उनका कुल उद्देष्य यथास्थिति को छेड़े बिना परिवर्तन की स्वयंस्फूर्त धाराओं को अपने पक्ष में मोडे़ रखना होता है. ताकि उनके शोषक, समाज के शीर्षस्थ वर्ग के हितों को किसी भी प्रकार की चोट न पहुंचे.

मीडिया द्वारा साहित्य की उपेक्षा तथा उपन्यास के अंत की हाल की घोषणा को बाजार के बढ़ते वर्चस्व से जोड़कर भी देखा जा सकता है. यह बाजार के हक में होता है कि वह उपभोक्ताओं की भीड़ पैदा करे ताकि माल की खपत के अधिकाधिक अवसर पैदा हों. मुनाफा बढ़े. चूंकि विवेकीकरण की प्रक्रिया उपभोग को संतुलित करने का काम करती है. यह उपभोग को जरूरी चीजों बनाम तात्कालिक रूप से गैरजरूरी चीजों में बांटकर रखती है. चूंकि समस्त उपभोक्ता क्रांति की सफलता गैरजरूरी चीजों को रहन-सहन और प्रतिष्ठा से जोड़कर उन्हें अनिवार्य बना देने में निहित है, अतः बाजारवादी शक्तियां सबसे पहले विवेकीकरण पर ही हमला करती हैं. ताकि मनुष्य बिना किसी व्यवधान के उपभोक्ता वस्तुओं को अपनी प्रतिष्ठा का प्रतीक मानता रहे. हमें याद रहना चाहिए कि करीब दो दशक पहले बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए शिक्षा में व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को बढ़ावा देने की मांग बहुत जोर-शोर से की जा रही थी. बेकारी से निपटने के लिए यह आवश्यक भी था कि हमारे शिक्षालय केवल किताबी ज्ञान देने वाले संस्थान ही बनकर न रह जाएं. शिक्षा कम से कम इस लायक तो होनी ही चाहिए कि उससे व्यक्ति की जीविका का साधन हो सके. लेकिन शिक्षा का एक अन्य उद्देष्य जो उसके अन्य किसी भी लक्ष्य से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है, व्यक्तित्व का परिष्करण करना भी है. उसका यह उद्देष्य भी है कि वह विवेकीकरण की गति को बढ़ावा दे. बावजूद इसके बेरोजगारी का हव्वा दिखाकर व्यवसायमूलक शिक्षा के नाम पर देश के शिक्षासदनों को सीधे-सीधे बाजार के हवाले कर दिया गया. परिणाम आज हम सभी के सामने है. उच्चशिक्षा या कि जिसे व्यवसायमूलक शिक्षा का नाम दिया जा रहा है, आज इतनी महंगी हो चुकी है कि किसान या मजदूर की संतान उसके बारे सोच भी नहीं सकती. स्पर्धात्मक शिक्षा के नाम पर हमारे अघिकांश विद्यालय दोयम दर्जे की प्रतिभा के उत्पादक बनकर रह गए हैं. मैकाले ने जो काम ब्रिटिश हुकूमत को जमाने के लिए किया था वही काम आज हमारे व्यावसायिक शिक्षासदन बाजार की बेहतरी के लिए कर रहे हैं. बाजार द्वारा पोषित एवं संचालित हमारा तमाम मीडिया उच्चवर्ग की अमीरी तथा मध्यवर्ग के चेहरे पर आई चमक को देश की खुशहाली बताकर अपना उल्लू सीधा कर रहा है. बाजारवादी शक्तियों के समर्थन पर टिकी सरकारें चूंकि बेरोजगारी की समस्या से अपना पल्ला झाड़ना चाहती हैं और उनमें बैठे लोग बाजार का फायदा उठाने के चक्कर में रहते हैं, अतः वह निजी शिक्षण संस्थाओं को बढ़-चढ़कर लाइसेंस दे रही है. शिक्षा जिसको कभी मानवीकरण का माध्यम और शिक्षण को पवित्र उद्देष्य माना जाता था, आज वह पूरी तरह खरीदफरोख्त की चीज बन चुकी हैं. स्वाभाविक है कि मोटी रकम के बदले डिग्री खरीदकर निकले हमारे युवा अपनी शिक्षा का जल्दी से जल्दी और अधिकतम मूल्य प्राप्त करने की कोशिश में रहते हैं. यह स्थिति बाजार के पक्ष में तो है लेकिन यह उस समाज के पक्ष में हरगिज नहीं कही जा सकती जहां पहले से भारी आर्थिक असमानताएं हैं. जहां एक तिहाई लोग आज भी भीषण गरीबी के साये में जी रहे हैं.

सवाल उठ सकता है कि इससे साहित्य या उपन्यास का क्या सरोकार है. अथवा उपन्यास या साहित्य के संकट को क्यों बाजार से जोड़कर देखना चाहिए. किसी भी साहित्यिक रचना अथवा पुस्तक की उपयोगिता उसकी विषयवस्तु या उसमें सन्निहित ज्ञान की मौलिकता से ही तय नहीं की जा सकती; बल्कि इस बात से भी देखी जाती है कि वह रचना पाठक के मस्तिष्क को कितना ऊर्जस्वित और उद्वेलित कर पाती है. दूसरे शब्दों में एक अच्छी पुस्तक अपने पाठक के मानस में भी विकसित होती रहती है. साथ-साथ वह पाठक को इस योग्य भी बनाती है कि वह स्थितियों का धैर्य पूर्वक, नीर-क्षीर विश्लेषण करते हुए बेहतर निर्णय ले सके. पुस्तकें पीढ़ियों के अनुभव का निचोड़ होती हैं. उनकी योग्यता किसी समस्या पर फैसला देने से नहीं आंकी जाती. बल्कि इस बात से आकलित की जानी चाहिए कि वे भिन्न-भिन्न परिस्थितियों रह रहे पाठकों की निर्णय लेने की क्षमता को किस हद तक बढा पाती हैं. किंतु यह तभी संभव है जब पाठक का मानस पुस्तक के मूलतत्व को ग्रहण करने में सामर्थवान हो. उपन्यास स्थितियों को बृहद परिप्रेक्ष्य में देखने की योग्यता प्रदान करता है. हालांकि साहित्य की दूसरी विधाएं भी पाठक के मानस को उद्वेलित करने का काम करती हैं. लेकिन उपन्यास में स्थितियों का बारीक चित्रण एवं अनुभवों की विशद्ता होती है जो निष्चय ही पाठक को एक विराट संसार से जोड़ने का कार्य करती है. जिससे परिस्थितियों की विवेचना के लिए उसके पास अपेक्षाकृत अधिक विकल्प होते हैं. इस तरह किसी भी साहित्यिक कृति का असली महत्त्व उस उद्वेलन से आंका जाना चाहिए जो पाठक के मानस में उमड़ता है तथा प्रकारांतर में जिसकी परिणति सार्थक सामाजिक परिवर्तन के रूप में होती है.

अब जरा इस बात पर भी विचार करके देखा जाए कि उपन्यास या साहित्य की भरपाई, क्या सामाजिक समस्याओं पर विद्वानों द्वारा लिखी गई आकादमिक पुस्तकों द्वारा संभव है. निष्चय ही आकादमिक ज्ञान के अपने लाभ होते हैं. साहित्यिक कृति जिस बात को घुमा-फिराकर, अपरोक्ष तथा प्रतीकात्मक ढंग से पाठकों को समझाने का प्रयास करती है, उसको सीधे-सीधे, अधिक प्रामाणिक ढंग से, कम समय तथा बहुत ही कम शब्दों में लेख अथवा पुस्तक के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया जा सकता है. विज्ञान, प्रौद्योगिकी, आदि अनेक विषयों का ज्ञान हम प्रायः इसी तरह की आकादमिक पुस्तकों से प्राप्त करते हुए आ रहे हैं. इसी प्रकार समाज विज्ञान की पुस्तकों का कार्य व्यक्ति को अपने समाज की विषेशताओं से परिचित कराते हुए उसे अपनी संस्कृति तथा परंपरा के करीब बनाए रखना है. इसके बावजूद इस तरह की पुस्तकें उपन्यास या साहित्य जैसी अन्य संष्लेषणात्मक विधाओं का विकल्प नहीं बन सकतीं. जिस तरह व्यक्तित्व निर्माण की बाजार में मिलने वाली पुस्तकों से इस विषय से संबंधित सूचनाएं तो एकसाथ प्राप्त की जा सकती है. मगर उसके लिए जरूरी समझ और भीतरी आग्रह उन पुस्तकों द्वारा संभव नहीं है. चूंकि नएपन की हर खोज के साथ धैर्य अनिवार्य अपेक्षा की तरह जुड़ा होता है. साहित्य, संगीत तथा अन्य मानवीय कलाएं मस्तिष्क को धैर्य और वैचारिकी से समृद्ध करने का काम भी करती हैं. वे मानवीय संवेदनाओं और ज्ञान के बीच उचित तालमेल बनाए रखती है. जिससे सामाजिक परिवर्तनों को सकारात्मक दिशा तथा भरपूर गत्यात्मकता मिलती रहती हैं. आकादमिक पुस्तकें हमारी वौद्धिकता को तो परिपक्व बनाती में लेकिन वास्तविक विवेकीकरण की स्थिति तक नहीं ले जा पातीं. संक्षेप में साहित्य अथवा मानवीय कलाओं की भरपाई अकादमिक स्तर की पुस्तकों से नहीं की जा सकती. चूंकि एक श्रेष्ठ औपन्यासिक प्रस्तुति में गांभीर्य, विवेचनात्मकता, सूक्ष्मता के साथ-साथ संवेदनाशीलता भी सन्निहित होती है; जिससे उसकी भरपाई साहित्य की अन्य किसी भी विधा, आकादमिक ज्ञान की दूसरी किसी भी धारा द्वारा संभव नहीं है.

यहां एक और सवाल खड़ा हो जाता है कि साहित्य की इतनी अपरिहार्यता और उपयोगिता के बावजूद क्या कारण है कि लोग साहित्यिक पुस्तकों से दूर होते जा रहे हैं? शिक्षा के प्रतिशत में आए सुधार के बाद भी पठनीयता का संकट क्यों बरकरार है? हम फिर साफ कर दें कि घटती पठनीयता अथवा पाठकीय संकट का रचना के आकार से कोई संबंध नहीं है. रचना भले ही कितनी बड़ी हो यदि उसमें पठनीयता का स्तर बराबर बना रहे तो वह अपना पाठक वर्ग भी स्वयं खोज लेती है. अतः साहित्य का भला सोचने वालों की कोशिश घटती पठनीयता का स्तर सुधारने की होनी चाहिए. प्रत्येक बड़ा लेखक अपना पाठक वर्ग साथ लिए चलता है. साहित्यिक रचना अपने पाठक के अंतर्जगत में जितना स्पेस बना पाती है वह उतनी ही सफल मानी जाती है. साहित्य का पाठक प्रायः अंतर्मुखी किस्म का जीव होता है. तमाम विद्रोहप्रियता के बावजूद अपनी सभ्यता, संस्कृति और परंपरा को आगे ले जाने की जिम्मेदारी भी इसी वर्ग की होती है. जब हम यह मान लेते हैं कि समाज की विवेकशीलता पर खतरा है तो अप्रत्यक्ष रूप में हम इसी वर्ग के बौद्धिक ह्रास की ओर इषारा कर रहे होते हैं. और जब हम कहते हैं कि साहित्य और संस्कृति पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं तो परोक्ष में हमारा उददेश्य इसी वर्ग की घटी संख्या पर चिंता व्यक्त करने का होता है. शिक्षा के तीव्र व्यवसायीकरण ने इसी वर्ग को नुकसान पहुचाने का कार्य किया है. समाज की उस संवेदनषीलता को भौंथरा करने का काम किया है जो उपभोक्तावाद तथा मशीनीकरण की मार से समाज को बचा सकती है. समाज के बड़े हिस्से में अपसंस्कृतिकरण के प्रति न तो पर्याप्त चिंता है न इस बारे में सोचकर वह अपना दिमाग खराब करना चाहता है. शायद इसी कारण शहरी क्षेत्र में विशेषकर उन स्थानों पर जहां व्यावसायिक शिक्षण संस्थान पर्याप्त रूप से पनप चुके हैं वहां आकादमिक विषयों के लिए पर्याप्त विद्यार्थी नहीं मिल पाते. एक और समस्या साहित्यिक पुस्तकों का नेटवर्क न होने की है. गांवों और कस्बों की तो बात ही रहने दें बड़े-बड़े शहरों में भी साहित्यिक पुस्तकों की कोई दुकान नहीं है. जहां सामान्य पाठक अपनी पसंद की पुस्तक खरीद सकें. जिस गति से छोटे शहरों और कस्बों से साहित्यिक पत्रिकाएं शुरू होती रहती हैं उस गति से साहित्यिक पुस्तकों की बिक्री के प्रबंध नहीं किए जाते. हर कोई सरकार और बाजार पर अपनी भड़ास निकालकर शांत हो जाता है. यह करीब-करीब मान लिया गया है कि साहित्य किसी को रोटी नहीं दे सकता. सहित्य-सृजन को तो पार्टटाइम जा॓ब माना ही जाता है. बड़े-बड़े साहित्यकार इसी कुंठा के शिकार हैं. इसी के कारण राजेन्द्र यादव जैसों को बड़े उपन्यासों पर संकट नजर आता है और सर विदिया जैसे नामचीन साहित्यकार उपन्यास के अंत की घोषणा करने लग जाते हैं.

विकास के चल रहे प्रयासों में मानवीय कलाओं और साहित्य की उपेक्षा का परिणाम आज हम देख ही रहे हैं कि व्यक्ति सुविधाओं का गुलाम बनता जा रहा है. यहां एक और बात साफ कर दी जाए कि साहित्य या अन्य कलाओं का सुविधाओं से वैर नहीं है. वे उनके चयन में विवेक की भूमिका तथा उनके न्यायिक बंटवारे पर जोर अवष्य देती हैं. अर्थात वे विकास को सामाजिकता के दायरे से बाहर जाने से रोकती हैं. यह मान लेना भी बेमानी होगा कि बढ़ती स्पर्धा और आपाधापी के वातावरण में लंबी रचनाओं के लिए पाठकों का सवर्था अकाल रहा है. अगर ऐसा होता तो औपन्यासिक कृतियां बिक्री के लिहाज से सबसे पीछे होतीं. जबकि हालात बिल्कुल विपरीत हैं. इस तर्क में तो दम हो सकता है कि व्यस्तता के चलते कुछ लोग बड़ी रचनाओं के लिए समय नहीं निकाल पाते. परंतु केवल पाठकों की संख्या द्वारा हम किसी विधा की उपयोगिता का आकलन नही कर सकते. विभिन्न विधाओं के पाठकों की संख्या अलग-अलग हो सकती है. अगर रचना का बड़ा आकार ही पाठकीय संकट का कारण होता तो आज की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा हाइकू, दोहा, सोरठा अथवा वैसी ही कोई छोटी विधा होती. जबकि स्थिति बहुत भिन्न है. अमेरिका जैसे अत्याधुनिक देश में भी जो हमसे कहीं ज्यादा आधुनिक और भौतिक परिवेश लिए हुए हैं, उपन्यास और साहित्य की लोकसत्ता में विश्वास किया है. गत सालों में वहां कई रोचक उपन्यासों का सृजन हुआ है. भारत में भी स्थिति संतोषजनक है तथा पूरा विश्वास है कि आगे भी बनी रहेगी. साहित्य हमेशा समाज का मार्गदर्शक रहा है. उपन्यास तो उसका वरद् पुत्र ठहरा. जिसके कंधों पर सर्वाधिक जिम्मेदारी है. इस जिम्मेदारी पर खरा उतरने के उसे वक्त के साथ-साथ जिन आवश्यक परिवर्तनों से गुजरना पड़ेगा उनसे निःसंकोच गुजरेगा. अतीत में भी वह समयानुसार साथ बदलता रहा है. ध्यान रहे कि इतिहास केवल राष्ट्रों-राज्यों का सगा होता है. वह केवल युद्धों, राजा-महाराजाओं, राष्ट्राध्यक्षों तथा उनकी छिनाल आदतों को जगह दे पाता है. मनुष्यता की स्मृतियों को लंबे समय तक संजोए रखने तथा पीढियों के बीच संवाद की स्थिति बनाए रखने का काम साहित्य और दूसरी मानवीय कलाओं का होता है. साहित्य की महत्त्वपूर्ण विधा के रूप में उपन्यास ने हमेशा अपनी उपयोगिता सिद्ध की है. आज भी वह अपरिहार्य है; और बिलाशक आगे भी बना रहेगा. लेख का समापन हिंदी के समान रूप से लिखने वाले सुप्रसिद्ध दक्षिण भारतीय साहित्यकार वेणुगोपाल के वक्तव्य से वाक्य उधार लेकर करना चाहूंगा—

‘मनुष्य सोचता बिंबों अथवा चित्रों में है. इसीलिए दार्शनिकों को कथासाहित्य रचना पड़ा. वेद से काम नहीं चला तो पुराण रचे गए. और सिद्धांत-ग्रंथों से काम न चलने पर कहानी, उपन्यास.’

जाहिर है कि उपन्यास का आगमन सामाजिक विमर्श के एक जरूरी माध्यम के रूप में हुआ है. अतः जब तक मानवीय चेतना और मनुष्यता के लिए सोचने वाले लोग हैं तब तक उपन्यास के अस्तित्व को कोई खतरा नहीं है.

ओमप्रकाश कश्यप

July 19, 2009

रोशडेल पायनियर्स : सहकारिता आंदोलन के उन्नायक वे महान अठाइस बुनकर

इटली की एक कहावत है—जो धीरे चलते हैं, वे दूर तक जाते हैं. इस कहावत को सच कर दिखाया था, रोशडेल पायनियर्स ने. पूंजीवाद से उत्पीड़ित गरीब बुनकरों ने, जो संख्या में केवल अठाइस थे. उनका सपना था, मुक्ति का. उनका सपना था, अपनी राह अपने आप चुनने का. अपनी आधी से अधिक जिंदगी यूरोपीय पूंजीवाद को भेंट कर देने के बाद उनका सपना था, बाकी की जिंदगी में स्वाभिमान को बचाए रखने का. वे कोई बुद्धिजीवी नहीं थे, लेकिन अनुभव से तपे-तपाए थे. वे पूंजीपति भी नहीं थे, लेकिन ईमानदारी और समर्पण जैसी अमूल्य निधियां उनमें से हरेक के पास थीं. वे निर्धन थे, परंतु संकल्प के धनी थे. वे भविष्यदृष्टा नहीं थे, किंतु अपनी मेहनत और संकल्प के सुफल को देख लेने की दूरदृष्टि उनके पास थी. उन्हें संगठन चलाने का भी कोई अनुभव नहीं था, लेकिन दूसरों की सुनना और अपनी बात सलीके से रखना उन्हें अच्छी तरह से आता था.

पूंजीवाद ने उन्हें सताया, उनके पूर्वजों को घर से बेघर किया, लेकिन पूंजी से उन्हें कोई वैर नहीं था. उन्हें वैर था पूंजीवाद से, जो सुरसा के मुंह के समान लगातार फैलता ही जा रहा था, जो मनुष्य की अस्मिता, उसके संस्कार, सभ्यता, संस्कृति और यहां तक कि उसकी पहचान को भी लीलता जा रहा था. भेड़िये के समान जिसके खूनी पंजे इंसानियत को दबोचने को आतुर थे. वे समझ चुके थे कि उनमें से किसी भी एकल शक्ति उस दानव का मुकाबला करने लायक नहीं है. हां, वे मिलकर कोई न कोई हल जरूर खोज लेंगे. इसलिए उन्होंने सहकार को चुना. उसके द्वारा वे चाहते थे—
‘अपनी संगठित-शक्ति द्वारा उस भेड़िये को मनुष्यता की चारदीवारी से बाहर खदेड़ देना.’1
वे चाहते थे पूंजीवाद का हृदय-परिवर्तन. चाहते थे कि वह खुद को बदले, नख-दंत त्यागकर मनुष्य-मात्र की अस्मिता का सम्मान करे…सबके कल्याण की सोचे…धन को तिजोरियों में बंद करने के बजाय जन-जन के काम लाए, इंसानियत निभाए. वे पूंजीवाद का आदर्श विकल्प दुनिया के सामने रखना चाहते थे, जिसमें धन-वैभव, सुख और समृद्धि हो, किंतु पूंजीवाद की एक भी बुराई न हो. न हो दर्प, न ऊंच-नीच का बोध, न धन-संपदा का कोरा अभिमान. आत्मनिर्भर बनना बनना उनका लक्ष्य था, शायद वैसी मजबूरी भी रही हो, इसलिए अपनी समस्याओं से खुद ही जूझने का संकल्प साध बैठे थे. लगभग उन्हीं दिनों ने राबर्ट पील का कहा था, ‘अपनी जिम्मेदारी स्वयं उठाओ’2 वही उन्हें प्रेरित कर रहा था. उनमें से हर एक न केवल अपनी, बल्कि पूरे समूह की जिम्मेदारी उठाने को संकल्पबद्ध था या अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होने के दिए दूसरों की जिम्मेदारियों में सहभागी बनना चाहता था.
उद्यम की शुरुआत के पूंजी अनिवार्य थी. लेकिन वह आए कहां से? गरीब मजदूरों को कर्ज भी कौन देता? देता भी तो कौन उसका ब्याज चुकाता? उसपर असफलता की संभावना भी डराती थी. आखिर इसका हल भी उन्होंने सोच लिया. वह भी सहकार की भावना के शत-प्रतिशत अनुकूल. गोया उस समय उनकी यह धारणा रही हो कि सहकार की शुरुआत ही करनी है तो वह पहले ही कदम से हो. संकल्प पहली ही सांस के साथ साधा जाए. जैसा हल उन्होंने सोचा था, वह दर्शाता था कि वह दूसरों से जैसे नहीं…अलग हैं सबसे. नियमानुसार उनमें से प्रत्येक प्रति सप्ताह एक-एक पैंस बचाता. वह रकम सुरक्षित रख ली जाती थी. मानो वह कोई यज्ञ था, जिसके लिए हर कोई अपनी ओर से समिधा डालने की तैयारी कर रहा था. हां, वह यज्ञ ही तो था. आत्मसम्मान, समानता, आत्मनिर्भरता, आर्थिक स्वावलंबन और सामाजिकता की सुरक्षा के लिए किया जाने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण एवं पवित्र यज्ञ.
हर एक की ओर से एक पाउंड, यानी कुल अठाइस पाउंड रकम जुटाने में दो महीने से भी ज्यादा गुजर गए. बीच में मुश्किलें भी आईं, निराशा और हताशा भी. कई बार लगा कि उनका सपना बीच ही मैं बिखर जाएगा. जो संकल्प वे साधना चाहते हैं, उनकी क्षमता से परे है. पर रास्ते निकलते रहे. उसी मामूली कही जा सकने वाली रकम से उन्होंने एक उपभोक्ता स्टोर की शुरुआत की थी. उस समय उन्होंने सोचा भी न होगा कि उनका मामूली-सा प्रयास, जिसकी कामयाबी में उनमें से अधिकांश को अंदेशा ही रहा होगा, एक दिन पूरे विश्व के लिए प्रेरणादायक सिद्ध होगा और इतना विस्तार लेगा कि कोई भी दूसरा आर्थिक आंदोलन उसका मुकाबला कर पाने में असमर्थ सिद्ध हो.
हम जान लें कि रोशडेल पायनियर्स पहली सहकारी संस्था नहीं थी. रोशडेल पायनियर्स से पहले डा॓. विलियम किंग, राबर्ट ओवेन आदि कई लोग सहकारी समितियों का गठन कर चुके थे. लेकिन वे सभी प्रयास नाकाम रहे थे. रोशडेल पायनियर्स में से एक चार्ल्स हावर्थ स्वयं भी एक सहकारी समिति का गठन कर चुका था, जो असफल सिद्ध हुई थी. उन्हीं अनुभवों से सबक लेते हुए रोशडेल पायनियर्स ने, पिछली कमियों को दूर करते हुए एक सहकारी समिति का गठन किया था. इस बार कठिन अनुशासन और ईमानदारी के कारण उन्हें कामयाबी भी प्राप्त हुई. कामयाबी भी ऐसी कि वर्षों तक रोशडेल पायनियर्स दुनिया-भर में सहकारिता आंदोलन का पर्याय बना रहा. उस समिति की सफलताएं दूसरी समितियों के लिए प्रेरणाएं बनीं. उनके द्वारा बनाए गए नियमों पर आगे चलकर यह आंदोलन आगे बढ़ा और इतनी तेजी से आगे बढ़ा कि पूरी दुनिया में वैकल्पिक अर्थनीति का प्रतीक बन गया.

रोशडेल
इंग्लेंड के सीमावर्ती प्रांत स्का॓टलेंड से एक पठार-शृंखला आरंभ होती है, जो पूरे देश को बीचों-बीच दो हिस्सों में बांट देती है. इस सुदीर्घ पठार-शृंखला का नाम है— पेनी(Pennines). इसकी भौगोलिक स्थिति के कारण इंग्लेंडवासी इसे कभी-कभी ‘इंग्लेंड की रीढ़’ भी कहते हैं. इसी पठार-शृंखला से रोश(Rosh) नामक नदी निकलती है. रोश नदी के किनारे बसे होने के कारण ही उस कस्बे का नाम रोशडेल पड़ा था. वर्षों तक वह कस्बा ईसाइयों के प्राचीन धर्मस्थान के रूप में विख्यात रहा. प्राचीन रोशडेल महज एक गांव था, जहां पर किसान खेती किया करते थे. बाद में कोयले की खानों की खोज हुई तो बाहर से मजदूर वहां आने लगे, जिससे उसकी आबादी भी बढ़ने लगी.
रोशडेल के कायाकल्प की वास्तविक शुरुआत अठारहवीं शताब्दी से हुई, जब मशीनीकरण का लाभ उठाते हुए पूंजीपतियों ने वहां बड़ी-बड़ी कपड़ा मिलें लगानी प्रारंभ कर दीं. रोश नदी के किनारे-किनारे कपड़ा बुनने के कई कारखाने लगाए गए, जिससे वह कस्बा कुछ ही समय में कपड़ा उद्योग के केंद्रीय स्थान के रूप में विख्यात हो गया. बावजूद इसके उनीसवीं शताब्दी के पांचवे दशक तक रोशडेल इंग्लैंड का एक मामूली कस्बा बना रहा. 1840 की जनगणना के अनुसार रोशडेल की आबादी थी मात्र 24423; और वहां का प्रमुख उद्योग था—वस्त्र निर्माण!
मशीनीकरण से पहले रोशडेल में बेहतरीन बुनकर थे. एक से बढ़कर एक, हुनरमंद और बेमिसाल. कारीगर हाथ से महीन मलमल बुनते थे, जिसकी दूर-दूर तक मांग थी. जिंदगी ठीक-ठाक चल रही थी. मशीनें आईं तो सब चौपट होने लगा. वर्षों पुराने जमे-जमाए उद्योग उद्योग उजड़ने लगे. उनमें लगे कारीगर बेरोजगार होते चले गए. हाथ की दस्तकारी मशीनों की गुलाम बनने लगी. बेरोजगारी बढ़ी तो जीने की मुश्किलें भी पांव पसारने लगीं. यहां तक कि जीवन जीना कठिन हो गया. जब पेट भरने को ही कुछ न हो तो तन ढकने को कहां से आए! दूसरों के लिए कपड़ा बुनने वाले, उनका नंगापन ढकने वाले बुनकर स्वयं नंगे रहने लगे. मशीनें अपने मालिक की मनमानी भी साथ लाई थीं. जो अभी भी अपने धंधे को चलाने का संघर्ष कर रहे थे उनका हाल भी कम बुरा नहीं था. चारों ओर से मिलने वाली रिपोर्ट बताती थीं कि—
‘उनके (बुनकरों के) घर का सारा साज-सामान, फर्नीचर आदि बिक चुका था. पहनने को केवल चिथड़े नसीब होते थे. प्रतिदिन सोलह-सोलह घंटे लगातार मेहनत करने वाले कारीगरों का इतना बुरा हाल था कि उन्हें आलू, प्याज, शकरकंद, दलिया, शीरे जैसी चीजों के सहारे पेट भरना पड़ता था.3
मजदूर और कारीगर छोटे-छोटे गंदे और दड़बेनुमा घरों में रहते थे. उनकी बस्तियों में रहन-सहन बहुत शोचनीय था. सफाई व्यवस्था के अभाव में वे अनगिनत बीमारियों का ठिकाना बन चुकी थीं. गरीबी की मार, कारखाना मालिक उनसे दिन में सोलह से अठारह घंटे तक काम लेते थे—
‘कारखानों में न्यूनतम वेतन की कोई अवधारणा ही नहीं थी. इतने घंटे काम करने के बदले में उन्हें जो मजदूरी मिलती थी, उसे आज के हिसाब से देखा जाए तो प्रति सप्ताह मात्र दस पैंस.’4
दस पेंस में अठारह घंटे कार्य. कमरतोड़ परिश्रम. बिना किसी सुविधा, मान-सम्मान के. इतनी राशि उनके भोजन के लिए भी अपर्याप्त सिद्ध होती थी. ऊपर से कारखानों में गंदगी इतनी अधिक थी कि मजदूरों को कोई न कोई रोग हर समय लगा रहता था. सफाई का न तो कोई इंतजाम था, न कारखाना मालिकों का उसकी ओर ध्यान ही जाता था. उनका जोर तो इस बात पर था कि कैसे ज्यादा से ज्यादा बचत करके मुनाफे को बढ़ाया जाए. उल्टे इस प्रकार के सवाल उठाने वालों को नौकरी से बेदखल कर दिया जाता था. इसके लिए मजदूरों का खुलेआम शोषण होता था.
अधिकांश फैक्ट्रियां बच्चों को काम में लगाए रखती थीं, जिन्हें बिना आराम के सोलह-सतरह घंटे लगातार काम करना पड़ता था. बीच-बीच में उन्हें मालिक की ओर से अक्सर चाय और सस्ते बिस्कुट मिलते. इसलिए नहीं कि भूख के कारण भोजन के रूप में वे उनकी जरूरत थे. महज इसलिए कि उन्हें खाकर उनकी कार्यक्षमता को किसी तरह बनाए रखा जाए. विशेष अवसरों पर जब काम की अधिकता होती तो मजदूरों को बिना आराम और अतिरिक्त मजदूरी के बीस-इकीस घंटे तक लगातार काम करना पड़ता था. और कभी-कभी तो रात-दिन काम में ही गुजार दिए जाते थे. कारखानों का वातावरण स्वास्थ्य के एकदम प्रतिकूल था, इस कारण मजदूरों को कोई न कोई रोग हमेशा घेरे रहता था. कई बार बिना उपचार के ही मजदूरों को जान से हाथ धोना पड़ता था—
‘ऊपर से प्रदूषण का बुरा हाल था. वह लगातार बढ़ता ही जा रहा था. सार्वजनिक सफाई व्यवस्था बेहद लचर थी. 1848 में रोशडेल की मजदूर बस्तियों में औसत आयु मात्र इकीस वर्ष थी, जो ब्रिटेन के उस समय के राष्ट्रीय औसत से छह वर्ष कम थी.5
यह कपड़ा मिलों में काम करने वाले उन मजदूरों का दुर्दशा थी, जिनके कारणा रोशडेल की मिलें पूरी दुनिया में अपनी उत्पादकता और अपने मालिकों के लाभ के लिए जानी जाती थीं. जिनके कारण पूरी दुनिया में इंग्लेंड की औद्योगिक प्रगति का डंका पिट रहा था. रोशडेल में स्त्रियों की अवस्था तो और भी दयनीय थी. पूरे मौसम उन्हें मात्र एक जोड़ी कपड़ों में रहना पड़ता था. कभी-कभी तो वे भी चिथड़े बनकर लटकने लगते. उनसे बदबू आती थी. खाली वक्त में स्त्रियां कपड़ों की जुएं बीनती या फिर चिथड़ों सींती रहतीं. विकट गरीबी के कारण अनेक औरतों को अधनंगे बदन ही रहना पड़ता था. हालत उस समय और भी दयनीय हो जाती थी, जब कोई स्त्री बच्चे को जन्म देती थी. उस समय—
‘अपने एकमात्र वस्त्रों को गंदगी से बचाने के लिए औरतें, बच्चे को जन्म देते समय अपने दोनों हाथ ऊपर उठा, दो अन्य औरतों के कंधों का सहारा लेकर खड़ी हो जाती थीं. उसी अवस्था में वे बच्चे को जन्म देती थीं. वे बुनकर जो अपनी बेमिसाल कारीगरी के पूरी दुनिया में जाने जाते थे, जो अपना पूरा जीवन पूरे संसार के लिए कपड़ा और बिस्तर आदि बुनने में लगा देते थे, उनके अपने शरीर पर फटे चिथड़े और बिस्तर पर गंदे तौलिये पड़े होते थे.’6
वे एक-दूसरे से सटाकर बनाए गए, छोटे-छोटे झोपड़ीनुमा कमरों में रहते. ऐसे संकरे कि वहां हवा और धूप मुश्किल से जा पाती थीं. खुली नालियों में कीड़े गिजबिजाते रहते. मारे बदबू के वहां से गुजरना कठिन होता. ऐसी अवस्था में बचपन से ही रोग पाल लेना एकदम आम था. औरतों में जनन-संबंधी बीमारियां अक्सर रहतीं. प्रसूति के दौरान स्त्री का चल बसना साधारण बात थी. जन्म के समय बच्चे की जीवन संभाव्यता बहुत ही कम होती. अधिकांश जन्म लेते ही मर जाते. भरपाई के लिए स्त्रियां नए भ्रूण को गर्भ में ले आतीं. एक और मजदूर वर्ग की यह स्थिति थी, तो दूसरी ओर इंग्लैंड का सभ्रांत वर्ग अत्याधुनिक जीवनशैली का अभ्यस्त होता जा रहा था. उस वर्ग में विलासिता के प्रतीक, नए-नए शौक पनप रहे थे.
ऐसी अवस्था में यह संभव ही था कि लोगों में अपनी स्थिति के प्रति आक्रोश पैदा हो, वे उससे उबरने के बारे में विचार करें. ध्यातव्य है कि पूंजीवादी शोषण से उबरने की छटपटाहट और आक्रोश की निकृष्ट अवस्था उन्हें अपराध की दुनिया में भी ढकेल सकती थी. लेकिन टूटन और घोर अभावों से भरी जिंदगी में ऐसे अवसर कम ही आते थे, जब मन में पल रहा आक्रोश विद्रोही बनकर ललकारने लगता था. उनमें से अधिकांश ईमानदार, दिल के भले, स्वावालंबी, कानून और न्याय-व्यवस्था में विश्वास रखनेवाले लोग थे. यही बात उनके पक्ष में सर्वाधिक जाती थी. परिस्थितियां उनके विपरीत थीं. उनके पास हस्तशिल्प की समृद्ध परंपरा, संबंधों की गरमाहट, घनी सामाजिकता तथा सकारात्मक सोच था. वे अपनी स्वतंत्रता के प्रति सजग थे; दूसरों की आधिकारिता का सम्मान करना उनका स्वभाव बन चुका था. अपनी परंपराओं तथा सामाजिक तालमेल को बनाए रखने के लिए उनमें ईमानदार चाहत थी.
अपनी एकता तथा संगठन शक्ति के बल पर वे सहकारी समिति के गठन के बजाय कुछ और प्रयास भी कर सकते थे, जैसे कि राजनीतिक शक्तियों के साथ तालमेल करके अपनी स्थिति में बदलाव के लिए कारखाना मालिकों पर दबाव बनाना. या फिर संसदीय ला॓बी बनाकर सरकार और प्रशासन को बाध्य करना कि वे कंपनी कानूनों में आवश्यक बदलाव लाकर श्रमिक-कल्याण के कार्यक्रमों को लागू करें. उनके लिए यह भी आसान था कि धार्मिक नेताओं, संघों अथवा चर्च की शरण में जाकर अपने पक्ष में माहौल बनाएं, ताकि सरकार और फैक्ट्री मालिक मजदूरों के हितों की ओर ध्यान दें. सरकार श्रमिक अधिकारों के पक्ष में आवश्यक कानून बनाए. मालिक अपने मुनाफे का एक हिस्सा श्रमकल्याण कार्यक्रमों पर खर्च करें. वे चाहते तो श्रमिकों के असंतोष का लाभ उठाते हुए उन्हें लंबी हड़ताल के लिए भी तैयार कर सकते थे; और इस बात की भी पूरी-पूरी संभावना थी कि उन्हें अपने लक्ष्य में सफलता ही मिलती. लेकिन उन्होंने इनमें से किसी भी रास्ते पर चलना स्वीकार नहीं किया. बल्कि अपनी परंपरा और ठोस इरादों के आधार पर ठोस कार्य करने के लिए स्वयं को तैयार कर लिया.
इसका एक कारण यह भी है कि बदलाव के बाकी सभी उपायों को समय-समय पर आजमाया जा चुका था. शायद अठारहवीं शताब्दी की यह विशेषता भी थी वह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नएपन और मौलिकता को आमंत्रित कर रही थी. ज्ञान के क्षेत्र में नए दर्शन का दर्शनों का उदय. विज्ञान के क्षेत्र में अधुनातन आविष्कार और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नित-नए चमत्कार मानव सभ्यता को उस शताब्दी के ही उपहार थे. तर्काधारित सोच ने मनुष्य के पूरे जीवन-दर्शन को प्रभावित किया था. विलियम किंग, राबर्ट ओवेन, चार्ल्स फ्यूरियर उस विचारधारा को नई जमीन दे रहे थे. हालांकि उनके द्वारा प्रारंभ किए गए सहकारिता के सभी प्रयास असफल रहे थे. किंतु सहकार के सामार्थ्य और उसकी उपयोगिता पर उन सबका अखंड विश्वास बना हुआ था, बावजूद इसके कि उसको पूरी तरह आजमाया जाना बाकी था. समय उसकी रूपरेखा तैयार कर चुका था. उसके लिए जिस विवेक, धैर्य, समर्पण, दूरदर्शिता तथा आचारसंहिता की आवश्यकता थी, उसकी रही-सही भूमिका गढ़ी जानी बाकी थी. समय इन सबको एक बार फिर अपनी कसौटी पर परखने की तैयारी कर चुका था.
उन दिनों इंग्लैंड में संस्थाओं के पंजीकरण के लिए ‘फ्रैंड्स सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट-1829’ नामक अधिनियम प्रभाव में था, जिसमें सन 1834 में संशोधन भी हो चुका था. अधिनियम के अंतर्गत म्युचुअल फंड्स की स्थापना के लिए संस्था गठित करने का प्रावधान था. उस अधिनियम की घोषणा के समय इंग्लेंड सरकार ने अपनी पीठ थपथपाई थी. क्योंकि सरकार की निगाह में सहयोगी संगठनों को बढ़ावा देने के लिए वह एक आदर्श व्यवस्था थी, जिसमें पहले से चले आ रहे प्रावधानों, परिवर्तनों तथा कानूनी सुधारों को भी सम्मिलित किया गया था. अठारह सौ उनतीस में जब वह अधिनियम मूल रूप में लागू हुआ था, उस समय तक समितियों का गठन प्रायः आर्थिक कार्यकलापों—यथा रकम उधार देने, जीवन बीमा, चिकित्सा बीमा आदि सामान्य कार्यों के लिए किया जाता था. उन दिनों लाभ का आशय केवल वित्तीय एवं मौद्रिक अर्जन तक सीमित था. सामाजिक लाभ जैसी कोई अवधारणा ही नहीं बन पाई थी. अतएव सामाजिक और रचनात्मक क्षेत्र में भी सहकारी समितियां उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं, इस प्रकार की कोई अभिकल्पना उस समय तक विद्वानों तथा प्रशासन के मानस में नहीं बन पाई थी.
सरकार पर बदलाव के लिए चौतरफा दबाव बना हुआ था. डा॓. विलियम किंग के समाचारपत्र ‘दि को-आ॓पेरटर’ का जनता पर प्रभाव बढ़ता ही जा रहा था. इस समाचारपत्र का पहला अंक 1 मई 1828 को निकला था और उसके बाद से लगातार यह लोगों में सहकारिता के प्रति चेतना जगाने का काम कर रहा था. उसी की प्रेरणा से इंग्लेंड में पहली सहकारी समिति की स्थापना हुई, सन 1830 में, नाम था—रोशडेल फ्रेंडली को-आ॓परेटिव सोसाइटी. चूंकि मजदूरों को वेतन मासिक या साप्ताहिक आधार पर मिलता था. अतएव समिति में सदस्यों को उनके दैनिक उपयोग की वस्तुएं उधार बेची जातीं थीं. नियम यह बनाया गया था कि वेतन मिलते ही मजदूर समिति का उधार लौटा कुछ दिनों तक तो सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहा. मगर वक्त के साथ सबकुछ गड़बड़ाने लगा. कुछ मजबूरी के कारण तो कभी जानबूझकर, सदस्य लिया गया उधार लौटाने से आनाकानी करने लगे. आखिर भारी घाटे के कारण वह समिति बंद कर देनी पड़ी.
अठारह सौ चौंतीस में पहली बार व्यवस्था के स्तर पर क्रांतिकारी सुधार देखने में आया. यद्यपि उन सुधारों का पूरी तरह से लाभ उठाने के लिए जनमानस पूरी तरह सक्षम नहीं हो पाया था. इस कारण नए सुधारों की उपयोगिता का पूर्णतः मूल्यांकन शायद उन दिनों संभव नहीं था. उन दिनों सरकार ने समिति पंजीकरण अधिनियम में एक और संशोधन किया था, जिसके आधार पर लाभ (Benefits) की परिभाषा को किसी भी प्रकार के अनुलाभों तक विस्तृत कर दिया गया था. नए अधिनियम के अंतर्गत किसी भी विधिमान्य लाभ की प्राप्ति के लिए समिति का गठन किया जा सकता था.7 अधिनियम में हुए कानूनी सुधार ने भी रोशडेल पायनियर्स को एक बार पुनः संगठित होकर उस अधिनियम का लाभ उठाने की प्रेरणा दी थी, जिसमें उन्हें आशातीत सफलता प्राप्त हुई.
सबसे पहले जो लोग समिति के रूप में आगे आए उनकी कुल संख्या अठाइस थी. वे सभी रोशडेल में काम करने वाले बुनकर परिवारों से संबद्ध साधारण मजदूर थे. उससे पहले भी मिल मजदूरों की स्थिति में सुधार के लिए आंदोलन कर चुके थे. उनमें उत्पे्ररक शक्ति की भूमिका निभाने वालों में प्रमुख थे—चार्ल्स हावर्थ, अब्राहम ग्रीनवुड, जा॓न हिल्टन, डेविड ब्रूक तथा विलियम कूपर.
सहकारिता आंदोलन के उन्नायक महान अठाइस  बुनकर
जेम्स स्मिथ               जा॓न स्क्रा॓क्राफ्ट
चार्ल्स हावर्थ               जा॓न हिल
विलियम कूपर          जा॓न हा॓ल्ट
डेविड ब्रूक                  जेम्स स्ट्रेंडिंग
जा॓न का॓लियर            जेम्स मनोक
सेम्युअल एस्वर्थ       जोसेफ स्मिथ
विलियम मलेल्यु       विलियम टेलर
जा॓र्ज हीले                    राबर्ट टेलर
मिल्स एस्वर्थ             बैजांमिन रूडमेन
जेम्स डेली                  जेम्स विलकिंसन
जेम्स ट्वीडले              जा॓न गार्सीड
सेम्युअल ट्वीडले        जा॓न बेंट
जा॓न केरसा॓                  एन ट्वीडले
जेम्स मेडन                जेम्स बेम्फोर्ड
( स्रोत : George Jacob Holyoake : The Rochdale Pioneers)
मिल्स असवर्थ को समिति का पहला अध्यक्ष बनाया गया, परंतु, समिति के गठन में चार्ल्स हावर्थ का योगदान अविस्मणरीय था. समिति के नियमों की अभिकल्पना में उसकी भूमिका मुख्य थी. उन सब के सम्मिलित प्रयासों से दि ‘रोशडेल इक्वीटेविल पायनियर्स सोसाइटी’ (Rochdale Equitable Pioneers Society) की नींव रखी गई, जिसने आगे चलकर उपभोक्ता सहकारी आंदोलन के क्षेत्र में अनेक कीर्तिमान हासिल किए और सहकारी आंदोलन की मुख्य प्रेरक बनी. समिति के संस्थापक सदस्यों को आगे चलकर ‘ख्यातिलब्ध अठाइस’ (Famous twenty-eight) कहकर उनकी सहकार भावना का सम्मान किया जाता है.
चार्ल्स हावर्थ
चार्ल्स हावर्थ ‘दि रोशडेल इक्वीटेविल पायनियर्स सोसाइटी’ के विधान का प्रमुख वास्तुकार था. उसी ने समिति के विधान की रूपरेखा गढ़ी थी. अतएव उसको हम टोडलेन में स्थापित पहली सहकारी समिति का प्रमुख नीतिकार, अभिकल्पक, विचारक, उत्प्रेरक आदि मान सकते हैं. पेशे से साधारण मजदूर हावर्थ कपड़ा बुनने के कारखाने में धागा डालने (Warper) का कार्य करता था. उसकी आस्था समाजवादी विचारों में थी. हावर्थ, राबर्ट ओवेन के विचारों से भी प्रभावित था. उसको विश्वास था कि ओवेन के विचारों पर चलकर एक नए समानता पर आधारित समाज का गठन संभव है. मजदूरों की स्थिति सुधारने के लिए चार्ल्स ने कई आंदोलनों में सहभागिता की थी.
उस समय तक कार्य के घंटे तय नहीं थे. कारखाना मालिक एक ही दिन में सोलह से अठारह घंटे तक काम लेते थे. हावर्थ ने इस मुद्दे पर सक्रियता दिखाते हुए दैनिक कार्यघंटों को दस घंटे तक सीमित करने के लिए लाए गए ‘दस घंटा अधिनियम’ के पक्ष में कई सभाएं कीं. हालांकि उस समय बहुत से मिल मजदूर इस संशोधन विधेयक के पक्ष में नहीं थे और इसे मालिकों तथा कामगारों के बीच का मुद्दा मानते हुए किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप के विरुद्ध थे. बावजूद इसके हावर्थ उस बिल के पक्ष में माहौल बनाने के लिए लंदन भी गया था तथा हाउस आफ कामॅन में बिल पर चल रही बहस के दौरान उपस्थित भी रहा. उसका प्रशासन और सरकार पर असर पड़ा. ‘रोशडेल इक्वीटेविल पायनियर्स सोसाइटी’ उसका पहला प्रयास नहीं था. ओवेन से प्रभावित होकर हावर्थ ने सन 1830 ईस्वी में एक समूह का गठन किया था, जिसका नेता वह स्वयं था.
हावर्थ का सपना था कि संगठित शक्ति के द्वारा सामूहिक लक्ष्यों की प्राप्ति की जाए, जिससे लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार की संभावना बढ़े. अपने सपने को सच में परिणित करने के लिए हावर्थ ने रोशडेल के टोड लेन नामक स्थान पर किराये की दुकान का प्रबंध किया था. वस्तुतः वह पुराना गोदाम था, जो वर्षों से खाली पड़ा था. उसका पता था—टोड लेन, रोशडेल. दुकान का किराया 10 पाउंड वार्षिक तय किया गया. दुकान को उन्होंने ‘को-आ॓परेटिव शा॓प’ का नाम दिया था. सहकारी समिति के लाभ को लगाई गई पूंजी के अनुपात में सदस्यों के बीच बंटवाने का विचार सहकारिता को उसी की देन है. व्यवसाय को ढंग से चलाने के लिए हावर्थ ने कुछ नियम भी बनाए थे. उनके अनुसार सदस्य उस दुकान से उधार माल खरीद सकते थे. उधार का भुगतान एक सप्ताह के बीच किया जाना तय था. प्रारंभ में सदस्यों का उपने उस सहयोगी उपक्रम के प्रति विश्वास और उत्साह बने रहे. लेकिन धीरे-धीरे उस व्यवस्था की कमजोरियां सामने आने लगीं. क्योंकि बहुत से सदस्य निर्धारित तिथि पर भुगतान नहीं कर पाते थे. और इस तरह उधार धीरे-धीरे बढ़कर एक विशाल रकम का रूप ले चुका था. उसमें से बहुत-सी राशि डूबती भी जा रही थी. उस दौरान हावर्थ को अपनी एक और भूल का भी अनुभव हुआ. उसके द्वारा उस दुकान के लिए बनाए गए नियम मौखिक थे, उनका लिखित प्रारूप न होने के कारण समिति का उधार न चुकाने वाले सदस्यों को अदालत के जरिये चुनौती नहीं दी जा सकती थी. फिर जैसा की तय था, हावर्थ को उस प्रयास में भारी नुकसान का सामना करना पड़ा. पहली का-आ॓परेटिव शा॓प बामुश्किल दो वर्ष ही चल पाई. भारी घाटे के कारण उसे बंद कर देना पड़ा.
योजना असफल हो जाने के कारण लोगों ने हावर्थ का खूब मजाक बनाया था. दुकानदारों का कर्ज लौटाने में उसको काफी नुकसान भी हुआ था. ऐसे में कोई और होता तो उस प्रयास को दोहराने का शायद फिर कभी प्रयास ही न करता. भूलकर भी संगठन और सहकार का नाम न लेता. लेकिन हावर्थ तो संकल्प का धनी था. समाज को बदलने के लिए कृतसंकल्प! पहली का-आ॓पेरिटव शा॓प बंद हो जाने का उसे दुःख था; और गहरा क्षोभ भी. उधर रोजमर्रा की वस्तुओं में भारी मिलावटी से मजदूरों में अनेक बीमारियां बढ़ती जा रही थीं. सरकार पूंजीपतियों की समर्थक थी, इस कारण उससे किसी प्रकार की उम्मीद करना भी व्यर्थ था. ऐसे में एक ऐसे उपभोक्ता भंडार की अत्यंत आवश्यकता थी, जहां पर मजदूरों को खाने-पीने की वस्तुएं शुद्ध एवं उपयुक्त मूल्य पर प्राप्त हो सकें. उसका पिछला प्रयोग असफल हो चुका था. नई शुरुआत कैसे की जाए, वह रात-दिन इसी सोच में रहता. दुबारा घाटा सहने के लिए न तो वह तैयार था, न कोई उस अवस्था में साथ देने वाला था. मित्रगण भी तब तक साथ देने से बचते, जब तक लाभ की सुनिश्चितता न हो.
वह सोचता था कि ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे सदस्यों को उनके द्वारा खर्च किए गए धन के अनुपात में लाभ मिलता रहे. उसने यह भी फैसला किया कि पिछली गलतियों को दोहराने से बचेगा. लेकिन वह राह कैसी हो, दुबारा गलतियां न हों, इसके लिए कौन से उपाय किए जाएं, यह समस्या उसको रात-दिन मथती रहती थी. और फिर सचमुच स्वप्नदृष्टा हावर्थ को एक रात सपने से ही राह मिली. एक रात हावर्थ देर तक जागा. चिंता के कारण उसको नींद आ ही नहीं रही थी. वह सहकारी प्रयासों को आगे बढ़ाना चाहता था. ‘दस घंटा अधिनियम’ के विरुद्ध आंदोलन करते समय कुछ नए साथी बने थे. वे उसका साथ देने को तैयार थे, किंतु दुबारा नुकसान की संभावना से ही वह व्यग्र हो जाता था. लाभ की सुनिश्चितता को बढ़ाने की कोई भी युक्ति उसकी समझ में नहीं आ रही थी. मगर उस रात जैसे कमाल हुआ. वह अचानक उठ कर बैठ गया. पत्नी बराबर में ही सो रही थी. उससे लगभग बेखबर, अपने ही एक पुरखे आर्कीमिडीज की भांति नए विचार के स्वागत में हावर्थ चिल्लाया—
‘मैंने ढूंढ लिया…मैंने हल ढूंढ लिया.’8
हावर्थ के सपने में उसके अठाइस साथी और सम्मिलित हो गए. प्रत्येक ने निर्णय लिया कि वे प्रति सप्ताह कम से कम दो पैंस की रकम जमा करेंगे. उन सभी का जीवन संघर्षशील था. इसलिए प्रति सप्ताह दो पैंस जुटा पाना भी उनके लिए आसान नहीं था. कुछ साथियों को उसकी पिछली असफलता याद थी. उन्हें लगता था कि यदि नया प्रयास भी असफल हुआ तो इससे उनकी मामूली जमापूंजी का नुकसान संभव है. इसीलिए हावर्थ को उनके प्रारंभिक विरोध और असहयोग का सामना करना पड़ा. ऐसे समय पर हावर्थ ने चतुराई और राजनीति का सहारा लिया. उसने दो पैंस प्रति सप्ताह अग्रिम राशि देने के लिए प्रबंधकों पर दबाव डालना प्रारंभ कर दिया, जिसके पूरा न होने पर उसने हड़ताल और काम छोड़कर जाने की धमकी देना शुरू कर दिया. दो पेंस एडवांस मामूली रकम थी. उसके लिए कारखाना मालिक हड़ताल को न्योता नहीं देना चाहते थे. परिणाम यह हुआ कि कई कारखाने कामगारों के समर्थन में आ गए. कहते हैं कि जहां चाह वहां राह. जहां संकल्प वहां सफलता. कुछ की दिनों में सामूहिक जमाराशि अठाइस पाउंड तक पहुंच गई. रकम बहुत ज्यादा नहीं थी. मगर इतनी थी कि उससे वे अपने एक और सपने में रंग भरने का प्रयास कर सकें.
चार्ल्स हावर्थ को अपने पिछले अनुभव की याद थी. साथ में पिछले सिस्टम की कमजोरियां भी. उसके अनुभव को देखते हुए सदस्यों की ओर से नई समिति की नियमावली तैयार करने की जिम्मेदारी उसी को सौंपी गई थी. हावर्थ ने उस दायित्व का भली-भांति निर्वहन किया. पिछले संगठन की कोई लिखित नियमावली न होने के कारण, सदस्यों को नियमों के पालन के लिए बाध्य कर पाना कठिन था. इस बार हावर्थ ने समिति के गठन से पूर्व ही एक विस्तृत नियमावली तैयार की थी, जिसको 24 अक्टूबर 1944 को पंजीयक फ्रैंडली को-आ॓परेटिव सोसाइटी के कार्यालय से पंजीकृत भी करा लिया गया. नई समिति का नाम रखा गया—‘रोशडेल इक्वीटेविल पायनियर्स सोसाइटी’.
पिछले अनुभवों के सबक लेते हुए हावर्थ ने समिति के उपभोक्ता भंडार से की गई खरीद के अनुपात में सदस्यों को नकद लाभांश देने का प्रावधान किया था, जिसे बाद में बनने वाली सभी सहकारी समितियों में एक आधारसिद्धांत के रूप में मान्यता मिली. उसके द्वारा समिति के विधान में की गई नई व्यवस्थाएं आगे चलकर सहकारिता आंदोलन की रीढ़ बनीं. हावर्थ के निकट सहयोगी, मित्र और समिति के महत्त्वपूर्ण सदस्य, विलियम कूपर ने भी माना कि सदस्यों के बीच लाभ के विभाजन का विचार हावर्थ की ही देन था. उसका जन्म सन 1814 में हुआ था. उसके मित्र प्यार से उसको ‘दि ला॓यर’ कहा करते थे. वह होलसेल कंज्यूमर सोसाइटी का आजन्म सदस्य भी था. उसकी सेवाओं को देखते हुए बाद में उसे इस समिति का अध्यक्ष भी बनाया गया. जो भी हो, हावर्थ का परिश्रम सफल रहा और रोशडेल पायनियर्स का काम चल निकला. 25 जून, 1868 को जब उसकी मृत्यु हुई, सहकारिता आंदोलन पूरे यूरोप में छाने लगा था. उसे हेवुड (Heywood) नामक स्थान पर दफनाया गया. हावर्थ की मृत्यु पर उसको श्रद्धांजलि देते हुए विलियम कूपर ने कहा था—
‘अपने जीवन में वह दूसरों के सदैव काम आनेवाला अतिसंवेदनशील नागरिक, धर्म के मामले में सर्वथा मुक्त विचारक, सामाजिक तथा राजनीतिक सरोकारों के समय सतत प्रगतिशील तथा लोककल्याण के लिए लगातार काम करने वाला एक महान समाज सुधारक था. वह एक अच्छा पति और पिता, सच्चा तथा हितैषी मित्र था.’9

जेम्स स्टेंड्रिंग
जेम्स स्टेंड्रिंग(James Standring) भी मलमल के कारखाने में बुनाई का कार्य करता था. वह प्रगतिशील विचारों को मानने वाला, एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता था. मजदूरों की आर्थिक सामाजिक दशा में सुधार के लिए वह सदैव समर्पित रहता था. राबर्ट ओवेन के कार्यों के प्रशंसक जेम्स का मानना था कि उसकी तरह दूसरे उद्यमियों को भी श्रमिक-कल्याण के कार्यों के लिए खुलकर सामने आना चाहिए. उसमें नेतृत्व की क्षमता थी और वह श्रमिकों को अपने अधिकार के लिए संघर्ष करने के लिए सतत प्रेरित करता रहता था. रोशडेल में जब कारखानों में दैनिक कार्यघंटों में कमी लाने के लिए ‘दस घंटा अधिनियम’ के पक्ष में मजदूरों ने आंदोलन की शुरुआत की तो जेम्स ने न केवल उस आंदोलन का खुलकर समर्थन किया, बल्कि बल्कि सचिव के पद पर रहकर उसके आंदोलनकारियों के नेतृत्व में जोर-शोर से हिस्सा भी लिया. 1843-44 के बीच श्रमिकों ने अग्रिम वेतन के भुगतान के पक्ष में हड़ताल की तो वह एक बार फिर उनके समर्थन में उतर आया, हालांकि इस बार वह हड़ताल लगभग असफल सिद्ध हुई थी.
इसी बीच जेम्स को सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम में सरकार द्वारा किए गए संशोधन की जानकारी मिली. उसने तत्काल फ्रैंडली सोसाइटी अधिनियम की प्रति मंगाकर उसका अध्ययन किया. उसको लगा कि मजदूरों को संगठित करने, उनके अधिकारों की रक्षा तथा उनके लिए कल्याण-कार्यक्रम प्रारंभ करने की दिशा में वह अधिनियम उपयोगी हो सकता है. रोशडेल इक्वीटे्वल पायनियर्स सोसाइटी के गठन के लिए मजदूरों को प्रेरित करने वालों में जेम्स स्टेंड्रिग सबसे आगे था. समिति का गठन हुआ तो जेम्स का नाम भी अठाइस संस्थापक सदस्यों में सम्मिलित था.

विलियम कूपर
समिति के संस्थापक सदस्यों में से एक विलियम कूपर का जन्म सन 1822 में हुआ था. समिति द्वारा उपभोक्ता भंडार प्रारंभ किया गया तो उसका खंजाची विलियम कूपर को ही बनाया गया. इसके अतिरिक्त उसका कार्य समिति के रिकार्ड की देखभाल करना था. समिति से जुड़ने से पहले वह हैंडलूम के कारखाने में बुनकर का काम करता था. समिति के सदस्य के रूप में उसको एकाउंटस तैयार करनेकी जिम्मेदारी सौंपी गई. जिसको उसने अच्छी तरह से निभाया. इसका उसको लाभ मिला. आगे चलकर जब कोआ॓परेटिव होलसेल सोसाइटी आरंभ की गई तो कूपर को ही उसका अध्यक्ष चुना गया. कोआ॓परेटिव होलसेल सोसाइटी का कार्य सहकारी स्तर पर चल रहे उपभोक्ता भंडारों को सामान उपलब्ध कराना था. यह समितियां सीधे उत्पादक से वस्तुएं खरीदकर उन्हें सहकारी उपभोक्ता भंडारों तक पहुंचाने का कार्य करती थीं. इससे जहां उत्पादकों को अपने उत्पादों के लिए बाजार के लिए भटकना नहीं पड़ता था, वहीं समिति के भंडारों को भी अपेक्षाकृत सस्ती दरों पर माल उपलब्ध हो जाता था. राबर्ट ओवेन तथा विलियम किंग के विचारों से प्रभावित कूपर की सहकार के विचारों में बहुत आस्था थी. ग्रीनवुड की भांति कूपर की भी महत्त्वाकांक्षाएं थीं. वह भी मेहनती तथा अद्वितीय प्रतिभा का धनी था. सहकारिता और समाजवाद से जुड़े विचारों के प्रसार के लिए उसने कई स्तर पर काम किए. को-आ॓परेटिव होलसेल सोसाइटी के गठन के पीछे कूपर की काफी प्रेरणाएं थीं. उसके इस प्रयास से सहकारी समितियों के कार्य को संगठित करने की दिशा में मदद मिली. क्योंकि स्थान-स्थान पर तेजी से खुलते जा रहे उपभोक्ता भंडारों के लिए संभव न था कि वे सीधे उत्पादकों से माल मंगवा सकें. उनके इस कार्य को कोआ॓परेटिव होलसेल समितियां सुलभ बना देती थीं. इससे उत्पादकों में सहकारी संस्थाओं के प्रति आकर्षण पैदा हुआ. दूसरे बाजार की समस्या कम होने से उन छोटे उत्पादकों को भी आगे बढ़ने का अवसर मिला जो अभी तक बड़े उत्पादकों के सामने बाजार में टिक नहीं पा रहे थे. दूसरे उत्पादित माल की खपत की सुनिश्चितता होने के पश्चात लोग सहकारी समूहों के माध्यम से उत्पादकता के क्षेत्र में भी आगे आने लगे थे, जो उससे पहले कदापि संभव नहीं हो पा रहा था. इसके अतिरिक्त कूपर ने सहकारी बीमा समिति के गठन में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. साथ ही आगे चलकर सहकारी कामगार समिति(Co-operative Workers Society) की स्थापना में भी उसका बहुमूल्य योगदान रहा.
कूपर को सहकारिता के सैद्धांतिक पक्ष का भी पर्याप्त ज्ञान था. इस विषय पर अपनी पकड़ तथा अपने अनुभव का प्रदर्शन करते हुए उसने एक पुस्तक की रचना भी की. उस पुस्तक का शीर्षक है—हिस्ट्री आ॓फ दि रोशडेल डिस्ट्रिक्ट कोर्न मिल’. यह पुस्तक तत्कालीन इंग्लैंड के कारखानों में कामगारों की स्थिति को समझने का एक आदर्श माध्यम है. उससे यह भी पता चलता है कि औद्योगिकीकरण का वह दौर कितना अव्यवस्थित एवं श्रमिक-विरोधी था. विलियम कूपर का निधन 31 मार्च, 1868 को हुआ, उस समय उसकी आयु मात्र छियालिस वर्ष थी. विलियम कूपर को ऋद्धांजलि देते हुए सहकारिता के मुख्य समाचारपत्र ‘दि को-आ॓परेटर’ ने लिखा कि—
‘जैसी दिखाई देती थी, वह उसकी मौत नहीं थी. बल्कि वह पवित्र जीवन की ओर बहा ले जाने वाली दिव्य श्वांस थी. वह एक इंसान द्वारा देवताओं की महान नगरी में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की कोशिश है, भले ही हम जैसे साधारण लोग उसको मौत का नाम देते रहते हैं.’10
छोटे से जीवन में बड़े कार्य कर जाने वाले दुनिया में जो गिने-चुने इंसान जन्में हैं, विलियम कूपर का उन्हीं आदरणीयों में से एक है. मिल्स एश्वर्थ व्यवसाय से बुनकर मिल्स एश्वर्थ (Miles Ashworth) की ओवेन एवं लुईस ब्लेंक के विचारों में पूरी आस्था थी. लेकिन राजनीतिक रूप से वह एक चार्टिस्ट था तथा संगठन के कार्य में उसको प्रवीणता प्राप्त थी. रोशडेल इक्वीटेविल पायनियर्स सोसाइटी का सदस्य बनने से पहले उसने कुछ दिनों तक एक कारखाने में चैकीदार की नौकरी भी की थी. समिति के गठन के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने वालों में वह सबसे आगे था. इसलिए समिति के गठन के समय पहला अध्यक्ष मिल्स एश्वर्थ को ही बनाया गया. उसने अपने दायित्व का विधिवत निर्वाह किया. समिति का ही एक और सदस्य सेमुअल एश्वर्थ, मिल्स का ही बेटा था. मिल्स एश्वर्थ की मृत्यु 13 अप्रैल, 1868 को हुई, उस समय उसकी आयु 76 वर्ष थी. मिल्स को रोशडेल पायनियर्स के कब्रिस्तान में दफनाया गया था. सहकारी क्षेत्र उसके योगदान को भुला पाना संभव नहीं है.
जेम्स स्मिथ
अपने साथियों की भांति जेम्स स्मिथ भी ऊन छांटने के कारखाने में नौकरी करता था. वह एक समाजवादी विचारक था, जिसकी आंखों में रात-दिन आमूल परिवर्तन का सपना कौंधता रहता था. बहुमुखी प्रतिभा का धनी स्मिथ मेहनती भी खूब था. रोशडेल पायनियर्स के गठन के दौरान सदस्यों को उससे जोड़ने, उनके दिमाग में साहचर्य के प्रति अनुराग पैदा करने वालों में स्मिथ सर्वोपरि था. इसलिए समिति के गठन के समय से ही उसको महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं सौंपी जाती रहीं. वह समिति के कार्य में रात-दिन जुटा रहता था. उसकी सेवाओं को देखते हुए उसको निदेशक, अध्यक्ष, महासचिव, ट्रस्टी जैसे महत्त्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी सौंपी जाती रही, जिसका उसने भली-भांति निर्वाह किया. सदस्यों के बीच सहकार की भावना जगाने और शांति एवं सौहार्द कायम करने के लिए सतत कार्यशील रहने वाले जेम्स स्मिथ की मृत्यु मात्र 50 वर्ष की अवस्था में, 27 मई, 1869 को हुई. उसको रोशडेल के कर्बिस्तान में दफनाया गया. रोशडेल के उपभोक्ता भंडार को अपनी स्थापना के प्रारंभिक वर्षों में ही मिली अप्रत्याशित सफलता के पीछे जेम्स स्मिथ के परिश्रम का बहुत बड़ा योगदान था. विडंबना यह है कि जिस आंदोलन की नींव जमाने में स्मिथ का हाथ था, उसकी सफलता के बहुत कम आयाम वह अपने छोटे-से जीवन में देख सका. बावजूद इसके प्रारंभिक रोशडेल पायनियर्स के संस्थापक सदस्यों में उसका योगदान अविस्मरणीय था.

जा॓न स्क्राक्रा॓फ्ट
स्क्राक्रा॓फ्ट बहुत मामूली व्यक्ति था. फेरी लगाकर माल बेचने वाला. गरीब और सीधा-सादा. राजनीति में उसकी जरा भी रुचि नहीं थी. बावजूद इसके वह कुशल वक्ता था तथा लोगों को प्रभावित करने का गुर उसको आता था. उसका ज्ञान बहुआयामी था. लोग अक्सर उससे मिलने के लिए आते रहते थे. उस समय वे उससे स्थानीय मसलों के अलावा धर्म, राजनीति तथा सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करते थे. वह देर रात तक उनके बीच बैठकर बात-चीत करता रहता था. उसकी बतकही का जादू कि लोग अपनी भूख-प्यास सबकुछ भुला देते थे. एक मंजे हुए विद्वान की भांति स्क्राक्रा॓फ्ट अपने सानिध्य में बैठे लोगों की प्रत्येक जिज्ञासा का समाधान करने की कोशिश करता. कभी-कभी बात बहस तक भी पहुंच जाती थी. कई बार धार्मिक मान्यताओं पर चर्चा प्रारंभ हो जाती थी. स्क्राक्रा॓फ्ट के पास गंभीर आलोचकीय दृष्टि थी, जो धार्मिक चर्चाओं के दौरान अक्सर मुखर हो जाती थी. वह धर्म में आडंबरवाद का घोर विरोधी था. अतएव धार्मिक चर्चाओं के दौरान अक्सर वह चर्च के आडंबरवाद की बखिया उधेड़ने लगता था. उस समय वहां पर उपस्थित धार्मिक रूप से आस्थावान व्यक्ति लंबी-लंबी बहसों पर भी उतर आते थे. लेकिन स्क्राक्रा॓फ्ट का धर्म संबंधी ज्ञान दार्शनिकता से लबरेज था. वह अपने आलोचकों की हर बात का तार्किक उत्तर देने का प्रयास करता. इस तरह की बहसों में उसको हरा पाना असंभव था. वस्तुतः मानववादी होने के नाते स्क्राक्रा॓फ्ट की धर्म-संबंधी व्याख्याएं जनसामान्य के पक्ष में जाती थीं. जिन लोगों के बीच वह रह रहा था, उन्हें इसी प्रकार के जादुई नेतृत्व की आवश्यकता थी. वास्तव में उसकी विचारधारा मानवीयता के अनुकूल थी. इसलिए वह पास आए लोगों के साथ देर तक बहस कर सकता था.

जा॓न का॓लियर
प्रथम अठाइस के बीच जा॓न का॓लियर शायद सर्वाधिक सुशिक्षित सदस्य था. वह समाजवादी विचारधारा में आस्था रखने वाला एक प्रशिक्षित इंजीनियर था. का॓लियर के दादा, जा॓न का॓लियर(टिम बाबिन) स्वयं बहुत अच्छे लेखक थे. वे रोशडेल के निकटवर्ती स्थान मिलनरो के रहने वाला, लगभग बातूनी व्यक्ति थे. गद्य और पद्य दोनों ही विधाओं में उनका अच्छा दखल था. 1744 तथा 1750 के बीच उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की थी. उनकी शैली व्यंग्यात्मक थी. जिसका असर लंबा होता था. लोग उनकी ओर खिंचे चले आते थेµस्त्री और पुरुष दोनों. 1786 में उनकी मृत्यु हुई थी. उनके मजाकिया स्वभाव का अनुमान इस कविता से लगाया जा सकता है, जो उन्होंने अपनी मृत्यु के मात्र दस मिनट पहले लिखी थी. उनकी मृत्यु के उस कविता को उनके समाधिलेख के रूप में उनकी कब्र पर खुदवा दिया. कविता का आशय है—
‘यहां जा॓न अपनी नन्ही कविता के साथ लेटा हुआ है. उसके साथ गाल से गाल सटाए हुए. चैंकिए मत कि उनके बीच गहरा समझौता हो चुका है. अब न जा॓न को किसी शरबत की आवश्यकता है, न उसकी प्रेमिका को चाय की.’11
जा॓न का॓लियर पर अपने दादा की विचारधारा का असर पड़ा था. समाजवाद के प्रति अपनी आस्था के ही कारण वह रोशडेल पायनियर्स के संपर्क में आया. दादा की भांति जा॓न का॓लियर भी अद्भुत वक्तव्य कला का धनी था. रोशडेल पायनियर्स द्वारा उपभोक्ता भंडार की स्थापना से लेकर उसके आगे के प्रगति अभियानों में जा॓न का॓लियर का योगदान अत्यंत बहुमूल्य था. उसकी मृत्यु 24 नवंबर 1883 को हुई. उस समय उसकी आयु 75 वर्ष थी. उसको रोशडेल की कब्रगाह में ही दफनाया गया.

डेविड ब्रूक
डेविड ब्रूक पेशे से ब्ला॓क पेंटर तथा विचारधारा से चार्टिस्ट था. यहां हम बता दें कि इंग्लेंड में 1830 से लेकर 1840 के बीच राजनीतिक कार्यकर्ताओं का एक संगठन आंदोलनरत था. संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं की मांग आधुनिक लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप थीं. वे सत्ता में सभी की साझेदारी की मांग कर रहे थे. उनकी सबसे पहली मांग थी कि प्रत्येक नागरिक को वैद्य मतदान के आधार पर संसद में जाने का अधिकार होना चाहिए. प्रारंभ में सराकार को यह मांग बहुत नागवार गुजरी थी. परिणामस्वरूप अनेक चार्टिस्ट को सजा काटने के लिए आस्ट्रेलिया भेज दिया गया था. ‘चार्टिस्टस’ आंदोलनकारियों की मांग को आगे चलकर जान स्टुअर्ट मिल आदि व्यक्ति स्वातंत्रय के समर्थक विचारकों का समर्थन मिला, जिससे वह आंदोलन नए सिरे और नए नाम से आगे बढ़ सका.
डेविड ब्रूक ईमानदार तथा उत्साही कार्यकर्ता था. उसकी मेहनत एवं लगन को देखते हुए उसको समिति के उपभोक्ता भंडार के लिए सामान की खरीद का दायित्व सौंपा गया था. वह एक जिम्मेदारी का काम था. खासकर उन प्रारंभिक दिनों में जब उपभोक्ता भंडार को ‘बुनकरों की दुकान’ कहकर उससे जुड़े लोगों का मजाक उड़ाया जाता था. माल की खरीद के लिए ब्रूक को जगह-जगह जाना पड़ता था. वहां दुकानदार और उत्पादक आदि मिलकर बू्रक का मजाक उड़ाते, उसको हतोत्साहित करने का प्रयास करते थे. ब्रूक बिना आपा खोये धैर्यपूर्वक अपने काम में लगा रहता था. ब्रूक की आस्था समाजवादी विचारधारा में थी और वह चाहता था कि मजदूर वर्ग स्वावलंबी हो और बिना किसी की कृपा के, सिर्फ अपनी मेहनत द्वारा विकास करें.
वह अपनी ठीक-ठाक नौकरी छोड़कर समिति के साथ जुड़ा था और कहीं भी सात से आठ शिलिंग प्रतिदिन बहुत आसानी से कमा सकता था. लेकिन रोशडेल पायनियर्स का कार्य उसने केवल अपनी आत्मतुष्टि के लिए, यह कहकर स्वीकारा था कि जब तक समिति अपने प्रत्येक सदस्य को कम से कम तीन पेनी प्रतिघंटे की दर से वेतन देने में समर्थ नहीं हो जाती, तब तक वह बिना किसी मौद्रिक लाभ के अपनी सेवाएं प्रदान करता रहेगा. उसने कई वर्ष तक समिति की सेवा की. पांच वर्ष तक वह रोशडेल पायनियर्स के उपभोक्त भंडार में खरीद विभाग का कार्यालय अध्यक्ष बना रहा. उसने अपना सारा जीवन भीषण आर्थिक अभाव के बीच बिताया था. ब्रूक का निधन 79 वर्ष की अवस्था में, 24 नवंबर 1882 को हुआ. लेकिन उन सुंदर, सजीले और महकीले फूलों की भांति जो गुमनामी के अंधियारे में खो जाने को अभिशप्त होते हैं, बू्रक द्वारा समिति की कामयाबी तथा सदस्यों के बीच आपसी सौहार्द एवं सामाजिकता बनाए रखने के लिए किए गए कार्य को लगभग विस्मृत कर दिया गया.12

अब्राहम ग्रीनवुड
चार्ल्स हावर्थ की भांति अब्राहम ग्रीनवुड (Abraham Greenwood) भी बुनकर परिवार से संबद्ध था. उसका जन्म 1824 में हुआ था. पिता कंबल बनाने का कार्य करते थे. स्वयं ग्रीनवुड ने भी छबीस वर्षों तक ऊन की छंटाई का कार्य किया था. वह कई वर्षों तक चार्टर एसोसिएशन का सचिव रह चुका था. 1848 में रोशडेल पायनियर्स से जुड़ने से पहले वह ‘पीपुल्स इंस्टीट्यूट’ में पुस्कालयाध्यक्ष था. वह विलियम किंग तथा राबर्ट ओवेन के कार्य से प्रभावित था. उन्हीं के संपर्क में आने से सहकारी आंदोलन में उसकी आस्था जगी थी. इसलिए रोशडेल पायनियर्स से जुड़ने के साथ ही उसने सहकारिता के विस्तार के लिए पूरे मनोयोग से कार्य किया था. ग्रीनवुड की अध्यापन में रुचि थी, इसीलिए समिति द्वारा प्रदत्त दायित्वों के अतिरिक्त वह बाकी सदस्यों को पढ़ाने में भी रुचि लेता था. सप्ताह के अंत में एक दिन वह समिति के सदस्यों को पढ़ाने का काम करता था. राजनीति अर्थशास्त्र से उसका विशेष लगाव था.
अब्राहम ग्रीनवुड की मेधा एवं सहकार के प्रति उसके सक्रिय लगाव के कारण ही उसको रोशडेल सोसाइटी आफ इक्युटेविल पायनियर्स (Rochdale Society of Equitable Pioneers) के संस्थापक सदस्यों में शामिल किया गया था. समिति के सदस्य के रूप में ग्रीनवुड ने सौंपे गए दायित्वों का निर्वाह पूरी लग्न एवं ईमानदारी से किया. उसके माध्यम से समिति ने अपनी कई विस्तार योजनाओं को कामयाबी के साथ पूरा किया. इसलिए आगे चलकर जब कंज्युमर होलसेल सोसाइटी की स्थापना की गई तो उसकी अध्यक्षता के लिए ग्रीनवुड को ही चुना गया. वह रोशडेल कार्न मिल का संस्थापक और अध्यक्ष भी रहा. सन 1874 से 1898 के बीच उसने रोशडेल होलसेल सोसाइटी के कैशियर और प्रबंधक जैसे दायित्वों का भी वहन किया. इन सारी जिम्मेदारियों को संभालकर ग्रीनवुड ने सहकारिता के विचारों के प्रति निष्ठा के साथ अपनी प्रबंधन क्षमता का भी परिचय दिया था. इसीलिए समिति के भीतर उसको एक से बढ़कर एक, महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी जाती रहीं. आगे चलकर रोशडेल पायनियर्स ने जब बीमा व्यवसाय के क्षेत्र में प्रवेश किया तो सर्वसम्मिति से ग्रीनवुड को ही बीमा कंपनी की बागडोर सौंपी गई. उसको नवगठित बीमा कंपनी का अध्यक्ष बनाया गया.
सहकारिता के प्रचार-प्रसार उसके विचार एवं सिद्धांतों को आमजन तक ले जाने तथा लोगों को उसके प्रति प्रेरित करने के लिए उसने सहकारी समाचार नामक संचार सेवा की शुरुआत की थी. उसने को-आ॓परेटिव न्यूज सेवा के अध्यक्ष का दायित्व भी संभाला. वह पचीस वर्षों तक न्यूज पेपर सोसाइटी का अध्यक्ष भी रहा. उस पद पर रहते हुए भी उसने सहकारिता आंदोलन को आगे ले जाने का कार्य किया. ग्रीनवुड की समाजवादी विचारधारा में आस्था थी. लोककल्याण एवं समाजसेवा से जुड़े कार्यों में उसका मन लगता था. उसकी मृत्यु सन 1911 में हुई. सहकारिता आंदोलन विश्वपटल पर अगर अपनी पहचान बना पाया तो उसके पीछे ग्रीनवुड जैसे समर्पित को-आ॓परेटरों का भी भारी योगदान रहा है.

जा॓न हिल्टन
जा॓न हिल्टन, विलियम कूपर की भांति हालांकि रोशडेल पायनियर्स के संस्थापक सदस्यों में से नहीं था. परंतु समाजवादी-सुखवादी विचारधारा को लोकप्रिय बनाने वालों में उसका योगदान अविस्मरणीय है. उसका जन्म सन 1824 ईस्वी में हुआ था. वह एक प्रतिबद्ध विचारक तथा समाज में आमूल परिवर्तन का पक्षधर आंदोलनकर्मी था. मजदूरों पर उसका प्रभाव था. उनकी समस्याओं के निदान के लिए वह सतत प्रयासरत रहता था. इसीलिए 1864 में जब रोशडेल होलसेल को-आ॓परेटिव सोसाइटी प्रारंभ की गई तो जा॓न हिल्टन को उसकी सदस्यता के लिए आमंत्रित किया गया. जा॓न हिल्टन ने अपने दायित्व को खुशी-खुशी निभाया. वह मेडिल्टन एवं टांग सोसाइटी का भी संस्थापक सदस्य रहा. वह एक सफल लेखक था. वह पूंजीवाद के बढ़ते वर्चस्व को सामान्यजन के हितों के प्रतिकूल मानता था. विशेषकर उसकी पूंजीवाद की वह विचारधारा जिसके आधार पर वह मनुष्य को महज एक कामोडिटी मानकर आचरण करती है, जिसकी उपयोगिता दूसरी कामोडिटीज के सेवन की मात्र से तय होती है. अपने लेखों में हिल्टन इस पूंजीवादी प्रवृत्ति का जमकर विरोध किया था. उसकी विचारधारा मार्क्सवादियों से मेल खाती थी. 1899 में जब उसकी मृत्यु हुई तब तक सहकारिता का विचार बहुत आगे बढ़ चुका था.
सहकारी संस्था का गठन
सतरहवीं शताब्दी तक इंग्लेंड में पूंजीवाद अपनी जड़ जमा चुका था. उसके कारण वहां की अर्थव्यवस्था में तेज उछाल आया था. मगर साथ ही अनेक समस्याएं भी उत्पन्न होने लगी थीं. उनमें एक तो बेरोजगारी की समस्या थी. मशीनों ने गुणवंत शिल्पकारों से काम छीनकर उन्हें दर-दर भटकने को विवश कर दिया था. दूसरी बड़ी समस्या थी मजूदरों के शोषण की. मालिक लोग कम से कम मजदूरी के बदले जीतोड़ मेहनत कराना चाहते थे. उसके सभी कानूनों का एक ही मंतव्य था—शोषण, शोषण और शोषण, जनसामान्य का ज्यादा से ज्यादा शोषण. पूंजीवाद के दुष्प्रभावों से चिंतित डा॓. विलियम किंग ने उसको एक सामाजिक बुराई मानते हुए लिखा था—
‘इस व्याधि से बचा जा सकता है, उपचार हमारे हाथों में है, और वह उपचार है—सहकारिता.13
जब शोषण और अनाचार था तो उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया भी स्वाभाविक थी. विरोध के स्वर 1830 से उठने प्रारंभ हुए थे, किंतु पूंजीवाद का पहला संगठित विरोध चार्टिस्ट आंदोलनकारियों की ओर से हुआ. चार्टिस्ट आंदोलनकारी वस्तुतः शिक्षित और नौकरीपेशा वर्ग से थे, जो तत्कालीन व्यवस्था में स्वयं को आहत एवं उपेक्षित अनुभव कर रहे थे. इस आंदोलन का नामकरण विलियम लोवेट(1800-1877) द्वारा 1838 में एक नागरिक अधिकारपत्र(People’s Charter) जारी करने के साथ हुआ था. चार्टिस्ट आंदोलनकारी आर्थिक-राजनीतिक समानता और लोकतंत्र के समर्थक थे. अपने नागरिक अधिकारपत्र में उन्होंने जनसामान्य को मतदान का अधिकार दिए जाने, मतदान क्षेत्रें के एकसमान बंटवारे, निर्वाचित सदन, व्यक्तिगत संपत्ति का उन्मूलन, उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम शिक्षा निर्धारित करने, सभी को चुनाव लड़ने का अधिकार देने जैसे कई मांगें की थीं. ओ’ कोनर (F. O’Connor) के नेतृत्व में देशव्यापी हड़तालों के माध्यम से आंदोलनकारियों ने ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाने का असफल प्रयास किया था. तब सरकार दमन पर उतर आई. अनेक चार्टिस्ट आंदोलनकारियों को आस्टेªलिया में कैद कर लिया गया. सरकार के विरुद्ध मुकदमों में भी चार्टिस्ट आंदोलनकारियों को पराजय का मुंह देखना पड़ा. अंततः 1848 में वह आंदोलन दम तोड़ने लगा.
सन 1830 में ही आर्थिक आत्मनिर्भरता के माध्यम से जनसाधारण का सम्मान वापस लाने का प्रयास सहयोगी उद्यमों के माध्यम से हो चुका था. लेकिन अनुभव तथा जागरूकता के अभाव में हावर्थ तथा उसके सहयोगियों द्वारा 1830 में गठित पहली सहकारी समिति ‘रोशडेल फ्रेंडली को-आ॓परेटिव सोसाइटी’ को असफलता का मुंह देखना पड़ा. पहला अनुभव ही कड़वा रहा था. ऐसे में इस बात की संभावना कम ही थी कि दुबारा फिर उसी प्रकार का कदम उठाया जाता. लेकिन जैसा कि पहले की कहा जा चुका है, पूंजीवाद के दुष्प्रभावों के चलते मजदूरों की हालत बहुत खराब हो चली थी.
उत्तरोत्तर कठिन होते जाते जीवन में परेशानियों से मुक्ति का एक रास्ता यह भी हो सकता था कि समस्याओं के साथ जीवन से भी पलायन कर लिया जाए. अगर ऐसा होता तो समय उन लोगों को धिक्कारता. इतिहास उनीसवीं शताब्दी की संभवतः सबसे बड़ी उपलब्धि से वंचित रह जाता था. ऐसा सचमुच हो जाता तो जीवन में संभावनाओं की उपस्थिति और उनकी चामत्कारिक देन से लोगों का भरोसा ही उठ जाता. लेकिन आगे जो हुआ वह संभावनाओं से भी एकदम परे, अकल्पित और अप्रत्याशित था. इसके लिए उन्हें प्रेरणा देने, राह दिखाने और उनकी हिम्मत बढ़ाने के लिए मनुष्यता के इतिहास में बहुत कुछ था. अमेरिका के शेकर साहचर्यवादियों का एक गीत है—
‘जो भी सबसे ऊंचे शिखर तक पहुंचना चाहता है, उसको सर्वप्रथम सबसे नीचे मौजूद व्यक्ति की ओर देखना चाहिए. और फिर सबसे नीचे मौजूद व्यक्ति को साथ लेकर सर्वोच्च शिखर तक पहुंचने के लिए चढ़ाई प्रारंभ कर देनी चाहिए.’14
पहली समिति अपनी व्यवस्थागत कमजोरियों तथा कानूनी शिथिलताओं के कारण असफल हुई थी. इनमें प्रमुख कारण थे, उधार बिक्री का प्रावधान तथा नियमों की अस्पष्टता. मजदूरों की दयनीय आर्थिक स्थिति को देखते हुए की गई व्यवस्था के अनुसार सदस्यों को समिति के उपभोक्ता भंडार से एक सप्ताह का उधार दिया जाता था. उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि सप्ताह के अंत में उधार की रकम का भुगतान कर देंगे. इस व्यवस्था के पीछे पर्याप्त तर्क भी थे. क्योंकि सदस्यों को सप्ताह के अंत में वेतन प्राप्त होता था. किंतु व्यावहारिक रूप में यह व्यवस्था बहुत दिनों तक नहीं चल पाई. परिस्थितियों के चलते सप्ताह के अंत में भुगतान की वापसी अपेक्षा से बहुत कम हो चली थी. नियमों की अस्पष्टता के कारण ऐसे मामलों में उधार न लौटाने के दोषी सदस्य को न्यायालय में चुनौती दे पाना भी लाभकर नहीं था. परिणाम यह हुआ कि समिति को व्यापार में घाटा होने लगा. उसका बहुत-सा धन उधार में डूब गया. हावर्थ को व्यक्तिगत रूप में बहुत नुकसान उठाना पड़ा. कुछ ही दिनों पश्चात वह समिति भंग हो गई.
उस समय तो किसी ने नहीं सोचा था कि इतना नुकसान उठाने के पश्चात हावर्थ या उसके साथी दुबारा वैसा ही प्रयास करने पर विचार करेंगे. लेकिन भीषण गरीबी तथा बाजार के माहौल ने उन्हें दुबारा वैसा सोचने पर विवश कर दिया. या कहें कि उनके सामने ‘करो या मरो’ की स्थिति थी. बाजार में एक और तो महंगाई बढ़ती जा रही थी, ऊपर से मिलावट. मजदूरों की दुर्दशा का कहीं अंत नहीं था. 1843 की गर्मियों की बात है. सुप्रसिद्ध उपन्यासकार चार्ल्स डिकेन्स जो उन दिनों 31 वर्ष के सुदर्शन युवक थे, लंकाशायर की यात्र पर निकले. उद्देश्य था अनुभव बटोरना. देखना चाहते थे कि उत्तरी इंग्लेंड, जो उद्योग के क्षेत्र में विश्व-भर में नाम कमा रहा है, वहां पर आम जनजीवन कैसा है. उन्होंने मेनचेस्टर की मजदूर बस्तियों की यात्र की, यह जानने के लिए कि अपने मालिकों के लिए साल में करोड़ों पाउंड का मुनाफा कमाने वाली कपड़ा मिलों के मजदूर किन परिस्थितियों में रहते हैं.
डिकेन्स ने वहां जो देखा वह देह तो देह आत्मा तक को सुन्न कर देने वाला था. मजदूर बस्तियों में भूख एवं गरीबी के नंगे नांच ने डिकेन्स को हतप्रभ कर दिया. उन्होंने देखा कि औद्योगिक क्रांति का हृदय-प्रदेश माने जाने वाले उस क्षेत्र में जीवन कितना मुश्किल और अमानवीय है. मानो पूरे इंग्लेंड को दो हिस्सों में बांट दिया गया हो. उसके एक ओर तो बड़े-बड़े धन्नासेठों, पूंजीपतियों, उद्योगपतियों और कमाऊ नौकरशाहों का इंग्लेंड है, तो दूसरे इंग्लेंड में भूखे, नंगे, विपन्न और बीमार स्त्री-पुरुषों का बसेरा है. अगले ही दिन अथेनयिम क्लब में नौकरशाहों तथा कारखाना मालिकों की उपस्थिति में उन्होंने वहां उपस्थित मजदूरों का आवाह्न करते हुए कहा कि उन्हें अपनी इस अज्ञानता और अपराध-ग्रंथि से बाहर आ जाना चाहिए कि वे गरीबी और अपराध के बेवस जन्मदाता हैं. उन्होंने नौकरशाहों और कारखाना मालिकों से भी अपील की थी कि श्रमिकों की हालत में सुधार लाने के लिए वे आपसी कर्तव्यों तथा जिम्मेदारियों का परस्पर आदान-प्रदान करें.
मजदूर बस्तियों में छायी गरीबी ने डिकेन्स को इतना व्यथित कर दिया था कि ट्रेन द्वारा लंदन वापस लौटते हुए उन्होंने अपनी पुस्तक ‘दि क्रिसमस कैरोल’ की अभिकल्पना की. एक सप्ताह बाद ही उन्होंने वह पुस्तक लिखनी प्रारंभ कर दी. उसके लगभग छह महीने के बाद, दिसंबर 19, 1843 को वह पुस्तक प्रकाशित होकर आई, जिसने पूरे इंग्लेंड के बुद्धिजीवियों को झकझोर कर रख दिया. लोग मजदूरों की स्थिति के बारे में सोचने को विवश हो उठे—
‘क्रिसमस का उस जैसा उल्लास पहले कभी नहीं हुआ था’15
डेविड जे. थांपसन उस स्थिति के बारे में लिखते हैं. लंदन लौटने के बाद चार्ल्स डिकेन्स ने अपने आंख, नाक तथा कान यह जानने पर लगा दिए थे कि मेनचेस्टर और लंकाशायर की मजदूर बस्तियों के उत्थान के लिए पूंजीपति और सरकार कितने चिंतित हैं तथा मजदूर अपने शोषण एवं उत्पीड़न का कितना और किस तरह सकारात्मक विरोध कर पाते हैं. चार्ल्स डिकेन्स की पहली रचना ‘दि क्रिसमस कैरोल’ लगभग जीवनी थी. उसमें डिकेंस ने यह कल्पना कि थी एक पिता अपनी गरीबी से बेहद तंग आ चुका है. कर्ज न चुका पाने के कारण सजा काटते हुए भी वह अपने परिवार के प्रति चिंचित और परेशान है. उपन्यास का मुख्य पात्र बा॓ब क्रेस्टी (Bob Cratchit) नाम के अत्यंत गरीब मजदूर को बनाया गया था, जो अपने मालिक के लिए कमरतोड़ परिश्रम करता है, फिर भी वह अपने परिवार का भरण-पोषण कठिनाईपूर्वक ही कर पाता है. बा॓ब का एक बेटा नन्हा टिम है जो बहुत बीमार और चलने-फिरने से असमर्थ है. बा॓ब का मालिक धनी स्क्रूज(Scrooge) है, हद से ज्यादा कंजूस. उसके जीवन का मुख्य लक्ष्य अपने लिए अधिक से अधिक धन इकट्ठा करना है. उसको उन भूखे-बीमार मजदूरों और उनके परिवारों की कतई फिक्र नहीं है, जिनके परिश्रम के दम पर उसके कारखाने सोना उगलते हैं.
पुस्तक के बहाने डिकेन्स द्वारा गढ़ा गया रूपक तेजी से बदलते ब्रिटिश समाज पर तीखा कटाक्ष था, जिसका एक सिरा बेहद चमकदार और चकाचैंध से युक्त था, उसपर मुट्ठी-भर लोगों का अधिपत्य था. जबकि दूसरे सिरे पर हजारों-लाखों उत्पीड़ित-शोषित जन थे, जीवन की मामूली सुविधाओं के लिए तरसते हुए. कार्ल मार्क्स इसी वर्ग को सर्वहारा कहकर पुकारता था. कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें न भरपेट रोटी मिलती थी, न तन ढकने को कपड़ा. पुस्तक के बहाने लेखक ने मजदूर जीवन की विसंगतियों को पूरी दुनिया के सामने लाने का प्रयास किया था, जिसमें उन्हें भरपूर कामयाबी प्राप्त हुई. डिकेन्स की यह पुस्तक आगे चलकर सामाजिक अध्ययन के लिए प्रमुख दस्तावेज बनी. उससे तेजी से उभरते औद्योगिक समाज की विसंगतियां लोगों के सामने आने लगीं. डिकेन्स द्वारा गढ़ा गया पात्र बा॓ब क्रेस्टी समाज के गरीब, ऋणग्रस्त, उत्पीड़ित और शोषित मजदूर का प्रतीक बन गया तथा कुटिल स्क्रूज को कंजूसी का पर्याय मान लिया गया. जनमानस में स्क्रूज जैसे मालिकों के प्रति संचित आक्रोश को मुखर अभिव्यक्ति मिलने लगी. इसके साथ ही एक और मुख्य बात मजदूरों को यह समझ में आने लगी कि अपनी बेहाली और दुर्दशा के वे या उनका भाग्य जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि उसकी जिम्मेदार वह व्यवस्था है, जो पूंजी को सीमित हाथों में कैद करने का अवसर देती है. वे समझने लगे कि इस अवस्था से उभरने के लिए उन्हें स्वयं ही प्रयास करने होंगे.
डिकेन्स के मेनचेस्टर दौरे से पहले ही बा॓ब क्रेस्टियों का एक समूह अपने परिजनों के साथ, वहां से मात्र सतरह किलोमीटर दूर रोशडेल में अपनी समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए निंरतर बैठकें करता आ रहा था. बैठकों में मजदूरों की समस्याओं तथा उनसे मुक्ति के बारे में विचार होता था. उसी बैठक में एक दिन जा॓न कार्सव ने सहकारी समिति के गठन का सुझाव दिया. उस सुझाव पर सभा की सहमति भी बन गई. यह 1843 की सर्दियों की बात है. बा॓ब के प्रस्ताव पर विचार के लिए एक और सभा का आयोजन किया गया, वह बैठक क्रिसमस से कुछ ही दिन पहले रोशडेल में टोड लेन के निकट बीवर्स आर्मस, चीतम स्ट्रीट, के पते पर वह बैठक आयोजित हुई. सभा में मौजूद सभी लोगों ने सर्वसम्मिति से निर्णय लिया कि कारखाना मालिकों की अनुकंपा की प्रतीक्षा में निरंतर दुःख सहने से अच्छा है, अपने ही विवेक एवं श्रम के आधार पर प्रयास शुरू किए जाएं. पूंजीपति मदद के लिए आगे आएंगे, मजदूरों का यह विश्वास तो कभी का टूट चुका था. उस सभा में सहकारी समिति बनाने के निर्णय को अनुमति मिल गई. जिसका मुख्य उद्देश्य बनाया गया ग्राहकों को शुद्ध, पवित्र पूरे माल की आपूर्ति. वह 15 अगस्त 1844 का दिन था. बाकी दिनों से कहीं अधिक पवित्र और उम्मीदों से भरा हुआ.
सहकारी समिति की बात करना, उसके विचार को आगे चलाना अलग बात थी, उसके लिए पूंजी का प्रबंध करना अलग बात. मगर जहां चाह वहां राह. मजदूरों ने बैठक के दौरान निर्णय किया कि प्रत्येक मजदूर को जो समिति का सदस्य बनना चाहता है, समिति के कोष में न्यूनतम एक डा॓लर का निवेश करना होगा. एक-एक पेनी के लिए कमरतोड़ परिश्रम करने वाले मजदूरों के लिए डा॓लर की रकम बहुत बड़ी थी. तब यह सुझाव भी आया कि इसके लिए कारखाना मालिकों से उधार लिया जाए. जो उधार देने में आनाकानी करें, उन्हें हड़ताल या धरना-प्रदर्शन के माध्यम से एडवांस देने के लिए विवश किया जाए. उस समय जो सदस्यगण काम करें वे यह प्रयास भी करें कि हड़ताल पर गए सदस्यों के हिस्से के पैंस भी बचा सकें. हड़ताल की धमकी मिलने पर कुछ कारखाना मालिक एडवांस देने को सहमत हो गए. मगर कुछ ने एकदम इंकार कर दिया. इसपर मालिकों एवं मजदूरों के बीच संघर्ष भी हुआ. इसपर कुछ मजदूर निराश होकर समिति के प्रस्ताव से पीछे हटने लगे. कुछ अभी भी उम्मीद बांधे रहे. प्रत्येक सप्ताह दो पैंस की रकम लक्ष्य को देखते हुए पर्याप्त नहीं थी. हालांकि कुछ कारखाना मालिक उतनी रकम एडवांस के रूप में देने को तैयार थे, जबकि कुछ इस मांग को पूरी तरह नकार चुके थे. आखिर मजदूरों तथा मालिकों के बीच यह समझौता हो सका कि उतनी रकम मालिकों की ओर से मजदूर संगठन को एडवांस के रूप दी जाएगी. जहां से सदस्य उस राशि को उधार के रूप में ग्रहण कर सकते हैं.16
दो पेंस की रकम उस समय अथिकतर कामगारों की लगभग दो सप्ताह की मजदूरी के बराबर थी. कह सकते हैं कि उन बुनकरों के लिए यह रकम भी मामूली न थी. इसे उगाहने के लिए तीन व्यक्ति नियुक्त किए गए, जो प्रत्येक सोमवार सदस्यों से रकम लाकर खजांची के पास जमा कर देते थे. हालात को देखते हुए एक पाउंड की शेयर निधि जुटाना भी कठिन प्रतीत हो रहा था. सदस्य प्रति सप्ताह दो पैंस जमा करने में भी नाकाम हो रहे थे. कई बार ऐसे भी अवसर आए जब सदस्यों पर निराशा हावी होने लगी थी. उस समय यह विचार भी आया कि समिति के गठन का विचार फिलहाल स्थगित कर दिया जाए तथा विकास के वैकल्पिक उपायों के बारे में सोचा जाए. साथ ही अभी तक जमा की गई रकम, उसके सदस्यों को लौटा दी जाए. कुछ सदस्य तो हताश होकर उस समय तक जमा कराई गई शेयर-निधि वापस भी मांगने लगे थे.17
यह प्रतिकूल स्थिति थी. लेकिन उम्मीदों एवं घनी निराशाओं के बीच मजदूरों का संघर्ष चलता रहा. इस बीच चार्ल्स हावर्थ बिना समय खोए तेजी से समिति के लिए विधान की रचना में लगा था. विपरीत स्थितियों और आस-निराश के बीच डोलते उस छोटे से समूह के लिए पहला पड़ाव आया 24 अक्टूबर 1844 को, जब हावर्थ द्वारा बनाए गए नियमों को रजिस्ट्रार आ॓फ फैमिली सोसाइटीज द्वारा पंजीकृत कराके, नियमों की उस व्यवस्था को संसद के अधिनियम के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था की पहचान दी गई. इस प्रकार रोशडेल कोआपरेटिव इक्वीटेवल सोसाइटी की नींव रखी गई. जिसने इंग्लेंड में सहकारिता आंदोलन का सूत्रपात किया जो कुछ ही वर्षों में पूरी दुनिया में फैलता चला गया. आगे चलकर सहकारिता आंदोलन में नए सुधार हुए. नए-नए विचार भी आए. मगर उसकी मूल भावना वही रही, जो उन बुनकरों द्वारा पहली सहकारी समिति के गठन के समय दर्शायी गई थी.
और इस प्रकार दिसंबर तक रोशडेल पायनियर्स मिलकर प्रारंभिक 28 पाउंड की पूंजी जमा करने में कामयाब हो गए. उपभोक्ता भंडार के लिए समिति ने टोड लेन स्थित एक पुरानी मिल के मालिक मिस्टर डनलप से बात की. मिल हालांकि वर्षों पहले बंद होकर खंडहर में बदलने लगी थी. तथापि वह उसे किसी समिति को किराये पर देने को तैयार न थे. अंततः एक उपाय निकाला. समिति के ही एक स्थायी सदस्य के नाम पर उस गोदाम के भूतल स्थित 23 फुट चैड़े तथा 50 फुट लंबे स्थान को तीन वर्ष के लिए किराये पर लिखवा लिया गया. किराया रखा गया था—दस पाउंड प्रति वर्ष. आगे चलकर उस स्थान के अगले हिस्से, 23 फुट चैड़े तथा सतरह फुट गहरे स्थल, को दुकान के रूप में प्रयोग में लाया गया. शेष स्थान को भंडार तथा मीटिंग आदि के उपयोग के छोड़ दिया गया.
यहां प्रश्न हो सकता है कि सहकारिता, जिसने आगे चलकर अपनी उपयोगिता उद्योग, व्यापार, सेवा, संस्कृति, कल्याण आदि अनेक क्षेत्रें में प्रदर्शित की, उसकी पहली इकाई का आरंभ उपभोक्ता भंडार के माध्यम से ही क्योंे हुआ? उस समय मजदूरों की अन्य समस्याएं भी गंभीर थीं. सहकारिता आंदोलन के विस्तार एवं उसकी प्रवृत्ति के बारे में विशिष्ट चर्चा तो आगे की जाएगी. यहां यह बता देना ही पर्याप्त होगा कि विभिन्न देशों में सहकारिता का विस्तार उन देशों की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक स्थितियों के अनुसार ही हुआ. दूसरे शब्दों में एक बार उपयोगिता सिद्ध हो जाने के पश्चात विभिन्न देशों, समाजों ने सहकारिता का उपयोग अपनी तरह से, अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप ही किया. लेकिन थोड़े-बहुत परिवर्तन के बावजूद उनका विधान रोशडेल पायनियर्स से प्रेरित ही रहा. यह बात भी दृष्टव्य है कि स्वयं रोशडेल इक्वीटेविल पायनियर्स सोसाइटी की नियमावली का मुख्य ढांचा (Manchester Rational Sick and Burial Society) से प्रेरित-प्रभावित था.18 रोशडेल पायनियर्स द्वारा उसमें मामूली परिवर्तन किए गए थे. उत्पादकता सहकारिता आरंभ करने के पीछे मुख्य कारण तो यह था कि जनसाधारण दुकानदारों की मनमानी और उनके द्वारा खाद्यपदार्थों में की जाने वाली मिलावट से परेशान था. इसीलिए उपभोक्ता भंडार को मजदूरों में कामयाबी मिलने की संभावना अधिक थी. दूसरे सीमित पूंजी द्वारा वे उद्योगपतियों को चुनौती देने में समर्थ ही नहीं थे.
खरीदे गए सामान के अनुपात में लाभ का विभाजन हावर्थ का मौलिक विचार था. वही आगे चलकर सहकारिता के प्रसार में सहायक बना. इसलिए समिति के विधान में लाभ के न्यायिक बंटवारे का विशद् उल्लेख किया गया था. बावजूद इसके उपभोक्ता भंडार की शुरुआत के पीछे रोशडेल पायनियर्स की आर्थिक लाभ कमाने की इच्छा गौण ही थी. वस्तुतः गरीबी, कुपोषण और बेकारी के अतिरिक्त मजदूरों की मुख्य समस्या थी—घटिया, मिलावट-युक्त खाद्य साम्रगी की उपलब्धता, वह भी औने-पौने दामों में. स्पष्ट है कि रोशडेल के उन मजदूर बुनकरों ने अपनी रोजमर्रा की परेशानियों से मुक्ति के उपाय के रूप में सहकारिता को चुना था. समिति के माध्यम से—
‘उनका तात्कालिक लक्ष्य था—उचित मूल्य पर श्रेष्ठतर गुणवत्ता के भोज्य-पदार्थों की उपलब्ध्ता, साथ ही कुछ रोजगार तथा सहकारी प्रयासों द्वारा होने वाले लाभ के माध्यम से एक समुदायिक इकाई की स्थापना, जहां पर रहने और काम करने की स्थितियां अपेक्षाकृत बेहतर हों. दूसरे शब्दों में वे एक शैतानी मिल के भीतर अपने लिए नए तीर्थ (येरोशलम) का निर्माण करना चाहते थे.’19
समिति के सदस्यों में चार्ल्स हावर्थ आदि कुछ तो पुरानी रोशडेल फ्रैंडली को-आ॓परेटिव समिति के सदस्य रह चुके थे, जबकि कुछ सदस्य डा॓. विलियम किंग के समाचार पत्र ‘दि को-आ॓परेटर’ के प्रभाव से उससे जुड़े थे. कुछ चार्टिस्ट आंदोलन से ही एक-दूसरे के साथ थे जबकि कुछ मद्यनिषेद्ध आंदोलनों के दौरान आपस में जुड़े थे. ये सभी अपनी परिवर्तनकारी निष्ठा के कारण समिति के संपर्क में आए थे. पेशे के अनुसार भी उनमें विभिन्न व्यवसायों से संबंधित, यथा—दर्जी, मोची, जा॓इनर, केबीनेट बनाने वाले, इंजीनियर आदि सम्मिलित थे. तथापि उनमें आधे से अधिक सदस्य कपड़ा उद्योग से जुड़े साधारण कारीगर थे. वे सभी लगभग एकसमान स्थितियों से गुजरे हुए, इसलिए उनकी समस्याएं भी एक जैसी ही थीं. इसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि उन अठाइस सदस्यों में न केवल एकता एवं समर्पण का भाव था, बल्कि अपने लक्ष्य के लिए पूरी निष्ठा एवं त्याग के साथ जुटे रहने का साहस भी था. बावजूद इसके लोगों का समर्थन पाने के लिए उन्हें काफी दिनों तक अनेक कठिनाइयों से गुजरना पड़ा था.
उस महत्त्वपूर्ण अवसर को शब्दों में चित्रित करते हुए जार्ज हा॓लस्की, जो रोशडेल पायनियर्स की प्रारंभिक टीम का सदस्य रह चुका था, ने लिखा है—
‘सहकार को समर्पित कुछ व्यक्ति अंतिम निर्णय करने की चाहत में गोदाम के सीलन और उदासी भरे कक्ष में उत्साहपूर्वक मिले. कि जैसे कोई संसद के विरुद्ध जमा हो रहे षड्यंत्रकारी हों. वे अपनी तैयारी दिखाते हुए इस बात पर बहस कर रहे थे कि अंत में दुकान बंद करने की जिम्मेदारी कौन संभालेगा. उनमें से एक इस काम को पसंद नहीं करता था, तो दूसरे को दुकानदारी के काम से ही नफरत थी. लेकिन उनमें से किसी के पास भी आगे बढ़ने के सिवाय कोई और विकल्प नहीं था. उनमें देर तक कड़वी बहसबाजी चलती रही. लेकिन कुछ देर बाद पूरी टोडलेन उनके ठहाकों से गूंज रही थी.’20
ध्यातव्य है कि उन मजदूरों की दुर्दशा का मुख्य कारण उनकी गरीबी थी. शिक्षा एवं सांस्कारिक प्रशिक्षण का भी उनमें अभाव था. तथापि यह भी सत्य है कि उस समूह को सहकारिता के सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक पक्ष की पूरी जानकारी थी. कठिन परिस्थितियों के बावजूद उनके जुड़ाव के प्रमुख कारण आर्थिक न होकर नैतिक थे. प्रकारांतर में इसीलिए सहकार को सभी राष्ट्रों एवं धर्मालंबियों ने आंदोलन के रूप में अपनाने पर जोर दिया, क्योंकि उसमें नकार के स्थान पर समर्थन एवं सहयोग से काम लिया जाता था. उनका संगठन भूख के बजाय आदर्शवाद से प्रेरित था.21 सहकार उन्हें किसी एक व्यक्ति के कल्याण का न सोचकर पूरे समूह के कल्याण का आश्वासन देता था, इसलिए सामूहिकता की भावना को भी बढ़ाता था. हालांकि इसी तरह की नैतिक व्यवस्थाएं पूर्वी एवं पश्चिमी धार्मिक-नैतिक शास्त्रें में भी मौजूद रही हैं, परंतु पूंजीपतियों ने अपने प्रभाव एवं धन के दुरुपयोग द्वारा उन सभी नैतिक व्यवस्थाओं को शोषण के हथियार के रूप में प्रयुक्त करना आरंभ कर दिया था. सहकार चूंकि प्रत्येक व्यक्ति को सहभागिता के साथ संवाद का अवसर भी उपलब्ध कराता था, इसलिए सहकारिता को उन परिस्थितियों में आदर्श माना गया था.
ओमप्रकाश कश्यप

1.  ’…certain working men in Rochdale have practiced the art of self-help, and of keeping the “wolf from the door.’— George Jacob Holyoake in History of The Rochdale Equitable Pioneers.
2.  ’…taken their own affairs into their own hands.’— Robert Peel.
3.  ’…from all around came reports of weavers clothed in rags, who had sold all their furniture, who worked 16 hours a day yet lived on a diet of oatmeal, potatoes, onion porridge and treacle’— E. P. Thompson, The Making of the English Working Class, (Penguin, Harmondsworth, 1968)— quoted in Johnston Birchall, Co-op: The People’s Business [Manchester University Press, Manchester, UK, 1994), p. 34].
4.  ’No minimum wage existed and salaries were commonly below the equivalent of 10 pence per week in modern terms.’— Ibid
5.  ’Moreover, pollution had increased and public sanitation system was both poor in quality and quantity. In fact, in 1848 the mean life expectancy in Rochdale was only 21 years, six years less than the English national average.’— Ibid, p. 35.
6.  ’…to give birth standing up, their arms round two other women, because they had no change of bedclothing; the very people who had spent their lives weaving clothes and blankets for the world had come down to this, rags on their backs and no blankets on their beds.’ —Birchall, pp. 35-37.
7.  ’Societies might be formed for the foregoing purpose ‘or for any other purpose which is not illegal.’— The Present Application of the Rochdale Principles of Co-operation (1937).
8.  ’The idea of the ‘divi’ came to him one sleepless night – he disturbed his wife’s sleep too, with shouts of: “I’ve got, I’ve got it!’— web material published by Heywood Advertiser,
9.  ’In life he was a useful citizen; a freethinker in religion; in political and social questions an advanced and consistent reformer; a good husband and father; a true, constant, and faithful friend.’— William Cooper’s last tribute quoted from web material by Rochdale Council, UK.
10.  There is no death: what seems so is transition;
This life of mortal breath
Is but the suburb to the life Elysian,
Whose portal we call death. — The Co-operator
11.   Here lies John, and with him Mary,
Cheek by jowl and never vary;
No wonder that they so agree,
John wants no punch, and Moll no tea.—

Quoted by George Jacob Holyoake in the History of the Rochdale Pioneers :
12.   ’He never flinched from the post assigned to him, although the foreman of the works at which he was employed was a shopkeeper; yet he still served the Store with a fidelity rarely, if ever, surpassed by a true believer in the emancipation of the working classes by their own exertions. He frequently left his own employment, at which he could then earn 7s. to 8s. per day, to work for love of the cause, until the Society could afford to pay him something like 3d. per hour for his labour. For four to five years he was superintendent and purchaser. Although, like many a flower, ‘born to blush unseen,’ his services have never been acknowledged; or rather say, until the present panic, which almost annihilated the block printing business, brought the old boy so low in his finances that a notice was given that an application would be brought before the quarterly meeting to make him a present of ten pounds, to assist him to stave off his enemy, poverty; but a generous committee did better, they found him employment at one of the Branch Stores, where he was numbered among the servants of the Society, contented to serve where he once commanded.’— The History of the Rochdale Pioneers: by George Jacob Holyoake.
13.   ’These evils may be cured: and the remedy is in our own hands. The remedy is CO-OPERATION.’ — Dr. William King (b.1786, d.1865) in The Co-operator.
14.   Whoever wants to be the highest, Must first come down to be the lowest;
And then ascend to be the highest, By keeping down to be the lowest.
(A songs (c. 1795) of Shaker commune formed by the New Light followers of Ann Lee an immigrant English factory worker and a Quaker in 1793, quoted from History of Work Cooperation in America by John Curl.)
15.   ’Christmas has never been the same.’— by David J. Thompson wrote in The Nignt The Light Were Lit!
16.   ’However, at twopence per week (240 pence=20 shillings=1 pound) the accumulation was slow, and members began to despair to such an extent that some suggested that the fund be dissolved and redistributed back to the contributors.’— G. J. Holyoake, The History of the Rochdale Pioneers, (Charles Scribner’s Sons, New York, 1918), 10th ed., p. 4/9.
17.   ’While some employers made the required advances, many did not, and the effort failed. They then resolved to take the twopence that they were paying into the Weaver’s Union and collect it into their own fund.’— Johnston Birchall, Co-op: The People’s Business (Manchester University Press, Manchester, UK, 1994), pp.-41
18.   ’From the Rational Sick and Burial Society’s laws, a Manchester communistic production, they borrowed all the features applicable to their project, and with alterations and additions their Society was registered….’— G. J. Holyoake,
19.   ’Their immediate aim was to get better quality food at decent prices and give some of them jobs. Their ultimate goal was to use the co-op’s profits to create their own community where working and living conditions would be better. Amongst the “satanic mills” they would build their “New Jerusalem.”— The Night The Lights Were Lit, by David J. Thompson.
20.   ’A few of the co-operators had clandestinely assembled to witness their denouement: and there they stood, in that dismal lower room of the warehouse, like the conspirators under Guy Fawkes in the Parliamentary cellars, debating on whom should devolve the temerity taking down the shutters, and displaying their humble preparations. One did not like to do it, and another did not like to be seen the shop when it was done: however, having gone so far there was no choice but to go farther, and at length one bold fellow, utterly reckless of consequences, rushed at the shutters, and in a few minutes Toad Lane was in a titter.’— G. J. Holyoake.
21.   ’Hence the members of this new group had a significant amount of experience in cooperation and related reform-minded efforts, and, despite all the hardship described above, were probably driven more by idealism than by hunger’.— Johnston Birchall, Co-op: The People’s Business pp.-42

July 11, 2009

सामाजिक गतिशीलता एवं अंतर्विरोध

स्वाधीन भारत में हम अक्सर अपनी सार्वजनिक असफलताओं व भटकावों पर चिंता व्यक्त करते रहते हैं. इन असफलताओं व भटकावों के पीछे जो कारण निहित हैं, उनमें से एक प्रमुख कारण यह है कि हम अपने अंतर्विरोधों को समाप्त कर, उनमें खप रही ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने में विफल सिद्ध हुए हैं. ज्ञातव्य है कि सामाजिक अंतर्विरोधों की जड़ें गहरी और परंपरा से पोषित होती हैं. इन्हें एकाएक दूर कर पाना संभव नहीं होता. अंतर्विरोधों क रूप से निष्प्रभावी कर दिया था. सामाजिक अंतर्विरोधों के जन्मदाता कारक धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक, औपनिवेशिक आदि किसी भी प्रकार के हो सकते हैं. ये स्पष्ट भी हो सकते हैं और अस्पष्ट भी. ये स्वाभाविक रूप से उत्पन्न और/या प्रायोजित भी हो सकते हैं. मुल मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए भी कभी-कभी राज्य भी, सामाजिक अंतर्विरोधों को हवा देने लगता है. ज्योतिष शास्त्र को विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाने तथा घटती सरकारी नौकरियों के बावजूद आरक्षण को चुनावी मुद्दा बनाना कुछ इसी प्रकार के मामले हैं.

भारतीय समाज, जैसा कि हम सभी जानते हैं, विविध संस्कृतियों का समुच्चय है. दूसरे समाजों की अपेक्षा हमारे समाज की संरचना कहीं अधिक जटिल व बहुआयामी है. ऐसे समाज में अंतर्विरोधों की उपस्थिति पूर्णतः स्वाभाविक है. उन पर नियंत्रण तथा उनमें खप रही ऊर्जा को सही दिशा देने का दायित्व केवल राज्य का नहीं है. यह, इस दिशा में कार्यरत सभी संस्थाओं और बुद्धिजीवियों की भी जिम्मेदारी है. विचारणीय यह भी है कि सत्ता एवं शक्ति के बल पर, अंतर्विरोधों से मुक्ति पाना प्रायः संभव नहीं होता. अंतर्विरोधों का शमन करने का एकमात्र रास्ता, परस्पर विरोधी शक्तियों को संवाद के स्तर तक लाकर, ऐसे संवादों की निरंतरता बनाए रखनरे में ही निहित होता है.

यह मान लेना कुछ विचित्र-सा लगता है कि समाज तात्कालिकता के सिद्धांत के आधार पर विकसित होता है. यह कुछ वैसे ही संकल्पना है जैसी किसी गांव में बिजली आ जाने मात्र से ही उनके संपूर्ण कायापलट की कल्पना कर बैठना. चूँकि समाज संबंधों की बहुआयामी और जटिल संरचना है, इसलिए सामाजिक विकास की व्याख्या किसी अकेले सिद्धां के आधार पर नहीं की जा सकती दूसरे शब्दों में ऐसा कोई नियम नहीं है जो सामाजिक गतिशीलता के सभी पहलुओं को उनकी संपूर्णता के साथ परिभाषित-व्याख्यायित कर सके. तात्कालिकता समाज की बृहद चेतना में स्फुरण मात्र ही उत्पन्न कर पाती है. सामाजिक परिवर्तन को नियंत्रित करने वाली शक्तियों में से कुछ तो इस स्फुरण को ऊर्जा प्रदान करने का कार्य करती हैं. जबकि कुछ उनके विरोध में खड़ी हो जाती हे. समर्थन और विरोध के सिलसिले के बीच ही सामाजिक परिवर्तन अपना स्वरूप ग्रहण करते हैं सामाजिक विकास की प्रवत्ति वर्तुलाकार स्प्रिंग जैसी होती है. जिसमें संस्कृति और परंपराएँ अतीत से जुड़े रहने का आग्रह करती हैं. जबकि प्रौद्योगिकी और अपने लिए अधिकतम सुख-सुविधा जुटा लेने की आकांक्षा इसे आगे की ओर बल प्रदान करती है हर बार ऐसा लगता है कि विकास चक्र अपनी पुरानी स्थिति में लौट आया है, मगर यह सिर्फ भ्रम होता है. इस बीच परिस्थितियाँ बदल चुकी होती हैं. परिवर्तन चक्र आगे की ओर बढ़ चुका होता है. संस्कति या परम्पराओं को सामाजिक गतिशीलता का प्रतिद्वंद्वी मान लेना भी जल्दबाजी भरा निर्णय होगा. संस्कृति तथा परंपराएँ मात्रा परिवर्तनों के नियंत्रक एवं मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है. इसके बावजूद कि जो नए परिवर्तन समाज में होते हैं, वे संस्कृति और परंपराएँ मात्र परिवर्तनों के नियंत्रक व मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है. इसके बावजूद कि जो नए परिवर्तन समाज में होते हैं, वे संस्कृति और परंपराओं को भी पहले जैसा नहीं रहने देते. इस प्रकार विकास के साथ-साथ, संस्कृति और परंपराओं के नवीकरण का दौर भी चलता रहता है. आगे हम समाज की गतिशीलता को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों प्रौद्योगिकी, राजनीति, धर्म व जातीयता तथा उनके बीच पल रहे अंतर्विरोधों पर विचार करेंगे.

समाज की गतिशीलता को परखने का एक पैमाना उस समाज में प्रौद्योगिकी विकास की दर भी है. उत्पादन प्रणाली में प्रौद्योगिकी एवं अन्य कारणों से आई जटिलता, समानुपातिक रूप में अन्य सामाजिक जटिलताओं को भी जन्म देती है. प्रौद्योगिकी का अपरिष्कृत यानी कम जटिल रूप मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता था. अभी कुछ दशक पहले तक लुहार-बढ़ई आदि ग्रामीण शिल्पकार, अपनी निम्न सामाजिक प्रस्थिति के बावजूद, ग्रामीण समाज व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण हिस्सा माने जाते थे. प्रौद्योगिकी विकास का आरंभिक दौर उत्पादन प्रक्रिया में श्रम की लागत घटाने और उसे आरामदेय बनाने पर जोर देता थां उदाहरण के लिए हाथ से बान बंटनेवाले दस्तकारों ने जब गाँव के कारीगरों द्वारा ही बनी बान-बटाई मशीन का उपयोग करना शुरू किया तो उत्पादन प्रक्रिया आरामदेय हुई. उत्पादन बढ़ा और कामगारों की उपयोगिता भी पूर्णतः बनी रही. यह छोटी-सी मशीन मानवीय श्रम को पूरा सम्मान देती थी. उसके बुद्धि कौशल का मान रखती थी. परन्तु अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी मानवीय श्रम को हीन-दृष्टि से देखती है. यह मानवी-कौशल की उपेक्षा और अवमानना करती है. स्वचालीकरण की अधुनातन खोजें उत्पादन-प्रक्रिया का शत-प्रतिशत मशीनीकरण करने पर उतारु हैं, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी पर टिके उद्यमों में कर्मचारी की उपयोगिता मशीन की भूल पर नजर रखने तथा भूल होने की स्थिति में उसकी सूचना विशेषज्ञ तक पहुँचाने तक सीमित होकर रह गई है. उत्तरआधुनिक प्रौद्योगिकी इसे भी समाप्त करने को कृतसंकल्प है. यह कर्मिक-दक्षता का शून्यीकरण करने जैसी स्थिति है. विकास और संचारक्रांति के नाम पर देश के संरचनात्मक ढांचे को मजबूत किए बिना जो लगभग गैर-जरूरी प्रौद्योगिकी समाज पर थोपी जा रही है, वह भी समाज के आधारभूत ढांचे को नुकसान पहुँचाने वाली है, यह बात किसी से छिपी नहीं है.

अत्याधुनिकी प्रौद्योगिकी सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करनेवाले कारणों में प्रमुख है. परन्तु नवीन आविष्कारों पर समाज के मुट्ठी-भर लोगों का नियंत्रण तथा इससे होनेवाले लाभ का समाज के वर्ग-विशेष तक सीमित होकर रह जाना, कल्याणकारी राज्य की आधार-मान्यताओं के सर्वथा विरुद्ध है. प्रौद्योगिकी विकास का संकुचित हितों में उपयोग सामाजिक असंतुलन और तदनंतर सामाजिक असंतोष को बढ़ाता है इससे समाज की विकासशीलता में पश्चगामी खिंचाव पैदा हो जाता है.

समाज की जीवंतता का एक लक्षण राजनीति भी है. किंतु हाल के वर्षों में राजनैतिक प्रश्न अचानक इतने महत्त्वपूर्ण हो चुके हैं कि उन्होंने समाज से जुड़े अन्य प्रश्नों को हाशिये पर पहुँचा दिया है. यह एक त्रासदी-सा लगता है कि संस्कृति-प्रधान भारतीय समाज, राजनीति को ही सामाजिक परिवर्तन का एकमात्र कारक मानकर, सत्ता-प्रधान समाजों जैसा आचरण कर रहा है. चूँकि यह प्रवृत्ति हमारी संस्कृति के विरुद्ध है, हमारी परंपराएं इसका विरोध करती हैं, इसलिए इससे होने वाले परिवर्तनों को समाज का पूरा समर्थन नहीं मिल पाता. संक्षेप में कहें तो अर्थव्यवस्था और उत्पादन प्रणालियों का अतिसंक्रेदित रूप अनियोजित विकास व सामाजिक अंतर्विरोधों को बढ़ावा देता है जो समस्याएँ आज हमें परेशान कर रही हैं, उनके मूल में यही कारण निहित हैं. इसके पीछे बहुत-सा दोष हमारे संचार माध्यमों का भी है. ये जिस रूप में जनता के साथ संवाद करते हैं, उसमें से जनता के मूल मुद्दों की प्रतिध्वनि गायब कर दी जाती हे.

आज हम इस बात में खुशी का अनुभव करते हैं कि हमारा लोकतंत्र प्रबुद्ध हो रहा है इसके सीमित फायदे हैं, जिन्हें हम देख भी रहे हैं. परंतु किसी भी देश-काल में राजनैतिक चेतना के उदय को संपूर्ण सामाजिक चेतना के उदय का पर्याय नहीं माना जा सकता. स्वयं गाँधी जी सामाजिक चेतना के विकास को राजनैतिक चेतना से अलग और बढ़कर मानते थे इसलिए उन्होंने कांग्रेस से आजादी प्राप्त होते ही राजनीति छोड़कर सामाजिक उत्थान के लिए जुट जाने को कहा था.

राजनीति की भाँति धर्म भी सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करने वाला मुख्य कारक है. धर्म यद्यपि व्यक्ति की निजी अभिधारणा मात्र होता है. मगर समूह के रूप में यह अक्सर आक्रामकता को प्रोत्साहित करने वाला ही सिद्ध होता है. प्रकट में प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय यही मानता और घोषणा करता है कि सभी धर्मों का मूल स्वरूप एक जैसा है. परम सत्ता एक है. विभिन्न धर्म उसी को पाने के लिए अपने विधि-विधानों के अनुसार प्रयत्नशील रहते हैं. परन्तु वास्तविक दृष्टि इस समतावादी दष्टिकोण से भिन्न ही रहती है.

समूह के रूप में धर्म शक्ति का व्रत प्रतीक होता है. अतः शक्ति केन्द्र में सर्वोपरि स्थान पाने की लालसा प्रायः सभी धर्मावलंबियों में होती है. इसी कारण विधर्मी को उसकी इच्छा या अनिच्छा से अपने धर्म या संप्रदाय में खींच लेने की प्रवत्ति प्रायः हर धर्मावलंबी की होती है. धर्मांतरण को विकास का प्रतीक बताकर सामूहिक धर्मांतरण की कोशिशें प्राचीन काल से ही, दुनिया-भर में होती रही हैं. परंतु आध्यात्मिक निष्ठा में परिवर्तन और तदनुरूप धर्मांतरण के मामले बहुत कम देखे जाते हैं. जो लोग हिंदू से मुसलमान या मुसलमान से हिंदू बनते हैं, वे इसलिए नहीं कि इस्लाम का भ्रातत्व और समतावादी दृष्टिकोण उन्हें लुभाता है. या हिंदुत्व की दार्शनिक गवेष्णाएँ उन्हें अपनी ओर आकर्षित करती हैं यदि बाह्य दबाव न हो तो सत्ता केंद्र से जुड़ने या उसका संरक्षण पाने की लालसा ही धर्मांतरण का प्रमुख कारण बनती है. सत्ता से जुड़ा या उसमें रुचि रखने वाला व्यक्ति धर्मांतरण को सत्ता केंद्र के और अधिक निकट पहुँचानेवाले माध्यम के रूप में देखता है. जबकि जीवन की मामूली जरूरतों के लिए कठिन संघर्ष करने वाला व्यक्ति, यह सोचकर धर्मांतरण के लिए सहमत हो जाता है कि इससे उसके जीवन-संघर्ष में कुछ कमी आएगी और प्रकारांतर में वह एक सुखमय जीवन जी सकेगा. धर्मांतरण आमतौर पर स्वयं-स्फूर्त नहीं होता. प्रायः यह बाह्यः उत्प्रेरणा के आधार पर ही संभव हो पाता है धर्म और राजनीति का गठजोड़ इस उत्प्रेरण को बढ़ावा देता है. सामाजिक गतिशीलता के भारतीय संदर्भों को समझने के लिए हमें अपने समाज के वर्गीय चरित्र को भी समझना होगा. सामाजिक अंरर्विरोधों को उभारने में इसकी अहम भूमिका रहती है. स्वाधीन भारत में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली का चयन इस उम्मीद के साथ किया गया था कि यह समाज के सभी वर्गों को विकास के एकसमान अवसर उपलब्ध कराएगी. इससे सहअस्तित्व की भावना बढ़ेगी. लेकिन वर्गीय अंतर्द्वंद्वों को मिटाने के लिए कोई असरकारी प्रयास सरकार या राजनैतिक दलों द्वारा नहीं किया गया. संभवतः यह मान लिया था कि लोकतंत्र जो बहुजन की इच्छानुकूल सत्ता परिवर्तन का औजार है, वह समाज और सत्ता के वर्गीय चरित्र में बदलाव के लिए असरकारी सिद्ध होगा. अर्थात् एक राजनैतिक प्रणाली सामाजिक प्रणाली की जिम्मेदारी भी निभा लेगी. यही भूल हमारी वर्तमान समस्याओं के मूल में है. सत्ता परिवर्तन, समग्र सामाजिक परिवर्तन का पर्याय नहीं है, तो भी ऐसा मान लिया गया कि राजनीति के केंद्र में स्थापित होने के पश्चात, सामाजिक प्रस्थिति में भी व्यापक बदलाव संभव हो जाएगा. इसलिए प्रायः सभी सामाजिक संस्थाएँ जनाकांक्षाओं को सशक्त जनांदोलनों में परिवर्तित करने की कोशिश करने की बजाय, राजनीति से जुड़ने या उसका समर्थन पाने में ही अपनी ऊर्जा खपाती रहीं हैं.

भारतीय जनमानस के इसी वर्गीय चरित्र का लाभ उठाने के लिए विभिन्न पूँजीवादी एवं राजनैतिक शक्तियाँ, संस्कृति और अन्य सामाजिक प्रकल्पों की अपने स्वार्थानुकूल व्याख्या करती हैं. संचार माध्यमों का संकुचित सन्दर्भों में और कदाचित अनुचित भी, उपयोग करते हुए ये शक्तियाँ, दीर्घकालिक लाभों के लिए शुरू किए गए आंदोलनों को अल्पकालिक लाभों तक सीमित करने में, सफल हो जाती हैं. आरक्षण और फिर आरक्षण में से आरक्षण जैसी व्यवस्थाओं को ऐसी कोशिशों के रूप में ही लिया जाना चाहिए. ऐसे अल्पकालिक लाभ, सामाजिक व्यवस्था में युगांतरकारी आमूल-चूल परिवर्तन करने में सफल नहीं हो पाते. इसलिए ये सामाजिक अंतर्विरोधों को कम कर पाने में भी अक्षम सिद्ध होते हैं.

विडंबना यह है कि सत्ता शीर्षों पर विद्यमान शक्तियाँ इन अल्पकालिक परिवर्तनों को भी, अक्सर अपने अस्तित्व पर संकट के रूप में देखती हैं. इसलिए वे इन प्रणालियों से जो इन परिवर्तनों को प्रोत्साहित करती हैं, या तो उदासीन हो जाती हैं अथवा उनका अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए उपयोग करने का प्रयत्न करती हैं जिससे उन प्रणालियों में और बाहर असंतोष पनपने लगते हैं. जिससे समाज की गतिशीलता बाधित होती है. यही कारण है कि आम-चुनावों के दौरान जहाँ देश के अभिजात वर्ग में, मतदान के प्रति उदासीनता छाई रहती है, वहीं उत्पीड़ित और सत्ता से वंचित वर्ग में, इस लेकर उत्सव का जैसा माहौल रहता है. दक्षिणी दिल्ली की पाॅश कालोनियों और यमुनापार की झुग्गी-झोंपड़ी बस्तियों में, मतदान के प्रतिशत में भारी अंतर से, यह परिवर्तन साफ देखा जा सकता है. एक ओर तो प्रगतिशील शक्तियाँ देश को अंधविश्वास और समाज के वर्गीय चरित्र से छुटकारा दिलाने के लिए प्रयत्नशील हैं, तो दूसरी ओर जनतंत्रीय और वैज्ञानिक सोच को परंपरा और रुढ़ि में ढाल देने की कोशिश भी प्रतिरोधी शक्तियों द्वारा जारी है. सामाजिक व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर स्थित लोग, एक ओर अपनी स्थिति में सुधार लाने के लिए संगठित होकर संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर लोगों को धार्मिक व जातीय आधार पर बाँटकर, उनके आंदोलन को निष्प्रभावी करने की कोशिशें भी बराबर चल रही हैं. सामाजिक गतिशीलता के भटकाव का सबसे बेहतर उदाहरण और क्या होगा कि कुछ वर्षों पूर्व, जब सरकारी और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में कंप्यूटर का प्रयोग नाममात्र को होता था, तब भी महानगरों के अखबार, चौराहे और गलियाँ कंप्यूटर द्वारा जन्मपत्री बनाने के विज्ञापनों से भरे रहते थे विज्ञान की आधुनिक और चमत्कारी खोज का लाभ उपयोग कर, देश की आम जनता जिसका बहुलांश अनपढ़ है, को और अधिक रूढ़िवादी बनाया जा रहा था. क्या इसके पीछे सिर्फ व्यावसायिक कारण ही थे? और यदि इसके निहितार्थ कुछ और भी थे तब देश के बुद्धिमान समाजशास्त्री इसे चुपचाप क्यों देखते रहे? दरअसल व्यावसायिक शक्तियां सबसे पहले अपने समय के सोच को नियंत्रित करने का प्रयास करती हैं, ताकि उनके विरोध की कम से कम संभावना हो, और यदि ऎसी स्थिति बने तो उसे आसानी से नियंत्रित किया जा सके. क्योंकि उस अवस्था में समाज का स्थापित बुद्धिजीवी वर्ग या तो मौन धारण कर लेता है, अथवा वह समर्थन और विरोध में इतना बंट जाता है कि परिवर्तन में उसकी भूमिका गौण हो जाती है.

अंत में सिर्फ इतना कि हमारा समाज इन दिनों अंतर्द्वंद्वों के एक दौर से गुजर रहा है जो इस देश में प्रबुद्ध होते जनतन्त्र का लक्षण है. अब तक की तमाम निराशाओं के बावजूद, भारतीय समाज में चल रही उथल-पुथल यह विश्वास जगाती है कि हम कोई जड़ समाज नहीं हैं और जब तक समाज के उत्पीड़ित और वंचित वर्ग के मन में असंतोष तथा आँखों में सुनहरे कल का सपना शेष है, तब तक सामाजिक परिवर्तनों की धारा को, न तो कोई रोक पाएगा, न ही इनकी दिशा बदलने में कामयाब हो सकेगा.

ओमप्रकाश कश्यप

July 6, 2009

समकालीन दर्शन तथा उसकी प्रमुख समस्याएं

इस आलेख के शीर्षक के रूप में मैंने ‘समकालीन दर्शन तथा उसकी प्रमुख समस्याएं’ को चुना है. किंतु यह आरंभ में ही स्पष्ट करना उचित होगा कि इसमें समकालीन दर्शन के अधिकांश संदर्भ पाश्चात्य दर्शन से आएंगे. कुछ पाठकों को यह अरुचिकर लग सकता है. विशेषकर उन्हें जो भारत की समृद्ध चिंतन-परंपरा से परिचित हैं, मगर कदाचित अपने पूर्वग्रहों के कारण, गत एक हजार वर्षों से उसमंे उत्पन्न बौद्धिक ठहराव की स्थिति को वे या तो स्वीकारना नहीं चाहते अथवा उन्हें इसका बोध ही नहीं है. यह एक विडंबना ही है कि पांचवी-छठी शताब्दी तक दुनिया को दर्शन का पाठ पढ़ाने वाले और इस आधार पर विश्वगुरु के पद पर दावेदारी गांठने वाले भारत में, शताब्दियों से कोई नया दार्शनिक विचारयानी ऐसा कोई विचार जिसको भारतीय दर्शन परंपरा का मौलिक विस्तार माना जा सके, पनप ही नहीं पाया. यहां तक कि जैन और बौद्ध दर्शन भी, जिन्होंने ईसा से पांच-छह शताब्दी पहले से लेकर छठी शताब्दी बाद तक, न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय चिंतन को अभिनव पहचान एवं गरिमा प्रदान की थीµजिसके कारण वे देश भू-भारती को आज भी सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, बाद में धीरे-धीरे अपनी स्वाभाविक चमक खोने लगे थे. उसके बाद का तो पूरा का पूरा युग वैचारिक जड़ता, निरर्थक बहसों, कर्मकांडों, धर्म के नाम पर थोपे गए ढकोसलों तथा सांप्रदायिक उन्मादों का है. इस संबंध में डा॓. हजारी प्रसाद द्विवेदी की टिप्पणी दृष्टव्य है. उन्होंने आठवीं शताब्दी बाद के युग को टीका युग की संज्ञा देते हुए, उसकी वास्तविक स्थिति पर बहुत यथार्थपरक ढंग से लिखा है

दसवीं शताब्दी के बाद, बल्कि आठवीं शताब्दी के बाद ही, हमारे देश में टीका युग चलने लगा. यानी कोई मौलिक चिंतन, नए सिरे से सोचना संभव नहीं, बल्कि पुराने ग्रंथों में जो कुछ कहा गया है, उसका हम भाष्य कर सकते हैं, टीका कर सकते हैं, टीका की टीका, उसकी भी टीका, सात-सात पुश्तों तक टीकाएं चलती रहीं. टीकाओं का युग आ गया. ज्ञान की धारा अवरुद्ध हो गई. यह टीका वाली प्रवृत्ति, गुरु नानक का जिस समय आविर्भाव हुआ था, उस समय अपनी चरम अवस्था में पर आई हुई थी. नतीजा यह हुआ कि हिंदु शास्त्रों के विपुल भंडार में से केवल तीन ग्रंथ चुन लिए गएइनको प्रथानत्रयी कहते हैं. तीन ग्रंथ या ग्रंथ समूह. इनमें से एक है उपनिषद अथवा दस या ग्यारह उपनिषद, जिनपर आदि शंकराचार्य ने अपना भाष्य लिखा था; अद्वैत मत के प्रतिपादन के लिएदूसरी श्रीमद् भगवद्गीता, और तीसरा वेदांत सूत्रबादरायाण का लिखा हुआ वेदांत सूत्र.’1

स्मरणीय है कि वैदिक मुनियों से लेकर, गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, यूनानी दार्शनिक थेल्स, सुकरात, प्लेटो और अरस्तु आदि के समक्ष प्रमुख दार्शनिक समस्याएं परमसत्ता, भ्रांति, ज्ञान, सद्गुण, सृष्टि, मनस् और इनके औचित्य आदि की व्याख्या को लेकर थीं. प्राचीन मनुष्य यह सोचकर कि मैं क्यों जन्मा? इस सृष्टिमात्र का औचित्य क्या हैआश्चर्य से भर जाता था. प्राचीन भारतीय मुनियों ने यद्यपि हिरण्यगर्भ सूक्त के माध्यम से सृष्टि की उत्पत्ति की व्याख्या करने का प्रयास अवश्य किया था. तथापि सृष्टि और जीवन की उत्पत्ति तथा इनके औचित्य से जुड़े अनगिनत प्रश्न मनीषियों को सहस्राब्दियों से उलझाते रहे हैं. प्राचीन भारतीय मुनियों से लेकर यूनानी और अरबी दार्शनिकों ने अपने-अपने अनुभव एवं बौद्धिक सीमाओं के अनुसर इस प्रश्नों का उत्तर खोजने का प्रयास भी किया, मगर एक भी विद्वान इस विराट सृष्टि से जुड़े अनगिनत प्रश्नों का सर्वमान्य उत्तर देने में समर्थ न हो सका. महात्मा बुद्ध ने तो आत्मा, परमात्मा संबंधी समस्याओं को ‘अव्यक्त-अव्याख्येय’ कहकर इनसे जुड़े प्रश्नों को सतत टालते रहने का प्रयास भी किया. जबकि जैन दर्शन ने स्यादवाद् के माध्यम से समस्त संभावनाओं को सम्मिलित रूप से परखकर एक आमराय बनाते हुए, सत्य तक पहुंचने का सुझाव दिया. मृत्यु का भय मनुष्य को इस संसार से दूर भागने, अमरता की खोज के उकसाता रहा है. मृत्योपरांत के सत्य को जानने की अभिलाषा भी विभिन्न धार्मिक-दार्शनिक विश्वासों के क्रमिक विकास का आधार बनी. उसी के आधार पर विभिन्न सांस्कृतिक प्रतीकों, कर्मकांडों, स्वर्ग-नर्क, अवतारवाद, पाप-पुण्य आदि की प्रासंगिकताएं गढ़ी गईं.

नवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में आदि शंकराचार्य(788-820) ने वेदों की नवीन व्याख्या करते हुए वैदिक दर्शन को नए सिरे से व्याख्यायित करने का युग-परिवर्तनकारी कार्य किया था. इसके लिए उन्होंने प्रायः सभी प्रमुख उपनिषदों, श्रीमद्भागवद् और बह्मसूत्रों का भाष्य लिखा. अद्वैत दर्शन की स्थापना के लिए उन्होंने उस समय के अनेक विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ में हिस्सा लिया, जिसमें उनका मंडन मिश्र के साथ हुआ शास्त्रार्थ जगत्प्रसिद्ध है. अपने मत के प्रतिपादन के लिए वे वस्तुतः अपने समकालीन मीमांसा दर्शन, जो उन दिनों सर्वाधिक लोकप्रिय दर्शन थाके प्रकांड विद्वान कुमारिल भट्ट से शास्त्रार्थ करना चाहते थे. कुमारिल भट्ट मंडन मिश्र के शिष्य थे. मंडन मिश्र स्वयं वेदशास्त्र एवं कर्मकांड के ज्ञाता विद्वान थे. कुमारिल भट्ट से शास्त्रार्थ की कामना लिए शंकराचार्य जिस समय उनसे मिलने प्रयाग पहुंचे, वे घोर प्रायश्चित भावना का शिकार होकर एक कंदरा में स्वयं को मद्धिम अग्नियुक्त चिता के आगे समर्पित कर चुके थे. वहां पहुंचकर शंकराचार्य को ज्ञात हुआ कि कुमारिल भट्ट ने बौद्ध दर्शन को समझने तथा तर्कशास्त्र के दौरान बौद्ध मतालंबियों को परास्त करने की कामना के साथ उसका अध्ययन किया था. किंतु वैदिक परंपरा में किसी एक गुरु के अनुशासन में रहते हुए, बिना उसकी अनुमति के विद्याध्ययन करना पाप की श्रेणी में आता है. जैसे ही कुमारिल भट्ट को इसका बोध हुआ, उनका मन आत्मग्लानि से भर गया. तीव्र पायश्चित भावना से ग्रसित होकर उन्होंने खुद को धीमी चिता के हवाले कर दिया. जिस समय शंकराचार्य उनसे मिलने पहुंचे, कुमारिल भट्ट स्वयं को अग्नि-समर्पित कर चुके थे. उन्होंने शंकराचार्य को अपने गुरु मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ करने की सलाह दी. तब वे उनसे मिलने के लिए प्रस्थान कर गए जो उस समय महिष्मति(आजकल सहरसा, बिहार), में विहार कर रहे थे. बड़े-बड़े दिग्गज विद्वानों की उपस्थिति में शंकराचार्य और मंडनमिश्र का शास्त्रार्थ पंद्रह दिनों तक चलता रहा. अंततः मंडनमिश्र की पराजय हुई. इसपर उनकी पत्नी भारती मिश्र ने, जो उस शास्त्रार्थ में निर्णायक की भूमिका निभा रही थीं, यह कहकर कि अर्धांगिनी होने के नाते उनपर विजय पाए बिना उनके पति मंडन मिश्र को पराजित नहीं माना जा सकता, शंकराचार्य को पुनः बहस के लिए आमंत्रित किया. शास्त्रार्थ हुआ. अंततः भारती मिश्र को भी हार माननी पड़ी. शास्त्रार्थ की शर्तों के अनुसार मंडन मिश्र ने संन्यास ग्रहण कर लिया. वे सुरेश्वराचार्य के नाम से साधु बनकर वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार में जुट गए.

अप्रासंगिक लगने वाली इस घटना का यहां उल्लेख तत्कालीन समाज में गुरु की हैसियत का अनुमान लगाने के लिए किया गया है, जो उन दिनों सत्ताकेंद्र का रूप ले चुका था. अपनी सत्ता को अक्षुण्ण रखने के लिए वह ज्ञान के आयोजनों-प्रयोजनों पर भी नियंत्रण रखने का काम करता था, जो एक तरह से अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था. गुरु-शिष्य परंपरा के कुछ लाभ थे, तो हानियां भी कम नहीं थीं. गुरु की अनुमति के बिना विद्याध्ययन पर अंकुश भी कालांतर में मुक्त चिंतन का अवरोधक तथा वैचारिक जड़ता की स्थिति का कारण बना, जिनके रहते ज्ञान का मौलिक अनुसंधान असंभव ही था. शंकराचार्य की अपनी प्रतिभा तो असंदिग्ध, बल्कि काल-चेतना से भी आगे थी. अल्प आयु में ही वे वेद-वेदांगों का विशद् अध्ययन-मनन कर चुके थे. उनकी ज्ञानचेतना और बौद्धिक मेधा विराट थी, यही कारण है कि शास्त्रार्थ में बड़े-बड़े विद्वान उनके आगे टिक नहीं पाते थे. खुले शास्त्रार्थ में उद्भट विद्वानों को परास्त कर उन्होंने वैदिक धर्म की पुनःस्थापना करने का युगांतरकारी कार्य भी किया था. इसके लिए उन्हें मीमांसकों के अलावा सांख्य दर्शन के आचार्यों, वैशेषिकों और नैयायिकों से भी शास्त्रार्थ करना पड़ा था. शंकराचार्य ने रूढ़ियों और कर्मकांडों से ग्रस्त समाज में अद्वैत दर्शन के रूप में एकेश्वरवाद की स्थापना की और ज्ञानमार्गी धारा का समर्थन किया. उनके द्वारा देश के चारों कोनों में स्थापित मठ, आगे चलकर वेदांत दर्शन के प्रचार-प्रसार में सहायक बने. मठों की स्थापना के पीछे उनका ध्येय था कि वे अध्ययन-मनन का केंद्र बनकर वेदांत की परंपरा का उत्तरोत्तर विकास करने में सहायक सिद्ध होंगे. इससे धार्मिक-दार्शनिक शोध को विस्तार मिलेगा. मगर कालांतर में वे मठ धर्मसत्ता के शक्तिशाली केंद्र के रूप में स्थापित होते चले गए. अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए वहां मौजूद पुजारी, मठाधिपति राजसत्ता, कुटिल नीति, ओछे हथकंडों, मिथ्याडंबरोंµयहां तक कि षड्यंत्रों का सहारा भी लेने लगे. इससे वहां वैचारिक जड़ता और अज्ञानता का प्रवेश स्वाभाविक ही था.

अद्वैत दर्शन की स्थापना के लिए शंकराचार्य ने उपनिषदों, बृह्मसूत्र एवं गीता पर सारगर्भित भाष्य लिए थे. उनका दर्शन वैदिक धर्मग्रंथों से उद्भूत था. तत्कालीन समाज में वेदांत की प्रासंगिकता एवं उपयोगिता का आकलन इससे भी किया जा सकता है कि उन दिनों प्रचलित अधिकांश दर्शन वैचारिक जड़ता और वितंडा का शिकार हो रहे थे. जनसाधारण की उनमें रुचि निरंतर घटती जा रही थी. यहां तक कि एक सहस्राब्दि से अधिक लोकमानस पर छाये रहे जैन और बौद्ध दर्शन की लोकप्रियता भी खतरे में थी. मींमासा दर्शन कर्मकांड प्रधान था, जबकि तर्क और विश्लेषण पर आधारित न्याय और वैशेषिक दर्शनों का प्रभाव समाज के प्रबुद्ध वर्ग तक सीमित था. जनसाधारण में उनकी कोई प्रतिष्ठा न थी. शंकराचार्य ने एक ओर तो शास्त्रार्थ के माध्यम से अपने विरोधियों को वेदांत अपनाने के लिए बाध्य किया, दूसरी ओर जनसाधारण को प्रभावित करने के लिए भक्ति को भी पर्याप्त महत्त्व दिया. उनके द्वारा लिखित पद ‘भज गोविंदम्, भज गोविंदम्, गोविंदम भज मूढ़मते’ आगे चलकर भक्ति परंपरा के विस्तार का मूल मंत्र तथा बौद्ध एवं जैन धर्म के प्रभाव के चलते वैदिक धर्म-दर्शन की लुप्तप्रायः प्रतिष्ठा वापस दिलाने वाला सिद्ध हुआ. हालांकि प्रकारांतर में भक्ति आंदोलन के विस्तार, विशेषरूप से सगुण भक्ति के रूप में थोपे गए अवतारवाद के बढ़ते प्रभाव में वेदांत की चिंतन-मनन और ज्ञान-साधना की प्रवृत्ति, वांछित विस्तार न ले सकी. उसके स्थान पर खोखले कर्मकांड और मिथ्याडंबर छाते चले गए. एक समृद्ध दर्शन विभिन्न पंथों, संप्रदायों में विभाजित होता गया. उसकी क्षतिपूर्ति के लिए कोई नया दार्शनिक विचार जन्म न ले सका. वेदांत के पश्चात नवीं-दसवीं शताब्दी से भारतीय दार्शनिक परंपरा में पसरा शूण्य अभी तक यथास्थति बनाए हुए है. यूं, इस बीच छुटपुट प्रयास अवश्य हुए, लेकिन वे एक प्रकार से पुराने मतों का ही विस्तार थे, जिसके लिए डा॓. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘टीकाकरण’ शब्द का उपयोग किया है.

बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिवेश में शंकराचार्य द्वारा स्थापित वैदिक धर्म-दर्शन की परंपरा उसके विस्तार का कारण तो बनी, सत्ताकेंद्रों का समर्थन भी उसको मिला, जिससे बौद्धदर्शन के प्रभाव में आई प्रजा, पुनः वैदिक धर्म में दीक्षित होने लगी. चूंकि उस समय तक देश में बौद्धदर्शन की परंपरा लगभग चैदह सौ वर्ष पूरे कर चुकी थी, इसलिए उसकी काट एवं उसपर अपनी वरीयता दर्शाने के लिए मठाधीशों ने वैदिक परंपरा को सनातन कहना आरंभ कर दिया, वेदों को अपौरुषेय मान लिया गया. यह कदम वैदिक युग से चली आ रही नवान्वेषण की चिंतनधर्मी परंपरा के लिए घातक सिद्ध हुआ. इसके लिए अन्य कारण भी जिम्मेदार थे. उस समय देश का राजनीतिक वैभव उतार पर था. महाप्रतापी गुप्तवंश का पतन हो चुका था और भारत छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था. उनके बीच सत्ता और वर्चस्व के लिए संघर्ष होते ही रहते थे. देश की राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाने के लिए विदेशी आक्रामक अपनी गिद्धदृष्टि इसपर जमाए हुए थे. देश पर न केवल बाहरी आक्रमण आरंभ हो चुके थे, बल्कि देश के बड़े भू-भाग पर विधर्मियों का कब्जा बढ़ता ही जा रहा था. भारतीय शासकों के विधर्मियों के साथ युद्ध में निरंतर परास्त होते जाने से जनसाधारण पर हताशा व्याप्त होने लगी थी. बाहर से आए आक्रामक सिंधु के इस पार रहने वाले भारतीयों को हिंदू कहते थे, अतएव वैदिक दर्शन के स्थान पर हिंदू दर्शन या हिंदू धर्म रूढ़ होता चला गया. जो अपनी जड़ें वैदिक दर्शन की परंपरा में खोजता था, लगभग भटका हुआ था. जिसके अनुयायी अपने ही देवताओं से लगभग हताश हो चुके थे. इसलिए त्राण की खोज में उन्हें पीर-औलियाओं की शरण में जाने से भी गुरेज नहीं था.

विचार-शैथिल्य के उस दौर में मात्र एक टीका के आधार पर अलग-अलग संप्रदाय बनने लगे. परिणाम यह हुआ कि समाज छोटे-छोटे समूहों में बंटता चला गया. मामूली कर्मकांड यहां तक कि वृथा रूढ़ियों को लेकर भी बहसें होने लगीं. विवेक के स्थान पर टोने-टोटके प्रभावी होते गए. धर्म का वास्तविक उद्देश्य मानव समाज को जोड़े रखना, उसके नैतिक स्तर को ऊंचा उठाना तथा विभिन्न मत-मतांतरों के बीच समन्वय की भावना का विस्तार करना हैआपसी मतभेदों, क्षुद्र स्वार्थपरता, निरर्थक वितंडावाद तथा वैचारिक जड़ता के बीच यह बात पूरी तरह भुला दी गई. यह मान लिया गया कि सृष्टि का सारा ज्ञान प्रथान-त्रयी में सुरक्षित है. उससे बाहर कुछ नहीं. और तो और संप्रदाय के गठन का आधार ही मौलिक सोच न होकर टीका को बना दिया गया. द्विवेदी जी आगे लिखते हैं

‘…तो संप्रदाय वह होगा जिसके पास अपना एक भाष्य होगा. अपनी एक टीका जरूर होनी चाहिए और टीका के लिए टीका(तिलक) भी लगाने की जरूरत है. वह इसका सूचक है कि इसके पास एक टीका है. उसका अपना मंत्र होना चाहिए. उसका अपना ईष्टदेव होना चाहिए.’2

किसी प्राचीन ग्रंथ की टीका लिखकर और मात्र एकाध मंत्र की रचना से न केवल विद्वानों में नाम गिनाया जा सकता था, बल्कि नए संप्रदाय की नींव रखना भी संभव था. कहा जा सकता है कि अवतारवाद एवं आडंबरवाद के चलते उन दिनों नए संप्रदाय के गठन के लिए न तो स्वतंत्र विचारधारा की जरूरत रही थी, न स्वतंत्र दर्शन और न ही समस्याओं के तार्किक-तात्विक विवेचन की. ऐसे में संप्रदायों के गठन के पीछे शक्ति-सत्ता का प्रदर्शन होना स्वाभाविक ही था. यह सत्ता कहीं धर्मसत्ता का प्रतीक थी तो कहीं पर राजनीति समर्थित. इससे उन लोगों को भी अपना प्रभुत्व जमाने का अवसर मिलता था, जिनके लिए धर्म-दर्शन का अभिप्राय महज सत्ता कब्जाना था. जाति के आधार पर बंटे समाज में, उसी के आधार पर जन्मना विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के मन में ऐसी महत्त्वाकांक्षाओं का पनपना अस्वाभाविक भी नहीं था. ‘मठाधीश’ होना प्रारंभ में भले ही सम्मान और बौद्धिक गरिमा का प्रतीक शब्द रहा हो, मगर आगे चलकर यह शब्द बौद्धिक जड़ता और सर्वसत्तावाद का पर्याय बनता चला गया. फलतः संप्रदाय और उनका गठन लोककल्याण अथवा ज्ञानचेतना की पवित्र भावना से प्रेरित न होकर, वर्चस्व-भावना और ताकत का प्रतीक बनता चला गया. अक्सर यह भी होता था कि नए संप्रदाय के गठन का विचार पहले बनता, संप्रदाय तत्पश्चात गठित होता. शास्त्रीय मान्यता उसके भी बाद मिल पाती. कई बार ऐसा भी होता कि टीका या संप्रदाय-ग्रंथ बाद में रचा जाता, संप्रदाय की रूपरेखा या उसकी अभिकल्पना पहले गढ़ ली जाती. ऐसे संप्रदाय-गठन के पीछे प्रायः धार्मिक-सामाजिक सत्ता पर सवारी गांठने की प्रवृत्ति का हाथ होता था, जो पचास सौ नहीं बल्कि शताब्दियों तक लगातार उत्प्रेरक का काम करती रही. टीकाकरण, जिसे आज की भाषा में भावानुवाद भी कह सकते हैं, की प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हुए डा॓. हजारीप्रसाद द्विवेदी एक और ऐतिहासिक प्रसंग का उल्लेख करते हैं

‘‘यह सब कहते हैं कि वृंदावन में एक शास्त्रार्थ सभा हुई. चैतन्य देव बड़े भारी भक्त थे बंगाल के; और उनके शिष्यों ने बड़ा साहित्यिक कार्य भी किया है. भक्ति पर जितना अच्छा ग्रंथ उन्होंने लिखा है, उतना भारतवर्ष में कम लोगों ने लिखा। तो वृंदावन की एक सभा में उनसे पूछा गया कि तुम्हारा कोई संप्रदाय है? उन्होंने कहा‘है’, तो कहने लगे‘टीका कहां है तुम्हारे पास? किस ग्रंथ पर तुमने टीका लिखी है? कोई टीका नहीं है इसलिए तुम अलग हो जाओ.’ तो बलदेव विद्याभूषण ने एक दिन की मोहलत मांगी और रातोंरात किसी तरह अपने को जात में दाखिल किया.’’3

उपर्युक्त उद्धरण से आप अनुमान लगा सकते हैं कि आठवीं शताब्दी के बाद से बीसवीं शताब्दी तक भारत में नए दार्शनिकबोध के नाम पर शून्य पसरा हुआ है. दरअसल अपनी अद्वितीय प्रतिभा और तर्क-सामथ्र्य के बल पर शंकराचार्य ने वेदांत को जिस ऊंचाई तक पहुंचाया था, उनसे यह मान लिया गया कि वेदांत के आगे कुछ हो ही नहीं सकता. परंपराजीवी हिंदू मानस वैसे भी स्वयं को वेदों की छाया से बाहर नहीं लाना चाहता. इसलिए शताब्दियों बाद भी भारतीय मनीषा वहीं ठहरी हुई है, जहां लगभग एक हजार वर्ष पहले शंकराचार्य ने उसको छोड़ा था. अतएव भारतीय दर्शन में जब भी समकालीनता की चर्चा होती है, तो बात अधिक से अधिक उनीसवीं शताब्दी में चलने वाले चंद सुधारवादी आंदोलनों तथा स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, महर्षि अरविंद आदि के विचारों तक सीमित होकर रह जाती है. हालांकि हम सभी जानते हैं कि ये सभी विद्वान, समाज-सुधारक अपने विचारों, संप्रदायों और हजारीप्रसाद द्विवेदी के शब्दों में कहें तो ‘टीकाकरण’ के माध्यम से वैदिक परंपरा का ही ‘अनुसंधान’ कर रहे थे. शताब्दियों तक विधर्मियों की दासता भोग चुके हताश भारतीयों के लिए अतीतोन्मुखी होकर अपनी स्मृतियों की तलहटी में छिप जाना अस्वाभाविक भी नहीं था.

बाद के महापुरुषों में सर्वपल्ली राधाकृष्णन, महात्मा गांधी, आचार्य रजनीश भी आते हैं. इनमें से प्रथम दो ने राजनीति के साथ-साथ समाजकर्म को भी समानरूप से साधने में महारत हासिल कर ली थी, जिससे उन्हें व्यापक लोकसमर्थन हासिल हुआ. उसके बल पर वे भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार बने. गांधी जी ने अपने नाम से किसी स्वतंत्र विचार अथवा ‘वाद’ के प्रचलन का समर्थन कभी नहीं किया, बल्कि अपने जीवन-कर्म ही को अपना संदेश माना. फिर भी कुछ विद्वान गांधीवाद का दार्शनिक सिद्धांत की तरह उल्लेख जरूर करते हैं, गांधी जी विचारों की परिधि बहुत व्यापक थी, उसमें समाजविज्ञान, आर्थिकी, मानविकी और राजनीति का पूर्ण समन्वय है. किंतु यदि हम उसमें किसी स्वतंत्र दार्शनिक विचार की खोज करें तो हमें संभवतः निराश रह जाना पड़ेगा. डा॓. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय दर्शन के प्रकांड अध्येता थे. इसका प्रमाण भारतीय दर्शन पर उनका विशाल ग्रंथ है, उनकी दृष्टि मानवतावादी और समन्वयकारी थी. उन्होंने वैदिक धर्म-दर्शन की नैतिकतावादी व्याख्या पर जोर दिया, मगर वे किसी नए दार्शनिक विचार के प्रणयन का खतरा नहीं उठा सके. आशय है कि ये दोनों महापुरुष कहीं न कहीं वैदिक धर्म अथवा औपनिषदिक दार्शनिक परंपरा का ही विस्तार कर रहे थे.

यहां आचार्य रजनीश पर विशेष चर्चा प्रासंगिक है. बीसवीं शती के इस विलक्षण प्रतिभाशाली आघ्यात्मिक गुरु को अनेक विद्वान दार्शनिक की मान्यता देते हैं. स्वयं रजनीश अपने भक्तों के बीच खुद को ‘ओशो’ कहलवाकर प्रचार करते रहे. अधिकाधिक लोगों को अपने विचारों और वक्तृत्व-कला से प्रभावित करने की महत्त्वाकांक्षी ललक ने ही उन्हें दुनिया के उन गिने-चुने प्रवाचकों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया था, जो समाज के बड़े वर्ग को अपना अनुयायी बना लेने में सफल होते हैं. अपने प्रवचनों में उन्होंने भारतीय धर्म-दर्शन और सांस्कृतिक प्रतीकों की अधुनातन व्याख्याएं कीं और अपना अलग प्रशंसक वर्ग पैदा किया. अधिकांश विद्वानों का मत है कि लोकायतों की भांति रजनीश भी मुक्त-भोग के समर्थक थे. जबकि मेरे विचार में वे भोग को नियंत्रण मुक्त करने के बजाय, उसको लेकर मानव-मन में पलने वाली स्वाभाविक कुंठाओं से मुक्ति का आवाह्न कर रहे थे. ‘संभोग से समाधि तक’ शीर्षक के अंतर्गत दिया गया उनका लंबा प्रवचन वस्तुतः कामेच्छाओं के अनुचित शमन तथा उनको लेकर मनुष्य की स्वाभाविक कुंठाओं से मुक्ति की खोज का उद्यम है. लेकिन जैसा कि अक्सर देखा गया है, गलत हाथों में पड़कर क्रांतिकारी विचार अपनी ही जड़ें काटने लगते हैं. कालांतर में रजनीश दर्शन के नाम पर भी स्वच्छंदतावादी जीवनशैली उभरने लगी. उनके आश्रम की गतिविधियों को लेकर रहस्यमयी किवदंतियां बनने लगीं.

ठीक पांच सौ वर्ष पहले जन्मे जा॓न काल्विन नामक फ्रांसिसी विचारक का मानना था कि स्वर्ग की कल्पना व्यर्थ है। ईश्वर ने अपने परमानंद के लिए ही इस सृष्टि की रचना की है। मनुष्य धरती पर रहकर ही स्वर्ग जैसी सुविधाएं जुटा सकता है। काल्विन की यह विचारधारा चर्च की तात्कालिक मान्यताओं के विरुद्ध, सीधे-सीधे उसकी सत्ता को चुनौती थी। अतः काल्विन का विरोध स्वाभाविक था। इसके लिए उसको जेनेवा से निष्कासन भी झेलना पड़ा था। बीसवीं शताब्दी में रजनीश भी कुछ इसी प्रकार का प्रस्ताव रख रहे थे. दोनों के बीच करीब साढ़े चार सौ वर्ष का अंतर था, लेकिन विरोध का सामना रजनीश को भी करना पड़ा. मेरी दृष्टि में रजनीश की विचारधारा और उनके द्वारा प्रस्तावित जीवनशैली का एक राजनीतिक पहलू भी था. उनकी धार्मिक-दार्शनिक स्थापनाएं, जाने-अनजाने समाजवादी विचारधारा के विरुद्ध जा रही थीं, जिसके लिए फ्रांस और रूस में दुनिया की दो महान क्रांतियां हो चुकी थीं. भारत भी उनके प्रभाव से अछूता नहीं था. दुनिया-भर के करोड़ों लोग उसी के माध्यम से नए समानताधारित समाज का सपना देख रहे थे. रजनीश संन्यास और वैराग्य संबंधी परंपरागत मान्यताओं को चुनौती देते हुए संसार से पलायन के बजाय, सबके बीच रहकर चुनौतियों का सामना करने और उनसे सतत जूझने की प्रेरणा दे रहे थे, वह बाजार के लिए विशेष लाभकारी था. कभी-कभी लगता है कि रजनीश धर्म-दर्शन के फालूदे को पूंजीवाद की आइसक्रीम के साथ खपाने का प्रयास कर रहे थे. उस समय पूरी दुनिया परस्पर शीतयुद्ध में फंसे दो ध्रुवों में बंटी हुई थी, जिसके एक छोर पर साम्यवादी रूस था, दूसरे पर अमेरिका जहां पूंजीवाद अपनी जड़ें गहरी कर चुका था और उसकी निगाह भारत जैसे एशियाई देशों पर थी. इसलिए रजनीश जब अमेरिका गए तो वहां उनका जोरदार स्वागत किया गया. लेकिन धर्म का उच्छ्रंखलतावादी रूपजैसा कि रजनीश के प्रतिपक्ष के रूप में प्रचारित किया जा रहा था, किसी भी समाज अथवा धर्म में स्वीकार नहीं था. धर्म-दर्शन और पूंजीवाद की युति बाजार के दीर्घकालिक हितों के विरुद्ध होने के कारण स्वयं पूंजीपति उसके साथ बहुत दूर तक जाने को तैयार नहीं थे. शायद इसलिए कि धर्म की जड़ें अतीत में होती हैं और अतीत के प्रति सघन व्यामोह त्वरित सामाजिक परिवर्तन के प्रयासों में, खासकर जैसा कि बाजारवादी शक्तियां चाहती हैं, अवमंदक का कार्य करता है.

रजनीश का प्रभाव प्रायः समाज के ऊपरी वर्गों तक सीमित था, जिनकी क्रय क्षमता पर्याप्त थी. इसलिए अमेरिकी प्रवास के आरंभिक दिनों में रजनीश के विचारों को वहां खूब मान-सम्मान मिला. लेकिन अकेला उच्च आय वर्ग तो बाजार की महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा कर नहीं सकता था. इसके लिए समाज के मध्यम और अल्पआयवर्ग का साथ भी अत्यावश्यक, जिनके बीच धर्म और उसके प्रतीकों, कर्मकांडों की पूरी पैठ थी. यही कारण है कि कालांतर में रजनीश की विचारधारा पूंजीवाद समर्थित धार्मिक यथास्थितिवादियों को खलने लगीं. पूंजीवादी शक्तियां भी तब तक संभवतः मान चुकी थीं कि रजनीश-दर्शन के आधार पर उससे आगे की यात्रा असंभव, इसलिए उन्होंने धीरे-धीरे अपने हाथ खींचने शुरू कर दिए. परिणामस्वरूप रजनीश को अमेरिका की धरती का मोह छोड़कर भारत लौटना पड़ा. यहां के परिवेश में रजनीश के विचार चैंका देने वाले जरूर थे. लेकिन दार्शनिक दृष्टि से उनके पास भी नया कुछ नहीं था. मुक्त भोग अथवा भोग को लेकर कुंठाओं से मुक्ति का जो आवाह्न रजनीश कर रहे थे, चार्वाकपंथी उनसे बहुत पहले तथा उनसे कहीं अधिक तार्किक रूप में सामने ला चुके थे. कहने का आशय है कि प्रकांड मेधा के धनी रजनीश ने अपने प्रवचनों द्वारा धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों की अभिनव व्याख्याएं तो कीं, मगर वे ऐसा कोई विचार दे पाने में असमर्थ रहे, जो भारतीय दर्शन को मौलिक विस्तार देता हो.

पश्चिम में दर्शनशास्त्र के पर्याय के रूप में Phylosophy शब्द प्रचलित हुआ, जो दो शब्दों Philos तथा Sophia शब्दों से मिलकर बना है. इनमें Sophia का अर्थ क्रमशः प्रज्ञा अथवा बुद्धि एवं Philos का अभिप्राय प्रेम या अनुराग है. इस तरह Phylosophy का अर्थ हुआ प्रज्ञा अथवा बुद्धि के प्रति सहजानुराग. कुछेक अपवाद छोड़ दिए जाएं तो पाश्चात्य समाज में प्रज्ञावान मनुष्य को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था. प्लेटो ने तो यहां तक कहा था कि राज्य की बागडोर दार्शनिकों और विद्वतजनों के हाथों में होनी चाहिए. इसके समानांतर भारतीय परंपरा में दर्शन का अभिप्रायः जीवन के मूलभूत रहस्यों की खोज एवं परमसत्ता से साक्षात्कार की स्थिति से लिया जाता है. इसके लिए मन एवं आचरण की शुद्धता तथा सर्वकल्याणधर्मी चिंतन अनिवार्य है. भारतीय दर्शनों में योग को परमसत्ता से साक्षात्कार का एक सशक्त माध्यम बताया गया है. दूसरी ओर विज्ञान एवं बुद्धि-विवेक के सहयोग के आधार पर इस सृष्टि के रहस्यों के बारे में अधिक से अधिक जान लेना या जान लेने की कोशिश करना ही पश्चिमी दर्शन की विशेषता है. बुद्धि और विज्ञान के प्रति सहज अनुराग से बंधे होने के कारण पश्चिमी दर्शनशास्त्री नए वैज्ञानिक आविष्कारों से तत्काल प्रेरणा लेते रहे हैं. विज्ञान जैसे ही कोई नई खोज करता है, तत्पे्रेरित दार्शनिक विचार भी समानांतर रूप में विकासमान होने लगता है. यही कारण है कि पंद्रहवी शताब्दी के बाद की वैज्ञानिक क्रांति पाश्चात्य दर्शन के क्षेत्र में भी समानरूप से क्रांति की वाहक सिद्ध होती है. समकालीन पाश्चात्य दर्शन के प्रमुख आधार-स्तंभ, सुविख्यात दर्शनशास्त्री फ्रांसिस बेकन, डेविड ह्यूम, जा॓न ला॓क, देकात्र्त, स्पेंसर, बर्कले, लाइबिन्त्जि, स्पिनोजा, हीगेल, वाल्तेयर, कांट आदि पंद्रहवी शताब्दी के बाद की ही उपज हैं.

यह ध्यान देने की बात है कि आठवीं और विशेषरूप से दसवीं शताब्दी के बाद भारत में जहां टीकाकरण के माध्यम से महज परंपरा-पोषण किया जा रहा था, वहीं पश्चिम में उसके प्रति आलोचनात्मक रवैये की शुरुआत हो चुकी थी. पीटर अबेलार्ड (1079 1142) ने यह कहकर कि प्राचीनतम धर्मों और धर्मग्रंथों के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं है, पूरे समाज में भूचाल ला दिया था. इसपर विशेषकर पादरीवर्ग जो ईसाई धर्म के श्रेष्ठतम होने का दावा कर रहा था, नाराज हो उठा. अबेलार्ड के विरुद्ध विरोध की लहर उठने लगी. उससे विचलित हुए बिना अबेलार्ड ने कहा कि वास्तविक धर्मग्रंथ तो सत्य है. उस तक पहुंचने के लिए किसी धर्म अथवा धर्माचार्य की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं है. सत्य क्या है, इसका स्पष्टीकरण करने के बजाय उसने उसके बारे में लोगों को अपने विवेकानुसार स्वयं निर्णय लेने के लिए छोड़ दिया था. स्पष्ट है कि अबेलार्ड ने धार्मिक साक्षात्कार अथवा तत्संबंधी अनुभूतियों के लिए पादरी समेत दूसरे धर्माचार्यों की अनिवार्यता पर प्रश्न उठाए थे. वह चाहता था कि हर व्यक्ति जो सत्य को प्राप्त करना चाहता है, उसके लिए वह अपनी क्षमताओं के अनुरूप विचार करे. संदेह को जिज्ञासा और ज्ञान का मूलमंत्र मानते हुए अबेलार्ड ने एक मूलमंत्र दिया

संदेह हमें जांच-पड़ताल के लिए प्रेरित करता है, जांच-पड़ताल हमें सत्य तक ले जाती है.’4

पीटर अबेलार्ड ने सत्य को ही ईश्वर माना था. जैसे आगे चलकर गांधीजी ने स्वीकार किया. पर अबेलार्ड के विचार यहीं तक सीमित नहीं थे. उससे लगभग डेढ़ सह्स्राब्दि पहले जब सुकरात ने कहा था कि ‘उस(परमात्मा) को पहचानो’(Know thyself)] तब एक तरह से वह भी परमसत्य की ही प्रतिष्ठा कर रहा था. बल्कि सुकरात से भी हजारों वर्ष के मनुष्य की स्वाभाविक जिज्ञासा परमतत्व अथवा परमसत्ता की खोज में ही निहित थी, जिसके माध्यम से सृष्टि के मूल स्वरूप तथा उसके कारण की व्याख्या की जा सके. इस बीच कुछ भौतिकवादी विचारक भी आए, जिन्होंने परमात्मा की सत्ता को चुनौती दी. लेकिन कुल मिलाकर सारे विमर्श आत्मा-परमात्मा और उनके जागतिक संबंधों की खोज तक सिमटे रहे. अबेलार्ड ने सुकरात की उक्ति में संशोधन करते हुए कहा, ‘खुद को पहचानो’(Know yourself) उसका मानना था कि सृष्टि के रहस्यों की खोज में स्वयं से परे जाने की जरूरत नहीं है. उसकी तलाश अपने ही भीतर, खुद की पहचान के साथ की जानी चाहिए. मनुष्य के मन-मस्तिष्क को समझकर भी सृष्टि के रहस्यों का निदान संभव है. सत्य की खोज के लिए इतर से अंतर की यात्रा की चेष्टा पूर्व में भी प्रारंभ हो चुकी थी. ग्यारहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत के निगुर्णाश्रयी भक्ति परंपरा के संतकवि भी परमात्मा को पाने के लिए अपने अंतर्मन में झांकने की अलख जगा रहे थे. योग दर्शन का तो आधार ही, अपने भीतर की शक्तियों को एकाग्र कर उन्हें आत्मबल एवं अभ्यास द्वारा इतना ऊंचा उठाना है कि आत्मा और परमात्मा के बीच जो द्वैत आभासमान है, वह तिरोहित हो और परमात्मा का साक्षात संभव हो सके. कबीर पढ़े-लिखे तो नहीं थे, लेकिन उन्होंने भी परमात्मा की खोज में इधर-उधर भटकने, धर्मालयों में माथा टेकने, माला-जप करने वाले रूढ़िवादियों को लगभग ललकारते हुए कहा था कि ‘तेरा साईं तुज्झ में जागि सके तो जाग.’

अभिप्राय है कि धर्म-दर्शन को लेकर पीटर अबेलार्ड से शुरू हुआ आलोचनात्मक विमर्श, आने वाली शताब्दियों में पश्चिमी दर्शन की प्रमुख विशेषताओं में शुमार होता चला गया. उनीसवीं शताब्दी तक आते-आते तो सुकरात और प्लेटो जैसे अध्यात्मवादियों की खुलेआम खिल्ली उड़ाई जाने लगी. जर्मन कवि-दार्शनिक नीत्शे ने सुकरात का उपहास करते हुए कहा था

सुकरात तो जोकर ठहरा, उसे कौन गंभीरता से लेता है.’5

सुकरात ही क्यों, नीत्शे तो ईश्वर को भी नहीं बख्शता था. ईश्वर की अवधारणा जोरदार शब्दों में खंडन करते हुए उसने कहा था‘ईश्वर मर चुका है, और हमने उसकी हत्या की है.’6 ज्ञान की परंपरा तथा नए आलोचनात्मक विमर्श का स्वागत करने में वाल्तेयर भी पीछे नहीं था. उसका कहना था कि

मनुष्यता की कल्याण के लिए अतीत की उपयोगिता यह जानने के लिए है कि पुराने जमाने के लोग कैसे सोचते थे, न कि यह पता लगाने में कि वे क्या करते, और कैसा खाते-पीते थे.’7

वस्तुतः पंद्रहवी शताब्दी से पश्चिम में औद्योगिक-वैज्ञानिक क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी. जिसके प्रभाव के चलते वहां परंपरागत चिंतन को लेकर एक आलोचनात्मक युग का सूत्रपात हुआ था. धर्म, दर्शन, राजनीति, समाज, संस्कृति आदि कुछ भी उसकी पहंुच से बाहर नहीं था. काॅपरनिकस की पुस्तक ‘दि रिबोल्युशनिबस् आॅरबियम’ (De Revolutionibus Orbium, 1543) तथा न्यूटन की ‘प्रिंसीपिया मेथेमेटिका’ (Philosophie Naturalis Principia Mathematica, 1687) ने वहां वर्षों से चली आ रही अवैज्ञानिक धारणाओं को चुनौती देते हुए नए ज्ञान-विज्ञान की ओर संकेत किया था. बेकन ने ‘ज्ञान ही शक्ति8 कहकर नई शोधों का खुले मन से स्वागत किया था. उसको विश्वास था कि कि मशीनें आनेवाले दिनों में मनुष्य की मुक्ति की वाहक सिद्ध होंगी, जिससे तत्कालीन समाज में नई तकनीक और मशीनीकरण को लेकर जो स्वाभाविक संकोच, डर आदि थे, वह कम होने लगे थे. इसी आधार पर बेकन को आधुनिक विज्ञान का पितामह माना जाता है, जिसके फलस्वरूप आगे चलकर समाज में नए ज्ञान और आविष्कारों को स्वीकार्यता मिलने लगी थी.

पंद्रहवीं शताब्दी से शुरू हुए बौद्धिक पुनर्जागरण के काल में जहां-जहां तकनीक और विज्ञान गए, वहां-वहां बौद्धिक-सामाजिक आंदोलन चले, जिन्होंने यूरोप समेत पूरी दुनिया को प्रभावित करने और बदलने का काम किया. लेकिन भारत जैसे ब्रिटिश उपनिवेशों की स्थिति भिन्न थी. अंग्रेजी दासता से पीड़ित ये देश प्रौद्योगिकीय क्रांति और तज्जनित परिवर्तनों से न केवल अछूते थे, बल्कि घोर अतीतोन्मुखी वातावरण में जी रहे थे. उसकी मेधा हताश और पलायनोन्मुखी हो चुकी थी. परिणाम यह हुआ कि दर्शन-चिंतन की धुरी भारत आदि एशियाई देशों से खिसककर फ्रांस, जर्मनी और इटली जैसे देशों में चली गई, जो उन दिनों पुनर्जागरण के प्रभाव में थे. वहां उसने एक के बाद एक धर्म, दर्शन, राजनीति, समाज, अर्थशास्त्र, विज्ञान आदि अनेक क्षेत्रों में कई मौलिक विचारों को जन्म दिया. पीटर अबेलार्ड की ज्ञानाश्रयी परंपरा को फ्रांसिस बेकन, डेविड ह्यूम, जाॅन लाॅक, देकात्र्त, स्पेंसर, लाइबिन्त्जि, बर्कले, स्पिनोजा, इमानुएल कांट, हीगेल आदि ने अपनी-अपनी तरह से विस्तार दिया और पाश्चात्य दर्शन की परंपरा को समृद्ध करने में अपना योगदान दिया. इन दार्शनिकों का चिंतन कमोबेश परंपरा से पोषित था, मगर उनकी कसौटियां एकदम अलग थीं, जो नए वैज्ञानिक सिद्धांतों और आविष्कारों से अनुप्रेत थीं. बेकन ने वैज्ञानिक आविष्कारों को मानवमुक्ति से जोड़ते हुए उनका जोरदार ढंग से स्वागत किया था, तो लाइबिन्त्जि सृष्टि की उत्पत्ति एवं संचालन का कारण शुभ के संवाहक छोटे-छोटे चिद्बिंदुओं को मानता था. स्मरणीय है कि लाइबिन्त्जि से सैकड़ों वर्ष पहले, वैशेषिक दर्शन के प्रणेता कणाद मुनि ने भी सृष्टि की उत्पत्ति का मूल अतिलघु कणों को माना था. बकर्ले ने ‘दृष्टि ही समष्टि है’ कहते हुए इस सृष्टि और उससे जुड़ी प्रत्येक विचारधारा को व्यक्ति सापेक्ष माना था. यह विचारधारा आगे चलकर अस्तित्ववादी दर्शन में अपेक्षाकृत अधिक परिष्कृत एवं नैतिकतावादी स्थापनाओं के रूप में विकसित हुई.

आधुनिक पश्चिमी दर्शन की बात करें तो वह मुख्यतः संदेहवाद(डेविड ह्यूम), अनुभववाद(जाॅन लाक), समीक्षावाद(इमानुएल कांट), अवयवीवाद(ह्नाइटहैड), विकासवाद(डार्विन, हर्बट स्पेंसर), सर्वेश्वरवाद (स्पिनोजा), यथार्थवाद(रसेल), चिद्बिंदुवाद या आध्यात्मिक बहुत्वाद (लाइबिनित्जि), अस्तित्ववाद(किर्कगाद, सार्त्र), व्यवहारवाद (विलियम जेम्स) आदि दर्जनों धाराओं में बंटा हुआ है. यदि गंभीरतापूर्वक विवेचन किया जाए तो परस्पर भिन्न नजर आती इन विचारधाराओं में से कई ऐसी हैं, जिनमें परस्पर सामन्जस्य एवं एकरूपता है. जैसे विकासवाद एवं नवविकासवाद, भौतिकवाद के ही नवविकसित रूप हैं. भौतिकवादी और विकासवाद के समर्थक स्पेंसर, डार्विन आदि इस सृष्टि को अपने आप में पूर्ण मानते हैं, उनकी निगाह में इसकी उत्पत्ति के पीछे आत्मा अथवा ईश्वर जैसी कोई पारलौकिक सत्ता नहीं है. न ऐसी किसी ऐसी सत्ता की कल्पना की जा सकती है, जिसको विज्ञान के द्वारा जानना असंभव हो. जैसे-जैसे विज्ञान परिपक्व होता जाएगा, इस सृष्टि के रहस्यों से भी पर्दा हटता जाएगा. इन दार्शनिकों का मानना था कि आनेवाले वर्षों में विज्ञान न केवल सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़े प्रत्येक प्रश्न का उत्तर देने में सक्षम होगा, बल्कि उसके औचित्य से भी पर्दा हटा सकेगा, साथ ही उन प्रश्नों के उत्तर भी दे सकेगा, जो सहस्राब्दियों से मानव-मस्तिष्क की समस्याएं बने हुए हैं.

भौतिकवादियों से अलग स्पिनोजा समस्त चराचर को परमसत्ता का विस्तार मानता था. उसके अनुसार समस्त सृष्टि शुभ का विस्तार है. यदि इसमें कोई अशुभ अथवा किसी भी प्रकार से जो विक्षोभ आभासित है, उसके लिए मानवीय कमजोरियां जिम्मेदार हैं. उसके अनुसार असीमित परमसत्ता को समझना और उसकी व्याख्या करना सीमित मानवेंद्रियां के सामथ्र्य से परे है. मनुष्य जब भी ऐसा करता है, उससे चूक होती है. अपनी दुर्बलताओं को समझने के बजाय वह इस सृष्टि जो परमात्मा की दोषमुक्त और महानतम रचना है, में खोट निकालने लगता है. इस संदर्भ में हीगेल भी स्पिनोजा का समर्थक था. उसका मानना था, कि अपरिमित परमसत्ता का साक्षात सीमित सामथ्र्ययुक्त मानवेंद्रियों की पहुंच से परे है. स्पिनोजा के सर्वेश्वरवाद के पीछे भारतीय उपनिषदों और सुकरात का अध्यात्मवाद है. वह इस समस्त चराचर सृष्टि को इस परमसत्ता का विस्तार मानता था. उपनिषदों में भी ‘सर्व खाल्विदं ब्रह्म’ कहकर इस चराचर जगत को परमसत्ता का ही विस्तार माना गया है, जो निर्विकल्प, विकारहीन एवं सर्वथा संपूर्ण है. यदि कहीं अभाव है, यदि इसमें कहीं विकार अथवा विक्षोभ नजर आता है, तो उसका कारण मानवीय स्वभाव की कमजोरी अथवा उसकी अज्ञानता है. सर्वेश्वरवादियों की दृष्टि में मनुष्य की अज्ञानता ही उसकी समस्याओं की जननी है. भौतिकवादी विचारकों की भांति व्यवहारवादी दार्शनिक भी इस सृष्टि को वास्तविक और सत्य मानते हैं. उनके अनुसार जो प्रत्यक्ष है, अनुभूति का विषय और मनुष्य के लिए उपयोगी है, वही सत्य है. हीगेल और कांट जैसे अध्यात्मवादियों जो इस सृष्टि को पूर्ण मानते थे, का विरोध करते हुए प्रसिद्ध व्यवहारवादी विचारक विलियम जेम्स ने कहा था किµ‘इस सृष्टि को पूर्ण मानना सर्वथा प्रतिक्रियावादी विचार है, क्योंकि इससे विकास की समस्त संभानाएं समाप्त हो जाती हैं. ऐसे में मनुष्य को करने के लिए कुछ रह ही नहीं जाता.’ व्यवहारवाद और उपयोगितावाद इस मामले में एक-दूसरे के करीब हैं कि दोनों की सृष्टि को वास्तविक और ज्ञेय मानते हैं.

विकासवाद, व्यवहारवाद, उपयोगितावाद जैसी दर्शन की आधुनिक विचारधाराओं पर वैज्ञानिक शोधों का प्रभाव स्पष्ट नजर आता है. उल्लेखनीय है कि दर्शनशास्त्र संबंधी भिन्न मतों, विचारधाराओं के बावजूद पूर्व और पश्चिम के प्राचीनतम दर्शनशास्त्रियों के समक्ष लगभग एकसमान समस्याएं रही हैं. जो सहज मानवीय जिज्ञासाओं का विस्तार थीं. पहली सृष्टि की उत्पत्ति और उसके पीछे निहित कारण और उसका औचित्य. दूसरी परमात्मा अथवा परमसत्ता का स्वरूप तथा उसको जानने अथवा प्राप्त करने के उपाय तथा आत्मा एवं परमात्मा के संबंधों की व्याख्या. तीसरी ज्ञान का आधार एवं उसका औचित्य, ज्ञान-प्राप्ति के प्रमुख साधन, बुद्धि एवं ऐंद्रियानुभव की प्रामाणिकता. आदिकाल से ही दार्शनिक इन शाश्वत दार्शनिक प्रश्नों से जूझते आ रहे हैं. लेकिन तब तक विज्ञान का इतना विस्तार नहीं हुआ और मनुष्य अपने ज्ञान के लिए निजी अनुभवों और तप-साधना(अध्ययन) पर निर्भर था, वह इस सृष्टि का कारणस्वरूप परमात्मा को मानता था. विराट प्रकृति के आगे सृष्टि उसको एक जंजाल लगती थी, इसलिए मृत्यु भय से मुक्त होना, मोक्ष प्राप्त करना उसका प्रमुख आध्यात्मिक ध्येय हुआ करता था. मगर जैसे-जैसे विज्ञान ने प्रकृति और मानवजीवन के गुत्थियों को सुलझाना आरंभ किया, अंतरिक्ष की यात्राओं, चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में आई क्रांति, भौतिकी के अभूतपूर्व आविष्कारों तथा जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान के चमत्कारों ने मनुष्य के सामने एक के बाद एक बौद्धिक ज्ञान के इतने सोपान खड़े कर दिए कि उसको यह भरोसा होना लगा कि सृष्टि की व्याख्या बिना किसी पारलौकिक अथवा काल्पनिक सत्ता की मदद से भी की जा सकती है. विज्ञान और उसके आविष्कारों, उपलब्धियों का दबाव इतना अधिक था कि दार्शनिकों को भी अपनी विचारधारा में तदनुरूप संशोधन करना पड़ा. फिर तो जैसे-जैसे प्रयोगशालाओं में कृत्रिम जीवन की संभावनाएं बढ़ती गईं, दर्शनशास्त्रियों ने भी ईश्वर, आत्मा, परमात्मा, पाप-पुण्य और स्वर्ग-नर्क जैसी मान्यताओं से किनारा करना आरंभ कर दिया है.

पश्चिम में आज की मौजूदा सर्वाधिक लोकप्रिय विचारधाराओं में तीन प्रमुख हैं—

1. व्यवहारवाद अथवा प्रागेमेटिज्म

2. विश्लेषणात्मक अथवा तर्कमूलक दर्शनशास्त्र

3. अस्तित्ववाद

व्यवहारवादी दार्शनिकों में अमेरिका के विलियम जेम्स प्रमुख हैं. अध्यात्मवाद प्रत्येक जागतिक कर्म तथा उसके लक्षणों, वस्तु आदि को पूर्वनियोजित मानता है. सृष्टि के केंद्र में परमात्मा को रखकर वह उसके रहस्यों को समझना चाहता है. वह परमात्मा को अपना सुदूर लक्ष्य मानता है तथा अपने और उसके बीच की जागतिक दूरी को पाटने के लिए वह सतत प्रयत्नशील रहता है. व्यवहारवादी दृश्यमान जगत से परे किसी भी सत्ता की उपस्थिति को पूरी तरह नकारते हैं. सृष्टि के केंद्र में मनुष्य को रखते हुए वे जागतिक सत्यों की वस्तुनिष्ठ व्याख्या करने का प्रयास करते हैं. जो वस्तु मनुष्य की दृष्टि से और पहुंच से परे है, उस वस्तु का मानवजीवन के लिए कोई उपयोग नहीं है. इसलिए प्रकृति, पुरुष, ब्रह्म, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य जैसी अवधारणाएं व्यवहारवादियों की निगाह में कोई मूल्य नहीं रखतीं. वे जगत को गतिशील मानते हैं. उनके अनुसार मनुष्य के कर्म पूर्वनिर्धारित न होकर उसके अपने विवेक एवं चयन पर निर्भर होते हैं. व्यवहारवादी के लिए किसी वस्तु का मूल्य उसकी जीवन में उपयोगिता से तय होता है. यदि कोई वस्तु जीवन में उपयोगी है, तो वह सत्य भी है. यह अध्यात्मवादियों की उस धारणा के विपरीत है जिसके अनुसार वे किसी वस्तु में अंतर्निहित सत्य को ही उसकी उपयोगिता का आधार मानते हैं. इस सत्य का आकलन परमसत्ता से उसकी निकटता के आधार पर किया जाता है. दूसरी ओर व्यवहारवादियों के लिए ‘उपयोगिता ही प्रामाणिकता’ है. चूंकि ईश्वर का ऐंद्रियक साक्ष्य संभव नहीं है, अतएव वह भी सत्य नहीं है, इसलिए वह ईश्वर के अस्तित्व को भी नकार देते हैं. हालांकि भौतिकवादियों की भांति व्यवहारवादी दार्शनिक ईश्वर की अवधारणा का सामान्यतः सीधे-सीधे विरोध नहीं करते. बल्कि वे उसे जनसामान्य की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान करने, उसके आचरण को नियंत्रित, मर्यादित बनाने के लिए जरूरी मानते हैंµऔर उसे उस समय तक स्वीकृति देने के पक्ष में हैं, जब तक कि मनुष्य का ज्ञान-विज्ञान इस जीवन और सृष्टि से जुड़े सभी प्रश्नों की तार्किक व्याख्या देने में सफल नहीं हो जाता. अमेरिकी व्यवहारवाद वस्तुतः यूरोप के मानववाद (शिलर) से प्रेरित है, जो इस चराचर जगत को मनुष्य की कर्मशाला मानता है.

मानववादी भी इस सृष्टि की व्याख्या मनुष्य को केंद्र में रखकर करते हैं. उनके अनुसार मनुष्य इस सृष्टि का सर्वश्रेष्ट प्राणी है. वह विवेक से काम लेता है. वह अपनी स्थिति में सुधार करने में सक्षम है. अतएव सृष्टि के सारे आयोजन मनुष्य के लिए हैं. उसके बिना या उससे परे वे प्रयोजनविहीन हैं. उनकी उपयोगिता मानवजीवन को अधिकाधिक सुख-सुविधामय बनाने में है. मनुष्य अपने कार्यों के संपादन हेतु पूरी तरह स्वतंत्र तथा स्वायत्त है. यहां भारतीय मानववाद और पाश्चात्य मानववाद में एक गुणात्मक अंतर देखने में आता है. भारतीय मानववाद में व्यक्ति नैतिक आचरण को केंद्र में रखकर, समस्त जीव समुदाय के सुखों पर विचार करते हुए, तदनुसार निरपेक्ष कर्म करने में विश्वास रखता है. जबकि पश्चिमी दर्शन में सुख का अभिप्रायः अपेक्षाकृत स्थूल संदर्भों में, प्रायः भौतिक सुखों से लिया जाता है. पूर्व और पश्चिम के दार्शनिक रुझानों में एक बड़ा अंतर यह भी देखने को मिलता है, कि वहां मनुष्य और उसकी चिंताएं दार्शनिक विवेचना का मूल विषय हैं. इसके विपरीत भारतीय दर्शन में, चिंतन का मूल विषय ब्रह्म यानी परमसत्ता को बनाया गया है. इहलोक भारतीय दर्शन की समस्या नहीं है. क्योंकि वह तो माया है, अभासी है, इसमें मन को रमाए रखना माया के प्रभाव में आकर अपने वास्तविक लक्ष्य को बिसरा देना है. माया से परे जाने के लिए सतत आत्मपरिष्कार जरूरी है, जो दीर्घ तपश्चर्या, सतत साधना, चित्तवृति निरोध, अस्तेय, अपरिग्रह तथा योग जैसी नैतिक व्यवस्थाओं द्वारा संभव है.

विश्लेषणात्मक अथवा तर्कमूलक दर्शनशास्त्र के विचारक यथा बट्रैंड रसेल, जी ई मूर, ए एन व्हाइटहैड